Monday, December 28, 2009

सबा सौ साल की कांग्रेस के जश्‍न में वेबसाइट का खलल

इसे अगर आप लापरवाही कहते हैं तो ये एक गंभीर किस्म की लापरवाही है। देश पर हुकूमत करनेवाली कांग्रेस के वेबसाईट में अगर इस तरह की गलतियां है तो ये वाकई दुर्भाग्यजनक है। कांग्रेस पार्टी की ऑफिसियल वेबसाईट बताती है कि कि राजीव गांधी सक्रिय राजनीति में सन्1983 में अपने भाई संजय गांधी की मौत के बाद आए।

अब ये बात सिंधु सभ्यता के स्क्रिप्ट की तरह इतनी पुरानी भी नहीं कि लोग न जानते हों। संजय गांधी की मौत विमान दुर्घटना में 1980 में हुई और राजीव गांधी 81 में ही कांग्रेस महासचिव बन गए। वे उसी साल फरवरी 1981 में अमेठी से लोकसभा के सदस्य चुन लिए गए। लेकिन कांग्रेस की साईट कहती है कि राजीव गांधी सन् 1983 में अपने भाई संजय गांधी की दुखद मृत्यु के बाद सक्रिय राजनीति में आए।


दूसरी बात साईट बताती है वो ये कि उसके अतीत के अध्यक्षों में जवाहरलाल नेहरु नामका कोई व्यक्ति कभी अध्यक्ष नहीं हुआ। साईट में आप हिस्ट्री वाले लिंक पर जाएं फिर उसमें से उसके पूर्व अध्यक्षों का लिंक क्लिक करे तो डॉ मुख्तार अंसारी(1927) के बाद सीधे ये साईट बल्लभभाई पटेल(1931) पर आ जाती है, वो जवाहरलाल नेहरु को भूल जाती है जिन्होने लगातार 1929 और 30 में पार्टी की अध्यक्षता की थी। जिन्होने अपने पिता से अध्यक्षता का चार्ज लिया था।

साईट में चूंकि पहले ही मोतीलाल नेहरु का जिक्र कर दिया गया है तो ये बात फिर भी क्षम्य है कि उनकी 1928 की अध्यक्षता का जिक्र नहीं है। लेकिन जिस जवाहरलाल नेहरु को अपनी अध्यक्षता के दरम्यान लाहौर अधिवेशन में तिरंगा फहराने और पूर्ण स्वराज्य की घोषणा करने का श्रेय जाता है-पार्टी उन्हे ही भूल गई।

यूं, कांग्रेस की ऑफिसियल साईट में इस आपराधिक लापरवाही से आम जनता के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता लेकिन देश पर हुकूमत करने वाली पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल जरुर उठता है। सवाल ये भी उठता है कि एक माध्यम के रुप में पार्टी इंटरनेट को कितने हल्के रुप में लेती है। ये उस पार्टी की वेबसाईट है जो हिंदुस्तान में कंम्प्यूटर क्रान्ति लाने का दंभ भरती है-लेकिन अपने उसी नेता के बारे में तथ्यात्मक गलतबयानी करती है जो इसका सूत्रधार माना जाता है। दूसरी बात ये कि जिस नेहरुजी को देश और दुनिया का एक बड़ा हिस्सा आधुनिक विचारों का पोषक मानता है उन्ही के खानदान द्वारा संचालित पार्टी एक आधुनिक प्रचार माध्यम पर अपने पितृपुरुष को भूल जाती है।

यूं, एक विचार ये भी है कि हमारे राजनेता या कई दूसरे पेशे के लोग भी पढ़ाई-लिखाई या भाषाई-तथ्यात्मक शुद्धता को बेवकूफों का शगल समझते हैं। शायद राहुल गांधी या खुद कांग्रेस अध्यक्ष भी कभी अपना वेबसाईट नहीं देखते। या हो सकता है कि कांग्रेस के किसी घनघोर उदारवादी (रिफॉर्मिस्ट?) मैनेजर ने ये काम किसी एजेंसी को आउटसोर्स कर दिया हो जिसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि नेहरुजी नामका जीव भी इस धरा पर कभी अवतरित हुआ था। क्या फर्क पड़ता है कि राजीव गांधी ‘83 मे राजनीति में आए थे या ‘81 में? क्या फर्क पड़ता है कि साईट में कुछ गलतियां दिख रही हैं...जनता तो वोट देकर फिर भी चुन ही रही है न! आमीन!

Friday, December 11, 2009

तेलंगाना के बहाने.....

तेलंगाना की केंद्र द्वारा एक तरह से स्वीकृति ने छोटे राज्यों के पैरोकारों में एक नया उत्साह भरा है। पूरे देश से इस तरह की मांग उठ रही हैं जिनमें से कई तो बहुत पुरानी है या फिर जिनका कुछ आधार भी बनता है। लेकिन कुछ लोगों द्वारा इसका विरोध इस अंदाज में किया जाता है मानो छोटे भौगोलिक-सांस्कृतिक या क्षेत्रीय अभिव्यक्तियों को बोलने का हक ही नहीं है। ये विरोध कई बार सामंती अंदाज ले लेता है मानो वे शासक हों और मांग करनेवाला शासित। बहरहाल, मीडिया के कुछ लालबुझक्कड़ इस चिंता में दुबले होते जा रहे हैं कि देश का क्या होगा या फिर कौन सा शहर किस राज्य की राजधानी बनेगी।

सबसे लचर तर्क ये दिया जा रहा है कि खर्चे बढ़ जाएंगे और भ्रष्टाचार की गंगोत्री खुल जाएगी जब ये छोटे राज्य राजनीतिक अस्थिरता के शिकार होंगे। ये मानकर चला जाता है कि स्थिर सरकार भ्रष्ट नहीं होती और वहां सबकुछ ठीकठाक होता है या फिर बड़े राज्य हमेशा से स्थिर होते हैं या फिर उनके नेता बड़े ही पवित्र। यहां पिछले दो दशकों से यूपी जैसे बड़े राज्यों की अस्थिरता आंखें खोलने वाली है जहां पिछले पचास साल से स्थिर सरकार होने के बावजूद हरियाणा, केरल या गोवा जैसा विकास सपना ही है। कहने को तो बिहार, बंगाल में भी पिछले सालों दो दशकीय या फिर तीन दशकीय महा-स्थिरता रही है लेकिन विकास के मामले में ये फिसड्डी ही रहे। दूसरी तरफ हरियाणा, गोवा, मिजोरम जैसे राज्य आयाराम-गयाराम के नायाब उदाहरण हैं लेकिन वहां के लोग एक यूपी या बिहार जैसे तथाकथित बड़े रुप से महान राज्यों को लोगों को अपने यहां कर्मचारी तो रख ही सकते हैं। यूं, यहां जापान या इटली का उदाहरण देना ठीक नहीं होगा लेकिन सनद के लिए कहा जा सकता है कि पिछले 50 सालों में वहां तकरीबन 50 सरकारें आईं और गईं लेकिन वहां के विकास पर कोई फर्क नहीं पड़ा। तो कुल मिलाकर मामला बड़ा होने या स्थिर होने का नहीं विकास करने की मानसिकता और विकास के हालात होने का है।

नेताओं ने अपने-अपने हिसाब से स्टैंड लिया है। बीजेपी का एजेंडा संघ का है जो छोटे राज्यों को केंद्र की मजबूती मानती है। कांग्रेस का कोई एजेंडा नहीं-हालात इसका एजेंडा है, यूं इसे छोटे राज्यों से परहेज नहीं है। बड़ी पार्टी है, आराम से दुकानदारी चलाती रह सकती है। क्षेत्रीय पार्टीयां सहूलियत के हिसाब से रुख अपनाती है-लालू को तेलंगाना से कोई परहेज नहीं-उनका क्या जाता है-जबकि यहीं लालू झारखंड बनते वक्त अपने लाश पर झारखंड बनाने की बात करते थे। माया ने बुंदेलखंड का एजेंडा राहुल गांधी की गोदी में डाल दी है कि देते रहो पैकेज-अब राज्य मांग रही हूं। दूसरी तरफ ये कि उसे लगता है कि बुंदेलखंड और हरितप्रदेश में दलितों का अनुपात अच्छा है तो क्या बुराई है। मारे जाएंगे मुलायम जो फिरोजाबाद और कन्नौज के नेता बनकर रह जाएंगे-वहां से भी उनकी जमीन खिसक रही है।

यूं ऐसा हमेशा नहीं होता कि छोटे राज्य विकसित ही हो जाएं लेकिन वे बड़े राज्यों से बेहतर तो हैं ही। कुलमिलाकर बड़े राज्य नेताओं-ब्यूरोक्रेटों को बड़ा संसाधन हड़पने का मौका देते हैं जबकि छोटे राज्यों में छोटा संसाधन और जनता की पैनी नजर का खतरा होता है। यहां झारखंड का उदाहरण देकर विषयांतर किया जा सकता है लेकिन यहां तो हरेक तर्क के दर्जन भर से ज्यादा प्रति तर्क दिए जा सकते हैं।

तो कुल मिलाकर मामला इन टुच्चे स्वार्थो के बीच न फंसे इसके लिए फिर से राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन करना जरुरी हो गया है। जो उचित मांगों पर एक खास समय सीमा में अपनी रिपोर्ट दे और देश में एक बार में दो-चार या पांच राज्य बनाए जाएं। राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हर 50 साल पर किया जाए और बेहतर प्रशासन, क्षेत्रीय अभिव्यक्ति और देश की मजबूती के लिए नए राज्यों को बनाने की प्रक्रिया शुरु हो। नए राज्य देश से अलग इकाई नहीं होने जा रहे जैसा कुछ टीवी एंकरों की जुबान से भयानक रुप से ध्वनित होता लगता है-ये देश को ही मजबूती प्रदान करेंगे।

Sunday, November 22, 2009

मंहगाई पर बोलना गुनाह है।

सीएनबीसी के सैकड़ों पत्रकार सड़क पर आ गए, लेकिन कोई चूं तक नहीं बोला। बोलना भी नहीं चाहिए, क्योंकि लाखों लोग हर रोज जब नौकरी से निकाल दिए जाते हैं तब तो कोई नहीं बोलता-भला सीएनबीसी के लोगों में कौन से सुरखाब के पर लगे थे। यूं हमारी मीडिया कभी-कभी दूसरे समूहों में हो रही छंटनी पर खबरें दिखा या छाप देती हैं लेकिन वो खबर तभी बन पाती है जब उससे बड़े खातेपीते और बड़बोले तबको का हित प्रभावित होता हो। जेट एयरवेज की छंटनी को याद कीजिए वो इसलिए खबर बन पाई थी क्योंकि नेताओं, कारोबारियों और अपार्टमेंट-कोठियों में रहनेवालों की फ्लाईट छूट रही थी और मीटिंग्स कैंसिल होनेवाली थी जिससे इस ‘देश’ का बहुत बड़ा नु्कसान होता। अब मान लीजिए की डीटीसी बसों के कर्मचारियों की छंटनी हो जाए तो भला क्यों दिखाएगी मीडिया? हां, ये कर्मचारी हड़ताल कर दें तो बात अलग है।
तो फिर इस देश में बोलेगा कौन? जब सबने बोलना ही बंद कर दिया है तो फिर बोलेगा कौन? आपको नहीं लगता कि ये स्पेस कोई और हड़प सकता है जो बोलने से आगे जाकर बंदूक की भाषा भी बोल सकता है। चलिए इसे भी यूटोपिया मान लेते हैं, आखिर हमारी लाखों की सेना और पूरा तंत्र उन्हे कुचल करने के लिए काफी है।

इधर, देखने में आया है कि लोगों की नौकरी और महंगाई पर बोलने के लिए कोई नहीं बचा। नेताओं की जुबान को लकवा मार गया है। यह देश पक्ष-विपक्ष विहीन देश हो गया है जहां दलालों, माफियाओं, सेटरों और फिक्सरों का बोलवाला है। इधर चीनी की कीमत 40 पार गई तो मैंने आजतक किसी भी माननीय का बाईट नहीं सुना। दूसरी तरफ किसानों का दिल्ली में जिस दिन आन्दोलन हो रहा था उस दिन ऐसे-ऐसे लोगों का बाईट टीवी पर देख रहा था जो कारपोरेट सेक्टर के दलाल हैं। इन्हे कुछ दिनो तक लाईजनर कहते थे लेकिन आजकल कंसलटेंट कहा जाने लगा है। यहां मकसद किसानों के आन्दोलन की आलोचना नहीं है लेकिन उसमें घुसे नेताओं की नीयत जरुर संदेहों के घरे में है। ये लोग वहां इसलिए थे कि वहां हजारों की भीड़ थी। आजतक इनमें से किसी भी नेता को हमने अलग से चीनी के मुद्दे पर नहीं सुना, और न ही इन्होने कभी महंगाई पर बोला।

पिताजी से कल फोन पर बात हो रही थी। उन्होने कहा कि अभी अगर कोई मंहगाई के मुद्दे पर संसद में किसी मंत्री को कुर्सी फेंककर मार डाले तो वो बड़ा नेता बन सकता है। मंहगाई के मुद्दे पर किसी विमान का अपहरण कर भी सुर्खी बटोरी जा सकती है। इस 120 करोड़े के देश में लोग तो हाड़तोड़ मेहनत करते हैं लेकिन उससे उपजने वाला पैसा कहां जाता है कि ये नहीं मालूम। वो पैसा हमें न तो स्कूलों में दिखता है न ही सड़कों पर। बस लोग धकियाए जा रहे हैं, पीटे जा रहे हैं और उनकी कटोरियों से दाल और कपों से चाय कम होती जा रही हैं। फिर इस सिस्टम का मतलब क्या है ?

लेकिन मेहरबानों...कदरदानों ज्यादा मुद्दों और जनहितों की बात करोगे तो लेफ्टिस्ट करार कर दिए जाओगे, सरकार आतंकवादी करार दे सकती है और तुम्हारे दोस्त तुम्हे पागल। वे तुम्हे अपनी पार्टी में बुलाने से मना कर सकते हैं, तुम्हारा फोन अटेंड करना बंद कर सकते हैं सबसे बड़ी बात तो ये कि आप एक लोकतंत्र में जी रहे हैं जहां हाल ही में जनता ने एक स्थिर सरकार के लिए वोट किया है। फिर क्या फर्क पड़ता है कि चीनी 40 पार गई है !

Sunday, November 15, 2009

हिंदी को गाय और ब्राह्मण की तरह पवित्र मत बनाईये

मेरे एक वरिष्ट फिरोज नकबी का मानना है कि देश में हिदी की दुर्दशा तभी से शुरु हुई जब आजादी के बाद इसे पवित्रतावादियों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। महात्मा गांधी चाहते थे कि देश में हिंदुस्तानी का विकास हो जिसमें लिपि तो देवनागरी हो लेकिन उसमें उर्दू और दूसरी भाषाओं के शब्द भी लिए जाएं। कुछ लोगों ने ये भी कहा कि हिंदी को देवनागरी और फारसी दोनों ही लिपिय़ों में लिखने की आजादी दी जाए। लेकिन कुछ अति पवित्रतावादियों के चक्कर में हिंदी को वो स्वरुप नहीं मिल पाया। इसमें हिंदी भाषा के कट्टरपंथी भी थे और उर्दू के भी। हिंदी वाले अपनी संस्कृतनिष्ट पहचान के लिए मरे जा रहे थे जबकि उर्दू वालों को लग रहा था कि उनकी भाषा ही खत्म हो जाएगी। पवित्रतावादियों को ये ख्याल नहीं था कि जब भाषा ही नहीं बच पाएगी तो उसका विकास कहां से होगा।

इलाहाबाद में उस जमाने में इस उद्येश्य से एक हिंदुस्तानी अकादमी की भी स्थापना की गई जिसमें अपने जमाने के जानेमाने विद्वान प्रोफेसर जामिन अली और डा अमरनाथ झा का अहम योगदान था। इस संस्था को महात्मा गांधी का भी आशीर्वाद मिला हुआ था। लेकिन हिंदुस्तानी अकादमी अकेली क्या करती। वो भाषाई कट्टरपंथियों के सामने टिक नहीं पाई। आज हालत ये है कि हिंदुस्तानी अकादमी के साईट पर जाएं तो वहां भी संस्कृतनिष्ठ हिंदी का ही बोलवाला दिखता है।

आज अगर हिंदुस्तानी भाषा का वो प्रयोग कामयाब हो गया होता तो देश में हिंदी एक बड़े क्षेत्र की भाषा बन चुकी होती। 2001 की जनगणना के मुताबिक जो हिंदी महज 45 लोगो की जुबान है वो अपने साथ मराठी, गुजराती, बंगाली, उडिया और असमी को भी जोड़ सकती थी और वो तकरीबन 70 फीसदी लोगों की भाषा होती। इसका इतना बड़ा साईकोलिजकल इम्पैक्ट होता कि हिंदी-विरोधी आंदोलन की इस देश में कल्पना नहीं की जा सकती थी। गौरतलब है कि मराठी की अपनी लिपि नहीं है और वो देवनागरी में ही लिखी जाती है। इसके अलावा गुजराती भी देवनागरी से मिलती जुलती है। पंजाबी, बंगला, उडिया और असमी के इतने शब्द हिंदी से मिलते जुलते हैं कि उन्हे आसानी से हिंदी का दर्जा दिया जा सकता था-बशर्ते हम लचीला रुख अपनाते। (ये ऐसे ही होता जैसे अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा आदि हिंदी की क्षेत्रीय भाषा या बोलियां बनकर रह रही हैं-ये अलग विमर्श है कि खड़ी हिंदी के विकास ने उन भाषाओं पर क्या असर डाला है!) लेकिन अफसोस, पवित्रतावादियों ने सब गुर-गोबर कर दिया। जो हिंदी वास्तविक संपर्क की भाषा बन सकती थी वो सिर्फ आमलोगों के संपर्क की भाषा बनी-बड़े लोग, सत्ताधीश और कारोबारियों ने अंग्रेजी अपना लिया। हिंदी और गौर-हिंदी के चक्कर में अंग्रेजी दबे पांव आ गई और इसने सबको खत्म कर दिया।

यूं, ऐसा जनता के स्तर पर नहीं हुआ। आम जनता हिंदुस्तानी ही बोलती रही लेकिन ये सिस्टम उसे संस्कृतनिष्ठ हिंदी सिखाने पर अमादा थी और अभी भी है। आप सरकारी विज्ञप्तियों को ध्यान से पढ़ें तो आप माथा पीट लेंगे-शायद हजारी प्रसाद द्विवेदी भी जिंदा होते तो न पढ़ पाते।

भला हो टीवी, सिनेमा और मीडिया का जिसने आम आदमी के बीच हिंदुस्तानी का प्रचार किया। औसत हिंदुस्तानी को इस भाषा से कोई परहेज नहीं लेकिन हमारे सरकारी कूढ़मगजों के दिमाग में कौन ये बात घुसाए।

दूसरी बात ये कि आज भले ही हिंदी अपने तरीके से अपना बिस्तार और विकास कर रही है लेकिन तथाकथित हिंदीवादियों और राज ठाकरे में उस स्तर पर अभी भी कोई फर्क नहीं है। हिंदीवादियों ने कभी भी हिंदी में कायदे के अनुवाद की कोशिश नहीं की। जो लोग हिंदी की मर्सिया गाते फिरते हैं उनसे कोई पूछे कि उन्होने विज्ञान, प्रबंधन और मेडीसीन के कितने पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया है। आज हालत ये है कि हिंदी में ढ़ंग की किताबे उपलब्ध नहीं है जो रोजगार में सहायक हो। इसके लिए कौन जिम्मेवार है? हमारी सरकार, भाषावादी या फिर ये बाजार?

