Monday, August 31, 2015

बिहार में महागठबंधन: नौ दिन चले अढ़ाई कोस?

लालूजी की रैली ताजा मामला है(रैली लालू की ही थी, ज्यादातर लोग उन्हीं के थे) तो उस पर लिखना बनता है। उस रैली में मेरे लिए एक लाइन की खबर ये है कि मुलायम उसमें नहीं आए थे क्योंकि सोनिया उसमें आई थीं और वरिष्ठता के हिसाब से मुलायम को आखीर में बोलने देने पर लालू-नीतीश भले ही सहमत हो जाते, सोनिया सहमत नहीं थी। 
जनता परिवार का जन्म और मृत्यु इतनी जल्दी हो जाएगा-इसका किसी को अनुमान नहीं था। हालांकि इसका संकेत मुलायम ने पिछले संसद सत्र में ही दे दिया जब उन्होंने संसद को वाधित करने की आलोचना कर दी थी।। दरअसल, मामला आनेवाले समय में विपक्ष के नेतृत्व का है जिसमें मुलायम सिंह अपनी दावेदारी चाहते हैं और जिसके लिए जनता परिवार के एका का प्रयास(या नाटक?) किया गया था। जबकि दूसरी तरफ नेहरु परिवार, सत्ता या विपक्ष की गद्दी पर अपना जन्मजात हक समझता है। मुलायम सन् 2019 के चुनाव के लिए उस हक को छीनना चाहते हैं। यह बिल्कुल स्वभाविक है। लेकिन नीतीश और लालू ने एक तरह से मुलायम को आश्वासन देकर अंगूठा दिखा गया। खैर,राजनीति में यह भी स्वभाविक लगने लगा है!  

हालांकि लालू-नीतीश ने इस बात का खयाल रखा कि सोनिया को आखीर में न बोलने दिया जाए-क्योंकि वो बात सोनिया को एक बड़े विपक्ष की संयुक्त नेता के तौर पर स्थापित होने का संदेश देती और मुलायम इससे और भी भड़क जाते। दूसरी बात ये कि वहां जो भी भीड़ थी, वो सोनिया को सुनने के लिए इंतजार ही नहीं करती। 
कल मैं रैली को लाइव नहीं देख पाया, लेकिन फेसबुक पर जो तस्वीरें दिख रही हैं वो रैली के बारे में मिश्रित संकेत देते हैं। एक तो लोग कम थे और जो लोग थे भी, वे लालू के समर्थक ज्यादा थे। शायद ताली भी लालू की बात पर ही ज्यादा बजी। 
रैलियों और चुनाव में हरेक राजनीतिक दल पैसा खर्च करता है-कोई ये कहे कि वो दूध का धुला है ये मानी नहीं जा सकती। लेकिन लोग उसी के ज्यादा जुटते हैं जिसके पास पैसे के साथ-साथ संगठन होता है। लालू-नीतीश की इस रैली ने उनके संगठन को बेनकाव किया है। पहले भी उस पर उन्होंने मेहनत नहीं की थी और भविष्य में भी ऐसा कोई इरादा उनका नहीं लगता। उनसे बेहतर संगठन तो मरी हुई वामपंथी पार्टियों का होता है।
कुल मिलाकर बिहार चुनाव का नतीजा अभी से साफ है। चुनाव बीजेपी गठबंधन जीतेगा, प्रश्न सिर्फ ये है कि कितने अंतर से जीतेगा?

Wednesday, August 26, 2015

पटेलों की आरक्षण की मांग

पटेलों को आरक्षण मिलने से सबसे ज्यादा दिक्कत किसे होनी चाहिए? जाहिर है, वर्तमान पिछड़ों को। और जाटों को आरक्षण मिलने से? उसमें भी वर्तमान पिछड़ों को दिक्कत होनी चाहिए कि कोई मजबूत जाति उसके हिस्से में सेंधमारी करने आ रही है। लेकिन पिछड़ों का कोई मजबूत प्रतिरोध सामने नहीं है। सिवाय एकाध फेसबुकिया विचारकों के पिछड़ों को अपने हितों की कोई चिंता नहीं है! ऐसे विचारक भी सोचते हैं कि इसे संघ परिवार की साजिश बताकर वे अपने ऐतिहासिक कर्तव्य की इतिश्री कर लेंगे। भला हो सुप्रीम कोर्ट का जो उनके हितों की रक्षा करता है।

