Friday, December 11, 2009

तेलंगाना के बहाने.....

तेलंगाना की केंद्र द्वारा एक तरह से स्वीकृति ने छोटे राज्यों के पैरोकारों में एक नया उत्साह भरा है। पूरे देश से इस तरह की मांग उठ रही हैं जिनमें से कई तो बहुत पुरानी है या फिर जिनका कुछ आधार भी बनता है। लेकिन कुछ लोगों द्वारा इसका विरोध इस अंदाज में किया जाता है मानो छोटे भौगोलिक-सांस्कृतिक या क्षेत्रीय अभिव्यक्तियों को बोलने का हक ही नहीं है। ये विरोध कई बार सामंती अंदाज ले लेता है मानो वे शासक हों और मांग करनेवाला शासित। बहरहाल, मीडिया के कुछ लालबुझक्कड़ इस चिंता में दुबले होते जा रहे हैं कि देश का क्या होगा या फिर कौन सा शहर किस राज्य की राजधानी बनेगी।

सबसे लचर तर्क ये दिया जा रहा है कि खर्चे बढ़ जाएंगे और भ्रष्टाचार की गंगोत्री खुल जाएगी जब ये छोटे राज्य राजनीतिक अस्थिरता के शिकार होंगे। ये मानकर चला जाता है कि स्थिर सरकार भ्रष्ट नहीं होती और वहां सबकुछ ठीकठाक होता है या फिर बड़े राज्य हमेशा से स्थिर होते हैं या फिर उनके नेता बड़े ही पवित्र। यहां पिछले दो दशकों से यूपी जैसे बड़े राज्यों की अस्थिरता आंखें खोलने वाली है जहां पिछले पचास साल से स्थिर सरकार होने के बावजूद हरियाणा, केरल या गोवा जैसा विकास सपना ही है। कहने को तो बिहार, बंगाल में भी पिछले सालों दो दशकीय या फिर तीन दशकीय महा-स्थिरता रही है लेकिन विकास के मामले में ये फिसड्डी ही रहे। दूसरी तरफ हरियाणा, गोवा, मिजोरम जैसे राज्य आयाराम-गयाराम के नायाब उदाहरण हैं लेकिन वहां के लोग एक यूपी या बिहार जैसे तथाकथित बड़े रुप से महान राज्यों को लोगों को अपने यहां कर्मचारी तो रख ही सकते हैं। यूं, यहां जापान या इटली का उदाहरण देना ठीक नहीं होगा लेकिन सनद के लिए कहा जा सकता है कि पिछले 50 सालों में वहां तकरीबन 50 सरकारें आईं और गईं लेकिन वहां के विकास पर कोई फर्क नहीं पड़ा। तो कुल मिलाकर मामला बड़ा होने या स्थिर होने का नहीं विकास करने की मानसिकता और विकास के हालात होने का है।

नेताओं ने अपने-अपने हिसाब से स्टैंड लिया है। बीजेपी का एजेंडा संघ का है जो छोटे राज्यों को केंद्र की मजबूती मानती है। कांग्रेस का कोई एजेंडा नहीं-हालात इसका एजेंडा है, यूं इसे छोटे राज्यों से परहेज नहीं है। बड़ी पार्टी है, आराम से दुकानदारी चलाती रह सकती है। क्षेत्रीय पार्टीयां सहूलियत के हिसाब से रुख अपनाती है-लालू को तेलंगाना से कोई परहेज नहीं-उनका क्या जाता है-जबकि यहीं लालू झारखंड बनते वक्त अपने लाश पर झारखंड बनाने की बात करते थे। माया ने बुंदेलखंड का एजेंडा राहुल गांधी की गोदी में डाल दी है कि देते रहो पैकेज-अब राज्य मांग रही हूं। दूसरी तरफ ये कि उसे लगता है कि बुंदेलखंड और हरितप्रदेश में दलितों का अनुपात अच्छा है तो क्या बुराई है। मारे जाएंगे मुलायम जो फिरोजाबाद और कन्नौज के नेता बनकर रह जाएंगे-वहां से भी उनकी जमीन खिसक रही है।

यूं ऐसा हमेशा नहीं होता कि छोटे राज्य विकसित ही हो जाएं लेकिन वे बड़े राज्यों से बेहतर तो हैं ही। कुलमिलाकर बड़े राज्य नेताओं-ब्यूरोक्रेटों को बड़ा संसाधन हड़पने का मौका देते हैं जबकि छोटे राज्यों में छोटा संसाधन और जनता की पैनी नजर का खतरा होता है। यहां झारखंड का उदाहरण देकर विषयांतर किया जा सकता है लेकिन यहां तो हरेक तर्क के दर्जन भर से ज्यादा प्रति तर्क दिए जा सकते हैं।