बाजार को दोष देना बेवकूफी है। बाजार ने कभी भाषा का विरोध नहीं किया। बल्कि उसने माल बेचने के लिए हमेशा उसका उपयोग ही किया है। आज हिंदी सीखने के लिए अगर दूसरे प्रदेशों के लोगों में भी इच्छा जगी है तो इसके पीछे भी बाजार ही है। आज कारपोरेट बोर्ड रुम में भी हिंदी घुस गई है तो जाहिर है इसके पीछे बाजार है। मूल गलती हिंदी-वादियों की जो हिंदी को गाय, गंगा और ब्राह्मण की तरह पवित्र बनाए रखना चाहते हैं।

Wednesday, November 11, 2009

मायावती को खुश नहीं होना चाहिए

उपचुनाव के नतीजों की व्याख्या खंगालने बैठा तो नेट पर खास हाथ नहीं लगा। इधर टीवी वाले तो ऐसे ही हैं। हर जगह सिर्फ हेडलाईन बनाने की होड़ थी कि बब्बर को शेर कैसे लिखा जाए और कांग्रेस का ‘राज’ अच्छा लगेगा या हाथी की चिंघाड़। बहरहाल इन सबसे उलट ये कहीं नहीं मिल पा रहा था किस पार्टी को कितने फीसदी वोट मिले या किसने किसका वोट खाया और पहले किसको कितना मिला था। मेहनत का काम है, तुरत-फुरत तो हो भी नहीं सकता। दिमाग खपाना पड़ता है और वो भी अगर कनिष्ठ किस्म के गैरराजनीतिक मिजाज वाले स्टाफ को कहा जाए तो स्टोरी की मां-बहन एक हो जाए। लखटकिया सैलरी लेनेवाले हुक्मरान कहते हैं कि राजनीति बिकती नहीं-कौन माथापच्ची करे।(ये अलग विमर्श हो सकता है कि माथा बचा भी है या नहीं) दूसरी तरफ राजनीतिक खबरों का मतलब हमारे यहां राज ठाकरे, अमर सिंह टाईप के नेताओं की बाईट या फिर कैची हेडलाईन लगाना हो गया है। खासकर टेलिविजन चैनलों में।

इधर हमारे एक मित्र ने कहा कि अमां यार सारी खबर ये टीवी वाले दे देंगे तो पत्रिकाएं कैसे चलेंगी। ये तो उनका काम है कि आराम से विश्लेषण करती रहें। फ्रंटलाईन या इस तरह की पत्रिकाओं का काम है यह।

बहरहाल, यूपी उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि विधानसभा में माया सबपर भारी पड़ी। उधर उसने फिरोजाबाद में अपने उम्मीदवार को ढ़ीला कर दिया और राज बब्बर जीत गए। कांग्रेस खुश है। शायद माया ने सोचा होगा कि पहले सपा को निपटाना जरुरी है। जनता में मैसेज यहीं गया है कि सपा साफ हो रही है। कांग्रेस का साईकोलिजकल ग्राफ बढ़ा है। लेकिन ये भी महज खुशखबरी ही है। कांग्रेस अपने कद्दावर नेताओं का सीट हार गई। पंडरौना में विधायक से सांसद बने आरपीएन सिंह की मां तीसरे नंबर पर रही, तो उधर झांसी में राहुल के प्रदीप जैन अपना उम्मीदवार नहीं जितवा पाए। इसका क्या मतलब लगाया जाए? हां, कांग्रेस को थोड़ी तसल्ली इस बात से मिली की उसने लखनऊ पश्चिमी सीट बीजेपी से छीन ली जो वो पिछले तकरीबन 20 साल से दबाए बैठी थी। भला हो टंडन के कोप का कि बीजेपी उम्मीदवार खेत रहे-टंडन अपने दुलारे के लिए टिकट जो चाहते थे।

कुछ जानकार कहते हैं कि भले ही माया ने सपा को निपटा दिया हो लेकिन इसका खामियाजा उसे अगले विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। अब लोगों के दिमाग में साईकोलोजिकली कांग्रेस नंबर-2 हो गई है। अगर कांग्रेस इस रफ्तार को बरकरार रखती है तो अब माया विरोधी मतों का ध्रुबीकरण कांग्रेस के इर्द-गिर्द होगा। मुसलमान वैसे ही मूड बना चुका है, अब पंडितों में भगदड़ मचेगी। फिर तो कांग्रेस मजबूत होगी ही, बीएसपी का ग्राफ नीचे आएगा-क्योंकि ये संवर्णों का वोट ही था जिसने बीएसपी को 24 फीसदी से उछाल कर 33-34 फीसदी कर दिया था। गौर करने लायक बात ये है कि मुलायम का आधार व्यापक है। मुलायम और कल्याण मिलकर पिछड़ों की एकमात्र पार्टी है। ऐसे में ये हो सकता है कि लड़ाई सिमटकर कांग्रेस-सपा में हो जाए और बहनजी तीसरे नंबर पर पहुंच जाएं। ये बिल्कुल हो सकता है कि बसपा कांशीराम के जमाने में चली जाए। आमीन।

Tuesday, October 27, 2009

अंग्रेजी शिक्षा और दलित

संजीव एड एजेंसी में काम करता है। बोल रहा है कि उसका सीईओ भी कभी-कभी हिंदी बोल लेता है या अक्सर हिंग्लिश बोल रहा होता है। उस दिन रतन टाटा भी नैनो मसले पर पीसी में बोल रहे थे। लेकिन कैसे बोल रहे थे? वे अटक-अटक कर बोल रहे थे। सुना कि फिल्म जगत में अधिकांश नए कलाकारों को देवनागरी में स्क्रिप्ट पढ़ने में दिक्कत होती है, उन्हे रोमन अंग्रेजी में लिखकर दिया जाता है। शुरु में ये बाते बचकानी लगती थी, लगता था कि कोई मजाक तो नहीं रहा। लेकिन दिल्ली आने के बाद लगा कि नहीं ये हकीकत है। मेरे कई दोस्तों ने कहा कि यार हिंदी पढ़ने में दिक्कत होती है। माफ कीजिए वे उत्तरभारत के ही थे। इधर रवीशजी ने पोस्ट लिखा कि चंद्रभान प्रसाद अंग्रेजी देवी की मूर्ति लगवा रहे हैं ताकि दलित भी अंग्रेजी में पढ़कर ऊंची जगह जाए। मुझे तकनीकी तौर पर इसमें कोई दिक्कत नजर नहीं आती।

मैने मोहल्लालाईव(mailto:mohallalive.com/2009/10/27/sushant-jha-writeup-on-hindi-english-debate/) पर एक लंबा सा पोस्ट लिखा जिसमें कई लोगों को मेरे हिंदी विरोध या इसके प्रति हिकारत की गंध नजह आई। लेकिन सवाल ये है कि क्या अंग्रेजी की तारीफ हिंदी विरोध है ?

हिंदी इस देश में क्यों नहीं रोजगार, कामकाज और रिसर्च की भाषा बन पाई और क्यो वह एक संपर्क की भाषा बनकर रह गई-ये अलग विमर्श हैं। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हिंदी प्रेम दिखाने के लिए उसे सीने में चिपकाए रखा जाए, बस, आटो, बेडरुम और वाथरुम में भी विलाप किया जाए। भाषा की चिंता और उसके लिए उपाय खोजना अलग चीज है, मौजूदा दौर में व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाना अलग चीज है। हिंदी के एक बड़े पैरोकार डा राम मनोहर लोहिया तो अंग्रेजी के बड़े विद्वान थे, उन्हे जर्मन भी उतनी ही आती थी-लेकिन सिर्फ हिंदी प्रेम की वजह से उन्होने अपने आपको हिंदी तक सीमित नहीं रखा।

हिंदी को अगर वाकई रोजगार से जोड़ना है तो जो चीजें व्यावहारिक हैं उन्हे अमल में लाना होगा। हमारे देश में कितने हिंदी प्रेमी हैं जिन्होने तकनीक, प्रबंधन, प्रशासन के किताबों का हिंदी में अनुवाद किया है या मौलिक रुप से लिखा ही है? सिर्फ मन से हीन भावना हटा लेने और भाषा-संस्कृति की दुहाई देने से हिंदी कैसे अंग्रेजी के समकक्ष आ सकती है।

जो लोग चीन, कोरिया और जापान का उदाहरण देते हैं उन्हे भारत और उन देशों के हालातों को समझना होगा। उन देशों की राष्ट्रीयता का एक बड़ा आधार वहां की भाषा है जो वहुसंख्य जनता बोलती और लिखती है। क्या हिंदी के साथ ऐसी स्थिति थी या है? मौजूदा हिंदी तो सिर्फ हिंदी पट्टी में ही पिछले डेढ-दो सौ सालों में अपने असितित्व में आई है, पूरे देश की बात तो अलग है। आजादी के बाद हिंदी इस देश की संपर्क भाषा बन सकती थी लेकिन उसके लिए तत्कालीन हालात अनुकूल नहीं थे। ऐसे में वो जगह अंग्रेजी ने ले ली। अब अगर अंग्रेजी में सारे कारोबार, रिसर्च और प्रशासन का काम हो रहा है तो ये बिल्कुल उचित है कि उसके पढ़ाई की समुचित व्यवस्था की जाए। ऐसा नहीं हो सकता कि देश का एक वर्ग अंग्रेजी पढ़कर अच्छी-2 नौकरी करता रहे और दूसरा वर्ग मातृभाषा पढ़ते हुए ही जिंदगी गुजार दे। अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करना हर देशवासी, खासकर गरीबों का मौलिक अधिकार होना चाहिए। चंद्रभान प्रसाद इस मायने में सही हैं कि दलितों को अंग्रेजी पढ़नी ही चाहिए।

Thursday, September 24, 2009

दून-लंदन में पढ़ा शख्स कोबाद गांधी भी हो सकता है, राहुल गांधी ही नहीं...

टीवी पर कोबाद गांधी की खबर आ रही थी। आफिस में साथ करनेवाले एक मेरे मित्र ने उसे धोखे से राहुल गांधी समझ लिया। वजह ? वजह ये कि वो गांधी भी दून और लंदन में पढ़ा था। मतलब ये कि अधिकांश लोग यहीं सोचते हैं कि एक नक्सली दून और लंदन में कैसे पढ़ सकता है ? उसे तो फटेहाल या दीनहीन होना चाहिए। पेट की भूख ही किसी को नक्सली बना सकती है ! क्या वाकई ऐसा है?

विश्वदीपक मेरे मित्र है, एक टीवी चैनल में काम करते है। हमारी सप्ताहिक मुलाकातों में अक्सर इस विषय पर गंभीर बतकुट्टौवल होती है कि वाकई नक्सलवाद या अतिवामपंथ का हमारे देश में कोई भविष्य है। कुछ लोग ये भी कहते हैं कि वामपंथ ही अप्रसांगिक हो गया है। इसकी वजह वे ये गिनाते हैं कि सोबियत ढ़ह गया, चीन बदल गया और अपने यहां बंगाल में उसका किला कमजोर पड़ गया है। तो क्या यहीं वामपंथ की प्रसांगिकता या परिभाषा है। विश्वदीपक कहता है कि अगर नक्सली समस्या पर हम दिल्ली के पाश इलाके के किसी फ्लैट में बहस कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि वो हमारे ड्राईंग रुम में घुस गया है।


ये तर्क मुझे परेशान कर देता है, लेकिन वाकई इस तर्क में दम है। उसका ये भी कहना है कि वो कौन सी वजहें है जिस वजह से अचानक ग्रामीण विकास मंत्रालय पिछले कुछ सालों में ‘एलीट’ मंत्रालय बन गया है, और राहुल गांधी ‘नरेगा’ की माला जप रहे हैं? इसकी ये वजह नहीं कि देश के संभ्रान्त शासक वर्ग का हृदय परिवर्तन हो गया है, बल्कि इसकी वजह दांतेवाड़ा और लातेहार की गरजती बंदूके हैं जिससे हिंदुस्तान का सत्ताधारी एलीट घवरा गया है। ये नक्सलवाद की पहली विजय है। वो दिल्ली की सत्ता पर भले ही कब्जा न कर सके लेकिन उसके संघर्षों ने लुटियंस जोन में बैठों शासकों को प्रतीकात्मक रुप से ही बदलने को जरुर मजबूर कर दिया है।

कुछ आंकड़ों पर गौर करने की जरुरत है। देश में पिछले 60 साल में साक्षरता बढ़ी है, आमदनी बढ़ी है, लोगों का जीवनस्तर बढ़ा है। ये आंकड़े खुशफहमी पैदा करते हैं। लेकिन सवाल को जरा पटल दीजिए। क्या पिछले साठ साल में सकल निरक्षरों की तादाद में कमी आई है ? क्या गरीबों की सकल तादाद में कमी आई है, भले ही फीसदी में कमी जरुर आ गई हो ? देश की एक बड़ी आबादी निरक्षर है, गरीबी रेखा से नीचे है और स्तरीय मानकों पर उसके जीवन जीनें की दूर-2 तक अभी कोई संभावना नहीं है। हालत इतनी खराब है कि देश के उद्योगपतियों को सिर्फ जीवनयापन की कीमत पर सस्ते मजदूर मिलते हैं और देश के कई अंबानी दुनिया के रईसों में शुमार हो गए हैं। वे इसलिए अमीर नहीं हुए कि उन्होने किसी इनोवेटिव उत्पाद का आविष्कार किया हो और दुनिया के बाजारों में भर दिया हो। ये नितांत सस्ते श्रम का मायाजाल है।

ऐसी हालत में अगर 70-80 करोड़ लोग एक स्तरहीन जिंदगी जी रहे हैं और गुस्सा, खींझ, बीमारी, कुपोषण और निरक्षरता की हालात में फंसे हैं तो क्या ये हालात नक्सलवादी आंदोलन के लिए उपजाऊ जमीन मुहैया नहीं कराती ? गृहमंत्रालय के आंकड़े बता रहे हैं कि देश के तकरीबन एक चौथाई जिले माओवादियों के असर में है या उनका वहां कुछ प्रभाव है। ऐसे में अगर प्रधानमंत्री तक बार-बार चिंता जाहिर करते हैं कि माओबादी सबसे बड़ा खतरा है तो वे मजाक नहीं कर रहे होते-उनकी जुबान से एक अज्ञात भय झलकता है। वक्त आ गया है हम इस समस्या को वास्तविकता के स्तर पर झेंले न कि सिर्फ लफ्फाजी करके। अगर हम दून और लंदन में पढ़े हर आदमी को राहुल गांधी समझने की गलती करेंगे तो नक्सली वाकई राजधानी तक आ जाएंगे।

Wednesday, September 23, 2009

कुछ तैरती पतवारें, कुछ डूबती नौकाएं...

रायबरेली के फिरोज भाई बड़े दिलदार इंसान हैं। वे गालिब से लेकर माईकेल जेक्सन तक की बात करते हैं। हाल ही में उन्होने एक हिंदी का एक गजल सुनायी। ये गजल इलाहाबाद में रहनेवाले उनके एक मित्र एहतेराम इस्लाम ने लिखी थी जिसे मैं अपने ब्लाग पर बांटने का लोभ नहीं छोड़ पा रहा...

