Wednesday, July 1, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद-2

इलाहाबाद शुरु हो चुका था। हम रास्ते भर कल्पना करते आए थे कि यमुना कहीं हमारे बाजू से गुजरती होगी, दिख ही जाएगी। यमुना नहीं दिखी, वो तो संगम के पास दिखी। हमारा भौगोलिक ज्ञान थोड़ा दुरुस्त हुआ। बहरहाल, राजीव का ममेरा भाई यानी गौरव हमे रिसीव करने आया था। पुरानी मारुती थी, शादी का घर था-वो हमें लेने के साथ-साथ पानी भी लेने आया था। हमने स्टेशन पर पानी पिया, पान खाया, उसे निहारा और पटना स्टेशन से तुलना की। (ये हमारी बीमारी है कि हम हर शहर की तुलना पटना से करने लगते हैं) इलाहाबाद का स्टेशन अच्छा लगा, अपना सा। बहुत भीड़भाड़ नहीं, कूड़े कचरे भी कम था, लोगों की चाल में कोई बैचेनी…कोई हड़बड़ी नहीं। ये शहर का पहला एहसास था।
हमने शहर के चक्कर लगाए। पानीवाले से पानी के चार बोतल लिए(बोतल कहना उचित नहीं-वो 20 लीटर वाले को क्या तो कहते हैं)। गौरव ने बताया कि संगम यहां से नजदीक है, दिल फिर से एक बार धड़का। मां ने फोन पर बताया था कि संगम में जरुर डुबकी मार लेना। शहर की सड़के अच्छी थी, कहीं गड्ढें नहीं। हरियाली ऐसी की लगा कि काश..आंख में रिकार्डिंग की सुविधा होती।जैसा सुना था...कि यूपी उल्टा प्रदेश है-वैसा तो लगता नहीं। सोच ये भी रहा था कि क्या इन्ही सड़को पर एक मजदूरिन को देख कर निराला ने कविता लिखी होगी- वह तोड़ती पत्थर.....कहीं ये सड़क वहीं तो नहीं।

हम थोड़े आशंकित भी थे कि शादी के घर में रहने-नहाने में दिक्कत होगी। फिर मामा के रुतबे का अंदाज भी था-कहीं बड़ा सा होटल ही बुक करवाया हो। हमें क्या, हम तो मेहमाननवाजी करेंगे, खाएंगे, घूमेंगे और मस्ती करेंगे। लेकिन मामा ने बढ़िया इंतजाम किया था। युनिवर्सिटी के इलाके में ही चैथम लाईंस मे उनका फ्लैट था। एक के बाद एक लगे हुए फ्लैट-जैसे पूरे हिंन्दुस्तान के युनिवर्सिटियों में होते हैं। एकदम शान्ति,लगा अगर पढ़ाकू हो तो पक्का नोबेल जीत लोगे। इनमें से कई फ्लैट खाली थे। मामा ने 5-6 फ्लैट बुक करवा लिए थे। सबमें टैंट हाउस का गद्दा, तकिया, बाल्टी,मग, साबुन और टूथपेस्ट रखे थे। पानी की कोई दिक्कत नहीं थी। गंगा वाटर का सप्लाई था, ठंढ़े पानी में हमने जमकर नहाया।
हमने थोड़ा मेल मुलाकात करके, थोड़ी पेट पूजा करके... शहर देखने की ठानी। हलांकि इसे टुकड़े-टुकड़े में ही देख पाया लेकिन वो घड़ी अनमोल थी। हमें लस्सी पीने की याद आई। हमने रिक्शा लिया, उसने 10 रुपये में बहुत दूर तक घुमाया। हम कर्नल गंज गए...आनंद भवन के सामने से। तय किया कल इस पर धावा बोलना है। कैमरे की बैट्री को रात में फुलचार्ज पर डाल देंगे। हम कर्नल गंज गए,लस्सी पी, पान खाई और वहां की लड़कियों को देखा। लौटते हुए हमने युनिर्वसिटी की इमारत देखी, गंगानाथ झा और सुंदरलाल होस्टल देखा। हम दंग रह गए। हमने इश्वर से शिकायत की कि हमें इलाहाबाद में पैदा क्यों नहीं किया। (जारी)

10 comments:

‘नज़र’ said...

बहुत अच्छा लिखा है, अगले अंक का इंतिज़ार है...


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चर्चा । Discuss INDIA

venus kesari said...

वाह भाई वाह आपने तो इलाहाबाद को नए नजरिये से देखने को विवश कर दिया
वैसे बता दूं "वह तोड़ती पत्थर" दारागंज के रास्ते पर हुआ वाक्य है

हम कर्नल गंज गए,लस्सी पी, पान खाई और वहां की लड़कियों को देखा। :):)

वीनस केसरी

Rajiv K Mishra : Roam-antic Realist said...

सुशांत जी, चलते रहिए प्रयागराज की यात्रा पर...मैं भी आपके साथ ही चल रहा हूं। कुछ कर्नल गंज की लस्सी पर लिखें..., कुछ विश्वविद्यालय के वास्तु पर और कुछ वहां की लड़कियों पर...।

Udan Tashtari said...

बढ़िया..इलाहाबाद है ही ऐसा..आखिर हमरी ससुराल है न जी!!

डॉ. मनोज मिश्र said...

आपकी प्रभु से शिकायत सही है ,इलाहाबाद और बनारस शहर नहीं है बल्कि एक नशा है जो यहाँ एक बार रह गया वह पूरी दुनिया में कहीं नहीं रह पायेगा .

हर्षवर्धन said...

ऐसे ही है हमारा इलाहाबाद। सुशांतजी, इलाहाबाद तो ऐसे ही है। और, ईश्वर से नाराज मत होइए। इलाहाबाद से जो गुजर गया वही इलाहाबादी है। इलाहाबाद संस्कृति है सिर्फ शहर नहीं है। हम तो, मुंबई-दिल्ली रहते हुए भी इलाहाबाद ही जी रहे हैं।

sushant jha said...

उड़न तश्तरीजी...अब तो मुझे भी इलाहाबाद को ससुराल बनाने का मन करता है...!

mahashakti said...

उड़न तश्तरीजी...अब तो मुझे भी इलाहाबाद को ससुराल बनाने का मन करता है...!

@ sushant jha ji कोई कन्‍या पंसद आई की नही ?

चलिये पैदा नही हुये तो क्‍या बात है, ससुराल तो बना ही सकते है।

हमारा इलाहाबाद ऐसा है कि कि आप इसे भूल ही नही सकते है, कुछ कमियाँ तो है, पर अच्‍छाईयों को देखना ही ज्‍यादा अच्‍छा होता है।

आपका पुन: स्‍वागत है, मनमोहने इलाहाबाद में

sushant jha said...

महाशक्तिजी...एक कोई लड़की हो तो बताऊं...मुझे तो इलाहाबाद की हर लड़की ही पसंद आई...बहरहाल..इलाहाबाद तो जरुर आऊंगा...बल्कि अब तो आने का बहाना खोजूंगा...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हमने गंगानाथ झा छात्रावास में आठ साल गुजारे और अब यहीं जिला कचहरी में हाकिम-ए-खजाना बने बैठे हैं। तो अपने को भाग्यशाली मान लेते हैं। अभी इलाहाबाद में रुके हों तो चाय-बैठकी हो सकती है।