Friday, December 2, 2016

सोशल मीडिया: किधर जा रहा है?

हर युग किसी खास घटना,व्यक्तित्व या विचारधारा से प्रभावित होता है और उस युग का नामकरण भी उसी अनुरूप कर दिया जाता है. सोशल मीडिया का जिस हिसाब से प्रचार-प्रसार और प्रभाव बढ़ा है, कुछ लोग इसे सोशल मीडिया युग भी कहने लगे हैं. आज के युग में जो कोई सोशल मीडिया पर नहीं है, उसके असितित्व पर ही कई बार शक कर लिया जाता है! सोशल मीडिया की ताकत इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि वह कई बार मुख्यधारा की मीडिया या पारंपरिक मीडिया को भी प्रभावित करने की स्थिति में आ जाता है.  
 
ऐसे में सवाल यह उठता है कि इससे आगे इसकी दिशा क्या है और इसका कितना प्रभाव बढ़ेगा. इस प्रश्न का एक संभावित जवाब पाने से पहले आइये हम कुछ अन्य बातों पर विचार करें.
सोशल मीडिया ने आमजन को एक आवाज दी है. यहां हर कच्चा से कच्चा विचार अपना स्थान पा जाता है, जिसका आमतौर पर कोई दूरगामी असर नहीं होता लेकिन हर वो विचार भी जगह पा जाता है जो सिस्टम को बदलने या किसी ठोस बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण हो जाता है. कई ऐसी बातें जो कई बार निहित स्वार्थों/दबावों की वजह से मुख्यधारा की मीडिया में नहीं आ पाती, सोशल मीडिया में आकर विमर्श को प्रभावित करने में सफल हो जाती हैं. हाल के समय में कई ऐसे अपराध, भ्रष्टाचार या कई कुरुतियों के खिलाफ सोशल मीडिया में अभियान चलाए गए और उसका अपेक्षित नतीजा भी निकला. सरकार और सत्तातंत्र को उसे सुनना पड़ता है. चाहे बिहार में रॉकी यादव की गिरफ्तारी, शहाबुद्दीन को जेल या तीन तलाक का मसला, चाहे वन रैंक वन पेंशन की बात हो या फिर हाल ही में एक बड़े मीडिया हाऊस को सरकार द्वारा एक दिन के लिए बैन करने का मसला-सोशल मीडिया में हर विषय पर घनघोर बहस हुई है और उन बहसों ने जनमत को प्रभावित किया है. नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल या अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत में सोशल मीडिया की एक प्रभावी भूमिका से कोई इनकार नहीं करता.

अगर फेसबुक की बात करें जिसका फलक ज्यादा व्यापक है तो दुनिया में करीब 1.6 अरब लोग फेसबुक पर हैं, तो भारत में इसके 16.6 करोड़ मासिक यूजर हैं. भारत में प्रतिदिन करीब 8.5 करोड़ लोग फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं और प्रति दिन करीब 55 मिनट तक इस पर व्यतीत करते हैं. जिस हिसाब से मोबाइल फोन की संख्या और मोबाइल इंटरनेट की संख्या में इजाफा हो रहा है, यह संख्या कई गुणा बढ़नेवाली है.

कुल मिलाकर सोशल मीडिया संगठित सत्ता और पारंपरिक मीडिया की सत्ता को गहरे चुनौती दे रहा है. यह सूचना का लोकतंत्रीकरण है जिसमें हर किसी का ओपनियन सामने आ रहा है भले ही कितना ही कच्चा क्यों न हो. हां, उसमें ये खतरा जरूर है कि तथ्यों की गड़बड़ी, अफवाह और असंपादित विचार भी सामने आ रहे हैं जो कई बार सूचना के दृष्टिकोण से उपयुक्त नहीं होते और जिस वजह से सोशल मीडिया की विश्वसनीयता अभी तक संदेह के घेरे में है. अभी ये बहस भी जोरों पर है कि क्या फेसबुक गलत सूचनाओं को प्रतिबंधित करने जा रहा है? क्योंकि कुछ जानकार कह रहे हैं कि अगर फेसबुक ने 'कृत्रिम खबरों' को प्रतिबंधित किया तो उसे राजस्व का भारी नुक्सान होगा.
जो भी हो, सोशल मीडिया ने इसने इतना तो किया ही है कि संगठित सत्ता और संगठित मीडिया के वर्चस्व को तगड़ी चुनौती दे दी है.

जिस तरह से फेसबुक ने लाइव वीडियो(फेसबुक लाइव) शुरू किया है, आनेवाले समय में वीडियो कंटेंट की महत्ता और बढ़ जाएगी और न्यूज में विविधता आएगी. अब सिर्फ एक मोबाइल और ठीकठाक कनेक्टिविटी से कहीं से भी किसी भी घटना को लाइव दिखाना संभव हो पाएगा. यह सोशल मीडिया की नयी ताकत है. साथ ही ये भी कि जिस तरह से फेसबुक ने वीडियो को 'मोनेटाइज' करना शुरू किया है, आनेवाले समय में यह गूगल के लिए एक बड़ी चुनौती बनेगा और उसके बाजार में सेंधमारी करेगा.

सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा हिट वीडियो के आते हैं, फिर तस्वीर और फिर टेक्स्ट पढ़ा जा रहा है. यानी भविष्य वीडियो का है और उसमें पैसा भी आनेवाला है. इस क्षेत्र में रुचि रखनेवालों को इन बातों का खयाल रखना चाहिए.

दूसरी तरफ सोशल मीडिया खासकर फेसबुक अत्यधिक मोबाइल-केंद्रित होता जा रहा है और मातृभाषा-सहज है. इसका मतलब ये है कि जनभावना को ज्यादा से ज्यादा प्रकट करने का कोई मंच है तो वो सोशल मीडिया है. ऐसे आंकड़े सामने आ रहे हैं कि लोग ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया का इस्तेमाल मोबाइल पर करने लगे हैं और सोशल मीडिया ने भी उसके अनुरूप अपने आपको ज्यदा से ज्यादा ढ़ालना शूरू कर दिया है. भारत में मोबाइल फोन की संख्या करीब 90 करोड़ तक पहुंचने वाली है और ज्यादा से ज्यादा लोग उस पर इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं जो साक्षरता और बेहतर आर्थिक स्थिति के साथ बढ़ती ही जा रही है. 

सबसे बड़ी बात ये है कि इंग्लिश की तुलना में देसी भीषाओं में लोग ज्यादा से ज्यादा फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल कर रहे हैं. एक आंकड़े के हिसाब से भारत में अंग्रेजी में ऑनलाइन कंटेंट की बृद्धि दर करीब 45 फीसदी सालाना है तो देसी भाषाओं में ये करीब 100 फीसदी है. ये देसी भाषाओं के लिए स्वागत की बात है हालांकि अभी पक्के तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि इससे भाषाओं का विकास होगा या बाजार अपनी सहूलियतों के लिए ऐसा कर रहा है. लेकिन जो भी हो, हिंदी या अन्य राष्ट्रीय भाषाएं ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लाई जा रही हैं ऐसा फेसबुक का आधिकारिक बयान है. 

जहां तक मीडिया हाऊसों का सवाल है तो हाल तो ये है कि वेबसाइट्स की ट्रैफिक का 30 से 40 फीसदी हिस्सा तक फेसबुक से आ रहा है. यानी पारंपरिक न्यूजसाइट सिर्फ कंटेंट प्रोवाइडर बनते जा रहे हैं और सोशल मीडिया असली करियर बनता जा रहा है. जैसा कि पहले भी लिखा जा चुका है, फेसबुक पर फिलहाल दुनिया के 1.6 अरब लोग हैं. आप अंदाज लगाइये कि फेसबुक कि इस दुनिया में किसी छवि को संवारने में या बिगाड़ने में क्या हैसियत हो गई है!
 
अब प्रश्न ये है कि इससे आगे का रास्ता क्या हो सकता है? फेसबुक ने जिस तरह से सोशल मीडिया में और इंटरनेट की अन्य कंपनियों को पछाड़ या है, अब आगे का क्या रास्ता है? फिलहाल, फेसबुक ने सिर्फ वीडियो मोनेटाइजेशन किया है और फेसबुक लाइव शुरू किया है-यह यूट्यूब को एक तगड़ी चुनौती है जो पहले से ऐसा करता आ रहा है. लेकिन कल को अगर कोई कंपनी इससे भी एक कदम आगे बढ़कर ज्यादा समय व्यतीत करनेवाले और विज्ञापन पर क्लिक करनेवाले यूजर्स को राजस्व में हिस्सेदारी देने लगे तो क्या होगा

ये अभी काल्पनिक सवाल हैं. हो सकता है आनेवाले दिनों में ऐसा हो. क्योंकि हर कंपनी की एक लाइफ साइकिल होती है और अगर उस दरम्यान वो कंपनी अपने आपको नए तरीके से नहीं ढालती या नवाचार नहीं करती तो वो मौत की तरफ बढ़ जाती है. आनेवाला समय दिलचस्प होगा.