सीनें में धधकती हैं आक्रोष की ज्वालाएं...हम लांघ गए शायद सतोष की सीमाएं..

पग-पग पर प्रतिष्ठित हैं पथभ्रष्ट दुराचारी....इस नक्शे में हम खुद को किस बिन्दु से दर्शाएं....

बांसों का घना जंगल, कुछ काम न आएगा, हां खेल दिखाएंगी कुछ अग्नि शलाकाएं...

बीरानी बिछा दी है मौसम के बुढ़ापे ने, कुछ गुल न खिला बैठें यौवन की निराशाएं...

तस्वीर दिखानी है भारत की तो दिखला दो, कुछ तैरती पतवारें, कुछ डूबती नौकाएं...


ये गजल कुछ वामपंथी तेवर लिए हुए है, लेकिन मौजूदा दौर में लोगों की छटपटाहट और व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश को बखूबी बयां कर रही है। खासकर तब, जब गरीबों के लिए इंदिरा आवास की कीमत पचीस हजार रुपये आंकी जाती हो और देश के महानगरों में कोठियों की कीमत तीन सौ करोड़ तक पहुंच गई हो।

Tuesday, September 22, 2009

बिहार उपचुनाव के नतीजे और निहितार्थ


बिहार विधानसभा का हालिया उपचुनाव बहुत से लालबुझक्कड़ों के लिए नीतीश कुमार के अवसान का पैगाम लेकर आया। लेकिन लालू के चेहरे पर खुशी का अतिरेक नहीं था। लालू जानते हैं कि नीतीश, डैमेज कंट्रोल में माहिर है। इसलिए उन्होने गंभीरता से बयान दिया, कम से कम उनके चेहरे से यहीं लगा। हाल के दिनो में बिहार की जनता में ये मेसेज गया है कि नीतीश कुमार कुछ अहंकारी टाईप के हो गए है। हलांकि इस संदेश को फैलाने में जितनी विपक्ष की भूमिका नही थी उससे ज्यादा नीतीश के मंत्रियों की थी जिनका कहना था कि मुख्यमंत्री उपलब्ध ही नहीं होते। देखा जाए तो ये आरोप पूरी तरह से गलत भी नहीं है। नीतीश के समर्थकों का कहना है कि मंत्री और पार्टी के विधायक इसलिए नाराज है कि उन्हे मनमानी की छूट नही है। दूसरी तरफ विरोधियों का कहना है कि नीतीश ने सारे अधिकार अपने हाथ में रख लिए हैं। लेकिन जो भी हो अगर चुनाव किसी चीज का आईना है तो ये उपचुनाव ये साबित नहीं कर सकता कि नीतीश का जनाधार ढ़लान पर है क्योंकि हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की थी।

सबसे बड़ी बात ये कि ये चुनाव पटना की गद्दी के लिए नहीं था। इस चुनाव से मुख्यमंत्री का फैसला होनेवाला नही था। इसलिए स्थानीय स्तर के मुद्दे हावी हो गए और ये चुनाव पंचायत चुनाव सरीखा हो गया। ये बात लालू और पासवान भी जानते हैं कि साल भर बाद होनेवाले विधानसभा चुनाव में उनका मुकाबला एक व्यक्तित्व से कुशल प्रशासक बन गए नीतीश कुमार से होनेवाला है जिसके बरक्श जनता लालू-पासवान के 15 सालों की जुगलबंदी को तौलेगी।

ऊपर की पंक्तियां नीतीश कुमार का आनलाईन पीआर लग सकती है लेकिन जमीनी हकीकत यहीं है। नीतीश कुमार ने बिहार के समाजिक ‘ मेल्टिंग पाट’ में कई प्रयोग किये है। अतिपिछड़ों की गोलबंदी नीतीश के पक्ष में है(जिसकी आबादी करीब 38 फीसदी है) जबकि महादलितों के लिए कई योजनाएं बनाकर सरकार ने उन्हे अपने पक्ष में करने का कोशिश की है। लेकिन इसके नतीजे में कई जगहों पर कई मजबूत जातियों की जुगलबंदी और समीकरण पनप गए हैं जिस वजह से पिछले उपचुनाव में उनकी पार्टी को कई जगह पर नुकसान हुआ है। अतिपिछड़ाबाद और अति-महादलितवाद कई लोगों को नाराज भी कर गया है-ये बात नीतीश भी जानते हैं।

लेकिन उससे भी बड़ी बात ये कि जेडी-यू ने राजद के कई नेताओं को टिकट देकर अपने बनते हुए मजबूत वोट बैंक को नाराज कर दिया। श्याम रजक और रमई राम की हार तो यहीं कहानी कह रही है। तीसरी और अहम बात ये कि सरकार की दो समर्थक जातियां-ब्राह्मण और राजपूत- सरकार से नाराज दिखती हैं। ये नाराजगी पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त ही शुरु हुई थी-लेकिन अब जाकर आकार लेने लगी है। इसकी ऐतिहासिक-भौगोलिक वजहें भी हैं।

नीतीश कुमार से सरकारी कर्मचारी नाराज हैं। क्योंकि उन्होने हड़ताल का कड़ाई से सामना किया और काम का दवाब बढ़ गया हैं। भष्टाचार पर थोड़ा सा अंकुश लगा है, मास्टरजी को स्कूल जाना पड़ता है। इसकी वजह सिर्फ नीतीश कुमार नहीं है, केंद्र की तरफ से भी ढ़ेर सीरी योजनाओं के लिए ढ़ेर सारा पैसा आने लगा है-जिस वजह से कर्मचारियों को कम से कम आफिस में तो रहना ही पड़ता है।

ये सारी तस्वीरे क्या कहती है ? जनता को इन सब चीजों से कोई ऐतराज नहीं। वो उसके घाटे का सौदा नहीं। सामान्य तौर पर सूबे की कानून व्यवस्था ठीक हुई है, सड़के चमकने लगी है और गांवो में बिजली की तार दिखती है। लोगबाग नीतीश की आलोचना नहीं करते। एंटी इन्कम्बेंसी अभी तक नहीं है।

नीतीश, गलतियों को स्वीकार करने और उससे सबक सीखने में माहिर है। बड़ी बात ये कि जनता का बड़ा वर्ग उनके साथ है। ब्रांड नीतीश बहुत दिनों में बना है, वो इतने कम दिनों में खत्म नहीं हो सकता। इसलिए ये मानना कि उपचुनाव के नतीजे बिहार की जनता का लालू-पासवान के लिए मुहब्बत का पैगाम है-जल्दबाजी के सिवा कुछ नहीं। अगला चुनाव भी नीतीश बनाम अन्य ही होगा-जैसा बिहार में इससे पहले का दो चुनाव था। लालू बनाम अन्य तो अभी नहीं दिख रहा।

Friday, September 18, 2009

मोदी आज सठिया गए...

वैसे तो मोदी के कई फैसले पहले से ही इशारा कर रहे थे कि वे सठिया चुके हैं लेकिन आज अखबारों से पता चला कि वे वाकई सठिया गए हैं। वैसे सुना कि जब नेता सठियाता है तो क्रिकेट संस्थानों पर कब्जा कर लेता है। मोदी ये हाल ही में काम कर चुके हैं। लालू और पवार भी सठियाए थे तो उन्होने बिहार और देश स्तर के क्रिकेट संस्थाओं पर कब्जा कर लिया था।

वैसे एक थ्योरी ये भी है कि नेता सठियाता है तो दंगे करवाने लगता है। 90 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी सठियाए थे तो बाबरी-अयोध्या दंगा हुआ था। उससे भी पहले सुना कि आजादी से पहले एक बार जिन्ना सठियाए थे तो देश भर में यादगार दंगे हुए थे। उस हिसाब से मोदी बहुत पहले सठिया चुके हैं, वैसे सर्टिफिकेट पर आज सठियाए हैं।

बुजुर्गों का कहना है कि नेता जब सठिया जाता है तो वो संत किस्म का हो जाता है। सुना कि वो अपने पाप का घड़ा भरकर पूण्य लूटने निकल जाता है। जिन्ना भी पाकिस्तान के जन्म के बाद वहां कि नेशनल एसेंबली में उदारवादी भाषण देते हुए पाए गए। आडवाणी ने जिन्ना के मजार पर पर सजदा किया, लालू ने मांसाहार छोड़ दिया और पवार ने विदेशी मूल की महिला का विरोध करना छोड़ दिया। हो सकता है कि मोदी भी कुछ ऐसा ही करें। वैसे मोदी ने रतन टाटा से आशीर्वचन (नैनो) लेकर संत-त्व तरफ एक कदम बढ़ा ही दिया है। उनका अगला कदम देव-त्व की तरफ होगा जिसके लिए वे अपने वरिष्ठ आडवाणी की तरह बुजुर्ग नहीं होना चाहते।

Wednesday, September 16, 2009

एक सनसनी जो बनते-बनते रह गई...

“लाख अन्यायपूर्ण और अनुचित आलोचनाओं के बावजूद सोनिया गांधी ने जिस गरिमा और गंभीरता के साथ सत्ता की कामना का वलिदान किया वो अपने आप में एक मिसाल है। वो एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिज्ञ हैं जिन्हे ग्रामीण और शहरी संभ्रान्त वर्ग समान रुप से पसंद करता है। हमारे देश में ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्होने महाद्वीपों, सभ्यताओं और भाषाओं के बंधन को इतनी आसानी से पार किया है और जिनको दुनिया गंभीरता से सुनती है। सोनिया गांधी का दिल हमेशा गरीबों, कमजोरों और सुविधाविहीन लोगों की भलाई के लिए धड़कता है”
पाठक इन शब्दों को पढ़कर परेशान या गुमराह न हों, न ही इन पंक्तियों के लेखक का कांग्रेसीकरण हो गया है। ये शब्द हैं इनफोसिस के अध्यक्ष नारायण मूर्ति के। अपने पाठकों की याददाश्त के लिए बताते चलें कि ये वहीं नारायण मूर्ति हैं जिनका नाम एक दौर में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए लंबे समय तक हवा में रहा था। माफ कीजिएगा, जरा हिंदी कठिन लिखी हुई है, क्योंकि ये पीटीआई की खबर का शब्दश: अनुवाद है जो नारायणमूर्ति की पांडित्यपूर्ण अंग्रेजी में दिया गया था। मौका था 15 सितंबर 2009 को मैसूर में इनफोसिस के दूसरे ग्लोबल एजुकेशन सेंटर के उद्धाटन का जो सोनिया गांधी के हाथों संपन्न हुआ था। लेकिन खबर ये नहीं है।

ठीक उसी दिन मैसूर से तकरीबन 2500 किलोमीटर उत्तर में पंजाब के शहर लुधियाना में सोनिया गांधी के बेटे और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी यूथ कांग्रेस के एक ट्रेंनिंग कैम्प का उद्धाटन करते हैं। इस कैम्प में य़ुवा कांग्रेसियों को चार दिन का ट्रेनिंग दिया जाना है कि तृणमूल जनता(ग्रासरुट मासेज) तक कैसे पहुंचा जाए और कांग्रेस को कैसे सत्ता की स्वभाविक पार्टी बनाए रखा जाए। इस कैम्प को साफ्ट स्किल का ट्रेंनिंग देने के लिए बंगलूरु से एक कंसलटेंसी को बुलाया जाता है जिसका नाम है- इस्टिट्यूट आफ लीडरशिप एंड इस्टिट्यूशनल डेवलपमेंट। इस फर्म के साईट पर जाएं तो पता चलता है कि इसके डाईरेक्टर का नाम है- डा जी के जयराम। डा जयराम इंफोसिस लीडरशिप इस्टिट्ट्यूट के प्रमुख रहे हैं। इस फर्म को एक ट्रस्ट चलाती है जिसकी एक ट्रस्टी है रोहिणी निलकेणी। रोहिणी निलकेणी, नंदन निलकेणी की पत्नी है। अब ये बताना कोई जरुरी नहीं है कि ये वहीं नंदन निलकेणी हैं जिन्हे सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली यूपीए सरकार ने अपने सबसे बड़ी महात्वाकांक्षी परियोजना यूनिक आईडेंटीफिकेशन कार्ड का अध्यक्ष बनाया हुआ है।

अब यहां दो अनुमान तो लगाए ही जा सकते हैं। अगर बीजेपी के धुरंधर, डा कलाम जैसे वैज्ञानिक को राष्ट्रपति बनाकर ‘सेक्युलर’ होने का भी तमगा हासिल कर सकते हैं तो भला कांग्रेस क्यों नहीं डा नारायण मूर्ति को राष्ट्रपति बनाकर अपना आधुनिकतावादी चेहरा दिखा सकती ? बिल्कुल दिखा सकती है, माना कि पिछले बार वाम एक महिला के नाम पर अड़ गया था-अब क्या परेशानी है ? नारायणमूर्ति ने अपने आपको निष्ठावान तो कमसे कम साबित कर ही दिया है !

इस खबर का मकसद न तो नारायण मूर्ति की पहुंच का मर्सिया पढ़ना है न ही उनकी गरिमा और अहमियत को ठेस पहुंचाना। इस खबर का मकसद सनसनीखेज पत्रकारिता करनेवाले भाई बंधुओं को आईना दिखाना है कि असल सनसनी तो यहां थी जिसमें वे चूक गए। खैर, हमारे देश में लकीर पीटने का भी रिवाज रहा है, सो वो अभी भी इस पर अमल कर सकते हैं।

Friday, August 28, 2009

बीजेपी का सतरंगी झगड़ा...कितना संगीतमय है!

आखिरकार मोहन भागवत दिल्ली आ ही गए। आना ही था। सुदर्शन भी पिछली बार चेन्नई में डेरा डाल आए थे जब आडवाणी को अध्यक्ष पद से हटाना था। हां, इतना तय है कि आडवाणी के जाने के बाद बीजेपी के आगामी नेता इतने बौने होंगे कि संघ प्रमुख उन्हे नागपुर से फोन पर ही निपटा देंगे। संघ सुप्रीमों का दिल्ली आना मायने रखता है। मजाल है कि कोई भाजपाई चूं भी बोल सके। सबको टिकट लेना है, पद पाना है जिसपर मुहर नागपुर ही लगाता है। कुल मिलाकर संघ प्रमुख हमारे यहां की एक बड़ी पार्टी-बीजेपी- के खुमैनी हैं जो चुनाव लड़नेवाले उम्मीदवारों को योग्यता का सर्टिफिकेट देते हैं।

लेकिन खेल मजेदार है, टीवी के लायक बिकाऊ भी। उधर जसवंत को भाजपा ने निकाला तो वाजपेयी के तमाम पुराने ‘खास’ गोलबंद हो गए। नया गोला ब्रजेश मिश्रा और यशवंत सिंहा ने दागा। उनका कहना है कि आडवाणी को ये बात मालूम थी कि आतंकियों को छोड़ा जाना तय हुआ था। ये कैबिनेट का सामूहिक फैसला था। मामाला वैसा ही लग रहा है जैसा राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में आडवाणी पर आरोप लगाते थे। अब निकालते रहो कितने को पार्टी से निकालते हो। बीजेपी आलाकमान शौरी को पार्टी से नहीं निकाल पाया, उधर खंडूरी और वसुंधरा अभी तक आंखे दिखा रहे हैं। पहली नजर में बात तो सही लगती है कि पार्टी की हार के लिए प्यादे ही कैसे जिम्मेवार हैं जबकि लड़ाई तो प्रधानमंत्री बनने की थी।

जाहिर है वाजपेयी के तमाम पुराने यार ( या शागिर्द?) एक हो गए हैं। ब्रजेश, जसवंत, खंडूरी ये तो बानगी है। वाजपेयी ने जब जसवंत को मुलाकात का वक्त दिया तभी लग रहा था कि खेल अभी बाकी है।
आडवाणी खेमा के सारे चुप हैं। वे हवा का रुख देख रहे हैं। क्या बैकय्या, क्या जेटली और क्या अनंतकुमार। सुषमा का पता नहीं चल पा रहा वो अब किस खेमे में है। कई लोग खेमाविहीन होने की जुगत में है। राजनाथ के मन की बात किसी को पता नहीं- कि वो आडवाणी के आदमी है या असंतुष्टों का। लगते तो आडवाणी के हैं लेकिन संघप्रमुख के सामने जुबान नहीं खुलती-किसी की नहीं खुलती। आडवाणी को बचाने के लिए कहते हैं कि हार का ठीकरा मेरे सिर। लेकिन राजनाथ का कद इनता बड़ा नहीं कि ठीकरा उनके सिर फूटने की हामी भरे।

बीजेपी में कांग्रेस के उलट सब कुछ रहस्य ही रहस्य है। कांग्रेस में ही एक ही पथ है जिसका नाम 10 जनपथ है। बीजेपी में कई पथ हैं। यूं ज्यादातर नागपुर को जाती है लेकिन कुछ सड़कें इधर यू-टर्न मार आडवाणी के घर की तरफ मुड़ जाती थी।

जसवंत की विदाई से ठीक एक दिन पहले संघप्रमुख का इंटरव्यू आता है। उधर चिंतन बैठक है, आडवाणी एंड कंपनी पर आरोपों की बौछार होनी है और बीच में जसवंत सिंह आउट। क्या ये आडवाणी खेमा मुद्दा को डाईवर्ट कर रहा था जो चिंतन में उठना था?