पिछड़ों के कुछ नेता तो पटेलों को आरक्षण में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन उसके उलट याद कीजिए गुर्जर आन्दोलन को जो अ. ज. जाति में शामिल होने की मांग कर रहा था और मीणाओं ने सड़क पर उतर कर उनका विरोध किया था। इसे कहते हैं अपने हक के लिए लड़ना। हक की लड़ाई आत्ममुग्ध होकर और सिर्फ संख्या-बल के भरोसे चैन की बांसुरी बजाकर नहीं लड़ी जाती। पिछड़ी जातियों की आत्ममुग्धता का ये हाल रहा तो किसी साल यूपी के राजपूत आरक्षण को लेकर लखनऊ घेर लेंगे। तब क्या होगा? लेकिन सवाल उससे आगे का है।

आरक्षण का मुद्दा दरअसल वोट बैंक का मुद्दा होना नहीं चाहिए, यह विवेक का मुद्दा है। मंडल कमीशन के चेयरमैन बी पी मंडल ने जब इसका मसौदा तैयार किया था तो उनके मन में जातिगत पूर्वाग्रह नहीं था। वे वैसे भी एक बड़े जमींदार परिवार से थे जिन्हें सत्ता संरचना से लेकर समाज का जमीनी ज्ञान था। उन्होंने पिछड़ी जातियों में भी अत्यंत पिछड़ी जातियों की पहचान की थी और सवर्णों में भी गरीबों की पहचान की थी। हालांकि हर रिपोर्ट में सुधार की गुजाइंश हमेशा रहेगी, लेकिन बी पी मंडल का विवेक देखिए कि उन्होंने ब्राह्मणों में भी सबसे हीन माने जानेवाले महापात्र(श्मशान घाट का पुरोहित) को ओबीसी का दर्जा दिया और कई राज्यों में गंधर्व ब्राह्मणों(संगीत और नृत्य के पेशे वाले) को भी। मेरे जिला में भांटों और तेलिया ब्राह्मण(तेलियो को पुरोहित) को भी ओबीसी का दर्जा मिला। इसी तरह से हिमाचल प्रदेश और कई पहाड़ी राज्यों में ब्राह्मण-राजपूतों को भी ऐसा दर्जा मिला। ऐसे में उचित ही मंडल कमीशन में जाटों और पटेलों को स्थान नहीं मिला, जो न तो समाजिक दृष्टि से पिछड़ी थी और न शैक्षणिक दृष्टि से। हां, ये बहस का अलग मुद्दा है कि कुछ मजबूत जातियां फिर भी ओबीसी सूची में है-जैसे दक्षिण में नायडू या रेड्डी या बिहार के वैश्यों में कई समृद्ध जातियां।

लेकिन दिक्कत ये है कि आरक्षण को वोट से जोड़ दिया गया। ऐसा मान लिया गया कि आरक्षण आखिरी उपाय है-जबकि वो तो प्राथमिक उपाय था। हालात ये है कि सरकारी नौकरियों की संख्या इतनी घट गई हैं कि कई विभागों में कर्मचारियों के लिए बनाए गए सरकारी आवास खाली रहने लगे हैं। ऐसे में आरक्षण का फायदा ज्यादातर शैक्षणिक संस्थानों के लिए रह गया है। लेकिन केक का हिस्सा इतना छोटा है कि लड़ने वालों की कमी नहीं है। वोट के लालची नेताओं से तो उम्मीद कम है, लेकिन आशा है कि सुप्रीम कोर्ट हर किसी को आरक्षण मांगने और दे दिए जाने पर फिर से फटकार लगाएगा। लेकिन देश के बुद्धिजीवियों और राजनेताओं से ये मांग तो की ही जानी चाहिए कि ऐसे आर्थिक म़ॉडेल पर काम करें जिससे जॉबलेस ग्रोथ न हो। देश में जितनी बेरोजगारी बढेगी, आरक्षण की मांग उतनी ही सुलगती रहेगी।