Monday, November 23, 2015

अपेक्षित बनाम उपेक्षित@तेजस्वी यादव

    सोशल मीडिया और अखबारों में लालू यादव के सुपुत्र तेजस्वी यादव के शपथ ग्रहण के समय अपेक्षित को उपेक्षित बोलने पर भारी मजाक बनाया जा रहा है। मेरे खयाल से यह उचित नहीं है। 
    आधे से ज्यादा पत्रकारों और करीब 80 फीसदी पब्लिक को पूछा जाए कि अपेक्षित और उपेक्षित में क्या फर्क है तो दांत निपोड़ देंगे। लेकिन लालू  के कुंअर  ने कह दिया तो मजे ले रहे हैं।  उस जमाने के लोग ऐसा ही एक किस्सा राजीव गांधी का सुनाते हैं कि बंदे ने कथित तौर पर ये पूछ लिया था कि गेंहू का पेड़ कैसा होता है! जमाना ट्विटर का नहीं था, वरना भारी ट्रॉल होता।
    80 फीसदी वामपंथियो को ये नहीं पता है कि फासीवाद की परिभाषा क्या है। लेकिन सोने से पहले औ...र जागने के बाद एक बार फासीवाद जरूर बोलेंगे। करीब 70-80 फीसदी बिहारियों को ये नहीं पता कि श और र कैसे बोला जाता है, लेकिन मजा लेने में वे कम नहीं हैं। जब मैं दिल्ली आया था तो दिल्ली वालों ने खुद मेरा मजा ले लिया था।
    90 फीसदी टीवी एंकर-एंकरानियां और स्क्रिप्ट राइटर इस बात से भ्रमित हैं कि गृह-मंत्री होता है या ग्रह-मंत्री। लेकिन टीवी एंकर दुनिया का सबसे काबिल आदमी मान लिया जाता है। एंकरानियां उससे भी काबिल। जनता में।
    कुल मिलाकर जिसे देखो फिराक में लगा हुआ है कि तुम गलती करो-फिर मैं पानी उतारता हूं।
    मुझे लगता है कि नेताओं को इससे फर्क नहीं पड़ता। वे ऐसे किसी का मजाक नहीं उड़ाते। ये बीमारी पब्लिक में ज्यादा है। विरोध काम का होना चाहिए न कि उच्चारण का या ड्रेस का। लालूजी के बेटे को जी-न्यूज में एंकरिग थोड़े ही करनी है?
    (यह आलेख हिंदुस्तान दैनिक के राष्ट्रीय संस्करण में 23.11.2015 को प्रकाशित हो चुका है)

Friday, November 13, 2015

उदारवाद का प्रतीक एक भविष्यद्रष्टा प्रधानमंत्री


खलील जिब्रान ने लिखा है कि किसी व्यक्ति के दिलो-दिमाग को अगर समझना है तो इस बात को नहीं देखिए कि उसने अब तक क्या हासिल किया है, बल्कि इस बात पर गौर कीजिए कि वह क्या करने की अभिलाषा रखता है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के व्यक्तित्व पर विचार करने के लिए जिब्रान की यह उक्ति एक कसौटी हो सकती है। समस्या यह है कि नेहरु के व्यक्तित्व पर विचार करते समय देश की वर्तमान परिस्थिति और कांग्रेस पार्टी का मौजूदा नेतृत्व कुछ ज्यादा ही हावी हो जाते हैं, जबकि नेहरु का मूल्यांकन सम्पूर्णता में होना चाहिए। नेहरु का मूल्यांकन अतीत और वर्तमान दोनों के आइने में होना चाहिए-तभी हम उनके व्यक्तित्व की एक मुकम्मल तस्वीर हासिल कर पाएंगे।

आजाद भारत में नेहरू का प्रधानमंत्री बनना महज संयोग नहीं था, बल्कि नेहरु का व्यक्तित्व उन बहुत सारी बातों को परिलक्षित करता था जो इस देश की वास्तविकता थी और जिसे इस देश को अपने भविष्य में हासिल करना था और जिसका वादा आजादी की लड़ाई के दौरान किया गया था। इसमें कोई दो मत नहीं कि नेहरु, गांधी के सबसे प्रिय उत्तराधिकारी थे-एक प्राच्यवादी और देसी मानसिकता के गांधी के उत्तराधिकारी जिसे तत्कालीन और बाद के भी कई उदार वाम इतिहासकारों ने हिंदू राइट की संज्ञा दी थी। लेकिन इसके उलट नेहरु एक हद तक पश्चिमी, आधुनिक, वैज्ञानिक मूल्यों को मानने वाले और समाजवाद की ओर झुके हुए व्यक्तित्व के थे। फिर भी गांधी के वे प्रिय शिष्य थे और कम से कम गांधी इस बात से मुतमईन थे कि इस देश की बहुलता, अखंडता, उदारवादी मूल्य और परंपरा के साथ वैज्ञानकि चेतना का सम्मिश्रण अगर हो सकता है तो वो नेहरु के व्यक्तित्व में ही संभव है। यह उस पीढी के नेतृत्व की उदारता थी जिसे गांधी की हत्या के बाद उनके सबसे प्रमुख शिष्यों में से एक पटेल ने भी स्वीकार किया था, जबकि बकौल डोमिनिक लेपियर उस समय कांग्रेस संगठन पर पटेल का लौह नियंत्रण था।
 

नेहरु का मूल्यांकन करते समय उस कालखंड की समस्याओं पर एक नजर डालनी जरूरी है और आज की समस्याओं से उनकी तुलना भी। आजादी के बाद की मुख्य समस्याएं थीं-देश के बंटवारे के बाद की साम्प्रदायिक स्थिति, पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थियों का पुनर्वास, सैकड़ों रजवाड़ों में बंटे देश का एकीकरण, भयंकर समाजिक-आर्थिक विषमता, दो ध्रुबों में बंट चुकी दुनिया और उनकी चुनौतियां और सबसे बड़ी बात कि एक सार्थक लोकतंत्र की बहाली और उसे गतिशील बनाना। ये तो प्राथमिकताएं थीं लेकिन इसके अलावा एक वैज्ञानिक सोच से युक्त समाज निर्माण के लिए प्रेरक तत्व की भूमिका निभाना और ठोस नींव पर खड़े लोकतांत्रिक संस्थानों को गरिमा देना भी सरकार के एजेंडे में होना था। नेहरु के व्यक्तित्व का आकलन इन्हीं बिंदुओं पर किया जाना चाहिए कि वे उसमें कितना सफल हुए या उस दिशा में वे कितना अग्रसर हुए।

उस कालखंड की कई समस्याएं वर्तमान में भी ज्यों की त्यों बनी हुई है और कई तो उससे भी विकराल हो चुकी हैं जिसका सामना नेहरु ने किया था। ऐसे में नेहरु का अध्ययन अभी के लिए और आने वाले समय के लिए भी ज्यादा से ज्यादा प्रसांगिक होता जाएगा।

नेहरु से किसी विदेशी पत्रकार ने उनके जीवन और कार्यकाल के अंत में एक साक्षात्कार में पूछा था कि आप अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं? नेहरु का जवाब था, एक अत्यधिक धार्मिक मानसिकता वाले देश में एक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के निर्माण की दिशा में कोशिश करना।नेहरु के उन पत्रों में जो वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक नियमित अंतराल पर लिखते रहते थे, देश के अल्पसंख्यकों के प्रति चिंता साफ झलकती है। देश के बंटवारे के समय हुई भयानक हिंसा ने नेहरु और उस पीढी के कई नेताओं को गहराई से प्रभावित किया था और गांधी की हत्या के बाद साम्प्रदायिकता देश के केंद्र में दस्तक दे रही थी। ऐसे में स्वभाविक ही था कि सरकार का मुखिया साम्प्रदायिकता को अपना दुश्मन नंबर एक कहता था और सन् बावन में हुए पहले आम चुनाव में नेहरु ने इसे एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी बनाया था।

उस जमाने में सरकार और कांग्रेस संगठन में शीर्ष स्तर पर कई बार नेहरु और पटेल के बीच मतभेद के बिंदु उभर कर सामने आए थे लकिन नेहरु ने साम्प्रदायिकता पर अपना स्पष्ट रुख बनाए रखा। चाहे तो पुरुषोत्तम दास टंडन का कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हो या राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपति बनना, नेहरु ने हर बार अपना स्पष्ट मत जाहिर किया। नेहरु ने उस समय भी अपना स्पष्ट विरोध जाहिर किया जब राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर पुनर्निमाण के उद्घाटन में जाने का फैसला किया। हिंदू कोड बिल को पारित करवाने में नेहरु ने अम्बेदकर के साथ कंधा में कंधा मिलाकर काम किया, हालांकि डॉ अम्बेदकर उसे तीब्र गति से पारित करवाना चाहते थे। लेकिन नेहरु जानते थे कि उनकी सीमाएं क्या हैं और वे एक हद तक बंटवारे के बाद की तत्कालीन हिंदू भावनाओं से सीधा टकराव भी नहीं चाहते थे। डॉ अम्बेदकर, सामान नागरिक संहिता के हिमायती थे लेकिन नेहरु ने इसे भविष्य में उचित समय आने तक के लिए छोड़ देने का आग्रह किया क्योंकि बकौल नेहरु, देश के अल्पसंख्यक इस समय बंटवारे के बाद की स्थिति में भय के साये में जी रहे थे और उन्हें एक मरहम की जरूरत थी। तो नेहरु की धर्मनिरपेक्षता इस तरह की थी, जो नारों या सतही जुमलों से कम उनके कार्यों से ज्यादा झलकती थी।