उधर सयानों का कहना है कि जसवंत की विदाई संघ के इशारे पर हुई है और संकेत आडवाणी को सेफ पैसेज देने की है। मतलब ये तुमने भी तो पिछले के पिछले साल जिन्ना को देवता बताया था। लेकिन उधर फिर एक पेंच हैं।

सुदर्शन कहते हैं कि जिन्ना भले मानूस थे। अब यहीं सुदर्शन, आडवाणी को जिन्ना मसले पर अध्यक्ष पद से हटा चुके थे। लेकिन अब ये कैसा जिन्ना प्रेम?

उधर जिस दिन भागवत ने कहा कि एक नहीं दो नहीं 10-15 काबिल नेता हैं तो जोशी ने हां में हां मिलाई कि 10-15 ही क्यों 70-75 हैं। एक मतलब ये भी है कि उपर में जो पूरी टीम बैठी है उसे ही साफ कर दो। लाओ नीचे से नेता और पुनर्गठन करो। शौरी भी यहीं बोल रहे। तो क्या इस खेमें को संघ की सरपरस्ती हासिल है ?

लेकिन ये मानने का दिल फिर नहीं करता। क्योंकि जसवंत ने जो बड़ा पाप किया वो ये कि उन्होने जिन्ना को महान नहीं बताया-बल्कि सरदार पटेल की आलोचना की। उस पटेल की जिसे संघ वाले नेहरु के बरक्श अपना मानते आए हैं। तो फिर होगा क्या? इतना तो तय है कि आडवाणी एंड कंपनी को जाना होगा। संघ को उनका विकल्प नहीं मिल रहा। कोई ऐसा नाम जिस पर एका हो सके और जनता में भी जिसकी स्वीकार्यता ज्यादा हो। जाहिर है, कई डार्क होर्स इंतजार में बैठे हैं।

Friday, August 7, 2009

हमें आगे कौन पढ़ाएगा सरकार...?


सुमन कहती है कि फरक्का में वो सब कुछ है जो एक छोटे शहर में होना चाहिए, मसलन अच्छी सड़के, अच्छे स्कूल-डीपीएस भी है-और अच्छे अस्पताल। लेकिन नहीं है तो सिर्फ कोई भी कालेज। मैं भौचक्का हूं। मैं उससे कुछ और जानना चाहता हूं। वो आगे बताती है कि फरक्का में वाटर आथरिटी है, एनटीपीसी है, एनएचपीसी है, भेल है सब है। उसकी टाउनशिप है, गतिशील बाजार है और शान्ति है। लेकिन ऊपर बताया गया सारा कुछ केंद्रीय सरकार का है। मै पूछता हूं कि तो फिर बंगाली भद्रमानूष राईटर्स बिल्डिंग में क्या करते है। सुमन के पास इसका कोई जवाब नहीं है, वो बताती है कि किसी को कालेज की पढ़ाई करनी है तो या तो मालदा जाना होगा या फिर जंगीपुर(प्रणव बाबू का क्षेत्र-हलांकि वहां भी कोई बढ़िया इंतजाम नहीं है) जो 2 घंटे का रास्ता है। सारे संस्थान कलकत्ता में ही सिमट गए। यानी अच्छे नामों और अच्छे शक्ल-सूरतों वाली वामपंथी सरकार ने फरक्का नामके जगह के लिए पिछले 30 सालों में एक कालेज खोलने की कोई जरुरत नहीं समझी।

ये जरुरत बिहार में नीतीश कुमार और उनसे पहले के किसी सरकार ने भी नहीं समझी। शिक्षा पर भले ही लंबी चौड़ी तकरीरें हों और तमाम योजनाओं का पिटारा खोला-दिखाया जाए लेकिन हकीकत यहीं है कि बिहार जैसे प्रान्त में हाईस्कूल कम से कम 5 किलोमीटर के दायरे में है। अगर कालेज की बात की जाए तो नजदीकी कालेज कम से 10 किलोमीटर में एक है जिसमें परंपरागत विषय ही उपलब्ध है। पता नहीं, बिहार सरकार, ईसा के किस सन में इस वैचारिक लकबे से ग्रस्त हुई। वो कौन से महानुभाव थे-उन्हे खोजकर बिहार रत्न की उपाधि देनी चाहिए-जिन्होने 5 किलोमीटर के दायरे में हाईस्कूल खोलने पर पाबंदी लगवा दी। आज हकीकत ये है कि बिहार में लड़कियां-खासकर के ग्रामीण इलाकों की लड़किया किसी तरह घिसट-2 कर हाईस्कूल की शिक्षा प्राप्त करती है। जहां तक कालेज जाने का प्रश्न है तो ज्यादातर ल़डकियों के सपने कालेज की दूरी देखकर ही दम तोड़ जाते हैं। कालेज का एजुकेशन सिर्फ शादी के लिए किया जाता है, ताकि अच्छा दूल्हा मिल सके। इसकी खानापूर्ति प्राईवेट से इक्जाम देकर किया जाता है। पता नहीं, नीतीश कुमार को ये बात मालूम है कि नहीं-कपिल सिब्बल की चिंताओं में तो इतनी दूर की बात आ भी नहीं पाएगी।

मुझे नहीं मालूम देश के दूसरे हिस्सों की हालत क्या है। जहां तक यूपी की बात है तो लगता है कि वहां बिहार से ज्यादा शिक्षण संस्थान उपलब्ध हैं-चाहे विश्वविद्यालय हों या फिर हाईस्कूल। जहां तक मैने अनुभव किया है देश के दक्षिणी राज्य बीमारू सूबों से इतर कई दूसरे राज्य भी अपने बच्चों को बेहतर पढ़ा-लिखा रहे हैं।

सर्व शिक्षा अभियान के तहत भारत सरकार बड़े पैमाने पर शिक्षा के लिए धन दे रही है। खासकर प्राईमरी शिक्षा के लिए सरकार ने लाखों पंचायत शिक्षकों को बहाल कराया है। लेकिन हमारे यहां उच्च माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया है। बिहार जैसे सूबों की बात करे तो एक औसत परिवार का बच्चा दसवीं के बाद क्या करेगा-इसका कोई मुकम्मल इंतजाम न तो नीतीश कुमार के पास है न ही कपिल सिब्बल के पास। सरकार एक औसत बच्चे को उसके घर के पास-कम से कम-10 किलोमीटर के दायरे में कालेज देने में नाकाम रही है।

दूसरा तरीका ये है कि वो बच्चा 10+2 करने के बाद बंगलोर या पूना चला जाए जहां उसे लगभग 8 लाख रुपये खर्च करने के बाद इंजिनीयरिंग या दूसरी कोई पेशेवर डीग्री मिल जाएगी। ऐसे कितने परिवार है, जो इतना खर्च कर सकते हैं।

तो हम कर क्या रहे हैं। हम लाखों बच्चों को स्कूल से निकाल कर दिल्ली-मुम्बई की सड़कों पर फैक्ट्री, दूकानों और घरों में नौकर बनने के लिए भेज रहे हैं-जहां कोई न कोई राज ठाकरे उसे गाली देने के लिए तैयार बैठा है।

Thursday, July 16, 2009

पोलिटिकल लाईजनर-2

एमपी साहेब (पूर्व) टहल रहे हैं। इस महीने कोई लाईजनिंग नहीं हो पाई, कोई पार्टी नहीं फंसा। विवेकजी भी तो आजकल कम आ रहे हैं साउथ एवेन्यू। लगता है सुरेन्दर बाबू के यहां ज्यादा उठते बैठते हैं आजकल। हां, आदमी थोड़ा कमा लेता है तो कम भाव देता है वक्त-वक्त की बात है। लेकिन एक बात है कि विवेकजी पार्टी तुरंत खोज लेते हैं। अब ऊ ससुरा जो लोन लेने आया था 50 करोड़ का विवेकजी ही तो लाए थे। अब पार्टी नहीं लाते कहीं से उ बैंक के जीएम से दोस्ती का अचार डालते। वैसे मांगिए जाकर किसी से 50 हजार रुपये भी...अठन्नी नहीं देगा। रिश्ते को बिजनेस में ढ़ालिए, तभी कुछ निकलता है।

एमपी साहेब(पूर्व) को तो ये धंधा ही समझ में नही आता था पहले। दो टर्म तो धंधे की बारीकी समझने में लग गया। और इधर ऐसे-2 लोग हैं जो नेता को झोला लेकर चलते थे और करोड़पति बन गए-ऊ भी दांए बांए से। एमपी साहेब संसद जाते और पिछले बैंक पर उंघते रहते। ऊ कौन तो आया था अमेरिका का राष्ट्रपति बिल क्लिंटन...पार्टी अध्यक्ष ने कहा कि सबको मौजूद रहना है। पीएम ने कहा है कि ज्यादा से ज्यादा मुंडी दिखना चाहिए। ससुरा क्या-2 अंग्रेजी में बोलता रहा, कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा एमपी साहेब(पूर्व) को। ऊ तो पार्टी अध्यक्ष ने कहा कि सिर गिनेगें पार्लियामेंट में इसलिए चले गए थे नहीं तो कौन जाता जम्हाई लेने।

अब करें तो करें क्या। ससुरा सांसद निधि तो 2 करोड़ ही है। कितना बचेगा। मान लीजिए 30 फीसदी कमीशन ठेकेदार दे भी दे तो कितना होता है पांच साल में 3 करोड़। फिर दिल्ली में रहना है, स्टेटस है। साला 3-4 लाख का तो मंथली खर्चा है। इससे क्या खाक बचेगा। हां इधर इसका एक तरीका निकाला है। अपने भाई या भतीजे को ही ठेका देते हैं। ज्यादा बचता है। घर का माल घर में। परिवार वाले भी खुश। एक दिन फ्रस्ट्रेड थे-बोले कि हम करेंगे क्या बताईये। साली डाईरेक्ट गवर्नेंस में हमारा कोई रोल है नहीं-महीना में 5 दिन क्षेत्र को देते हैं अब साल भर का करेंगे हम। तो दो टर्म के बाद समझ में आया कि लाईजिनिंग की जा सकती है। इस बीच कई कमेटियों में थे। फाईनेंस कमेटी में थे तभी बैंकर सब से दोस्ती हुई थी। उसी के कमाई पर तो साऊथ एक्स में फ्लैट...खैर छोडिए भी इन बातों को...।

इधर साथ वाले क्षेत्र का एमपी मानव संसाधन में राज्यमंत्री लग गया। एक स्कूल का काम था मध्यप्रदेश में। मिशन का था। विवेकजी ही तो लाए थे। ससुरा एक ही बार में मान गया कि 10 लाख दे देंगे। समझ में ही नहीं आया कितना बड़ा पार्टी है। उससे कम से कम 25 लाख तो दूहा ही जा सकता था। लेकिन एमपी साहेब ने सारा माल गोल कर दिया...विवेकजी को 1 लाख ही दिया। खैर आज के दिन में विवेकजी इतने पर थोड़े मानेंगे। ऊ भी का कहा उन्होने मालूम है...विवेकजी.. का बताएं...सारा पैसा मंत्रिया खा गया...हम का कहते...चलिए पार्टी को जोड़ के रखिए..आगे भी काम देगा...(जारी)

Monday, July 13, 2009

पोलिटिकल लाईजनर-1

वह सियासत के लूडो (बिसात नहीं) का उस्ताद था। लेकिन सांप सीढ़ी के खेल में 99 पर उसे सांप ने डस लिया तो वह 25 पर आ गया। 3 बार सांसद रहने के बाद फिलहाल वो बेरोजगार है। वो लाईजनर बन गया है। वैसे लाईजनर बनने के लिए सांसद होना कोई अनिवार्य योग्यता नहीं है।

ये लोकेशन है साउथ एवेन्यू का जहां सांसदों का आवास है। जहां राष्ट्रपति भवन का दक्षिणी गेट दिखता है। आप अगर उधर से गुजरे तो लगेगा कि प्रतिभा ताई अभी आपको बुला लेगी और कहेगी कि बबुआ चाय तो पीते जाओ। तो पूर्व सांसद टर्न्ड लाईजनर ने अभी तक सांसदों वाली कोठी हथिया कर रखा है। हुआ ये कि जनाव जब लोकसभा में थे तो आवास समिति के अध्यक्ष थे। जमकर सांसदों को उपकृत किया था, अब हारने के बाद नया आवास समिति का अध्यक्ष उन्हे उपकृत कर रहा है। उनके नाम वो बंगला एलाट है।

शाम की बैठकी है। यहां सिर्फ पानी के साथ सिर्फ पनीली चाय मिलती है। हारे सांसद के घर ये उम्दा किस्म का स्वागत है। दिन भर महज 200 कप चाय बनती है उसी में सबका गुजारा होता है। आनेवाले सारे लोग लाईजनर ही हैं या भविष्य के लाईजनर है। सारे लोग संभावना तलाशने आते हैं। एक दूसरे को काटने आते हैं। सारे लोग सतर्क हैं, डरे हुए से कि कोई बेजा फायदा न उठा ले जाए। सांसद रह चुके लाईजनर ने कुछ नहीं कमाया है। उसके पास डिफेंस कालोनी में एक 3 करोड़ का फ्लैट है, बिहार में 2 पेट्रोल पंप है और उसने 4 बच्चों को फ्री में इंजिनियरिंग-मेडिकल में दाखिला दिलवाया है। हां, पटना में भी एक कोठी है। कैश है ही नहीं। दिन भर रोता रहता है।
दूसरा लाईजनर आता है शाम के 6 बजे। सांवला रंग, उम्र 45 साल, झक्क सूट और लंबी गाड़ी। आते ही पहला कहता है-अरे बीरेंद्रबाबू कहां थे, दर्शन भी दुर्लभ हो गया।

दूसरा- अरे सर क्या बताएं, भतीजे के एडमिशन में लगा था, इतना महंगा हो गया है कि हमारे जैसे आदमी के बस की बात नहीं।
पहला- कहां करवाया..
दूसरा- सर, चेन्नई में एसआरएम में।
पहला-वाह...कितना लगा....ऊ तो काफी चार्ज करता है...
दूसरा- अरे सर..पैसा तो सुनते हैं कि बहुत लेता है, एक आदमी था..थोड़ा कम लगा।
पहला- किसको बोले थे...
दूसरा- सर... मेरे परिचित है एक मुम्बई में...उसका परिचित है बंगलोर में..उसका दोस्त प्रिन्सिपल का साला है...
पहला-ससुरा बड़ा घाघ है...इतना लंबा चेन बना दिया न...कि मेरा बाप भी नहीं पहुंच सकता...साले को मैं रग-2 जानता हूं। है कोई इसके डाइरेक्ट टच का ही...लेकिन मुझे नहीं बताना चाहता। जानता है न कि नाम खुल गया तो शुक्ला 4-5 एडमिशन तो यूं ही करवा लेगा। आखिरकार मानवसंसाधन राज्य मंत्री उसका लंगोटिया जो है। मादर....&^%$
पहला- और बताईये...
दूसरा-सर सब आपकी कृपा है।

सीन खत्म। दूसरा उठता है, और मोबाईल लेकर कैम्पस से बाहर जाने का बहाना करता है। उमेशबाबू जान जाते हैं उसी से बात करनी है। वो भी थोड़ी देर में एमपी(पूर्व) से आज्ञा लेते हैं। दोनों पान की दुकान पर हैं।

अरे उमेशबाबू...ई एमपी साहेब भी है न...साले बड़े पेटू हो गए है। शिकार सूंघते रहते हैं। उनके सामने जुबान खोलना..मतलब पार्टी खो देना। अब बताईये...घोड़ा घास से दोस्ती करेगा क्या....(जारी)

Thursday, July 9, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - अंतिम भाग

10 तारीख को हमें इलाहाबाद से वापस आना था, मन कर रहा था कि काश कुछ दिन और रुक पाते। सुबह आठ बजे हमारी ट्रेन थी, गौरव हमें स्टेशन तक छोड़ने आया। हमने आते वक्त वो खूबसूरत केथेड्रल देखा जो स्टेशन के नजदीक ही है। हमने इलाहाबाद हाईकोर्ट भी देखा और उसके सामने फोटो खिचाया। हमें बड़ी मुश्किल से पुलिसवालों से मनुहार कर वहां पर फोटो खिंचाने की इजाजत मिली। वाकई इलाहाबाद हाईकोर्ट की इमारत अद्भुत है, हम उसकी भव्यता का अंदाजा लगाते रहे और सोचते रहे कि क्या वाकई हम उसी इमारत के सामने खड़े है जिसने इंदिरा गांधी की सत्ता को हिला कर रख दिया था।

डीडी न्यूज में काम कर रहे मेरे दोस्त नितेंद्र सिंह की याद बरबस आ गई जिसने कई बार इलाहाबाद के जगराम चौराहा का जिक्र हमारे सामने किया था। रास्ते में ही जगराम चौराहा दिखा, हमने वहां चाय पी। वो किसी जगराम नामके किसी कारोबारी के नाम पर था, जिनकी पिछली पांच पीढ़ियों से वहां दुकान थी। हमें फोटो खींचते देख दुकान मालिक ने शुरु में पूछताछ की, बाद में उसने हमारा काफी सहयोग किया। नितेंद्र सिंह की जुबान में मिठास अब हमारी समझ में आ गई थी। हम उसके मुंह से सिविल लाईन और जगराम चौराहा का जिक्र इतनी बार सुन चुके थे, जितना हमने कनाट प्लेस के बारे में नहीं सुना था। खैर संगम से आते वक्त ही शाम को हमने सिविल लाईंस भी देखा था। इतना खुला इलाका आजकल बनाना मुश्किल है। पापा ने फोन कर कहा कि वहां के कॉफी हाउस की बात ही कुछ और है, लेकिन वो हम देख नहीं पाए।