Monday, August 24, 2015

जयपाल सिंह मुंडा, आदिवासी हितों के प्रथम प्रवक्ता

इस किताब का बहुत दिनों से इंतजार था। हालांकि ये किताब अभी मेरी निगाहों से नहीं गुजरी है कि इसके कंटेंट पर कुछ लिख सकूं। रामचंद्र गुहा की किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ का जब मैं अनुवाद कर रहा था तो पहली बार जयपाल सिंह मुंडा के बारे में कुछ विस्तार से पढने को मिला था। गुहा साहब ने लिखा कि भारत में ऐसे कई नायक, कई घटनाएं या कई महत्वपूर्ण लोग हुए जिन्हें आज तक उनका जीवनीकार नसीब नहीं हुआ। उसमें से एक आदिवासी अधिकारों के प्रथम प्रवक्ता, झारखंड आन्दोलन के जनक, संविधान सभा के सदस्य और मशहूर हॉकी खिलाड़ी जयपाल सिंह मुंडा भी थे। ऐसे लोगों ने इस देश की समाजिक-राजनीतिक संरचना को बदलने में अमूल्य योगदान दिया।
जयपाल सिंह मुंडा की शिक्षा-दीक्षा इसाई मिशन की वजह से हुई और मिशन की मदद से ही वे उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए ऑक्सफोर्ड गए। वहां वे ऑक्सफोर्ड की हॉकी टीम में मशहूर खिलाड़ी के तौर पर उभरे और ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ हासिल किया। उनकी मशहूरियत की एक वजह भारतीय हॉकी टीम के कप्तानी भी थी जिसने 1928 के ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल किया था। हालांकि वो उनकी शख्सियत का एक छोटा सा हिस्सा था, उनको तो अभी बड़े-बड़े काम करने थे।
भारत आने के बाद इसाई मिशन उन्हें धर्म प्रचार के कार्य में लगाना चाहता था जिससे जयपाल ने विनम्रता से इनकार कर दिया। उन्होंने झारखंड पार्टी की स्थापना की जिसने केंद्रीय-पूर्वी भारत में एक अलग आदिवासी राज्य की मांग की। उस प्रांत में वर्तमान झारखंड, बंगाल का कुछ हिस्सा, उड़ीसा का उत्तरी भाग और छत्तीसगढ के कई इलाके शामिल होने थे। हालांकि वो मांग मानी नहीं गई और उनके आन्दोलन के करीब साठ साल बाद एक छोटा सा झारखंड राज्य कथित तौर पर आदिवासियों के लिए बनाया गया जिसमें उस समय तक आदिवासियों की संख्या घटकर 26 फीसदी हो गई थी, जो सन् 1951 में करीब 51 फीसदी थी!