सन् अस्सी के दशक में कई बार पाकिस्तान का दौरा कर चुके प्रसिद्ध स्तंभकार चाणक्य सेन ने पाकिस्तान डायरी नामकी किताब में पाकिस्तान के एक मशहूर पत्रकार को उद्धृत किया जिसमें उसने कहा था कि पाकिस्तान की बदनसीबी ये रही कि कायदे आजम जिन्ना की जल्द ही मृत्यु हो गई और वहां के पहले प्रधानमंत्री को सालभर के अंदर गोली मार दी गई। जबकि हिंदुस्तान को नेहरु के नेतृत्व में एक लंबा और स्थायी शासनकाल मिला। नेहरु जिस हिसाब से देश में पहले आम चुनाव के लिए व्याकुल दिख रहे थे और जिस काबिलियत से उनकी सरकार ने पहले निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन को इसकी जिम्मेवारी सौंपी थी, वो नेहरु की लोकतंत्र में आस्था दर्शाता था। हालांकि उसकी एक वजह ये भी थी कि नेहरु नई संसद द्वारा कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवाना चाहते थे जिसमें हिंदू कोड बिल और जमींदारी उन्मूलन से संबंधित विधेयक भी थे। लेकिन अन्य वजह ये भी थी कि नेहरु इस देश को जल्द से जल्द लोकतंत्रिक प्रक्रिया से पहला साक्षात्कार करवाना चाहते थे जिसकी कई विदेशी विद्वानों ने एक खतरनाक जुआ कहकर आलोचना भी की थी। यहां गौर करने वाली बात ये है कि भारत के साथ आजाद हुए कई देशों(इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो हमारे साथ आजाद हुआ पाकिस्तान ही है)में लोकतंत्र की जगह अधिनायकवाद पनप आया, जबकि नेहरु के नेतृत्व में भारत में तीन निर्विघ्न लोकसभा चुनाव हुए और दर्जनों विधानसभाओं के चुनाव भी। उस जमाने में भी विदेशी आलोचकों ने भी किसी भी स्तर पर उन चुनावों को भेदभावजनक करार नहीं दिया। आजाद भारत, लोकतंत्र की पथरीली राह पर धीरे-धीरे अपना मजबूत कदम बढा रहा था और उस भारत के सबसे बड़े नायक जवाहरलाल नेहरु ही थे।       

नेहरु ने कल कारखानों को आजाद भारत का तीर्थ कहा था। देश में विशाल इस्पात के कारखाने, पनबिजली परियोजनाएं, परमाणु बिजली के संयंत्र नेहरु सरकार की देन है। सरकार ने योजना-वद्ध विकास का एजेंडा तैयार किया था जो थोड़ा-थोड़ा सोवियत मॉडेल से प्रभावित था। हालांकि ऐसा नहीं है कि इसमे सिर्फ समाजवादी प्रभाव था, हकीकत तो ये है कि उस जमाने के उद्योगपति भी चाहते थे योजनावद्ध विकास का मॉडेल अपनाया जाए। देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों ने आजादी के पूर्व ही बंबई प्लान के नाम से  एक रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें सरकार से आग्रह किया गया था कि वो बुनियादी ढांचों में निवेश करे क्योंकि निजी क्षेत्र उस क्षेत्र में जाने के लिए तैयार नहीं था। दूसरी बात ये थी कि देश में भीषण आर्थिक असमानता थी और ऐसे में एक शिशु अर्थव्यवस्था को बिल्कलु निजी हाथों में छोड़ देने के अपने खतरे थे। भारत एक पूंजीवादी-साम्राज्यवादी देश की गुलामी से हाल ही में मुक्त हुआ था और देश का आम जनमानस भी पूंजीवाद को संशय की दृष्टि से देखता था। दुनिया के अधिकांश देशों में ये मानसिकता थी जो साम्राज्यवाद के चंगुल से उस समय मुक्त हो रहे थे। विदेश नीति के क्षेत्र में जवाहर लाल नेहरु ने जिस गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया, वो भी उसी भाव से प्रेरित था। ऐसे में नेहरु सरकार ने जिस योजनावद्ध विकास का मॉडेल अपनाया, उसकी कामयाबी पर बहस हो सकती है, लेकिन उसके उद्येश्यों पर नेहरु के विरोधी भी सवाल नहीं उठाते।

नेहरु के कार्यकाल में ही भाषा के आधार पर देश में पहली बार राज्यों का निर्माण हुआ था। हालांकि शुरू में खुद प्रधानमंत्री उसके समर्थक नहीं थे। हाल ही में धर्म के नाम पर देश का बंटवारा हो चुका था, सरकार इस बात से आशंकित थी कि भाषा के मुद्दे पर नया उथल-पुथल शुरू न हो। लेकिन आंध्रप्रदेश के आन्दोलनकारी पोट्टी श्रीराममलु ने जब राज्य के मुद्दे पर अनशन करते हुए जान दे दी तो नेहरु सरकार ने अपनी नीति पर पुनर्विचार किया। ऐसा ही पुनर्विचार सरकार ने हिंदी को लागू किए जाने पर किया और नेहरु के उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री ने भी सन् 1965 में वैसा ही किया। इस बात के लिए धुर हिंदीवादियों ने नेहरु के नेतृत्व की आलोचना की कि देश में अंग्रेजी के लिए एक चोर-द्वार खोल दिया गया लकिन इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि देश की अखंडता के मुद्दे पर तत्कालीन नेतृत्व ने भाषा के मुद्दे पर नरम रुख अख्तियार कर लिया। जबकि उसी समय हमारे पड़ोसी श्रीलंका और पाकिस्तान में भी कुछ ऐसी ही जिद वहां के बहुसंख्यकों ने कर ली थी, नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान के कुछ ही सालों में दो टुकड़े हो गए और श्रीलंका करीब आधी सदी तक उथल-पुथल से ग्रस्त और रक्तरंजित होता रहा। इन बातों के आलोक में नेहरु के नेतृत्व को देखा जाए तो हमें उसकी परिपक्वता का पता चलता है।   

प्रसिद्द इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब इंडिया आफ्टर गांधी में लिखा है कि सन् नब्बे और उसके बाद के दशकों में भारत सॉफ्टवेयर सहित कई क्षेत्रों में जो दुनिया भर में झंडे गाड़े थे उसका श्रेय बहुत हद तक नेहरु की भाषा नीति और विज्ञान और तकनीक के प्रति उनके प्रेम को जाता है। ये बातें रेखांकित किए जाने योग्य हैं कि आईआईटी जैसे देश के मशहूर संस्थान पंडित नेहरु के ही स्वप्न थे। यहां यह बात गौर करने लायक है कि आजादी के करीब पचास साल बाद भारत को जिन-जिन क्षेत्रों में सफलता मिलती दिख रही है, उसमें नेहरु कालीन नीतियों की बड़ी भूमिका है। चाहे भारत का एक सॉफ्टवेयर महाशक्ति के तौर पर उभरना हो या अंतरिक्ष के क्षेत्र में छलांग लगाना या फिर एक लंबे समय तक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास कायम रखना, इन सारी बातों की नींव नेहरु के शासनकाल में ही डाली गई थी।

जहां तक विदेश नीति की बात थी तो नेहरु के नेतृत्व में भारत ने उचित ही तत्कालीन परिस्थितियों के हिसाब से गुटनिरपेक्षता की राह पकड़ी थी। क्योंकि साम्राज्यवाद के चुंगुल से मुक्त हो रहे एशिया और अफ्रीका के देशों को महाशक्तियों की होड़ में पड़ने की जरूरत नहीं थी। अमेरिका चाहता था कि दुनिया के तमाम देश उसकी सोवियत विरोधी मुहिम में शामिल हो और ऐसा वो पैसा और हथियार के बल पर करना चाहता था। ऐसे नवजात देशों में स्वभाविक रूप से पूंजीवादी-साम्राज्यवादी अमेरिकी खेमे के प्रति संशय का भाव था। दूसरी तरफ वे देश सीधे तौर पर सोवियत खेमा में भी नहीं जाना चाहते थे, क्योंकि हर देश की परिस्थितियां अलग-अलग थीं। ऐसे में विश्व पटल पर नेहरु का उदय गुट निरपेक्ष देशों के एक बड़े नायक के तौर पर हुआ जिसकी एक नैतिक सत्ता थी। आज के समय में ये बात आश्चर्यजनक लगती है कि एक गरीब, शक्तिहीन, नव-स्वतंत्र और समस्याओं से ग्रस्त देश का नेता कैसे इतनी नैतितक सत्ता हासिल कर सकता था कि दुनिया की बड़ी शक्तियां उसकी बात सुनने को मजबूर थी?

नेहरु ने पड़ोसियों के साथ शांति की नीति अख्तियार की थी। उनके मन में एक एशियाई का ब्लॉक बनाने का सपना भी तैर रहा था। ये नेहरु ही थे जिन्होंने चीन को मान्यता देने और सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता प्रदान करने के लिए जोर लगाया था, ये बाद अलग है कि सन् बासठ की लड़ाई के आईने में वो बात आज कइयों को अतार्किक लगती है। लेकिन नेहरु की दृष्टि सिर्फ दस-बीस सालों के तात्कालिक लाभ पर केंद्रित नहीं थी, वे दुनिया की दो प्राचीन सभ्यताओं को नजदीक लाने की कोशिश कर रहे थे जिसका असर विश्व की भू-राजनैतिक अर्थव्यवस्थाओं को बदलने वाला था। आजादी के करीब सात दशक बाद और एक-धुब्रीय हो चुकी विश्व-व्यवस्था की तपिश झेलने के बाद अगर वर्तमान भारतीय नेतृत्व फिर से वो कोशिश करता नजर आ रहा है तो हमें इस बात को स्वीकार करनी चाहिए कि नेहरु की दूरदृष्टि कहां तक थी। नेहरु की पाकिस्तान नीति भी शांति पर आधारित थी, वे चाहते थे कि कश्मीर समस्या का समाधान बातचीत से हो और अभी तक वहीं बातें कही जा रही है। नेहरु के बारे में जो लोग उनके पश्चिमी सोच के प्रति अत्यधिक झुकाव और अल्पसंख्यकों के प्रति अत्यधिक नरम रवैये के प्रति शंकालु हैं उन्हें नेहरू की किताब डिसकवरी ऑफ इंडिया पढनी चाहिए और गंगा नदी के बारे में व्यक्त उनके उदगार पढने चाहिए। साथ ही उन्हें ये देखना चाहिए कि यूरोप में फासदीवाद के उदय के प्रति नेहरू की प्रतिक्रिया थी। भारत की बहुलतावादी संस्कृति सिर्फ नेहरु का स्वप्न नहीं था, यह तो इस देश की संस्कृति का स्वभाव था और है, जिसे नेहरु कायम रखना चाहते थे।