हमारे पास वक्त की कमी थी जिस वजह से हम बहुत कुछ और नहीं देख पाए। हम हरिवंशराय बच्चन का घर नहीं देख पाए जहां अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ था। हम कटरा के पास से गुजरे जरुर लेकिन वहां हम वहां चाय लस्सी नहीं पी पाए-जिस कटरे पर राही मासूम रजा ने कटरा बी आरजू लिखा था। हम युनिवर्सिटी के अंदर बहुत घूम नहीं पाए जो अपने सुनहरे अतीत के लिए मशहूर है। हम उन जगहों पर जाना चाहते थे जहां पर महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, निराला, और बड़े-2 साहित्यकार रहते थे। हम उन इलाकों में घूमना चाहते थे जहां मेरे कई दोस्तों और सीनीयर्स की प्रेम कहांनियां परवान चढ़ी थी।
इलाहाबाद से मेरे परिवार का थोड़ा व्यक्तिगत नाता भी रहा है। मेरे पापा ने अपने जीवन का अहम हिस्सा यूपी के एक बड़े नेता और वहां के मुख्यमंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा के साथ बिताया था। वे उनके राजनीतिक सलाहकार थे। इस नाते मेरे पापा इलाहाबाद और यूपी के चप्पे से परिचित थे। बचपन से जो बातें मैं इलाहाबाद के बारे में सुनता आ रहा था, वो सब सामने थी। शायद ये भी एक वजह हो कि इलाहाबाद यात्रा को मैनें इस स्तर पर जिया था। ये मेरे लिए महज किसी छोटे से शहर की यात्रा भर नहीं थी-ये मेरे लिए मेरे अतीत के साथ मेरा साक्षात्कार भी था।

आखिर जब हम ट्रेन से दिल्ली के लिए रवाना हुए तो हम भावुक हो गए। इस शहर के साथ हमारा क्या नाता था जिसने हमें बांध कर रख लिया। हम अपने मन को बार-2 तसल्ली देते रहे कि हमें यहां फिर से आना है। राजीव ने तो यहां तक कहा कि हमारी शादी इलाहाबाद में ही होनी चाहिए, ताकि आना-जाना बना रहे। शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि इस शहर का अगर कोई ग्रामदेवता है तो वो कामदेव ही होगा। वाकई हमें इलाहाबाद ने मोह लिया।...(अंतिम)

Tuesday, July 7, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - 8

आनंदभवन से छूटते ही हमने रिक्शा ली, और चल पड़े संगम की तरफ...उस संगम की तरफ जिसके बारे में बचपन से सुनता आ रहा था। जिस संगम का नाम सुनते ही मेरी दादी की आंखों में चमक आ जाती थी, जिस संगम के बारे में मां ने आते वक्त फोन पर खासतौर पर डुबकी मार लेने को कहा था। रास्ते भर हमें संगम के बारे में कई तरह के खयालात आते रहे। यही संगम हमारे भारतीय गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक है। मुन्नवर का वो शेर भी याद आया, “तेरे आगे अपनी माँ भी मौसी जैसी लगती है, तेरी गोद में गंगा मैया अच्छा लगता है।“ हम उन तमाम कहानियों, उपन्यासॉं और कविताओं के बारे में सोचते रहे जिसने संगम की तश्वीर मेरे जहन में उकेरी थी।
मैं उसी संगम की ओर जा रहा था जहां बिन बुलाए कुंभ के मौके पर दसियो करोड़ लोग आ जुटते हैं! इलाहाबाद कितना सस्ता लगा, किसी से हमने पूछा कि संगम कितना दूर है-पता चला 5 किलोमीटर के आसपास है। लेकिन रिक्शावाले ने सिर्फ 20 रुपया मांगा। मेरे साथ राजीव का चचेरा भाई मनीष था। रिक्शावाला रास्ते भर बताता गया कि यहीं वो जगह है जहां कुंभ का मेला लगता है। हम उस मैदान को आंखों मे भरते गए और तमाम मीडीया कवरेज को याद करते गए जो हमने बचपन से देखा था। संगम की तरफ जानेवाली सड़क बहुत प्यारी थी। रिक्शावाला बताता गया कि संगम के पास ही अकबर का किला है और एक बहुत ही प्रसिद्ध हनुमानजी का मंदिर भी है। कहते हैं कि किला बनवाते वक्त हनुमानजी की मूर्ति मिली थी जिसे लोगों ने लाख वहां से हटाना चाहा वो हिली तक नहीं। बहरहाल, हम इन्ही सब बातों पर चर्चा करते हुए संगम जा रहे थे कि एक पैदल चल रहे बुजुर्गबार ने कहा कि बेटा जब गंगा मैया बुलाती है तभी लोग संगम आ पाते हैं।

बहरहाल हम 15 मिनट के बाद संगम के घाट पर थे। हमें मल्लाहों ने घेर लिया, हर किसी में होड़ लग गई कि वो हमें अपने नाव पर ले चले। हमने सख्त बार्गेन की। हम कई बार रुठे, हमने कहा कि हम संगम में नहाने नहीं आए, हम तो यूं ही घूमने आए हैं। पंडों के एजेंट ने अलग घेरा कि कहीं पिंडदान कराने तो हम नहीं आए। आखिरकार हमने एक नाव किराये पर ली जिसने तीन सौ रुपये में हमें संगम तक ले जाने और ले आने का करार किया।
दरअसल, हर साल संगम की जगह बदलती रहती है और इस वर्ष यह ठीक नदी के किनारे से लगभग 1 किलोमीटर आगे है। वो मल्लाह हमें पूरे रास्ते भर अपनी कहानी सुनाता रहा। उसने बताया कि ये उसके पुरखों का पेशा है, वो निषाद था। उसने कहा कि भगवान रामचंद्र को जिस निषादराज ने नदी पार कराई थी वो उसके ही पूर्वज थे। उस मल्लाह ने देश भर में चल रही राजनीतिक हलचलों की हमें जानकारी दी-लेकिन बड़े दुख के साथ उसने ये भी बताया कि अब उसके बच्चे इस पेशें में नहीं आना चाहते।
हम संगम पहुंचे, वहां के पंडे ने घेर लिया। उसकी मल्लाह से पहले से ही सांठगांठ थी। उसने गंगा मैया की आरती और पूजा के नाम पर कुछ अनुष्ठान करवाए और न करवाने की सूरत में कई आशंकाएं जताई। उसने प्यार और दुलार भी दिखाया और अज्ञात की आशंका से भी डराया। अंत में उसने ब्रह्मास्त्र छोड़ा कि बाबू, बार-2 कोई संगम थोड़े ही आता है। उसने दावा किया कि हम बिहार के जिस इलाके से आते हैं उसका वो खानदानी पंडा है!
बहरहाल हमने संगम में डुबकी लगाई। हमने अपने परिवार और दोस्तों के नाम की डुबकी ली। एक डुबकी हमने उस लड़की के नाम भी ली जिसे हम अपना खास दोस्त कहते हैं। हमने देखा कि संगम में पूरा हिंदुस्तान डुबकी ले रहा है। वहां असम, बंगाल, उड़ीसा और आंध्रप्रदेश के लोग थे। हमने मन ही मन सोचा कि क्या ये विशुद्ध धार्मिक आस्था है जिस वजह से हम संगम में नहा रहे हैं या कुछ और है। मन में अभी भी अनिश्चय है, लेकिन इतना तो तय है कि गंगा के प्रति जो आस्था और सम्मान बचपन से है ये स्नान उसी का एक रुप था। यूं हमने पहले भी पटना और विंध्याचल में गंगा स्नान किया था। लेकिन संगम की बात ही कुछ और थी। हमारे मिथिलांचल में गंगा के दक्षिण का स्नान यानि पटना की गंगा को मान्यता नहीं है, ये कैसी विचित्र बात है।
संगम में पानी कम होता है, ऐसा सिर्फ नहाने वालों की सुविधा के लिए नहीं कि उस जगह का चयन कर लिया गया-बल्कि इसके पीछे कारण है कि जब यमुना, गंगा में मिलती है तो अपने साथ काफी मिट्टी, कंकर-पत्थर आदि ले आती है, जिस वजह से वो जगह ऊंचा हो जाता है। ऐसा दूसरी नदियों के साथ भी होता है। संगम में हमें वो यमुना मिल ही गई, जिसे हम रास्ते भर तलाश करते आए थे। हमने नहाते वक्त नेहरुजी की गंगा पर लिखा हुई वो उक्ति याद की, ‘अपने उद्गम से सागर तक और प्राचीनकाल से आज तक गंगा भारतीय सभ्यता की कहानी कहती है।‘ । आखिर गंगा हमारे देश की सभ्यता- संस्कृति के आईना के साथ-साथ ही यहां कि जीवनदायिनी भी तो है।
संगम की गंगा हमें गंदी नहीं लगी। पटना में तो यह काफी संकड़ी हो गई है। हमें राम तेरी गंगा मैली के कई दृश्य़ बार-2 याद आए। हमने वहां पर अदृश्य सरस्वती के बारे में सोचा कि वो कौन सी ऐतिहासिक-भौगोलिक परिस्थितियां रही होगी जब सरस्वती विलुप्त हो गई होगी। इस मायने में संगम का स्नान हर इंसान के लिए एक सबक होनी चाहिए कि कैसे प्रकृति से छेड़छाड़ हमारी जिंदगी, हमारी नदियां और हमारे पर्यावरण के लिए घातक साबित हो सकती है। हमने सोचा कि अगर सरकार संगम के नजदीक एक गंगा संग्रहालय बनाए और उसमें उन चीजों को संयोजित किया जाए जो गंगा और प्रकृति के बारे में हमारी जागरुकता बढ़ाने वाली हो तो कितना अच्छा हो।

हमने जिंदगी का पहला संगम स्नान कर लिया था। अब हम लौट रहे थे, एक सुकून के साथ, अपने भींगे बालों के साथ...एक आत्मविश्वास और श्रद्धा के साथ...कि हमने उस संगम में स्नान किया है जो हजारों साल से करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, जो पूरे देश के लोगों की सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। हमारे मल्लाह ने हमसे फिर आने की गुजारिश की और हमारे लिए गंगा मैया से दुआ मांगी। हमने गैलन में गंगाजल लिया, ये मां का आदेश भी था। अकबर के किले की प्राचीर में सूरज डूब रहा था, यहीं सूरज मेरे गांव में भी डूब रहा होगा,जहां मेरी मां सोच रही होगी कि संगम में स्नान के बाद उसके बेटे की आस्था अपनी परंपरा और संस्कृति से डिगेगी नहीं।...(जारी)

Monday, July 6, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - 7

अगले दिन जून की 9वीं तारीख थी, 8 जून की रात शादी थी, हम थककर चूर थे। हमारे पास एक ही दिन बचा था जिसमें हमें संगम, आनंद भवन और सिविल लाईंस जाना था। हम 12 बजे सोकर उठे और नहा धोकर आनंद भवन की ओर चले, हमने अपने आपको मामी की नजरों से बचा कर रखा जो कम से कम दो बार खाना के बुलावे के लिए झांक गई थी। हमने पहला काम ये किया कि लस्सी पी, और आनंद भवन गए। आनंद भवन देखने के बाद मुझे लगा कि प्रगतिशील सोच और शैक्षणिक-समाजिक जागरुकता इंसान को किस मुकाम तक ले जा सकती है। हम आनंद भवन देखते समय हर उस अध्याय, चर्चाओं, गोष्ठियों और अफवाहों को याद करते रहे जो नेहरु परिवार के बारे में बचपन से हम सुनते आ रहे थे, जो हमारी स्मृतियों में दर्ज था। शायद हम 10-15 साल पहले आनंद भवन देखते तो हम उसका इस तरह मनन नहीं कर पाते।

हमने नेहरु खानदान की शानो-शौकत देखी, उनकी लाईब्रेरी देखी उसमें रखी किताबों को देखा। हमने नेहरुजी का कोट, उनके जूते, उनका मोटर, उनका शेविंग बाक्स और हर उस चीज को देखा जिसका वे इस्तेमाल करते थे। हम उन अभागे और मूढ़ राजाओं के बारे में सोचते रहे जो धन दौलत में नेहरु परिवार से कहीं ज्यादा संपन्न था लेकिन जो इतिहास के कूड़ेदान में जाने के लिए अभिशप्त थे।

नेहरु परिवार के रहन सहन, जागरुकता और शिक्षा के प्रति उसके जूनून ने मुझे यकीन दिला दिया कि ये परिवार वाकई में आजाद भारत पर हुकूमत करने के लिए पूरी तरह तैयार हो रहा था। नेहरुजी और मोतीलाल का देश और दुनिया की समझ, उनका अंतराष्ट्रीय मामलों में पकड़ ये देखकर मैं नेहरुजी और इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व और उसके निर्माण के बारे में नई दृष्टोकोण से सोचने पर मजबूर हो गया। नेहरु परिवार का वंशबृक्ष बता रहा था इस परिवार में तकरीबन एक सदी पहले से ही अतर्जातीय और अंतर्धामिक विवाह होते आ रहे थे। बचपन से दिमाग में पल रहा एक किस्म का गैर-कांग्रेसवाद और खानदानवाद के खिलाफ रहनेवाली मानसिकता मानो थोड़ी संतुलित हो गई। मैं सोचता हूं कि आजादी के वक्त की सामंती जकड़न और तंग मानसिकता वाले मुल्क में नेहरुजी क्या वाकई बहुत उदार और लोकतांत्रिक किस्म के नेता नहीं थे ? क्या एक जाहिल और तंगनजर आदमी के हाथ ये वहुभाषी-वहुजातीय और वहुधार्मिक देश सुरक्षित रह सकता था ? ये अलग बात है कि एक मुद्दे के तौर पर मैं खानदानवाद का बहुत बड़ा विरोधी हूं और मुझे लगता है कि नेहरु परिवार के मौजूदा बारिस वौद्धिकता और दृष्टिकोण के मामले में अपनी पुरानी पीढ़ी के कतई बराबर नहीं है।

आनंद भवन में अभी भी नेहरुजी का ड्राईंगरुम, कांग्रेस का दफ्तर, बापू का शयन कक्ष, इदिरा गांधी का जन्मस्थान और वो धार्मिक किताबें मौजूद है जो नेहरुजी की मां पढ़ा करती थी। नेहरुजी और बापू का इंदिराजी को लिखा पत्र और कई दूसरी चिट्ठियां, कई किताब देखने को मिले जो नेहरु जी ने लिखे थे। हां, एक बात जो मुझे पता नहीं थी वो ये कि आनंदभवन लगभग 20 सालों तक कांग्रेस का हेडक्वार्टर थी। आनंद भवन के बगल में स्वराज भवन भी है जो मोतीलाल नेहरु ने सर सैयद अहमदखान से खरीदा था। बाद में जब बच्चे पढ़ने के लिए विलायत चले गए तो मोतीलाल ने वो मकान कांग्रेस को दे दिया। आनंदभवन को इंदिरा गांधी ने शायद 70 के दशक में देश को समर्पति कर दिया, वहां मैने वो इकरारनामा भी देखा जिस पर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और संजय गांधी के दस्तख़त मौजूद थे।
आनंद भवन में नेहरुजी के वंशबृक्ष को दर्शाता एक फोटो फीचर भी है जिनमें नेहरु परिवार के दूर दराज के संबंधियों और उनके बच्चों के नाम लिखे हुए हैं। इसमे कई दुर्लभ फोटोग्राफ है, जो हमें आजादी के वक्त लेकर चले जाते हैं। स्वराज भवन में एक अस्पताल भी बना हुआ था जिसे शायद नेहरुजी की पत्नी ने आजादी की लड़ाई में घायल लोगों के खोला था। इस भवन में एक पुस्तक केंद्र भी है जिसमें नेहरुजी, बापू और कई दूसरी किताबें उपलब्ध हैं। मैने इसी केंद्र से गांधीजी का माई एक्सपेरिमेंट विथ ट्रूथ खरीदा। हमनें आनंदभवन के सामने कई एंगिल से फोटो खिचवाया, और इतिहास की गोद में लगभग 3 घंटे बिताए। कुल मिलाकर मुझे लगा कि आनंदभवन महज एक ईंट पत्थर की खूबसूरत इमारत नहीं है, बल्कि यह हमारे आजादी के इतिहास का सबसे बड़ा गवाह है।...(जारी)

आर्काइव
तने मोह लिया इलाहाबाद - छ

तूने मोह लिया इलाहाबाद - पांच
तूने मोह लिया इलाहाबाद - चार
तूने मोह लिया इलाहाबाद - तीन
तूने मोह लिया इलाहाबाद - दो
तूने मोह लिया इलाहाबाद - एक

Saturday, July 4, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - 6

संगम और आनंद भवन का जिक्र करने के लिए मैं खुद ही ललचा रहा हूं। लेकिन शादी वाली रात की इतनी यादें हैं कि मैं किस्सागो बनता जा रहा हूं। वैसे संगम भी तो हम शादी के बाद ही देख पाए थे। बहरहाल, शादी के दौरान दुल्हन का गमगीन चेहरा मुझे भावुक कर गया। यों, माहौल आधुनिक था-दूल्हा-दुल्हन दोनों हिंदुस्तान के मशहूर मेडिकल कॉलेज से एमडी कर रहे थे। लेकिन पता नहीं क्यों-शादी के दरम्यान कई बार राजीव की मेमेरी बहन बाबुल का घर छोड़ने का गम छुपा नहीं पाई। कई बार उसकी रुलाई, हमें रुला गई। राजीव की मामी काफी हंसोड़ हैं, थोड़ी पारंपरिक सी दिखती हैं। वे शादी के माहौल को खुशनुमा बना रही थी। वे बीच-बीच में ऐसे लतीफे सुनाती कि दुल्हा-दुल्हन हंसते-2 लोट पोट हो जाते। उन्होने मंडप में ही अपनी बेटी से कहा-बेटा, तुम शादी के लिए परेशान हो रही थी, अब आया न मजा, इसे ही शादी कहते हैं। निवेदिता के गालों पर लाली दौड़ गई। मामी ने दूल्हे का परिचय जिस अंदाज में अपने तमाम ननद-ननदोसि और उनके बच्चों से कराया-वो काबिले तारीफ था, लगा मामी अमेरिका से तो नहीं आई हैं!

