Thursday, July 2, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद-3

दरअसल हम इलाहाबाद जाते ही इसे घूम नहीं पाए थे। इसकी वजह थी कि हम शादी वाले घर में गए थे, थोड़ा दिखाना भी था कि सिर्फ मेहमाननवाजी करने नहीं आए हैं। 7 जून की शाम को हम पहुंचे ही थे, 8 जून को शादी थी। दिन भर भागदौड़...उसी बीच में इलाहाबाद का दर्शन। संयोग था कि मामा का घर युनिवर्सिटी इलाके में ही था, उसकी मुख्य इमारत और सारे बड़े होस्टल पास ही थी। हमने उसे जी भर के देखा। हमने शादी के दिन तक आते जाते बाहर से आनंद भवन को देखा और कल्पना की कि नेहरुजी की जीवनशैली कैसी होगी। हमने रिक्शों से, गाड़ियों से और पैदल आते जाते हर लड़की को गौर से देखा और उसकी खूबसूरती को अपने आंखों में कैद करने की कोशिश की। हम उनकी आंखों में झांककर शहर और इस प्रदेश की कानून व्यवस्था का भी जायजा ले रहे थे। हमें इलाहाबाद की लड़कियां कई मापदंडों पर आगे नजर आई। उनके चेहरे का आत्मविश्वास, शहर का आत्मविश्वास बयां कर रहा था। उनकी आखों का नशा, शहर के नशे से कम नहीं था। उनकी आलस भरी चाल, शहर की चाल बता रही थी...अपने में खोई-2 सी...थोड़ी ऊंघती हुई सी।

हम शादी के दिन भी बार-2 कर्नलगंज जाते रहे। हमारी लस्सी पीने की तलब बार-2 हमें वहां खींच ले जाती थी। हमें कैमरे की बैटरी लेनी थी, लोगों ने कर्नल गंज का नाम सुझाया, हमें बाल बनवानी थी-हम भटक गए लेकिन जब सामने देखा तो वो कर्नलगंज ही था। मेरे एक दोस्त को हाजमे की दवा लेनी थी, लोगों ने तब भी कर्नलगंज ही सुझाया। हमने अपना तकिया कलाम बना लिया-सारे मर्ज़ की एक दवा....कर्नलगंज। शायद इसकी एक वजह ये भी थी कि हम कर्नलगंज के नजदीक ही ठहरे थे।

हम इलाहाबाद के लोगों की मीठी जुबान के कायल हो गए। हमें कई दफा अपनी मैथिली कम मीठी लगी। हमने रिक्शेवाले से बात की, हमने लस्सी वाले से बात की, पनवाड़ी से बात की हमने हर उस शख्स से बात की जिससे बात की जा सकती थी। इलाहाबाद के जुबान की मिठास अभी भी यादों में ताजा है। लस्सी वाले से बात की तो लगा कि किसी बेहद सुसभ्य और सुसंस्कृत नौजवान से बात हो रही है। हमने सिर्फ उसकी बात सुनने के लिए बार-बार लस्सी पी। रिक्शा वाला ऊंचाहार(रायबरेली) का रहनेवाला था। उसने जब अवधी में बात करनी शुरु की तो लगा कि काश हम भी ऐसा बोल पाते। वो नेहरु परिवार की तारीफ में भावविभोर हो गया। उसने बताया कि उसके आंगन की खटिया पर इंदिरा जी, राजीव जी और राहुल जी बैठ चुके हैं।
संगम और आनंद भवन से पहले दो बाते और अहम हैं जो नहीं भूलाती। एक तो युनिवर्सिटी के इलाके में जगह-जगह किताबों की दुकान का होना और दूसरी दोपहर में इलाहाबाद का लगभग सो जाना। सड़क के किनारे आधी दाम के किताबों की दुकानें...नौकरियों के फॉर्म की दुकाने...और चाय के साथ अखबारों में लगभग खो गए से युवाओं के चेहरे....पटना याद आ गया। अपना महेंद्रू भी तो ऐसा ही है। लेकिन, पटना के महेंद्रू और इलाहाबाद के इन इलाकों में बहुत अंतर है। हमारा महेंद्रू भीड़भाड़ वाला इलाका है...थोड़ा कम साफ सुथरा... लेकिन इलाहाबाद खुला-खुला सा था। हम मन ही मन फिर भी तसल्ली देते रहे कि अपना पटना ज्यादा डॉक्टर, इंजिंनीयर या दूसरी कामयाबी पैदा करता है...लेकिन इलाहाबाद का शैक्षणिक ढ़ांचा और युवाओं का जुनून देखकर दिल इस बात को नहीं मान पा रहा था।

जो बात सबसे दिलचस्प थी वो ये कि इलाहाबाद को सही में किसी ने ऊंघता हुआ शहर कहा है। दिन के दो बज रहे थे, हमें लस्सी की तलब लगी थी। हम फिर से कर्नलगंज में थे...राजीव के भाई को बाल बनवाना था(शादी के माहौल में उसे कई लड़कियों पर अपना इम्प्रेसन भी देना था), हम सैलून की तलाश में गए। उधर लस्सी वाला भरी दुपहर में तान के सो रहा था। हमने उसे जगाया, उसने कहा कि बगल के दुकान में पी लीजिए। हमें ताज्जुब हुआ। कई जगह ऐसा हुआ। लगा कि ये शहर 1 बजे से चार बजे तक बंद तो नहीं रहता। दिल्ली होता तो दुकानदार नोट छाप रहे होते। पता नहीं ये बात पूरे इलाहाबाद में है या फिर हमें ही इसका एहसास हुआ ? (जारी)

5 comments:

संगीता पुरी said...

आपकी इलाहाबाद यात्रा के बारे में पढकर अच्‍छा लगा .. अगली कडी का भी इंतजार रहेगा ।

डॉ. मनोज मिश्र said...

rochkta bnee hui hai.

venus kesari said...

mai shart laga kar kah sakta hoon ki app allahabad garmee ke samay hi aaye honge

venus kesari

Udan Tashtari said...

जारी रहो भाई..इत्मिनान से पढ़ रहा हूँ.

sushant jha said...

जी केसरीजी...मैं वहां जून के दूसरे सप्ताह में गया था।