नेहरु पर सबसे बड़ा आरोप चीन युद्ध में भारत की पराजय और वंशवाद को लेकर है। जहां तक वंशवाद की बात है तो ये याद रखने की आवश्यकता है कि नेहरु की मृत्यु के बाद उनके परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बना था और उनके वंशजों के कार्यों के लिए नेहरु को दोषी ठहराना उचित नहीं है। जहां तक चीन युद्ध की बात है तो नेहरु ने एक इतिहास के विद्यार्थी के तौर पर खुद स्वीकार किया था कि दोनों देश अपने ज्ञात इतिहास में पहली बार अपनी सीमा को खोजने निकले थे। ऐसे में दोनों का अपनी सीमा को लेकर दावा-प्रतिदावा करना स्वभाविक था।जहां तक उस युद्ध में भारत की पराजय की बात है तो यह सिर्फ सैन्य पराजय से बढकर थी। जैसा कि सरदार पटेल ने नेहरु को अपनी मृत्यु से पहले ही आगाह किया था कि चीन का साम्यवाद दरअसल साम्यवाद की आड़ में चीनी राष्ट्रवाद है। उस दृष्टि से देखा जाय तो वह लड़ाई एक उदार, बहुलतावादी और वैश्विक मानसिकता के भारत का एक अति राष्ट्रवादी, आत्मकेंद्रित, यूरोप-विरोधी मानसिकता वाले चीन से भिडंत थी। उस हिसाब से चीन युद्ध नेहरु के सम्पूर्ण करियर में एक मात्र बड़ी गलती दिखती है, लेकिन राष्ट्रों के इतिहास में ऐसे क्षण आते रहते हैं और किसी नेतृत्व के आकलन की एकमात्र कसौटी वो नहीं होती।

नेहरु दिल से समाजवादी थे, वे सोवियत म़ॉडेल की नियोजित अर्थव्यवस्था के प्रशंसक थे, लेकिन गांधी का वह शिष्य अपने अंतर्मन में उतना ही बड़ा अहिंसक था। यूरोपीय उदारवाद का उन पर गहरा असर था, प्रेस की स्वतंत्रता के वे प्रबल समर्थक थे। एक दलीय अधिनायकवाद के वे उतने ही खिलाफ थे और सुयोग्य व्यक्तियों की उनको उतनी ही कद्र थी। वैज्ञानिक डॉ होमी भाभा, विक्रम साराभाई, चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन, द्वीतिय पंचवर्षीय योजना के मुख्य सूत्रधार पी सी महालनोबिस नेहरु के ही चुनाव थे। संसदीय परंपरा में विपक्ष की भूमिका के वे उतने ही समर्थक थे, इसका अंदाज उन बहसों और पत्राचारों से लगाया जा सकता है जो नेहरु ने तत्कालीन प्रतिपक्ष के नेताओं के साथ की थी।

हिंदुस्तान की मौजूदा पीढी जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उदारवाद, विदेशों में अपनी सफलता और भारत की नव-अर्जित वैश्विक स्थित का गौरवगान करती है तो वो प्रधानमंत्री नेहरु को अक्सर भूल जाती है। अक्सर उनके व्यक्तित्व को उनके वंशजों के व्यक्तित्व साथ गड्डमड्ड कर दिया जाता है। शायद आनेवाला दौर नेहरु को और भी बेहतर समझ पाएगा-जब भारत और दुनिया भर में बहुलतावादी संस्कृति और वैचारिक उदारता पर हमले लोगों को ज्यादा बैचेन कर रहे होंगे।   

  (यह आलेख 'अहा! जिंदगी' के नवंबर 2015 अंक में प्रकाशित हो चुका है)

 

 

Monday, August 31, 2015

बिहार में महागठबंधन: नौ दिन चले अढ़ाई कोस?

लालूजी की रैली ताजा मामला है(रैली लालू की ही थी, ज्यादातर लोग उन्हीं के थे) तो उस पर लिखना बनता है। उस रैली में मेरे लिए एक लाइन की खबर ये है कि मुलायम उसमें नहीं आए थे क्योंकि सोनिया उसमें आई थीं और वरिष्ठता के हिसाब से मुलायम को आखीर में बोलने देने पर लालू-नीतीश भले ही सहमत हो जाते, सोनिया सहमत नहीं थी। 
जनता परिवार का जन्म और मृत्यु इतनी जल्दी हो जाएगा-इसका किसी को अनुमान नहीं था। हालांकि इसका संकेत मुलायम ने पिछले संसद सत्र में ही दे दिया जब उन्होंने संसद को वाधित करने की आलोचना कर दी थी।। दरअसल, मामला आनेवाले समय में विपक्ष के नेतृत्व का है जिसमें मुलायम सिंह अपनी दावेदारी चाहते हैं और जिसके लिए जनता परिवार के एका का प्रयास(या नाटक?) किया गया था। जबकि दूसरी तरफ नेहरु परिवार, सत्ता या विपक्ष की गद्दी पर अपना जन्मजात हक समझता है। मुलायम सन् 2019 के चुनाव के लिए उस हक को छीनना चाहते हैं। यह बिल्कुल स्वभाविक है। लेकिन नीतीश और लालू ने एक तरह से मुलायम को आश्वासन देकर अंगूठा दिखा गया। खैर,राजनीति में यह भी स्वभाविक लगने लगा है!  

हालांकि लालू-नीतीश ने इस बात का खयाल रखा कि सोनिया को आखीर में न बोलने दिया जाए-क्योंकि वो बात सोनिया को एक बड़े विपक्ष की संयुक्त नेता के तौर पर स्थापित होने का संदेश देती और मुलायम इससे और भी भड़क जाते। दूसरी बात ये कि वहां जो भी भीड़ थी, वो सोनिया को सुनने के लिए इंतजार ही नहीं करती। 
कल मैं रैली को लाइव नहीं देख पाया, लेकिन फेसबुक पर जो तस्वीरें दिख रही हैं वो रैली के बारे में मिश्रित संकेत देते हैं। एक तो लोग कम थे और जो लोग थे भी, वे लालू के समर्थक ज्यादा थे। शायद ताली भी लालू की बात पर ही ज्यादा बजी। 
रैलियों और चुनाव में हरेक राजनीतिक दल पैसा खर्च करता है-कोई ये कहे कि वो दूध का धुला है ये मानी नहीं जा सकती। लेकिन लोग उसी के ज्यादा जुटते हैं जिसके पास पैसे के साथ-साथ संगठन होता है। लालू-नीतीश की इस रैली ने उनके संगठन को बेनकाव किया है। पहले भी उस पर उन्होंने मेहनत नहीं की थी और भविष्य में भी ऐसा कोई इरादा उनका नहीं लगता। उनसे बेहतर संगठन तो मरी हुई वामपंथी पार्टियों का होता है।
कुल मिलाकर बिहार चुनाव का नतीजा अभी से साफ है। चुनाव बीजेपी गठबंधन जीतेगा, प्रश्न सिर्फ ये है कि कितने अंतर से जीतेगा?

Wednesday, August 26, 2015

पटेलों की आरक्षण की मांग

पटेलों को आरक्षण मिलने से सबसे ज्यादा दिक्कत किसे होनी चाहिए? जाहिर है, वर्तमान पिछड़ों को। और जाटों को आरक्षण मिलने से? उसमें भी वर्तमान पिछड़ों को दिक्कत होनी चाहिए कि कोई मजबूत जाति उसके हिस्से में सेंधमारी करने आ रही है। लेकिन पिछड़ों का कोई मजबूत प्रतिरोध सामने नहीं है। सिवाय एकाध फेसबुकिया विचारकों के पिछड़ों को अपने हितों की कोई चिंता नहीं है! ऐसे विचारक भी सोचते हैं कि इसे संघ परिवार की साजिश बताकर वे अपने ऐतिहासिक कर्तव्य की इतिश्री कर लेंगे। भला हो सुप्रीम कोर्ट का जो उनके हितों की रक्षा करता है।

पिछड़ों के कुछ नेता तो पटेलों को आरक्षण में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन उसके उलट याद कीजिए गुर्जर आन्दोलन को जो अ. ज. जाति में शामिल होने की मांग कर रहा था और मीणाओं ने सड़क पर उतर कर उनका विरोध किया था। इसे कहते हैं अपने हक के लिए लड़ना। हक की लड़ाई आत्ममुग्ध होकर और सिर्फ संख्या-बल के भरोसे चैन की बांसुरी बजाकर नहीं लड़ी जाती। पिछड़ी जातियों की आत्ममुग्धता का ये हाल रहा तो किसी साल यूपी के राजपूत आरक्षण को लेकर लखनऊ घेर लेंगे। तब क्या होगा? लेकिन सवाल उससे आगे का है।