शादी के मंडप के पास एक बड़ी ही गरिमामय महिला दिखीं। उनके व्यक्तित्व में गजब की आभा थी, गंभीरता थी उनमें नफासत और विद्वता का सम्मिश्रण था। हमनें दरयाफ्त की तो पता चला ये मोहिनी झा हैं जो इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील हैं। उनके पति अवधेश झा, युनिवर्सिटी में ही प्रोफेसर हैं और मिथिला समाज में भी सक्रिय हैं। बाद में पता चला कि मोहिनी झा, डॉ जयकांत मिश्र की भतीजी हैं। मैं फिर मैथिल नॉस्टेल्जिया में चला गया जिसका जिक्र मैनें पिछले पोस्ट में किया था। मुझे वो सूत्र मिलता नजर आ रहा था जिससे मैं उन लोगों के बारे में पता कर सकूं जिन्होने मैथिल मेधा का झंडा इलाहाबाद में गाड़ा था। लेकिन छुट्टी की कमी थी, अगले एक दिन में मुझे संगम और आनंद भवन जाना था, सो मैं उन लोगों से बातचीत नहीं कर पाया। अलबत्ता राजीव ने जरुर उनके यहां चाय नाश्ता किया।

उस शादी में एक और लड़की मौजूद थी। संदर्भ से हटकर भी उसका जिक्र जरुरी लगता है। वो प्रोफेसर पिता की बेटी थी। उसके पिता ने अपनी पत्नी की मौत के बाद बच्चियों को छोड़ दिया, वो कहां गुम हुआ पता नहीं। लड़की को मामा ने पाला था, लेकिन अब वो दिल्ली में अपने मामा के घर बतौर नौकरानी जैसी थी। वो दिल्ली के एक हिंदी कॉल सेंटर में 3-4 हजार रुपये की नौकरी करती थी। जब वो इलाहाबाद वापस आती तो कंपनी उसके पैसे काट लेती थी। उसके पास पहनने को बहुत ज्यादा कपड़े और सैंडिल नहीं थे। वो मेंहदी, कढ़ाई सिलाई कढ़ाई और कई दूसरे कामों में माहिर थी। अपने अंतर्मन में तकलीफों के इतने बड़े समंदर के बावजूद वो ऊपर से खुश थी, बल्कि सबके आकर्षण का केंद्र भी बनी हुई थी। मजे की बात ये कि उसी लड़की ने आम पड़ोसने वाले लड़के को कहा था-आम खट्टे हैं। राजीव ने उस लड़की को दिल्ली में मदद का भरोसा दिलाया, मैं राजीव की इस भावना से जबर्दस्त प्रभावित हुआ। मुझे लगा कि जिंदगी जब मुस्कराती है तो मन में ऐसे ही निस्वार्थ मदद की इच्छा जगती है...(जारी)

आर्काइव
तूने मोह लिया इलाहाबाद - पांच
तूने मोह लिया इलाहाबाद - चार
तूने मोह लिया इलाहाबाद - तीन
तूने मोह लिया इलाहाबाद - दो
तूने मोह लिया इलाहाबाद - एक

तूने मोह लिया इलाहाबाद-5

इलाहाबाद का जिक्र संगम, आनंद भवन, युनिवर्सीटी और सिविल लाईंस के बिना अधूरा है। लेकिन शादी के भागमदौड़ में हम दरअसल विवाह वाले दिन के बाद ही आनंद भवन और संगम जा पाए। अभी हम शादी के जिक्र का मोह नहीं छोड़ पा रहे।

बहरहाल, शादी के मौके पर हम जम कर सजे संवरे। हमने कई कोणों से अपने चेहरे को संवारा। युनिवर्सिटी कैम्पस की कई लड़कियां मौके पर मौजूद थी। दो बातें बार-2 हमारे जेहन में आती रही कि आखिर इलाहाबाद की लड़कियों में इतनी नैसर्गिक सुन्दरता क्यों है ? या फिर प्रोफेसरों की बेटियां ही ऐसी होती है ? हम अभी भी इस बात का मंथन कर रहे हैं। पता नहीं किस वास्तुशिल्पी ने इलाहाबाद को गढ़ा था, ये मासूमियत, ये नैसर्गिकता और ये मिठास इलाहाबाद में जितना था..उससे कम वहां की लड़कियों में नहीं था। खैर, हम भी थोड़े रौब में थे - आखिरकार अब बेरोजगार जो नहीं थे और मीडिया से भी थे। हम इस अहं पर मुस्करा रहे थे कि दुनिया की सारी बातें हमें मालूम है।

हमने दुल्हे दुल्हन के बैठने के मंच के पास अपना फोटो सेशन करवाया। राजीव के मां-पापा, और उसकी आधा दर्जन मौसियों ने साथ फोटो खिचवाया-जो अभी-2 बनारस से लौटी थी। ये सदियों का मिलन लगता था, कुछ मौसियां नेहरुकालीन थी तो कुछ राजीव युग(राजीव गांधी के युग की और मेरे दोस्त ‘राजीव’ के युग की भी) की। वो हिंदुस्तान के अलग-2 शहरों से आई थीं और अपने बेटों की तारीफ में मशगूल थीं। वर्षों पुरानी निन्दाएं और आलोचनाएं उनकी बातचीत का अहम हिस्सा था। एक मौसी जिनका आध्यात्मिक विषयों में खासा दखल है, उन्होने हमें टीवी से आया जानकर आस्था चैनल पर उनके प्रस्तुत होने की संभावनाएं भी टटोल ली।
बहरहाल, शादी में वहीं हुआ जो अमूमन होता है। वरमाला की रस्म को ‘बिना न्यूज एलीमेंट के इंडिया टीवी के शो की तरह’ आधे घंटे तक ताना गया। कुछ चुटकुले हुए, फोटो सेशन हुआ। शादी में शामिल युवाओं-युवतियों के नैन मिले, संभावनाएं तलाशी गई और मोबाईल नंबर, मेल आई़डी का भी आदान प्रदान हो गया। मजे की बात ये कि इसमें हमारे आधुनिक होते बुजुर्गों की सहमति थी-उन्हे ये अंतर्जातीय विवाह के ‘सदमे’ का सुकूनभरा विकल्प लग रहा था।

वाकई ये शादी यादगार थी। इलाहाबाद की सारी सड़कें मानों जौहरी विवाह स्थल की तरफ मुड़ गई थी। मामा के अतिथियों में युनिवर्सिटी के प्रोफेसर, कई भावी केंद्रीय विश्वविद्यालयों के वीसी, आला अफसरान और नेता शामिल थे। बिहार में बनने वाले नए केंद्रीय विश्वविद्यालय के वीसी प्रो. जनक पांडे का तो जलवा ही देखने लायक था। उनके आभामंडल में नहाने के लिए कई लोग आतुर दिखे।

ये शादी विशुद्ध मैथिल रीतिरिवाज से हुई। मामा के फ्लैट से लगा हुआ एक आंगननुमा जमीन है, जिसके चारो ओर पेड़ ही पेड़ लगे हुए थे। राजीव के नाना संस्कृत के बड़े आचार्य हुए थे, जिनका मुंगेर और भागलपुर के इलाके में खासी ख्याति थी। वाजपेयी सरकार में पीएमओ में ओसडी रहे और अभी जेडी-यू सांसद एन के सिंह के वे गुरु भी थे। जाहिर है, राजीव के मामा और उसके छहों मौसियों पर संस्कृत का बड़ा असर था। शादी के बीच में जब कोई रस्म होता और पौराणिक रीति थम जाता...तो राजीव की मौसियां और उसके मामा बड़े ऊंचे स्वर में संस्कृत के श्लोंकों का और वैदिक ऋचाओं का पाठ करने लगते। वे विभोर हो जाते। वड़ पक्ष के लोग ये देखकर दंग थे, उनकी समझ में नहीं आता कि वे क्या करें। लड़कियां जम्हाई लेने लगती, हम उस जम्हाई को अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश करते ! ये वाकई एक अविस्मरणीय क्षण था, कि एक इंटरनेशनल रिलेशन का अंग्रेजीदां प्रोफेसर, जो जॉन हापकिन्स जैसे विश्वविद्यालयों में लेक्चर देता है, कैसे संस्कृत का इतना अच्छा ज्ञाता था। राजीव के स्वर्गीय नानाजी की छाप वहां चप्पे-2 पर मौजूद थी। राजीव की मौसियों का-जो पुरानी पीढ़ी की नुमांइदगी कर रही थीं- संस्कृत पर इतनी जबर्दस्त पकड़ देखकर हमें यकीन हो चला कि वाकई मैत्रेयी, गार्गी और अनुसुया इसी जमीन पर पैदा हुई हैं...(जारी)

Friday, July 3, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - 4

इलाहाबाद का पुराना नाम प्रयाग भी है, लेकिन अब इलाहाबाद इतना अपना सा लगता है कि प्रयाग के नाम से पुकारने की मन में कभी कल्पना ही नहीं आई। यूं मेरी दादी इसे प्रयाग ही पुकारती थी। राजीव का बड़ा वाला ममेरा भाई जो बैंगलोर में कम्प्यूटर इंजिनीयर है, उसे शादी के दिन भी बार- बार ठंडा (कोक) की तलब लगती थी। वो गाड़ी निकाल कर हर दो घंटे में बाहर निकलता था। एक ऐसी ही तलब की पूर्ति के लिए वो हमें बाहर लाया, हमनें पाया कि हम प्रयागराज स्टेशन पर खडे हैं।पान वाले से उसका याराना था, उधारी भी चलती थी। हमनें ठंढ़ा पिया, प्रयागराज के नाम को गौर से देखा और अपनी दादी को एक बार फिर से याद किया। हम मुस्कराए, मन ही मन कहा-चलो नाम बदलने की सनक यहां के लीडरानों ने नहीं दिखाई। वैसे जरुरत भी नहीं है-प्रयाग हमारे जातीय स्मृति में बसा है तो इलाहाबाद ने दिल पर कब्जा कर लिया है।

शादी में बारात दूर से आयी थी, सीतामढ़ी से। कुछ लोग दिल्ली से भी आए थे। दूल्हा डाक्टर था, यूं दुल्हन भी डाक्टर है-कोई दहेज नहीं, सादगी भरा विवाह। लड़के के गांव से कुछ बराती इसलिए भी आ गए थे कि संगम नहा लेंगे-मौका मिले न मिले। तो हुआ यूं कि बहुत सारे बराती सुबह ही उपस्थित हो गए थे, उनके खानेपीने की व्यवस्था और नहाने-घुमाने की जिम्मेवारी भी अघोषित रुप से आन पड़ी थी।

राजीव के मामा डा एन के झा, जो इलाहाबाद युनिवर्सिटी में प्रोफेसर भी हैं-उनके अतिथियों में काफी सारे प्रोफेसर लोग भी थे। उनके परिवार के लोग और इलाहाबाद का मैथिल समुदाय विवाह में बढ़चढ़कर मौजूद था। हम में से कई लड़के जो कुंवारे थे-बल्कि अधिकांश कुंवारे ही थे-सजधज कर मौजूद थे-उन्होनें पूरी दुनियां की शराफत अपने चेहरे पर ओढ़ रखी थी। विवाह योग्य कन्याओं की माताएं उन लड़को को अपने निगाहों से तौल रही थी वो उनके व्यक्तित्व से उनकी आमदनी और व्यवहार को थाह रही थी। एक लड़का जो लड़की वाले की तरफ से था वो आम परोस रहा था। एक लड़की को आम देने के बाद उसने पूछा कैसा है। लड़की ने कहा-खट्टा है।

इलाहाबाद से मिथिलांचल का पुराना नाता रहा है। सदियों से मिथिला के लोग अध्ययन अध्यापन और धार्मिक वजहों से इलाहाबाद आते रहे हैं। ये कहानियां हमने बचपन से सुन रखी थी। सुना वहां कोई दरभंगा कालोनी भी है। इलाहाबाद में जिन मैथिलों ने ख्याति प्राप्त की उनमें डा गंगानाथ झा, डा अमरनाथ झा और महामहोपाध्याय डा उमेश मिश्र का नाम अहम है। गंगानाथ झा तो इलाहाबाद युनिवर्सिटी के पहले वीसी भी रहे और लगातार तीन बार वीसी रहने के बाद उन्होने अपने बेटे डा अमरनाथ झा को चार्ज सौंपा था, जो दुनिया के एकेडिमिक इतिहास में शायद अभी तक एक नायाब रिकार्ड है (एक ऐसा ही रिकार्ड कलकत्ता युनिवर्सिटी में भी बनते-बनते रह गया था जहां के वीसी सर आशुतोष मुखर्जी के बेटे श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी वीसी बने थे लेकिन दोनों के बीच कुछ अंतराल था। जी हां..ये श्यामाप्रसाद मुखर्जी वहीं थे जिन्होने बाद में जनसंघ की स्थापना की थी) इलाहाबाद युनिवर्सिटी में जीएन झा और एएन झा के नाम पर काफी भव्य और मशहूर छात्रावास है जहां रहनेवालों की आंखों में अभी भी आईएएस बनने का सपना तैरता है। हाल ही में इलाहाबाद युनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे डा जयकांत मिश्र का निधन हुआ, वे महामहोपाध्याय उमेश मिश्र के पुत्र थे। जयकांत मिश्र के बारे में प्रेमचंद के पौत्र और दिल्ली युनिवर्सिटी में इंग्लिश के प्रोफेसर आलोक राय का कहना है पूरी दुनिया में शेक्सपीयर के साहित्य और रोमांटिश्जम पर व्याख्या करने वाला शख्श जयकांत मिश्र जैसा कोई नहीं था।

तो हम इन यादों और कहानियों के साथ इलाहाबाद में थे। हम उन लोगों को ढ़ूढ़ रहे थे जिनका गंगानाथ झा या जयकांत मिश्र से कुछ वास्ता रहा हो। राजीव के ममेरी बहन की शादी मेरे लिए सिर्फ एक शादी भर नहीं थी...मैं इतिहास में गोता लगाना चाहता था...और उस बहाने बहुत कुछ जानना चाहता था, जो सालों से सुनता आ रहा था (जारी)

Thursday, July 2, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद-3

दरअसल हम इलाहाबाद जाते ही इसे घूम नहीं पाए थे। इसकी वजह थी कि हम शादी वाले घर में गए थे, थोड़ा दिखाना भी था कि सिर्फ मेहमाननवाजी करने नहीं आए हैं। 7 जून की शाम को हम पहुंचे ही थे, 8 जून को शादी थी। दिन भर भागदौड़...उसी बीच में इलाहाबाद का दर्शन। संयोग था कि मामा का घर युनिवर्सिटी इलाके में ही था, उसकी मुख्य इमारत और सारे बड़े होस्टल पास ही थी। हमने उसे जी भर के देखा। हमने शादी के दिन तक आते जाते बाहर से आनंद भवन को देखा और कल्पना की कि नेहरुजी की जीवनशैली कैसी होगी। हमने रिक्शों से, गाड़ियों से और पैदल आते जाते हर लड़की को गौर से देखा और उसकी खूबसूरती को अपने आंखों में कैद करने की कोशिश की। हम उनकी आंखों में झांककर शहर और इस प्रदेश की कानून व्यवस्था का भी जायजा ले रहे थे। हमें इलाहाबाद की लड़कियां कई मापदंडों पर आगे नजर आई। उनके चेहरे का आत्मविश्वास, शहर का आत्मविश्वास बयां कर रहा था। उनकी आखों का नशा, शहर के नशे से कम नहीं था। उनकी आलस भरी चाल, शहर की चाल बता रही थी...अपने में खोई-2 सी...थोड़ी ऊंघती हुई सी।

हम शादी के दिन भी बार-2 कर्नलगंज जाते रहे। हमारी लस्सी पीने की तलब बार-2 हमें वहां खींच ले जाती थी। हमें कैमरे की बैटरी लेनी थी, लोगों ने कर्नल गंज का नाम सुझाया, हमें बाल बनवानी थी-हम भटक गए लेकिन जब सामने देखा तो वो कर्नलगंज ही था। मेरे एक दोस्त को हाजमे की दवा लेनी थी, लोगों ने तब भी कर्नलगंज ही सुझाया। हमने अपना तकिया कलाम बना लिया-सारे मर्ज़ की एक दवा....कर्नलगंज। शायद इसकी एक वजह ये भी थी कि हम कर्नलगंज के नजदीक ही ठहरे थे।