लेकिन जयपाल सिंह मुंडा का योगदान उससे कहीं बढकर है। उनका वो योगदान आदिवासी हितों की रक्षा को लेकर है। जब आजाद भारत के लिए संविधान सभा का गठन किया जा रहा था तो जयपाल सिंह मुंडा को भी उसका सदस्य बनाया गया। लेकिन अगस्त 1947 में जब अल्पसंख्यकों-वंचितों के अधिकारों पर पहली रपट प्रकाशित हुई तो उसमें सिर्फ दलितों के लिए विशेष प्रावधान किए गए। दलित अधिकारों को लेकर डॉ अम्बेदकर का एक मजबूत आन्दोलन रहा था और तत्कालीन नेतृत्व में उस पर सहमति बन चुकी थी। खुद अम्बेदकर अब संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे। उधर देश के बंटवारे के बाद अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के हित में बोलने वालों में खुद पंडित नेहरु और गांधी थे। अल्पसंख्यक अधिकारों से संबंधित प्रस्ताव खुद सरदार पटेल ने संविधान सभा में प्रस्तुत किए थे। भाषाई आन्दोलनकारी भी सक्रिय थे। लेकिन आदिवासी हितों पर बोलनेवाला कोई नहीं था। सरकारी नौकरियों और विधायिका में तो दलितों के लिए 15 फीसदी आरक्षण की बात मान ली गई लेकिन आदिवासियों को सब भूल गए। ऐसे में जयपाल सिंह मुंडा ने ये कमान संभाली और संविधान सभा में एक ओजपूर्ण भाषण दिया-
“एक जंगली और आदिवासी के तौर पर मैं कानूनी बारीकियों को नहीं जानता लेकिन मेरा अंतर्मन कहता है कि आजादी की इस लड़ाई में हम सब को एक साथ चलना चाहिए। पिछले छह हजार साल से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है तो वे आदिवासी हैं। उन्हें मैदानों से खदेड़कर जंगलों में धकेल दिया गया और उन्हें हर तरह से प्रताड़ित किया गया। लेकिन अब जब भारत अपने इतिहास में एक नया अध्याय शुरू कर कर रहा है तो हमें अवसरों की समानता मिलनी चाहिए और मैं चाहता हूं कि पंडित जवाहर लाल नेहरु की बातों पर भरोसा करुं कि उन्होने जो शब्द कहे हैं उसे सही तरीके से लागू किया जाएगा।”
उसके बाद संविधान सभा ने आदिवासियों की समस्या को स्वीकार करते हुए 400 आदिवासी समूहों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जो आबादी की करीब 7 फीसदी थी। उन्हें नौकरियों और विधायिया में 7.5 आरक्षण प्रदान किया गया।
उसके बाद केंद्रीय-पूर्वी भारत में एक अलग आदिवासी राज्य हासिल करने के लिए जयपाल सिंह ने एक आदिवासी महासभा का गठन किया जो बाद में झारखंड पार्टी बन गई और आज की झारखंड मुक्ति मोर्चा किस्म की पार्टियां उसी पार्टी की मानस-संतानें हैं। सन् 1952 के चुनाव में झारखंड पार्टी के तीन सांसद और तेइस विधायक जीत गए और आदिवासी राज्य का मुद्दा देश के पटल पर स्थापित हो गया। दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह उसी पार्टी के समर्थन से चुनाव जीतकर राज्यसभा के सदस्य बने थे।
अभी जिस नगा शांति वार्ता के मुकाम पर पहुंचने की बात हो रही है उसके जनक अनगामी जापू पिजो को जयपाल सिंह मुंडा ने अलगाववाद छोड़ने के लिए काफी समझाया था। जयपाल का कहना था कि पिजो को भी उसी तरह से पूर्वोत्तर में एक राज्य की मांग करनी चाहिए जिस तरह की मांग जयपाल कर रहे थे। लेकिन पिजो नहीं माने और नगालैंड करीब 50 साल तक अशांति के गर्त में डूबा रहा।
आज जयपाल सिंह मुंडा को बहुत से लोग नहीं जानते। आदिवासियों के नाम पर झारखंड में बनी एक के बाद एक सरकारों ने भी मुंडा के लिए कुछ नहीं किया। शायद रांची में उनके नाम पर कोई स्टेडियम भर है। उन पर रांची के किसी सज्जन ने एक गुटखा किस्म की कितबिया लिखी थी जो बहुत प्रचारित नहीं हो पाई। उम्मीद है कि अब इस किताब में हमें जयपाल सिंह मुंडा के बारे में कई अनजानी बातें पढने को मिलेंगी। इस किताब के लिए लेखक ए के पंकज को ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं।

Wednesday, August 19, 2015

बिहार चुनाव@पैकेज

 बिहार के लिए बढिया हुआ कि नीतीश कुमार पिछले साल नरेंद्र मोदी से भिड़ गए। कम से कम competitive politics के बहाने ही सही बिहार को कुछ तो देने की घोषणा हुई। नीतीश बाबू साथ होते तो इतनी बड़ी रकम थोड़े ही मिलती. अब बिहारी गिन रहे हैं कि इस पैकेज में कितने जीरो हैं और पटना व नोएडा में फ्लैट की कीमत कितनी बढेगी। 


एक जमाने में ऐसा पैसा-मार और प्रोजेक्ट उठाऊ पॉलिटिक्स तमिलनाडु टाइप के दक्षिण के सूबे करते थे। इस बात का श्रेय नीतीश कुमार को इमानदारी से देना चाहिए कि उन्होंने बीजेपी को इतने बड़े पैकेज देने पर मजबूर कर दिया।