आरक्षण का मुद्दा दरअसल वोट बैंक का मुद्दा होना नहीं चाहिए, यह विवेक का मुद्दा है। मंडल कमीशन के चेयरमैन बी पी मंडल ने जब इसका मसौदा तैयार किया था तो उनके मन में जातिगत पूर्वाग्रह नहीं था। वे वैसे भी एक बड़े जमींदार परिवार से थे जिन्हें सत्ता संरचना से लेकर समाज का जमीनी ज्ञान था। उन्होंने पिछड़ी जातियों में भी अत्यंत पिछड़ी जातियों की पहचान की थी और सवर्णों में भी गरीबों की पहचान की थी। हालांकि हर रिपोर्ट में सुधार की गुजाइंश हमेशा रहेगी, लेकिन बी पी मंडल का विवेक देखिए कि उन्होंने ब्राह्मणों में भी सबसे हीन माने जानेवाले महापात्र(श्मशान घाट का पुरोहित) को ओबीसी का दर्जा दिया और कई राज्यों में गंधर्व ब्राह्मणों(संगीत और नृत्य के पेशे वाले) को भी। मेरे जिला में भांटों और तेलिया ब्राह्मण(तेलियो को पुरोहित) को भी ओबीसी का दर्जा मिला। इसी तरह से हिमाचल प्रदेश और कई पहाड़ी राज्यों में ब्राह्मण-राजपूतों को भी ऐसा दर्जा मिला। ऐसे में उचित ही मंडल कमीशन में जाटों और पटेलों को स्थान नहीं मिला, जो न तो समाजिक दृष्टि से पिछड़ी थी और न शैक्षणिक दृष्टि से। हां, ये बहस का अलग मुद्दा है कि कुछ मजबूत जातियां फिर भी ओबीसी सूची में है-जैसे दक्षिण में नायडू या रेड्डी या बिहार के वैश्यों में कई समृद्ध जातियां।

लेकिन दिक्कत ये है कि आरक्षण को वोट से जोड़ दिया गया। ऐसा मान लिया गया कि आरक्षण आखिरी उपाय है-जबकि वो तो प्राथमिक उपाय था। हालात ये है कि सरकारी नौकरियों की संख्या इतनी घट गई हैं कि कई विभागों में कर्मचारियों के लिए बनाए गए सरकारी आवास खाली रहने लगे हैं। ऐसे में आरक्षण का फायदा ज्यादातर शैक्षणिक संस्थानों के लिए रह गया है। लेकिन केक का हिस्सा इतना छोटा है कि लड़ने वालों की कमी नहीं है। वोट के लालची नेताओं से तो उम्मीद कम है, लेकिन आशा है कि सुप्रीम कोर्ट हर किसी को आरक्षण मांगने और दे दिए जाने पर फिर से फटकार लगाएगा। लेकिन देश के बुद्धिजीवियों और राजनेताओं से ये मांग तो की ही जानी चाहिए कि ऐसे आर्थिक म़ॉडेल पर काम करें जिससे जॉबलेस ग्रोथ न हो। देश में जितनी बेरोजगारी बढेगी, आरक्षण की मांग उतनी ही सुलगती रहेगी।

Monday, August 24, 2015

जयपाल सिंह मुंडा, आदिवासी हितों के प्रथम प्रवक्ता

इस किताब का बहुत दिनों से इंतजार था। हालांकि ये किताब अभी मेरी निगाहों से नहीं गुजरी है कि इसके कंटेंट पर कुछ लिख सकूं। रामचंद्र गुहा की किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ का जब मैं अनुवाद कर रहा था तो पहली बार जयपाल सिंह मुंडा के बारे में कुछ विस्तार से पढने को मिला था। गुहा साहब ने लिखा कि भारत में ऐसे कई नायक, कई घटनाएं या कई महत्वपूर्ण लोग हुए जिन्हें आज तक उनका जीवनीकार नसीब नहीं हुआ। उसमें से एक आदिवासी अधिकारों के प्रथम प्रवक्ता, झारखंड आन्दोलन के जनक, संविधान सभा के सदस्य और मशहूर हॉकी खिलाड़ी जयपाल सिंह मुंडा भी थे। ऐसे लोगों ने इस देश की समाजिक-राजनीतिक संरचना को बदलने में अमूल्य योगदान दिया।
जयपाल सिंह मुंडा की शिक्षा-दीक्षा इसाई मिशन की वजह से हुई और मिशन की मदद से ही वे उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए ऑक्सफोर्ड गए। वहां वे ऑक्सफोर्ड की हॉकी टीम में मशहूर खिलाड़ी के तौर पर उभरे और ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ हासिल किया। उनकी मशहूरियत की एक वजह भारतीय हॉकी टीम के कप्तानी भी थी जिसने 1928 के ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल किया था। हालांकि वो उनकी शख्सियत का एक छोटा सा हिस्सा था, उनको तो अभी बड़े-बड़े काम करने थे।
भारत आने के बाद इसाई मिशन उन्हें धर्म प्रचार के कार्य में लगाना चाहता था जिससे जयपाल ने विनम्रता से इनकार कर दिया। उन्होंने झारखंड पार्टी की स्थापना की जिसने केंद्रीय-पूर्वी भारत में एक अलग आदिवासी राज्य की मांग की। उस प्रांत में वर्तमान झारखंड, बंगाल का कुछ हिस्सा, उड़ीसा का उत्तरी भाग और छत्तीसगढ के कई इलाके शामिल होने थे। हालांकि वो मांग मानी नहीं गई और उनके आन्दोलन के करीब साठ साल बाद एक छोटा सा झारखंड राज्य कथित तौर पर आदिवासियों के लिए बनाया गया जिसमें उस समय तक आदिवासियों की संख्या घटकर 26 फीसदी हो गई थी, जो सन् 1951 में करीब 51 फीसदी थी!

लेकिन जयपाल सिंह मुंडा का योगदान उससे कहीं बढकर है। उनका वो योगदान आदिवासी हितों की रक्षा को लेकर है। जब आजाद भारत के लिए संविधान सभा का गठन किया जा रहा था तो जयपाल सिंह मुंडा को भी उसका सदस्य बनाया गया। लेकिन अगस्त 1947 में जब अल्पसंख्यकों-वंचितों के अधिकारों पर पहली रपट प्रकाशित हुई तो उसमें सिर्फ दलितों के लिए विशेष प्रावधान किए गए। दलित अधिकारों को लेकर डॉ अम्बेदकर का एक मजबूत आन्दोलन रहा था और तत्कालीन नेतृत्व में उस पर सहमति बन चुकी थी। खुद अम्बेदकर अब संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे। उधर देश के बंटवारे के बाद अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के हित में बोलने वालों में खुद पंडित नेहरु और गांधी थे। अल्पसंख्यक अधिकारों से संबंधित प्रस्ताव खुद सरदार पटेल ने संविधान सभा में प्रस्तुत किए थे। भाषाई आन्दोलनकारी भी सक्रिय थे। लेकिन आदिवासी हितों पर बोलनेवाला कोई नहीं था। सरकारी नौकरियों और विधायिका में तो दलितों के लिए 15 फीसदी आरक्षण की बात मान ली गई लेकिन आदिवासियों को सब भूल गए। ऐसे में जयपाल सिंह मुंडा ने ये कमान संभाली और संविधान सभा में एक ओजपूर्ण भाषण दिया-
“एक जंगली और आदिवासी के तौर पर मैं कानूनी बारीकियों को नहीं जानता लेकिन मेरा अंतर्मन कहता है कि आजादी की इस लड़ाई में हम सब को एक साथ चलना चाहिए। पिछले छह हजार साल से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है तो वे आदिवासी हैं। उन्हें मैदानों से खदेड़कर जंगलों में धकेल दिया गया और उन्हें हर तरह से प्रताड़ित किया गया। लेकिन अब जब भारत अपने इतिहास में एक नया अध्याय शुरू कर कर रहा है तो हमें अवसरों की समानता मिलनी चाहिए और मैं चाहता हूं कि पंडित जवाहर लाल नेहरु की बातों पर भरोसा करुं कि उन्होने जो शब्द कहे हैं उसे सही तरीके से लागू किया जाएगा।”
उसके बाद संविधान सभा ने आदिवासियों की समस्या को स्वीकार करते हुए 400 आदिवासी समूहों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जो आबादी की करीब 7 फीसदी थी। उन्हें नौकरियों और विधायिया में 7.5 आरक्षण प्रदान किया गया।
उसके बाद केंद्रीय-पूर्वी भारत में एक अलग आदिवासी राज्य हासिल करने के लिए जयपाल सिंह ने एक आदिवासी महासभा का गठन किया जो बाद में झारखंड पार्टी बन गई और आज की झारखंड मुक्ति मोर्चा किस्म की पार्टियां उसी पार्टी की मानस-संतानें हैं। सन् 1952 के चुनाव में झारखंड पार्टी के तीन सांसद और तेइस विधायक जीत गए और आदिवासी राज्य का मुद्दा देश के पटल पर स्थापित हो गया। दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह उसी पार्टी के समर्थन से चुनाव जीतकर राज्यसभा के सदस्य बने थे।
अभी जिस नगा शांति वार्ता के मुकाम पर पहुंचने की बात हो रही है उसके जनक अनगामी जापू पिजो को जयपाल सिंह मुंडा ने अलगाववाद छोड़ने के लिए काफी समझाया था। जयपाल का कहना था कि पिजो को भी उसी तरह से पूर्वोत्तर में एक राज्य की मांग करनी चाहिए जिस तरह की मांग जयपाल कर रहे थे। लेकिन पिजो नहीं माने और नगालैंड करीब 50 साल तक अशांति के गर्त में डूबा रहा।
आज जयपाल सिंह मुंडा को बहुत से लोग नहीं जानते। आदिवासियों के नाम पर झारखंड में बनी एक के बाद एक सरकारों ने भी मुंडा के लिए कुछ नहीं किया। शायद रांची में उनके नाम पर कोई स्टेडियम भर है। उन पर रांची के किसी सज्जन ने एक गुटखा किस्म की कितबिया लिखी थी जो बहुत प्रचारित नहीं हो पाई। उम्मीद है कि अब इस किताब में हमें जयपाल सिंह मुंडा के बारे में कई अनजानी बातें पढने को मिलेंगी। इस किताब के लिए लेखक ए के पंकज को ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं।