हम इलाहाबाद के लोगों की मीठी जुबान के कायल हो गए। हमें कई दफा अपनी मैथिली कम मीठी लगी। हमने रिक्शेवाले से बात की, हमने लस्सी वाले से बात की, पनवाड़ी से बात की हमने हर उस शख्स से बात की जिससे बात की जा सकती थी। इलाहाबाद के जुबान की मिठास अभी भी यादों में ताजा है। लस्सी वाले से बात की तो लगा कि किसी बेहद सुसभ्य और सुसंस्कृत नौजवान से बात हो रही है। हमने सिर्फ उसकी बात सुनने के लिए बार-बार लस्सी पी। रिक्शा वाला ऊंचाहार(रायबरेली) का रहनेवाला था। उसने जब अवधी में बात करनी शुरु की तो लगा कि काश हम भी ऐसा बोल पाते। वो नेहरु परिवार की तारीफ में भावविभोर हो गया। उसने बताया कि उसके आंगन की खटिया पर इंदिरा जी, राजीव जी और राहुल जी बैठ चुके हैं।
संगम और आनंद भवन से पहले दो बाते और अहम हैं जो नहीं भूलाती। एक तो युनिवर्सिटी के इलाके में जगह-जगह किताबों की दुकान का होना और दूसरी दोपहर में इलाहाबाद का लगभग सो जाना। सड़क के किनारे आधी दाम के किताबों की दुकानें...नौकरियों के फॉर्म की दुकाने...और चाय के साथ अखबारों में लगभग खो गए से युवाओं के चेहरे....पटना याद आ गया। अपना महेंद्रू भी तो ऐसा ही है। लेकिन, पटना के महेंद्रू और इलाहाबाद के इन इलाकों में बहुत अंतर है। हमारा महेंद्रू भीड़भाड़ वाला इलाका है...थोड़ा कम साफ सुथरा... लेकिन इलाहाबाद खुला-खुला सा था। हम मन ही मन फिर भी तसल्ली देते रहे कि अपना पटना ज्यादा डॉक्टर, इंजिंनीयर या दूसरी कामयाबी पैदा करता है...लेकिन इलाहाबाद का शैक्षणिक ढ़ांचा और युवाओं का जुनून देखकर दिल इस बात को नहीं मान पा रहा था।

जो बात सबसे दिलचस्प थी वो ये कि इलाहाबाद को सही में किसी ने ऊंघता हुआ शहर कहा है। दिन के दो बज रहे थे, हमें लस्सी की तलब लगी थी। हम फिर से कर्नलगंज में थे...राजीव के भाई को बाल बनवाना था(शादी के माहौल में उसे कई लड़कियों पर अपना इम्प्रेसन भी देना था), हम सैलून की तलाश में गए। उधर लस्सी वाला भरी दुपहर में तान के सो रहा था। हमने उसे जगाया, उसने कहा कि बगल के दुकान में पी लीजिए। हमें ताज्जुब हुआ। कई जगह ऐसा हुआ। लगा कि ये शहर 1 बजे से चार बजे तक बंद तो नहीं रहता। दिल्ली होता तो दुकानदार नोट छाप रहे होते। पता नहीं ये बात पूरे इलाहाबाद में है या फिर हमें ही इसका एहसास हुआ ? (जारी)

Wednesday, July 1, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद-2

इलाहाबाद शुरु हो चुका था। हम रास्ते भर कल्पना करते आए थे कि यमुना कहीं हमारे बाजू से गुजरती होगी, दिख ही जाएगी। यमुना नहीं दिखी, वो तो संगम के पास दिखी। हमारा भौगोलिक ज्ञान थोड़ा दुरुस्त हुआ। बहरहाल, राजीव का ममेरा भाई यानी गौरव हमे रिसीव करने आया था। पुरानी मारुती थी, शादी का घर था-वो हमें लेने के साथ-साथ पानी भी लेने आया था। हमने स्टेशन पर पानी पिया, पान खाया, उसे निहारा और पटना स्टेशन से तुलना की। (ये हमारी बीमारी है कि हम हर शहर की तुलना पटना से करने लगते हैं) इलाहाबाद का स्टेशन अच्छा लगा, अपना सा। बहुत भीड़भाड़ नहीं, कूड़े कचरे भी कम था, लोगों की चाल में कोई बैचेनी…कोई हड़बड़ी नहीं। ये शहर का पहला एहसास था।
हमने शहर के चक्कर लगाए। पानीवाले से पानी के चार बोतल लिए(बोतल कहना उचित नहीं-वो 20 लीटर वाले को क्या तो कहते हैं)। गौरव ने बताया कि संगम यहां से नजदीक है, दिल फिर से एक बार धड़का। मां ने फोन पर बताया था कि संगम में जरुर डुबकी मार लेना। शहर की सड़के अच्छी थी, कहीं गड्ढें नहीं। हरियाली ऐसी की लगा कि काश..आंख में रिकार्डिंग की सुविधा होती।जैसा सुना था...कि यूपी उल्टा प्रदेश है-वैसा तो लगता नहीं। सोच ये भी रहा था कि क्या इन्ही सड़को पर एक मजदूरिन को देख कर निराला ने कविता लिखी होगी- वह तोड़ती पत्थर.....कहीं ये सड़क वहीं तो नहीं।

हम थोड़े आशंकित भी थे कि शादी के घर में रहने-नहाने में दिक्कत होगी। फिर मामा के रुतबे का अंदाज भी था-कहीं बड़ा सा होटल ही बुक करवाया हो। हमें क्या, हम तो मेहमाननवाजी करेंगे, खाएंगे, घूमेंगे और मस्ती करेंगे। लेकिन मामा ने बढ़िया इंतजाम किया था। युनिवर्सिटी के इलाके में ही चैथम लाईंस मे उनका फ्लैट था। एक के बाद एक लगे हुए फ्लैट-जैसे पूरे हिंन्दुस्तान के युनिवर्सिटियों में होते हैं। एकदम शान्ति,लगा अगर पढ़ाकू हो तो पक्का नोबेल जीत लोगे। इनमें से कई फ्लैट खाली थे। मामा ने 5-6 फ्लैट बुक करवा लिए थे। सबमें टैंट हाउस का गद्दा, तकिया, बाल्टी,मग, साबुन और टूथपेस्ट रखे थे। पानी की कोई दिक्कत नहीं थी। गंगा वाटर का सप्लाई था, ठंढ़े पानी में हमने जमकर नहाया।
हमने थोड़ा मेल मुलाकात करके, थोड़ी पेट पूजा करके... शहर देखने की ठानी। हलांकि इसे टुकड़े-टुकड़े में ही देख पाया लेकिन वो घड़ी अनमोल थी। हमें लस्सी पीने की याद आई। हमने रिक्शा लिया, उसने 10 रुपये में बहुत दूर तक घुमाया। हम कर्नल गंज गए...आनंद भवन के सामने से। तय किया कल इस पर धावा बोलना है। कैमरे की बैट्री को रात में फुलचार्ज पर डाल देंगे। हम कर्नल गंज गए,लस्सी पी, पान खाई और वहां की लड़कियों को देखा। लौटते हुए हमने युनिर्वसिटी की इमारत देखी, गंगानाथ झा और सुंदरलाल होस्टल देखा। हम दंग रह गए। हमने इश्वर से शिकायत की कि हमें इलाहाबाद में पैदा क्यों नहीं किया। (जारी)

Tuesday, June 30, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद- 1

कुछ दिन पहले इलाहाबाद गया था। बचपन से काफी सुना था इस शहर के बारे में। हम हिंदुस्तानियों खासकर उत्तर भारतीयों के मन में जिन दो शहरों के बारे में एक खास किस्म की नॉस्टल्जिया है उसमें इलाहाबाद और कलकत्ता का नाम अहम है। पता नहीं क्यों- आप इन दोनों की शहरों में भले ही न गए हों लेकिन एक गजब का अपनापन लगता है। जिन लोगों ने थोड़ा सा साहित्य बगैरह पढ़ा है उनके मन में लाहौर के बारे में भी यहीं अपनापन है। एक जादू है, सम्मोहन है, एक नशा है। शायद इसकी वजह ये हो कि अंग्रेजी राज में यहीं तीनों शहर पहले पहल शिक्षा-दीक्षा और प्रशासन के केंद्र बने और बाद में आजादी के दीवाने क्रान्तिकारियों का बड़ा जत्था भी यहीं से निकला। दोनों शहर बौद्धिक गतिविधियों के बड़े केंद्र रहे हैं। इलाहाबाद हमारी जातीय स्मृति में बुरी तरह समाया हुआ है।

राजीव की ममेरी बहन की शादी थी। राजीव का ममेरा भाई भी आईआईएमसी में हमारा जूनियर था। सो जाना अनायास ही हो गया। ट्रेन में जाते समय इलाहाबाद के बारे में तमाम स्मृतियां जो किताबों और लोगों की बातचीत के मार्फत हमारे दिमाग तक आई थी, सामने आती गई। लगा जैसे किसी फिल्म का फ्लैशबैक चल रहा हो।

इलाहाबाद का मतलब मेरे लिए क्या था ? क्या ये वो शहर था जहां पंडित नेहरु और इंदिरा गांधी पैदा हुईं थी या महज संगम के घाट की वजह से इसे याद किया जाए। इलाहाबाद हिंदी साहित्य का गढ़ था, एक मायने में अभी भी है। जो लेखक या कवि इलाहाबाद में नहीं रहा, उसे एक तरह से मान्यता ही नहीं मिली। मन में हसरत थी कि देखें इसका सिविल लाईंस कैसा है जिसके बारे में शायद हमने कनाट प्लेस और मुम्बई के जुहू से भी ज्यादा सुन रखा था ! इलाहाबाद हाईकोर्ट की कल्पना इंदिरा गांधी वाले फैसले की याद दिलाती थी। कैसा है ये शहर...जिसके कण-कण में चिंगारी भरी हुई है। इसकी यूनिवर्सिटी बेमिशाल है, इसने सदी का सबसे लोकप्रिय अभिनेता पैदा किया है और इस जमीन ने एक नहीं दो नहीं तकरीबन आधा दर्जन प्रधानमंत्री साउथ ब्लॉक में भेजे हैं। कैसा होगा इलाहाबाद...जहां..फिराक गोरखपुरी पैदा होता है और कहता है कि मेरे अलावा अंग्रेजी सिर्फ राधाकृष्णन और मोतीलाल के बेटे को थोड़ी बहुत आती है !

ये मेरी रोमांचक यात्रा थी। मैंने सुना था कि यहीं वो इलाहाबाद है जहां कुंभ के मेले में 10 करोड़ से ज्यादा लोग जमा हो जाते हैं। इतने लोग जितनी फ्रांस की आबादी नहीं है। ये कैसा शहर है जहां हर आदमी साहित्यिक किस्म का है। सुना ये भी था इलाहाबाद की सियासी जमीन बहुत संवेदनशील है। रवीन्द्र कालिया ने लिखा कि इलाहाबाद ने जिसे अपना लिया, पूरे मुल्क ने उसे अपना लिया। इलाहाबाद ने जिसे ठुकरा दिया पूरे मुल्क ने उसे ठुकरा दिया। ये वहीं इलाहाबाद था जहां हेमवती नंदन बहुगुणा को गंगा किनारे का एक छोरा हरा देता है। ये वहीं इलाहाबाद था जहां इंदिरा गांधी की सर्वशक्तिशाली फौलादी सत्ता जस्टिस जगमोहन सिन्हा के कलम का शिकार हो जाती है। और मैं उसी शहर में जा रहा था...दिल की धड़कन तेज हो गई थी...बिल्कुल गाड़ी के रफ्तार की तरह....(जारी)

Saturday, June 6, 2009

दलित, समाज, सरकार और हकीकत-7

दलितों के विकास में एक अहम बात सरकार के बड़े स्तर पर नीति निर्धारण से भी जुड़ी हुई है। ये बात ऐसी है जो तत्काल अपना असर नहीं दिखाती लेकिन ये देश के दलितों और गरीबों के विकास और देश की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बहुत जरुरी है। और वो मुद्दा है केंद्र राज्य संबंध का, राज्यों का केंद्रीय करों में हिस्सेदारी बढ़ाने का और राज्यों को और भी ज्यादा स्वायत्तता देने का। हमारे सामने ये तथ्य है कि देश की राज्य सरकारें अपने बूते कोई भी आर्थिक संसाधन नहीं जुटा पाती, वे केंद्र के सामने व्यावहारिक रुप से एक नगरपालिका से ज्यादा कुछ भी नहीं है। तमाम बड़े टैक्स केंद्र सरकार उगाहती है और राज्यों के हिस्से सेल्स, मनोरंजन और जमीन के टैक्स ही बच पाते हैं, जो नाकाफी होते हैं। पिछले दशक तक केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी 26 फीसदी तक ही थी जिसे अब बढ़ाकर शायद 29.5 फीसदी कर दिया गया है। हम यहां देश में संसाधनों के विकेंद्रीकरण की तरफ इशारा करना चाहते हैं जो आम जनता और खासकर गरीबों-दलितों के लिए सबसे जरुरी चीज है।

यह एक तथ्य है कि आर्थिक केंद्रीकरण होने से देश में कुछ ही जगह पर कारोबार और विकास के टापू पनपते है जिसका सबसे ज्यादा फायदा खाते पीते वर्गों को होता है। हालात यह है कि आजादी के लगभग 60 साल बाद भी हमारे देश में शहरों की आबादी कुल आबादी की महज 30-32 फीसदी ही है और उसमें भी एक बड़ा हिस्सा स्लम में रहने को मजबूर है। हलांकि इसका सीधा कारण तीब्र औद्योगीकरण न होना प्रतीत होता है लेकिन ऐसा इसलिए हुआ है कि देश में सारे फैसले-खासकर-उद्योग धंधों से संबंधित-दिल्ली से ही लिए जाते हैं। देश का राजनीतिक-आर्थिक एलीट- जिसमें बड़े कारोबारी, दलाल(या सलाहकार ?), राजनीतिज्ञ से लेकर बड़े नौकरशाह तक शामिल हैं- नहीं चाहता कि संसाधनों वितरण नीचे तक हो। उसे केंद्रीकृत व्यवस्था आसान लगती है। अगर कोई इस एलीट वर्ग की तस्वीर उकेरना चाहे तो बहुत मुश्किल है, क्योंकि यह निरंतर गतिशील है, बहुरुपिया है और वायरस की तरह रंग बदल लेता है।

पिछले कुछ दशकों में अब जाकर सरकार ने औद्यौगिक नीति में थोड़ी सी ढ़ील दी है। दूसरी बात ये कि राज्यों के पास संसाधन इतने कम हैं कि वो कोई बड़े संरचनात्मक प्रोजेक्ट शुरु नहीं कर पाते। इससे देश में कुछ ही जगह शहरीकरण हो पाया है। हम देश के हर हिस्से को उत्पादक नहीं बना पाए हैं।

लेकिन इसका दलित हितों से क्या ताल्लुक है ? इस बात का दलित हितों से ये ताल्लुक है कि अगर देश में समान और विकेंद्रीकृत विकास होता है तो एक गरीब आदमी भी कम आमदनी में अपने घर के नजदीक रह सकता है और बचत कर सकता है। एक गरीब आदमी के बच्चे को भी घर के नजदीक युनिवर्सिटी और इंजिनीयरिंग कॉलेज मिले ये विकेंद्रीकरण का मतलब है। ऐसा क्यों है कि इस देश में सारे अच्छे कॉलेज दिल्ली-मुम्बई-पूना और बंगलूरु में ही है ? क्या महज सीटों में आरक्षण देकर एक गरीब के बच्चे को बंगलूरु के कॉलेज में पढ़ने भेजा जा सकता है जहां की फीस 5-8 लाख रुपये है ?