PIB की साइट पर देख रहा हूं कि नए हवाई अड्डों में रक्सौल और पूर्णिया को विकसित किया जाएगा-यानी हमलोग जो दरभंगा की मांग कर रहे थे वो मांग फिलहाल खटाई में समझी जाए। वैसे पूर्णिया भी बुरा विकल्प नहीं है, मेरे घर से मात्र तीन घंटे का रास्ता है। हां, पटना में नया हवाईअड्डा जरूरी है जिसकी बात इस पैकेज में है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

भागलपुर में एक नया केंद्रीय विश्वविद्यालय। आमीन। शायद विक्रमशिला विश्वविद्यालय नाम रखा जाए! नीतीश के नालंदा के जवाब में भाजपा का विक्रमशिला-मानो हिंदू यूनिवर्सिटी के जवाब में अलीगढ। competitive politics का अपना मजा है!

बिहार शायद पहला सूबा बन जाएगा जहां पर राज्य विश्वविद्यालयों की संख्या के बराबर ही केंद्रीय विश्वविद्यालय हो जाएंगे! गया, मोतिहारी, नालंदा, पूसा कृषि वि.वि., स्किल यूनिवर्सिटी, किशनगंज(अलीगढ की शाखा) के बाद अब भागलपुर! बात बुरी नहीं है-लेकिन अपने आप में एक बड़ा कटाक्ष है कि राज्य में पिछले करीब सात दशकों में कितने कम विश्वविद्यालय बने। और केंद्र ने तो उस सात में से छह दशक तक कुछ स्थापित ही नहीं किया। मामला ये भी है कि बिहारी पढने में तेज होते हैं, लेकिन बिहारी लोग अच्छा कॉलेज और अच्छा विश्वविद्यालय नहीं खोल पाते।

गंगा, कोसी और सोन पर नए पुल की घोषणा है। अच्छी बात है..बिहार में गंगा की लंबाई करीब 400 किमी है जबकि अभी तक इस पर ढंग का डेढ पुल(एक मोकामा और आधा नौगछिया-भागलपुर) काम कर रहा है। जबकि कम से कम 6-7 पुल होना ही चाहिए। नीतीश बाबू ने भी इस दिशा में ठीक-ठाक काम किया था। गंगा पर नया पुल जरुरी भी था। कोसी पर नए पुल की जो बात है, वो कहां बनेगा? देखने वाली बात होगी।

सॉफ्टवेयर पार्क की तो बात है लेकिन क्रियान्वयन कमजोर है। दरभंगा में पिछले साल एक सॉफ्टवेयर पार्क की बात हुई, लेकिन जमीन ही अभी तक नहीं मिल पाई। इसमें राज्य सरकार का भी रोल है, लेकिन जहां राज्य और केंद्र एक दूसरे से हमेशा भिड़ंत की मुद्रा में हो, वहां ऐसे प्रोजेक्ट कितना कामयाब होंगे-ये विचारणीय बात है।

कुल मिलाकर बिहारियों के बल्ले-बल्ले हैं। वोट में तो खैर जाति, कंवर्ट होती है। हां, पैकेज से परसेप्शन कुछ जरूर बनेगा। अब देखना है कि दूसरे राज्य इस भीमकाय पैकेज को किस तरह लेते हैं। कहीं ममता बनर्जी ये न कह बैठे कि वित्त मंत्रालय को दिल्ली से उठाकर कलकत्ता में स्थापित कर दिया जाए!

Tuesday, August 11, 2015

बिहारी अस्मिता@DNA

 नीतीश कुमार की पार्टी ने ठीक किया कि 50 लाख DNA सैम्पल भेजने की जगह नाखून और बाल ही लिफाफे में भिजवा रही हैं। बाल से समस्या आसान होगी, एक ही लिफाफे में हजार-हजार बाल आ जाएंगे। क्योंकि वैसे भी 50 लाख लोगों के DNA टेस्ट तो बिहार के स्वास्थ्य संस्थान में क्या होते, देश भर के डॉक्टर हांफ जाते। 