Wednesday, August 19, 2015

बिहार चुनाव@पैकेज

 बिहार के लिए बढिया हुआ कि नीतीश कुमार पिछले साल नरेंद्र मोदी से भिड़ गए। कम से कम competitive politics के बहाने ही सही बिहार को कुछ तो देने की घोषणा हुई। नीतीश बाबू साथ होते तो इतनी बड़ी रकम थोड़े ही मिलती. अब बिहारी गिन रहे हैं कि इस पैकेज में कितने जीरो हैं और पटना व नोएडा में फ्लैट की कीमत कितनी बढेगी। 


एक जमाने में ऐसा पैसा-मार और प्रोजेक्ट उठाऊ पॉलिटिक्स तमिलनाडु टाइप के दक्षिण के सूबे करते थे। इस बात का श्रेय नीतीश कुमार को इमानदारी से देना चाहिए कि उन्होंने बीजेपी को इतने बड़े पैकेज देने पर मजबूर कर दिया।

PIB की साइट पर देख रहा हूं कि नए हवाई अड्डों में रक्सौल और पूर्णिया को विकसित किया जाएगा-यानी हमलोग जो दरभंगा की मांग कर रहे थे वो मांग फिलहाल खटाई में समझी जाए। वैसे पूर्णिया भी बुरा विकल्प नहीं है, मेरे घर से मात्र तीन घंटे का रास्ता है। हां, पटना में नया हवाईअड्डा जरूरी है जिसकी बात इस पैकेज में है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

भागलपुर में एक नया केंद्रीय विश्वविद्यालय। आमीन। शायद विक्रमशिला विश्वविद्यालय नाम रखा जाए! नीतीश के नालंदा के जवाब में भाजपा का विक्रमशिला-मानो हिंदू यूनिवर्सिटी के जवाब में अलीगढ। competitive politics का अपना मजा है!

बिहार शायद पहला सूबा बन जाएगा जहां पर राज्य विश्वविद्यालयों की संख्या के बराबर ही केंद्रीय विश्वविद्यालय हो जाएंगे! गया, मोतिहारी, नालंदा, पूसा कृषि वि.वि., स्किल यूनिवर्सिटी, किशनगंज(अलीगढ की शाखा) के बाद अब भागलपुर! बात बुरी नहीं है-लेकिन अपने आप में एक बड़ा कटाक्ष है कि राज्य में पिछले करीब सात दशकों में कितने कम विश्वविद्यालय बने। और केंद्र ने तो उस सात में से छह दशक तक कुछ स्थापित ही नहीं किया। मामला ये भी है कि बिहारी पढने में तेज होते हैं, लेकिन बिहारी लोग अच्छा कॉलेज और अच्छा विश्वविद्यालय नहीं खोल पाते।

गंगा, कोसी और सोन पर नए पुल की घोषणा है। अच्छी बात है..बिहार में गंगा की लंबाई करीब 400 किमी है जबकि अभी तक इस पर ढंग का डेढ पुल(एक मोकामा और आधा नौगछिया-भागलपुर) काम कर रहा है। जबकि कम से कम 6-7 पुल होना ही चाहिए। नीतीश बाबू ने भी इस दिशा में ठीक-ठाक काम किया था। गंगा पर नया पुल जरुरी भी था। कोसी पर नए पुल की जो बात है, वो कहां बनेगा? देखने वाली बात होगी।

सॉफ्टवेयर पार्क की तो बात है लेकिन क्रियान्वयन कमजोर है। दरभंगा में पिछले साल एक सॉफ्टवेयर पार्क की बात हुई, लेकिन जमीन ही अभी तक नहीं मिल पाई। इसमें राज्य सरकार का भी रोल है, लेकिन जहां राज्य और केंद्र एक दूसरे से हमेशा भिड़ंत की मुद्रा में हो, वहां ऐसे प्रोजेक्ट कितना कामयाब होंगे-ये विचारणीय बात है।

कुल मिलाकर बिहारियों के बल्ले-बल्ले हैं। वोट में तो खैर जाति, कंवर्ट होती है। हां, पैकेज से परसेप्शन कुछ जरूर बनेगा। अब देखना है कि दूसरे राज्य इस भीमकाय पैकेज को किस तरह लेते हैं। कहीं ममता बनर्जी ये न कह बैठे कि वित्त मंत्रालय को दिल्ली से उठाकर कलकत्ता में स्थापित कर दिया जाए!

Tuesday, August 11, 2015

बिहारी अस्मिता@DNA

 नीतीश कुमार की पार्टी ने ठीक किया कि 50 लाख DNA सैम्पल भेजने की जगह नाखून और बाल ही लिफाफे में भिजवा रही हैं। बाल से समस्या आसान होगी, एक ही लिफाफे में हजार-हजार बाल आ जाएंगे। क्योंकि वैसे भी 50 लाख लोगों के DNA टेस्ट तो बिहार के स्वास्थ्य संस्थान में क्या होते, देश भर के डॉक्टर हांफ जाते। 

नीतीश ने जिस हिसाब से बिहारी अस्मिता की लड़ाई शुरू की है, उसमें कई समस्याएं है। नीतीश कुमार राजनीति के विद्यार्थी हैं, उन्हें क्या समझाना। ये यूपी, बिहार, टाइप के सूबे हैं न..वो सूबाई अस्मिता की बात नहीं करते-वे तो अपने आपको इस मुल्क का बाप समझते हैं। ये ऐसे सूबे हैं जहां कर्नाटक और मध्यप्रदेश का आदमी आकर यहां की पार्टियों का अध्यक्ष बन जाता है और सिर्फ अपनी खोपड़ी का खाता है। यहां के लोगों को कोई असुरक्षा बोध नहीं होता।

यूपी में तो एक पंजाब में जन्मी और समाजवादी सिंधी से ब्याही कांग्रेसी बंगालन CM बन गई थी ! देखा जाए तो ये बहुत उदार इलाके हैं-जब मैडम इंदिरा गांधी चिकमगलूर नहीं गई थी उससे बहुत पहले आचार्य कृपलानी, सीतामढी से चुनाव जीत गए थे। ये बातें तमिलनाडु या गुजरात में तब संभव नहीं थी। ऐसे इलाकों के लोग जब सूबाई अस्मिता की बात करें तो शोध का विषय बनता है।

एक बार राजीव गांधी ने आंध्रप्रदेश के CM को हवाईअड्डे पर इतना डांटा कि वेचारे CM की आंखों से बरखा-बहार उमड़ आई। लेकिन उसका फायदा वहां एक फिल्मस्टार एनटी रामाराव ने उठाया और एक पार्टी बना ली। कहा कि तेलुगु बिड्डा का अपमान हुआ है। तेलुगु देशम पार्टी चुनाव में स्वीप कर गई। असम में एक बार अस्मिता वाली बात पर तैंतीस साल का नेता सीएम बन गया। DMK जब 1967 में सत्ता में आई तो उसमें अस्मिता का पुट था। 

इन तमाम अस्मिताओं में कहीं न कहीं विराट हिंदी पट्टी के वर्चस्व के खिलाफ एक असुरक्षा का भाव था। लेकिन बिहार की कौन सी खास अस्मिता है ? क्या व्याख्या है उसकी? पिछले साठ सालों में बिहार ने किस असुरक्षा भाव को जिया है या कब-कब अस्मिता की आवाज उठाई है? बिहारी अस्मिता से कई गुणा ज्यादा तो दिल्ली में मैथिली और भोजपुरी के वास्तविक और फर्जी संगठन अस्मिता के नाम पर कार्यक्रम कर लेते हैं।

कुछ लोग व्यंग्य में कहने लगे हैं कि नीतीश कुमार का खुद का DNA तत्कालीन जद-यू नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी से मेल नहीं खाता, उन्होंने इसीलिए उनको आम और लीची नहीं खाने दिया था। पता नहीं क्या सचाई है।

बात डीएनए की आई तो हमारे यहां मुजफ्फरपुर की एक लड़की थी-नवारुणा। तीन साल पहले गुंडो ने उसे घर से उठा लिया था, आज तक नहीं मिली। कहते हैं कि उसकी हड्डी मिली थी। बिहार पुलिस की तो छोड़िए, आजतक CBI उसके DNA का मिलान नहीं कर पाई। फिर 50 लाख लोगों का DNA कौन मिलान करवाएगा। आज एक अखबार ने ठीक लिखा है-एक अत्यधिक पिछड़े सूबे का चुनाव हाईटेक हो गया है। बातें ट्विटर और DNA से नीचे की ही नहीं जा रही। 

कुछ साल पहले बाल ठाकरे परिवार ने भी दावा किया था कि उनके परिवार के DNA में कुछ बिहारी गुणसूत्र हैं। आशा है कि नीतीश कुमार कम से कम ठाकरे परिवार से अपना नाता कतई नहीं जोड़ेंगे। हालांकि राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने ठाकरे परिवार के साथ कंधा में कंधा मिलाकर प्रणब दादा को जरूर वोट किया था! 

नीतीश कुमार का मजबूत पक्ष उनका विकास पुरुष होना था, जो अपेक्षाकृत जाति से ऊपर की छवि रखता था। ऐसा नेतृत्व बिहार को पिछले छह दशक में मुश्किल से मिला था। उनको विकास के मुद्दे को केंद्र में रखना चाहिए, DNA जैसे मुद्दे पर उन्हें अपनी ऊर्जा नहीं गंवानी चाहिए।

Wednesday, July 29, 2015

कलाम साहब को वामपंथियों की "सशर्त" श्रद्धांजलियां...!