जाहिर है, बड़े शहरों का विकास देश के हित में कतई नहीं है-वे कूड़े के ढ़ेर और स्लम बस्तियों में तब्दील होते जा रहे हैं। वहां रहने का खर्च ज्यादा है, ऑफिस महंगे हैं, जमीन महंगी है और देश की उत्पादकता प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ समान और विकेंद्रितकृत विकास सभी को विकास का समान मौका देती है और अच्छी जीवनशैली प्रदान करती है। व्यापक अर्थों में ये गरीबों और दलितों के लिए फायदेमंद है।

लेकिन ऐसा तभी हो पाएगा जब राज्यों को ज्यादा वित्तीय अधिकार दिए जाएं। राज्यों को कम से कम केंद्रीय करों में 40 फीसदी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए और कुछ करों की उगाही का भी अधिकार उन्हे मिलना चाहिए।

कुछ ऐतिहासिक वजहों से अपने यहां केंद्र को इतना मजबूत बना दिया गया है कि ये बात अब बड़ी वाधा बन गई है। पंडित नेहरु ने जब संविधान सभा में अपने भाषण में ये बात कही थी तो हालात कुछ और थे-लेकिन अब हम एक परिपक्व और अपेक्षाकृत मजबूत देश बन गए हैं-हमें इस पर विचार करना चाहिए।(जारी)

Saturday, May 23, 2009

दलित, समाज, सरकार और हकीकत-6

हाल के दिनों में साहित्य और दलित चिंतन में मौलिकता और उभार देखने को आया है। इस सिलसिले में ऐसे लेखकों को खारिज कर देने की प्रबृत्ति भी बढ़ी है जो गैर-दलित हैं। दलित लेखकों का एक वर्ग कहता है कि दलितों को सहानुभूति का लेखन नहीं बल्कि स्व-अनुभूति का लेखन चाहिए। एक ऐसा लेखन जो भोगे हुए यथार्थ पर आधारित हो। लेकिन ऐसा उचित नहीं जान पड़ता। कई दूसरे गैर-दलित लेखक भी हो सकते हैं जिन्होने दलितों जैसे कुछ हालात झेले हों। जातीय और समाजिक भेदभाव की बात अगर छोड़ दी जाए तो आर्थिक आभाव कमोवेश हरेक इंसान को समान रुप से प्रभावित करता है।

दूसरी बात ये है कि अगर कोई गैर-दलित लेखक दलित हितों के बारे में कोई मौलिक विचार पेश करता है तो उसे लेने में क्या बुराई है भले ही वो सहानुभूति ही क्यों न हो। हमें याद रखनी चाहिए कि अमेरिका में अश्वेतों के समर्थन में एक निर्णायक लड़ाई को अंजाम देने वाले शख्स का नाम एब्राहम लिंकन था जो श्वेत था। दूसरी बात ये कि हिंदुस्तान में दलितों के सबसे बड़े हितचिंतक, राजनीतिज्ञ और विचारक बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर को भी एक महाराजा ने विदेश जाने में वित्तीय मदद की थी। कहने का मतलब ये कि नीयत अगर सही हो तो कोई काम बुरा नहीं है।

दलित लेखकों का एक वर्ग इस बात पर जोर दे रहा है कि अगर दलितों तरक्की करनी है तो उन्हे अंग्रेजी सीखनी होगी। ये बात सही है, और दलित ही नहीं- हर वर्ग के लिए सही है। लेकिन हमें याद रखनी चाहिए अग्रेजी सीखना एक क्रमिक प्रक्रिया है और इसके सहारे एक बड़े वर्ग के विकास का लंबे समय तक इंतजार नहीं किया जा सकता। इस वर्ग में दलित ही नहीं कई दूसरे वर्गों के लोग भी शामिल है।

आज के हिंदुस्तान में अंग्रेजी न जानने वाला तकरीबन हर हिंदुस्तानी कई स्तरों पर भेदभाव का शिकार है। तो क्या कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला जा सकता जिससे अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी सम्मानजनक जिंदगी जीने का रास्ता खुलता हो ? जो लोग सिर्फ अंग्रेजी के सहारे विकास की बात करते हैं वे प्रकारांतर से उसी समाजिक समूहों के हाथ में पूरी शक्ति देने की वकालत करते हैं जिसमें दलितों मौजूदगी शून्य से ज्यादा नहीं है। दुर्भाग्य से ये विमर्श आजादी के बाद से ही चल रहा है लेकिन इससे निपटने का कोई रास्ता किसी को नहीं सूझ रहा।

इसके लिए हाल ही का एक उदाहरण देना काफी है। ताजा लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जब अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करने की बात की तो जिस तरह का हाय तौबा मचा उससे .यहीं लगता है कि प्रवुद्धजनों,, हालात और तंत्र में अग्रेजी ने किस कदर अपना जड़ जमाया है। भाषाई विमर्श दलित हितों से सीधे जुड़ा हुआ है। या तो पूरे हिंदुस्तान में सरकारी स्तर पर अंग्रेजी की संस्थागत और ठोस पढ़ाई की व्यवस्था की जानी चाहिए या फिर उच्च स्तर पर भी क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई की माकूल व्यवस्था होनी चाहिए और नौकरियों में अंग्रेजी के आतंक को खत्म किया जाना चाहिए।

लेकिन सवाल ये है कि निजी क्षेत्र क्यों अंग्रेजी छोड़ेगा और क्षेत्रीय भाषाओं को अपनाएगा ? यहां फिर से सरकारी प्रोत्साहन की जरुरत है। सरकार को ऐसा कुछ करना होगा- चाहे वो प्रोत्साहनात्मक हो या निषेधात्मक- कि भाषाई आधार पर किसी से भेदभाव न किया जाए। सरकार क्षेत्रीय और राष्ट्रीय भाषा में कामकाज करनेवाली कंपनी को प्रोत्साहित कर सकती है। इसके आलावा सरकार क्षेत्रीय भाषाओं में ज्ञान के कई विषयों की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहन दे सकती है। हरेक भाषा में अनुवाद और मौलिक लेखन को प्रोत्साहित कर के सामग्री की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए बड़ी इच्छाशक्ति की आवश्यकता है जो हमारे नेतृत्व में नहीं दिखती।(जारी)

Friday, May 22, 2009

दलित, समाज, सरकार और हकीकत-5

सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है। आज के युग में जब अधिकांश नौकरियां निजी क्षेत्र से आ रहीं हैं तो दलितों के लिए यहां दोहरा संकट है। एक तो यहां आरक्षण नहीं है दूसरी बात ये अंग्रेजी एक बड़ी वाध्यता है। निजी क्षेत्र की अधिकांश अच्छी नौकरियों में अंग्रेजी का ज्ञान जरुरी है। यहां अगर सरकार और निजी क्षेत्र मिलजुल कर काम करे तो बात बन सकती है। इसका अच्छा उदाहरण मायावती का फॉर्मूला हो सकता था जिसमें एक खास फीसदी में दलितों को आरक्षण देने पर सरकार नजी क्षेत्रों को कुछ रियायते देती। लेकिन ये फॉर्मूला पूरे देश के स्तर पर लागू नहीं हो पाया है।

दूसरी बात ये कि कई नौकरियां ऐसी हैं जहां तकनीकी दक्षता की ज्यादा जरुरत होती है और भाषाई ज्ञान कम चाहिए होता है। सरकार ऐसे क्षेत्रों को तलाश कर दलितों के बच्चों को वहां पढ़ा सकती है जिससे वो आसानी से नौकरी हासिल कर सकें। सरकार को ज्यादा से ज्यादा आईटीआई और वोकेशनल कोर्स के संस्थान खोलने चाहिए या फिर प्राइवेट क्षेत्र को इसमें पूंजी लगाने के लिए हौसलाआफजाई करनी चाहिए। हमारे देश में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी तो पैदा हो गई है लेकिन यहां जरुरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा छोटी नौकरियां पैदा की जाएं जिससे लाखों लोगों को खपाया जा सके।

हमारे यहां कृषि क्षेत्र को अभीतक पूरी तरह खंगाला नहीं गया है। जैसा कि मैंने हरियाणा में देखा-वहां की सरकार अब कृषि उत्पादन बढ़ाने की जगह कृषि विविधिकरण पर जोर दे रही है। चूंकि देश अब खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है इसलिए खेती को ऐसे दिशा में मोड़ने में जरुरत है कि कम जमीन में ज्यादा से ज्यादा आमदनी हो सके। देश में अब फलों, सब्जियों और अन्य वाणिज्यिक खेती को बढ़ावा देने की नीति पर विचार होनी चाहिए। दुग्ध उत्पादन, अंडा, मांस, मधुमक्खी, मशरुम और मछली के उत्पादन पर सरकार को बड़ी नीति बनाने की जरुरत है। इससे रोजगार का विकेंद्रीकरण होगा और बड़ी आबादी को फायदा होगा जिससे दलित भी लाभान्वित होंगे।

दूसरी बात दलितों में कई ऐसी जातियां हैं जो हस्तकरघा और कलाकृतियां बनाती हैं। बांस की टोकड़िया, चटाईयां, बेंत की कुर्सियां और मिट्टी के बरतन जैसी कई चीजें हैं जो अभी तक सिर्फ स्थानीय बाजार में ही खपती है। बड़े पैमाने पर इनके कारोबार की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार को इस दिशा में भी सोचना होगा। हमारी सरकार इन सब चीजों को लेकर उदासीन है। हमने कोई ऐसी बड़ी नीति नहीं बनाई है या उसे बढ़ावा नहीं दिया है कि इसका बाजार बन सके और इसका विज्ञापन हो। हमें इन सब बातों को चिह्नित करना होगा कि वे कौन से तरीके हैं जिससे आमलोगों को फायदा हो।(जारी)

Tuesday, May 12, 2009

मायावती, अम्बेदकर, सेक्यूलरिज्म और बीजेपी

मायावती ने सत्ता हासिल करने के लिए जितनी भी कलाबाजियां खाईं हों लेकिन उनकी पार्टी अम्बेदकर के विचारों को ही पूरा करने का दंभ भरती है। कई लिखित साक्ष्यों से ये साबित हुआ है कि अम्बेदकर के मन में इस्लाम को लेकर कोई अच्छी धारणा नहीं थी। अम्बेदकर ने जब धर्म परिवर्तन का फैसला लिया तो उनको मनाने कई इसाई मिशनरियां, इस्लामिक और सिख धर्माचार्य भी पहुंचे थे लेकिन अम्बेदकर ने सबको ठुकरा कर बौद्ध धर्म चुना था। शायद अम्बेदकर के मन में ये बात थी कि जिन दलितों ने अतीत में इस्लाम, इसाई और सिख धर्म अपनाया था उनकी हालात जस की तस ही रही, समाजिक-आर्थिक रुप से उनमें कोई खास बदलाव नहीं आय़ा। अम्बेदकर की मुख्य लड़ाई हिंदू धर्म में भेदभाव को लेकर थी और वे दलितों को इस ढ़ांचे में सम्मानजनक स्थान दिलाना चाहते थे। जब एक हिंदू धर्माचार्य अम्बेदकर के पास हिंदू धर्म में ही बने रहने का आग्रह कर रहे थे तो अम्बेदकर ने उनसे कहा भी था कि क्या हिंदू समाज, शंकराचार्य के पद पर एक दलित को स्वीकार कर लेगा ?

कुल मिलाकर अम्बेदकर हिंदू समाज के आंतरिक सुधार को लेकर ज्यादा चिंतित थे। ये विचारधारा आरएसएस के विचारधारा से मेल खाती है लेकिन फर्क यह है कि आरएसएस सुधारों की क्रमिक प्रक्रिया में यकीन रखता है और इसके सुधार का मॉडल ऊपर से नीचे की ओर है जबकि अम्बेदकर इस क्रम को पलटना चाहते थे। दूसरी बात ये कि आरएसएस का विचार गैर-हिंदू सम्प्रदायों के विद्वेष पर टिका है, जिससे अम्बेदकर सहमत नहीं थे।

तो मायावती ऐसे स्कूल की छात्रा रही हैं जिसमें इस्लाम को लेकर कोई ज्यादा लगाव नहीं है। गौरतलब है कि मायावती या उनके मेंटर कांशीराम ने कभी भी हिंदू धर्म से अलग होने की बात नहीं की। कई विश्लेषकों का ये भी मानना है कि दलित जहां भी सशक्त होते हैं या उनमें सशक्तिकरण की भावना आती हैं वो हिंदुत्ववादियों के पाले में चले जाते हैं, उनका हिंदूकरण हो जाता है। इसका उदाहरण गुजरात और दूसरे कई जगहों के दंगे हैं जहां दलितों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया या उनका इस्तेमाल किया गया।

दूसरी बात ये कि हिंदुस्तान में सदियों से जो तबका सबसे गरीब और बंचित रहा है उनमें दलित और मुसलमानों की तादाद खासी है। कई बार दोनों वर्गों के आर्थिक हित भी टकराते हैं और उनमें विद्वेष पनपता है।
दूसरी अहम बात हाल की घटनाओं से ताल्लुक रखती है। पिछले सालों में जिस तरह राहुल गांधी ने दलितों को अपने पाले में लाने के लिए प्रयास किए हैं मायावती उससे सशंकित है। ये बात गौरकरने लायक है कि पूरे देश में जहा बीएसपी का ढ़ांचा नहीं है वहां दलित अभी भी कांग्रेस को वोट करता है। मायावती को लगता है कि अगर कांग्रेस फिर से सत्ता में आ गई तो वो सरकारी संसाधन के बल पर ऐसी-ऐसी योजनाएं बनाएगी जो दलितों को फिर से कांग्रेस की तरफ मोड़ सकती है। लालु-मुलायम, मुसलमानों के बारे में ये चोट बिहार-यूपी में सहला रहे हैं जब कांग्रेस ने केंद्र में रहकर अल्पसंख्यकों के लिए योजनाओं का पिटारा खोल दिया। दूसरी बात ये कि मुलायम सिंह यादव के फिर से कांग्रेस पाले में जाने की संभावना है, और मुलायम ने अपनी शर्त रख भी दी है कि जो भी सरकार मायावती को बर्खास्त करेगी वे उसी को समर्थन देंगे। कुलमिलाकर माया को खतरा, बीजेपी से नहीं-कांग्रेस से ज्यादा है।

ऐसी स्थिति में मायावती क्यों अपनी सियासी आत्महत्या चाहेंगी ? कांग्रेस और बीएसपी दोनो जानती है कि बीएसपी के विस्तार से अगर किसी को घाटा है तो वो कांग्रेस ही है। ऐसे में मायावती पहले अपनी जान बचाना पसंद करेंगी क्योंकि वो जानती हैं कि अगर फिर से कांग्रेस सत्ता में आई तो वो सीबीआई के चंगुल से नहीं बच पाएंगी।

ऐसे में मायावती का सेक्यूलर होना कोई मायने रखता है ? उनके वरुण गांधी पर रासुका लगाने को जो लोग उसके सेक्यूलर हृदय से जोड़कर देखते हैं उन्हे ये समझनी चाहिए कि मायावती बीजेपी के सहयोग से ही यूपी की तीन बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं।

Saturday, May 9, 2009

दलित, समाज, सरकार और हकीकत- 4

एक सवाल ये भी है कि दलितों के बच्चों को कमसे कम क्लास दसवीं तक कैसे स्कूल में रोक कर रखा जाए। देखने में ये आया है कि जैसे ही वो 12-14 साल के होते हैं उनपर परिवार चलाने की जिम्मेवारी आ जाती है, उनका परिवार इतना बड़ा होता है, उनके परिवार में अशिक्षा-जनित जागरुकता की कमी इतनी होती है कि उन्हे पढ़ाई जारी रखने में बड़ी मशक्कत होती है। सरकार ने स्कूलों में दोपहर का भोजन लागू करके इस दिशा में थोड़ा सा प्रयास किया है लेकिन सिर्फ ये कदम काफी नहीं है।

दोपहर का भोजन तो सिर्फ मिडिल स्कूल तक ही मिल पाता है, उससे आगे ऐसा कोई प्रोत्साहन नहीं है। हमारे देश के स्कूलों में सबसे ज्यादा ड्रॉप आउट दर अगर किसी की है तो वो दलितों के बच्चों की ही है। अगर यहां हम उनकी तुलना आदिवासियों से करें तो वहां स्थिति थोड़ी सी भिन्न है। सरकार से इतर इसाई मिशन और कई दूसरे संस्थाओं ने वहां शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर काम किया है, लेकिन दलितों के लिए खासकर के मैदानों में रहनेवाले दिलितों के बीच ये संस्थाएं काम नहीं कर रही। अभी तक हमारे देश की सरकारें इस ड्राप आउट को रोकने का कोई मुकम्मल तरीका नहीं खोज पाईं हैं।

यहां मामला उलझ जाता है। हमारी व्यवस्था ने संविधान में दलितों को आबादी के हिसाब से आरक्षण देकर अपने आपको जिम्मेदारियों से मुक्त कर लिया है। तो फिर सवाल ये है कि जिस वर्ग के पास जमीन नहीं है, शिक्षा में तमाम दिक्कते हैं वो अपनी तरक्की कैसे करे। क्या सिर्फ उसके घर के पास स्कूल खोल देने से वो अपनी पढ़ाई पूरी करके उन वर्गों के समकक्ष आ पाएगा जिनके घर पीढ़ियों से शिक्षा की ज्योति और संसाधनों की बरसात में नहाए हुए हैं ?

यहां कुछ साहसिक कदम उठाने की जरुरत है। सरकार कुछ ऐसे प्रोत्साहन के कदम उठा सकती है जिससे दलितों के बच्चे कम से कम हाई स्कूल या उससे ऊपर तक की शिक्षा ले सके। सरकार दलितों के बच्चों को प्रतिदिन कक्षा में उपस्थित होने के एवज में एक न्यूनतम राशि दे सकती है और ऐसे स्कूलों को सम्मानित कर सकती है जहां दलितों के बच्चे अच्छा परफॉर्म करते हों।

सरकार ऐसा भी कर सकती है कि दलितों के लिए एक न्यूनतम शिक्षा स्तर के बाद एक ब्याजमुक्त कर्ज की व्यवस्था करे जिससे वो अपना कोई व्यापार खडा कर सकें। मेरा मानना है कि दलितों के लिए वैसे भी सरकार को न्यूनतम ब्याज पर व्यापारिक ऋण का इंतजाम करना चाहिए। अगर कोई दलित दसबीं पास कर जाता है तो उसे कम से कम 25,000 रुपये प्रोत्साहन राशि के तौर पर मिलनी चाहिए। ये कदम कुछ वैसा ही होगा जैसे सरकार लाड़ली योजना के तहत कई सूबों में लड़कियों के जन्म पर कुछ रकम बैंको में जमा करवाती है।

दूसरी बात जो अहम है वो ये कि दलितों की आबादी का एक बड़ा वर्ग मेहनत मजदूरी करके कमाता है। सरकार ने नरेगा लागू किया है जो अच्छा कदम है लेकिन इसमें न्यूनतम मजदूरी इतनी कम है कि ये नाकाफी लगता है। वर्तमान में शायद सरकार रोजगार गारंटी योजना के तहत 65 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से 100 का रोजगार देती है, इसे बढ़ाकर 100 रुपये प्रतिदिन करने की जरुरत है। (जारी)