तो कुल मिलाकर मामला इन टुच्चे स्वार्थो के बीच न फंसे इसके लिए फिर से राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन करना जरुरी हो गया है। जो उचित मांगों पर एक खास समय सीमा में अपनी रिपोर्ट दे और देश में एक बार में दो-चार या पांच राज्य बनाए जाएं। राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हर 50 साल पर किया जाए और बेहतर प्रशासन, क्षेत्रीय अभिव्यक्ति और देश की मजबूती के लिए नए राज्यों को बनाने की प्रक्रिया शुरु हो। नए राज्य देश से अलग इकाई नहीं होने जा रहे जैसा कुछ टीवी एंकरों की जुबान से भयानक रुप से ध्वनित होता लगता है-ये देश को ही मजबूती प्रदान करेंगे।

3 comments:

Krishna Kumar Mishra said...

भाई आप के तर्क वाजिब नही लग रहे। आप एक तरफ़ इटली, आदि देशों की बात क्यो नही करना चाहते?, हिन्दुस्तान बट रहा है और आप उत्साहित हो रहे है, यहां सहूलियत की बात नही बात क्षेत्रिय उन्माद की है, जैसे यह मुल्क भाषा के आधार पर राज्यों में बांटा गया था उसके भी परिणाम बहुत अच्छे नही हुए। अब राजिनैतिक कुनबे अपने अस्तित्व को और इतिहास में अपनी अमरता को लेकर ये टुकड़े करवाने की कोशिश में लगे है। जहां कुछ हरा नही उसे हरित प्रदेश चाहिए क्योंकि कुछ कथित किसान नेता अपनी विरासत में मिली शाख को लम्बा करना चह्ते है, मैं फ़िर उत्तर प्रदेश की तराई को हरित प्रदेश के तौर पर बांटने की बात करूगां जो ज्यादा हरा है मांगे जा रहे भूभाग से। बात रही विकास और सहूलियत की तो उत्तरांचल की राजधानी देहरादून है अब आप बताए कि अमरनाथ के इलाके में बसे गांव हों या पूर्वी शिवालिक रेंज के गांव जिनके लिए देहरादून पहुचना कितना दुरूह है जबकि लखनऊ आसान है, फ़िर कैसी सहूलियत भाई, वैसे तो ब्रिटिश इंडिया से सबक ले सकते है कि सयुंक्त प्रान्त की दो राजधानियां हुआ करती थी नैनीताल और लखनऊ, सवाल व्यवस्था का है और यदि सरकार में कूबत है तो सब कुछ मुमकिन है। नही तो इस मुल्क को आप जैसे लोग रेपब्लिक, यूनिअन ओफ़ इंडिया से रूस की तरह फ़ेडरल बना देगें इन टुकड़ों की आपस में दूरियां बढ़ती जायेंगी, क्षेत्रवाद, भाषा वाद, धर्म और जाति न जाने किन किन मुद्दों पर हम लड़े, वैसे आज भी कोई कम लड़ाई नही है इन सब मामलों को लेकर, मै खिलाफ़त नही कर रहा इन सब वादों की पर इन सब से ऊपर भी एक वाद है जिसे राष्ट्रवाद कहते है और ये सर्वोपरि है। लोगों को अपनी चीज़ों का विकास प्रसार आदि करने का हक तो हासिल है इस मुल्क में फ़िर वे क्यों समाज़ की मुख्य धारा में आना नही चाहते, मैं उन राज्यों का उल्लेख करना मुनासिब नही समझता जो तमाम वादों के चलते यूनियन आफ़ इंडिया को बस एक प्रतीक मानते है उनके दिल-दिमाग अलाहिदा हो चुके है इस मुल्क के अस्तित्व से।

Krishna Kumar Mishra said...

हां एक बात और मौजूदा हालातों मे अलाहिदा प्रदेश, तहसील, जिला, थाना आदि -आदि बनने से भृष्टाचार का बढ़ना निश्चित है। विकास की तो बिल्कुल उम्मीद न करे........विकास बटने में नही जुड़ने में होता है बन्धू

Krishna Kumar Mishra said...

इधर भी आइये और देखिए क्या हालात है हमारे मुल्क के
http://manhanvillage.wordpress.com