मिथिला की एक लोककथा में एक ब्राह्मण का जिक्र आता है जो हर बात में मीन-मेख निकालता था। एक दिन पार्वती ने शिव से कहा कि हे महादेव मैं उस ब्राह्मण को भोजन पर निमंत्रित करना चाहती हूं, वो मेरी पाक-कला में कोई दोष नहीं ढ़ूंढ़ पाएगा। महादेव ने पार्वती को मना करते हुए कहा कि अपनी पाककला पर गुरूर मत करो, वो ब्राह्मण वैचारिक रूप से ही शैतान है। लेकिन पार्वती नहीं मानी। आखिर में ब्राह्मण को भोजन पर निमंत्रित कर ही दिया गया। पार्वती ने पूछा, 'हे ब्राह्मण भोजन कैसा था, कुछ त्रुटि तो नहीं हुई? इस पर उस ब्राह्मण ने कहा, 'भोजन तो अच्छा था, लेकिन इतना भी अच्छा नहीं होना चाहिए!'  आज कलाम साहब की मृत्यु के बाद ज्यादातर वामपंथी फेसबुकियों की टिप्पणी देखकर उसी ब्राह्मण की याद आ गयी।


मेरा मानना है कि ऑनलाइन कोई भी 'पंथी' गैंग ज्यादा खतरनाक होता है, वहीं ऑफलाइन होते ही वो शरीफ हो जाता है। आप उससे किसी चाय की दुकान पर मिल जाएं तो अपने पैसे की चाय पिलाएगा, लेकिन ऑनलाइन होते ही चंगेज खान हो जाएगा। यहां पर आते ही वो फाइटर प्लेन उड़ाने लगता है। चूंकि फेसबुक पर ऑनलाइन वामपंथी घनघोर अल्पसंख्यक हैं, तो यहां गुंडागर्दी सिर्फ दक्षिणपंथियों की दिखती है। यहां पर वामपंथियों ने ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट का चोला ओढ़ लिया है।

हमारे देश की परंपराओं में मृतकों के बारे में अपशब्द नहीं बोला जाता। खासकर तत्काल तो बिल्कुल नहीं, भले 10-20 साल बाद किसी ऐतिहासिक रिफरेंस में आलोचना कर दी जाए। मेरा अनुमान है कि जयचंद या मीरजाफर पर जो कहावतें बनीं है वो भी उनके मरने के तत्काल बाद न बनीं होंगी। लेकिन वामपंथी..ठहरे वामपंथी। वे कलाम साहब को "सशर्त श्रद्धांजलि" दे रहे हैं-मानो ये देवगौड़ा या मनमोहन सिंह की सरकार बनने का मसला हो।

फेसबुकिया पीढ़ी को इस प्रकरण से ये समझने में आसानी होगी कि हमारे देश का वामपंथ किन-किन वजहों से जमीन में धंस गया। अन्य बड़ी वजहें भी रही होंगी। कोई कायदे से रिसर्च करे तो सुभाष बाबू और गांधीजी के बारे में वाम श्रद्धांजलि भी इसी टाइप की मिलेगी-क्योंकि वाम स्कूल के सिलेबस में पिछले नब्बे सालों से एक ही किताब चल रही है-प्रगति प्रकाशन मास्को वाली।

कहते हैं कि गांधी की हत्या की वजह से संघ परिवार का ग्रोथ रेट 20-25 साल तक हिचकोला खाता रहा, लेकिन अब कलाम की जैसी-जैसी फेसबुकिया वाम श्रद्धांजलियां आ रही हैं-मुझे भय है कि वाम निगेटिव में न चला जाए। इस देश में 3-4 फीसदी वाम जरूरी है-ऐसा मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है।

Saturday, July 25, 2015

मुजफ्फरपुर रैली: मोदी ही लड़ रहे हैं बिहार विधानसभा चुनाव

मोदी ने साफ कर दिया कि वो चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। RJD का जिस तरह से उन्होंने फुल फॉर्म दिया वो कोई प्रधानमंत्री पर पर बैठा व्यक्ति शायद ही बोल पाता या भविष्य में कर पाएगा। नीतीश के बारे में उन्होंने कहा कि 'DNA' में ही गड़बड़ है। यह खतरनाक बयान वैसा ही है जैसे किसी कुत्ते को मारना हो तो उसे पहले पागल साबित कर दो। लालू-नीतीश के लिए यह चुनाव 'बहुत भारी' पड़ने वाला है।

जाति का कार्ड खेलने से नरेंद्र मोदी नहीं चूके। उन्होंंने 'यदुवंश', 'महादलित' आदि शब्दों के इस्तेमाल में कोई हिचक नहीं दिखाई। शायद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी ऐसा शब्द कभी इस्तेमाल न कर पाती। स्टोरीटेलिंग कोई मोदी से सीखे। उन्होंने नेपाल और भूटान यात्रा को भी बिजली के संदर्भ में उत्तर बिहार में बेच दिया। जबकि अमूमन विदेश विभाग से संबंधित बातें आम लोग कम ही समझ पाते हैं।

बिजली या सड़क के बारे में उनकी बाते पूरी सही नहीं थी-नीतीश के राज में बिहार में बिजली भी 'बेहतर' हुई है और सड़क भी। लेकिन 24-घंटे बिजली का वादा मोदी ने ऐसा कर दिया मानो वे खुद CM पद की दौड़ में हो। 

कोई प्रधानमंत्री इस तरह नहीं बोलता कि सीतामढ़ी-शिवहर हाईवे के लिए इतना करोड़ दिया, पटाना-बक्सर के लिए इतना करोड़। ये तो राज्यमंत्रियों वाली बातें हैं या NHAI अधिकारी टाइप बातें हैं। लेकिन मोदी के लिए इस युद्ध में हर कुछ जायज है। उस हिसाब से तो उनके मंत्रीगण ही प्रचार करने में फिसड्डी लगते हैं। (ऐसा उन्होंने पटना वाली मीटिंग में बोला जिसमें नीतीश भी थे)

उन्होंने बिहार की जनता को लालच भी दिया कि राज्य में अगर बीजेपी की सरकार आई तो केंद्र से उसे 'ज्यादा समर्थन' मिलेगा। उन्होंने 'डबल इंजन वाली गाड़ी' का जिक्र किया। पता नहीं, यह बयान कानूनी रूप से सही है या नहीं।

उन्होंने बिहार को 'कम से कम 50 हजार करोड़ के पैकेज' और उद्योग लगाने के लिए करों में छूट की घोषणा तो आज ही कर दी। संसद सत्र के बाद वे फिर से इस बहाने इस प्रचार युद्ध में गोला-बारूद भरेंगे।
सुशील मोदी के संदर्भ में

मुजफ्फरपुर की रैली में नरेंद्र मोदी ने सुशील मोदी का नाम नहीं लिया, लेकिन इशारों में कहा कि एक बिहारी को स्किल डेपलपमेंट नामका बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया है। 
उन्होंने कहा, "पहले लोग कहते थे कि बिहार में पहले से मोदी है तो दूसरे मोदी की क्या आवश्यकता है?" यह वाक्य सुशील मोदी के भविष्य के लिए अभी भी खतरनाक है।


सुशील मोदी का नाम उन्होंने सिर्फ नीतीश कुमार के साथ वाली परियोजनाओं के उद्घाटन भाषण में(सबसे पहला भाषण) लिया कि उस समय सुशील मोदी वित्त मंत्री थे और फंड के लिए केंद्र के पास आया करते थे।

नरेंद्र मोदी ने कहा कि नेता लोग अपना वादा भूल जाते हैं, जबकि वे नहीं भूलते। गांधी-मैदान में बम कांड और ढाई साल पहले बीजेपी नेताओं को आमंत्रित कर नीतीश कुमार का उस भोज को रद्द कर देने का जिक्र उन्होंने किया। नरेंद्र मोदी अगर ये बात अभी तक नहीं भूले हैं तो वे ये भी नहीं भूले होंगे कि सुशील मोदी ने उस समय नीतीश के समर्थन में जुबान सी ली थी।


और अंत में... मोदी ने साफ कर दिया कि सीपी ठाकुर 'मार्गदर्शक' हैं और जीतन राम मांझी का चेहरा 'सदैव मुस्कुराता' रहता है। दोनों नेता इस बात मतलब जरूर निकाल रहे होंगे।

Saturday, July 18, 2015

रथयात्रा के बहाने कुछ इतिहास, कुछ स्मृतियां

रथ-यात्रा मानो राष्ट्रीय पर्व होता जा रहा है। मेरे गांव का बच्चा भी रथ-यात्रा की तस्वीरें मोबाइल से शेयर कर रहा है। आज से सौ साल पहले मेरे पुरखे सिर्फ रथयात्रा के बारे में सुना करते थे-उस जमाने में कोई-कोई जाता था जगन्नाथ पुरी।

हमारे इलाके के लोग सबसे ज्यादा बाबाधाम(देवघर), काशी और प्रयाग जाते थे। नजदीक भी था। खाते-पीते या सम्पन्न लोग ही जाते थे ‘जगरनाथ’(जगन्नाथपुरी को मैथिली में ऐसे ही बोलते थे)। मेरी दादी काशी, प्रयाग और जगरनाथ गई थी। ऐसा इसलिए कि उस समय तक रेलवे की सुविधा हो गई थी। दादी काशी, प्रयाग, मथुरा, जगरनाथ और रामेश्वरम का नाम ज्यादा लेती थी। अयोध्या का कम लेती थी। रामेश्वरम तो खैर बहुत दूर था, लेकिन उसे पता था कि मेरे गांव से करीब एक हजार कोस है! 

