Monday, July 13, 2009

पोलिटिकल लाईजनर-1

वह सियासत के लूडो (बिसात नहीं) का उस्ताद था। लेकिन सांप सीढ़ी के खेल में 99 पर उसे सांप ने डस लिया तो वह 25 पर आ गया। 3 बार सांसद रहने के बाद फिलहाल वो बेरोजगार है। वो लाईजनर बन गया है। वैसे लाईजनर बनने के लिए सांसद होना कोई अनिवार्य योग्यता नहीं है।

ये लोकेशन है साउथ एवेन्यू का जहां सांसदों का आवास है। जहां राष्ट्रपति भवन का दक्षिणी गेट दिखता है। आप अगर उधर से गुजरे तो लगेगा कि प्रतिभा ताई अभी आपको बुला लेगी और कहेगी कि बबुआ चाय तो पीते जाओ। तो पूर्व सांसद टर्न्ड लाईजनर ने अभी तक सांसदों वाली कोठी हथिया कर रखा है। हुआ ये कि जनाव जब लोकसभा में थे तो आवास समिति के अध्यक्ष थे। जमकर सांसदों को उपकृत किया था, अब हारने के बाद नया आवास समिति का अध्यक्ष उन्हे उपकृत कर रहा है। उनके नाम वो बंगला एलाट है।

शाम की बैठकी है। यहां सिर्फ पानी के साथ सिर्फ पनीली चाय मिलती है। हारे सांसद के घर ये उम्दा किस्म का स्वागत है। दिन भर महज 200 कप चाय बनती है उसी में सबका गुजारा होता है। आनेवाले सारे लोग लाईजनर ही हैं या भविष्य के लाईजनर है। सारे लोग संभावना तलाशने आते हैं। एक दूसरे को काटने आते हैं। सारे लोग सतर्क हैं, डरे हुए से कि कोई बेजा फायदा न उठा ले जाए। सांसद रह चुके लाईजनर ने कुछ नहीं कमाया है। उसके पास डिफेंस कालोनी में एक 3 करोड़ का फ्लैट है, बिहार में 2 पेट्रोल पंप है और उसने 4 बच्चों को फ्री में इंजिनियरिंग-मेडिकल में दाखिला दिलवाया है। हां, पटना में भी एक कोठी है। कैश है ही नहीं। दिन भर रोता रहता है।
दूसरा लाईजनर आता है शाम के 6 बजे। सांवला रंग, उम्र 45 साल, झक्क सूट और लंबी गाड़ी। आते ही पहला कहता है-अरे बीरेंद्रबाबू कहां थे, दर्शन भी दुर्लभ हो गया।

दूसरा- अरे सर क्या बताएं, भतीजे के एडमिशन में लगा था, इतना महंगा हो गया है कि हमारे जैसे आदमी के बस की बात नहीं।
पहला- कहां करवाया..
दूसरा- सर, चेन्नई में एसआरएम में।
पहला-वाह...कितना लगा....ऊ तो काफी चार्ज करता है...
दूसरा- अरे सर..पैसा तो सुनते हैं कि बहुत लेता है, एक आदमी था..थोड़ा कम लगा।
पहला- किसको बोले थे...
दूसरा- सर... मेरे परिचित है एक मुम्बई में...उसका परिचित है बंगलोर में..उसका दोस्त प्रिन्सिपल का साला है...
पहला-ससुरा बड़ा घाघ है...इतना लंबा चेन बना दिया न...कि मेरा बाप भी नहीं पहुंच सकता...साले को मैं रग-2 जानता हूं। है कोई इसके डाइरेक्ट टच का ही...लेकिन मुझे नहीं बताना चाहता। जानता है न कि नाम खुल गया तो शुक्ला 4-5 एडमिशन तो यूं ही करवा लेगा। आखिरकार मानवसंसाधन राज्य मंत्री उसका लंगोटिया जो है। मादर....&^%$
पहला- और बताईये...
दूसरा-सर सब आपकी कृपा है।

सीन खत्म। दूसरा उठता है, और मोबाईल लेकर कैम्पस से बाहर जाने का बहाना करता है। उमेशबाबू जान जाते हैं उसी से बात करनी है। वो भी थोड़ी देर में एमपी(पूर्व) से आज्ञा लेते हैं। दोनों पान की दुकान पर हैं।

अरे उमेशबाबू...ई एमपी साहेब भी है न...साले बड़े पेटू हो गए है। शिकार सूंघते रहते हैं। उनके सामने जुबान खोलना..मतलब पार्टी खो देना। अब बताईये...घोड़ा घास से दोस्ती करेगा क्या....(जारी)

3 comments:

Harkirat Haqeer said...

राजनीती में अच्छी पकड़ है आपकी .....काफी मंझा हुआ लेखन.....!!

अनिल कान्त : said...

अच्छा लेख है भाई

satyendra... said...

nice story. keep it on.