नीतीश ने जिस हिसाब से बिहारी अस्मिता की लड़ाई शुरू की है, उसमें कई समस्याएं है। नीतीश कुमार राजनीति के विद्यार्थी हैं, उन्हें क्या समझाना। ये यूपी, बिहार, टाइप के सूबे हैं न..वो सूबाई अस्मिता की बात नहीं करते-वे तो अपने आपको इस मुल्क का बाप समझते हैं। ये ऐसे सूबे हैं जहां कर्नाटक और मध्यप्रदेश का आदमी आकर यहां की पार्टियों का अध्यक्ष बन जाता है और सिर्फ अपनी खोपड़ी का खाता है। यहां के लोगों को कोई असुरक्षा बोध नहीं होता।

यूपी में तो एक पंजाब में जन्मी और समाजवादी सिंधी से ब्याही कांग्रेसी बंगालन CM बन गई थी ! देखा जाए तो ये बहुत उदार इलाके हैं-जब मैडम इंदिरा गांधी चिकमगलूर नहीं गई थी उससे बहुत पहले आचार्य कृपलानी, सीतामढी से चुनाव जीत गए थे। ये बातें तमिलनाडु या गुजरात में तब संभव नहीं थी। ऐसे इलाकों के लोग जब सूबाई अस्मिता की बात करें तो शोध का विषय बनता है।

एक बार राजीव गांधी ने आंध्रप्रदेश के CM को हवाईअड्डे पर इतना डांटा कि वेचारे CM की आंखों से बरखा-बहार उमड़ आई। लेकिन उसका फायदा वहां एक फिल्मस्टार एनटी रामाराव ने उठाया और एक पार्टी बना ली। कहा कि तेलुगु बिड्डा का अपमान हुआ है। तेलुगु देशम पार्टी चुनाव में स्वीप कर गई। असम में एक बार अस्मिता वाली बात पर तैंतीस साल का नेता सीएम बन गया। DMK जब 1967 में सत्ता में आई तो उसमें अस्मिता का पुट था। 

इन तमाम अस्मिताओं में कहीं न कहीं विराट हिंदी पट्टी के वर्चस्व के खिलाफ एक असुरक्षा का भाव था। लेकिन बिहार की कौन सी खास अस्मिता है ? क्या व्याख्या है उसकी? पिछले साठ सालों में बिहार ने किस असुरक्षा भाव को जिया है या कब-कब अस्मिता की आवाज उठाई है? बिहारी अस्मिता से कई गुणा ज्यादा तो दिल्ली में मैथिली और भोजपुरी के वास्तविक और फर्जी संगठन अस्मिता के नाम पर कार्यक्रम कर लेते हैं।

कुछ लोग व्यंग्य में कहने लगे हैं कि नीतीश कुमार का खुद का DNA तत्कालीन जद-यू नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी से मेल नहीं खाता, उन्होंने इसीलिए उनको आम और लीची नहीं खाने दिया था। पता नहीं क्या सचाई है।

बात डीएनए की आई तो हमारे यहां मुजफ्फरपुर की एक लड़की थी-नवारुणा। तीन साल पहले गुंडो ने उसे घर से उठा लिया था, आज तक नहीं मिली। कहते हैं कि उसकी हड्डी मिली थी। बिहार पुलिस की तो छोड़िए, आजतक CBI उसके DNA का मिलान नहीं कर पाई। फिर 50 लाख लोगों का DNA कौन मिलान करवाएगा। आज एक अखबार ने ठीक लिखा है-एक अत्यधिक पिछड़े सूबे का चुनाव हाईटेक हो गया है। बातें ट्विटर और DNA से नीचे की ही नहीं जा रही। 

कुछ साल पहले बाल ठाकरे परिवार ने भी दावा किया था कि उनके परिवार के DNA में कुछ बिहारी गुणसूत्र हैं। आशा है कि नीतीश कुमार कम से कम ठाकरे परिवार से अपना नाता कतई नहीं जोड़ेंगे। हालांकि राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने ठाकरे परिवार के साथ कंधा में कंधा मिलाकर प्रणब दादा को जरूर वोट किया था! 

नीतीश कुमार का मजबूत पक्ष उनका विकास पुरुष होना था, जो अपेक्षाकृत जाति से ऊपर की छवि रखता था। ऐसा नेतृत्व बिहार को पिछले छह दशक में मुश्किल से मिला था। उनको विकास के मुद्दे को केंद्र में रखना चाहिए, DNA जैसे मुद्दे पर उन्हें अपनी ऊर्जा नहीं गंवानी चाहिए।