इधर जब अंग्रेजी राज स्थापित हुआ, तो लोग कलकत्ता जाने लगे और वहां से जगन्नाथ पुरी जाने का प्रचलन बढ़ने लगा। मेरे पर-बाबा के समय तक हमारे इलाके में रेल लाइन बननी शुरू हो चुकी थी (करीब 1890 ), लेकिन वे शायद उस पर चढ़े नहीं थे। पूरे गांव से एकाध आदमी गया था जगन्नाथ पुरी। इसकी वजह थी कि बीच में झारखंड का विशाल जंगल था और जो लोग वहां जाते थे वे पहले अपना अंतिम संस्कार करवाकर जाते थे! क्योंकि जीवित लौटने की गारंटी नहीं थी। 

जगन्नाथ पुरी मेरे गांव से करीब एक हजार किलोमीटर था/है। बीच में विशाल जंगल था, नदी-नाले, जानवर, पहाड़ और भाषाई विभिन्नता। फिर कैसे जाते होंगे लोग? पापा के दादा बताते थे कि अकेले कोई जाता नहीं था,दस-बीस के झुंड में जाते थे। देवघर तक तो नियमित संपर्क था। संस्कृत शिक्षा के लिए नवद्वीप से भी थोड़ा सा संबंध बना हुआ था। लेकिन नवद्वीप वाली बातें कम से कम तीन-चार सौ साल पुरानी होगी। 

उस जमाने में आबादी कम थी, कई-कई कोस तक बस्तियां नहीं थीं, लेकिन पगडंडी बनी हुई थी और गांव वाले अगले 100-200 किलोमीटर का रास्ता बता देते थे। बीच-बीच में सराय बने हुए थे, व्यापारियों-राजाओं ने धर्मशालाएं बनवाईं थी या किसी साधु का आश्रम उनका डेरा बनता था। अमूमन तीर्थ-यात्रियों से लूटमार कम होती थी-लेकिन मुसलमानी राज कायम हो जाने के बाद अवाध तीर्थयात्राएं जरूर कम हो गई थीं। मुगलों के पतन के बाद तो अराजकता के समय पिंडारियों की लूटमार और बढ़ गई थी। लोग अपने खोल में समाने लगे थे। सिर्फ जीवट लोग यात्रा करते थे।

जगन्नाथ जी पहुंचने पर अन्य तीर्थ स्थलों की तरह ही वहां के पंडे, लोगों के रहने-खाने का इंतजाम करते। उनके पास लोगों की वंशावली होती, अपने-अपने इलाके होते। पंडों में आज की तरह लालच नहीं था, लोग जाते भी कम थे, साधन भी नहीं था। लेकिन लोग संवाद कैसे करते होंगे? मिथिला का अंगूठा छाप आदमी(या दो-चार जमात पढ़ा व्यक्ति) उड़ीसा के लोगों से कैसे संवाद करता होगा? किसी-किसी लाल बुझक्कड़ को फारसी आती थी या थोड़ी सी संस्कृत। उसी में संवाद होता था। यहां के लोग मैथिली बोलते थे, वहां का के लोग उड़िया। लेकिन दिल की बात एक दूसरे की समझ में आ जाती थी। 

ऐसे में ‘जगरनाथ जी’ हमारे इलाके के लोगों की जातीय स्मृति में ही ज्यादातर सुरक्षित थे। बाबा जगरनाथ, राष्ट्रीय नहीं हुए थे। उनको टीवी, इंटरनेट ने अंतर्राष्ट्रीय बना दिया है। कहते हैं अंग्रेजी का ‘जॉगरनॉट’ शब्द भी जगन्नाथ रथ-यात्रा से ही प्रेरित है! 

आज फेसबुक पर रथ-यात्रा की तस्वीरों की बाढ़ सी आई हुई है। इमानदारी से कहूं तो "कुछ लोग" ईद के जवाब में भी लगा रहे हैं-मानो हम किसी से कम नहीं हैं! कुछ लोग इसलिए लगा रहे हैं क्योंकि उन्हें "छद्म" कम्यूनिस्टों से चिढ़ है और वे मजा ले रहे हैं। मैंने खुद ही एक बधाई में कटाक्ष किया था, लेकिन मैंने उन्हें शिवरात्रि की बधाई की याद दिलाई थी-रथयात्रा की नहीं !

Sunday, July 12, 2015

बिहार विधान परिषद परिणाम: पप्पू, मांझी और बीजेपी संगठन फैक्टर

बिहार में विधान परिषद चुनाव में बीजेपी-गठबंधन की जीत की अलग-अलग व्याख्या जारी है। आज हम सामान्य तथ्यों और धन-बल से इतर कुछ अन्य फैक्टर की चर्चा करेंगे।

पप्पू यादव ने अपने फेसबुक वाल पर संकेत किया कि राजद-जद-यू की हार में उनकी अहम भूमिका है-क्योंकि लोकसभा चुनाव में जब वे राजद के साथ थे तो कोसी से पूरव बीजेपी का खाता नहीं खुल पाया। जबकि इस चुनाव में जब वे राजद से निष्काषित हैं तो राजद-जद-यू का खाता नहीं खुला। आंशिक रूप से वे सही है, उस इलाके में उनका एक निश्चित प्रभाव है। 

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में पूरे पूर्वी बिहार में-गंगा के उत्तर और दक्षिण-दोनों जगह बीजेपी साफ हो गई थी। उन सीटों में सुपौल, अररिया, मधेपुरा, कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज, भागलपुर और बांका की सीटें थीं। इतना तो पप्पू भी मानते होंगे कि उन आठो सीटों पर उनका असर नहीं है! दरअसल, उस चुनाव में अन्य कारकों के अलावा पश्चिम की तरफ से आ रही बीजेपी की लहर को बंग्लादेश की सीमा से सटे एक ‘पूर्वी लहर’ ने भी रोक लिया था। पप्पू महज एक ‘बैलेंसिंग फैक्टर’ थे, जो वे इस बार भी थे- जब वे साइलेंट रह गए तो बीजेपी वहां से जीत गई। जहां पप्पू का असर नहीं था(बांका-भागलपुर) वहां फिर से जद-यू जीत गया।
एक फैक्टर जीतनराम मांझी भी है। स्थानीय निकायों में दलितों के लिए आबादी के हिसाब से सीटें रिजर्व हैं। यह बिल्कुल संभव है कि मांझी प्रकरण के बाद से दलितों का बड़ा हिस्सा जद-यू-राजद से नाराज हो गया हो।
चुनावों में बीजेपी की जीत को सिर्फ पैसे से जोड़ना पूरी तरह सही नहीं है। लोग इस बात को नजर अंदाज कर देते हैं कि बीजेपी और संघ ने पिछले 10-15 सालों में ग्रासरूट स्तर पर अपने संगठन का कितना फैलाव किया है। संघ का अपना नेटवर्क तो बना ही है, बीजेपी ने पिछले दशक में ग्राम पंचायत स्तर तक अपनी इकाई और अध्यक्ष बना लिए हैं। मेरे ग्राम पंचायत का बीजेपी अध्यक्ष एक मुसलमान है और उसकी अपनी कमेटी है। जबकि राजद या जद-यू ब्लॉक और जिला स्तर पर भी नहीं दिखते। उनका कार्यालय किसी चाय या पान की दुकान में चलता पाया जाता है। मेरे ब्लॉक में जद-यू की दो-दो कमेटियां हैं जो आपस में प्रमाणिकता के लिए लड़ती रहती हैं।


मैं अपने जिले(मधुबनी) की बात अगर करुं तो इस चुनाव में बीजेपी ने हमारे ब्लॉक(बाबूबरही) के कुल 20 ग्राम पंचायतों में हरेक 3 पंचायतों पर पांच कार्यकर्ताओं की कमेटी बनाई थी। इसके अलावा प्रखंड कमेटी और जिला कमेटी के लोग भी उसका सुपरविजन कर रहे थे। अब तीन पंचायत में विधान परिषद के करीब 45 वोटर थे जबकि उसके पीछे बीजेपी-संघ और उस खास उम्मीदवार और गठबंधन के सहयोगी दल के करीब 20 हार्डकोर वर्कर लोग लगे हुए थे। इतना टारगेटेड प्रचार क्या जद-यू और राजद से संभव है, जहां ये ही नहीं पता चलता कि प्रखंड अध्यक्ष कौन है और प्रखंड में अन्य कितनी कमेटिया हैं? बीजेपी की प्रखंड कमेटी में करीब दर्जन भर विभाग हैं जिसकी बकायदा पाक्षिक-मासिक बैठकें होती हैं, सुपरविजन होता है और रिपोर्ट तैयार होती है।

 हां, बीजेपी अगर कहीं कमजोर है तो अपने बौद्धिक विभाग में। लेकिन उसकी भरपाई उसने एक दुर्जेय पार्टी मशीनरी बनाकर करने की कोशिश की है। उसने पिछले दशकों में ‘आदमी’ बनाए हैं, तंत्र बनाया है जो शायद थोड़ा-थोड़ा कम्यूनिस्टों से प्रेरित भी लगता है। अब बीजेपी का वह निचला तंत्र कभी बीजेपी के लिए ‘एलियन’ माने जानेवाले अल्पसंख्यक समूहों तक में घुसपैठ कर रहा है, उन्हें प्रभावित कर रहा है। बाकी का काम अन्य ‘कारक’ पूरा कर देते हैं। 
अन्य दलों के पास विचार तो है, लेकिन उसे नीचे ले जाने के लिए तंत्र नहीं है, आदमी नहीं है। ऐसे में सिर्फ समाजिक गठबंधन करके या मीडिया की बहसों में हिस्सा लेकर बीजेपी ले लड़ना नाकाफी है। जद-यू-राजद जैसी पार्टियों को अपने उन विभागों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।