Saturday, May 23, 2009

दलित, समाज, सरकार और हकीकत-6

हाल के दिनों में साहित्य और दलित चिंतन में मौलिकता और उभार देखने को आया है। इस सिलसिले में ऐसे लेखकों को खारिज कर देने की प्रबृत्ति भी बढ़ी है जो गैर-दलित हैं। दलित लेखकों का एक वर्ग कहता है कि दलितों को सहानुभूति का लेखन नहीं बल्कि स्व-अनुभूति का लेखन चाहिए। एक ऐसा लेखन जो भोगे हुए यथार्थ पर आधारित हो। लेकिन ऐसा उचित नहीं जान पड़ता। कई दूसरे गैर-दलित लेखक भी हो सकते हैं जिन्होने दलितों जैसे कुछ हालात झेले हों। जातीय और समाजिक भेदभाव की बात अगर छोड़ दी जाए तो आर्थिक आभाव कमोवेश हरेक इंसान को समान रुप से प्रभावित करता है।

दूसरी बात ये है कि अगर कोई गैर-दलित लेखक दलित हितों के बारे में कोई मौलिक विचार पेश करता है तो उसे लेने में क्या बुराई है भले ही वो सहानुभूति ही क्यों न हो। हमें याद रखनी चाहिए कि अमेरिका में अश्वेतों के समर्थन में एक निर्णायक लड़ाई को अंजाम देने वाले शख्स का नाम एब्राहम लिंकन था जो श्वेत था। दूसरी बात ये कि हिंदुस्तान में दलितों के सबसे बड़े हितचिंतक, राजनीतिज्ञ और विचारक बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर को भी एक महाराजा ने विदेश जाने में वित्तीय मदद की थी। कहने का मतलब ये कि नीयत अगर सही हो तो कोई काम बुरा नहीं है।

दलित लेखकों का एक वर्ग इस बात पर जोर दे रहा है कि अगर दलितों तरक्की करनी है तो उन्हे अंग्रेजी सीखनी होगी। ये बात सही है, और दलित ही नहीं- हर वर्ग के लिए सही है। लेकिन हमें याद रखनी चाहिए अग्रेजी सीखना एक क्रमिक प्रक्रिया है और इसके सहारे एक बड़े वर्ग के विकास का लंबे समय तक इंतजार नहीं किया जा सकता। इस वर्ग में दलित ही नहीं कई दूसरे वर्गों के लोग भी शामिल है।

आज के हिंदुस्तान में अंग्रेजी न जानने वाला तकरीबन हर हिंदुस्तानी कई स्तरों पर भेदभाव का शिकार है। तो क्या कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला जा सकता जिससे अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी सम्मानजनक जिंदगी जीने का रास्ता खुलता हो ? जो लोग सिर्फ अंग्रेजी के सहारे विकास की बात करते हैं वे प्रकारांतर से उसी समाजिक समूहों के हाथ में पूरी शक्ति देने की वकालत करते हैं जिसमें दलितों मौजूदगी शून्य से ज्यादा नहीं है। दुर्भाग्य से ये विमर्श आजादी के बाद से ही चल रहा है लेकिन इससे निपटने का कोई रास्ता किसी को नहीं सूझ रहा।

इसके लिए हाल ही का एक उदाहरण देना काफी है। ताजा लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जब अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करने की बात की तो जिस तरह का हाय तौबा मचा उससे .यहीं लगता है कि प्रवुद्धजनों,, हालात और तंत्र में अग्रेजी ने किस कदर अपना जड़ जमाया है। भाषाई विमर्श दलित हितों से सीधे जुड़ा हुआ है। या तो पूरे हिंदुस्तान में सरकारी स्तर पर अंग्रेजी की संस्थागत और ठोस पढ़ाई की व्यवस्था की जानी चाहिए या फिर उच्च स्तर पर भी क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई की माकूल व्यवस्था होनी चाहिए और नौकरियों में अंग्रेजी के आतंक को खत्म किया जाना चाहिए।

लेकिन सवाल ये है कि निजी क्षेत्र क्यों अंग्रेजी छोड़ेगा और क्षेत्रीय भाषाओं को अपनाएगा ? यहां फिर से सरकारी प्रोत्साहन की जरुरत है। सरकार को ऐसा कुछ करना होगा- चाहे वो प्रोत्साहनात्मक हो या निषेधात्मक- कि भाषाई आधार पर किसी से भेदभाव न किया जाए। सरकार क्षेत्रीय और राष्ट्रीय भाषा में कामकाज करनेवाली कंपनी को प्रोत्साहित कर सकती है। इसके आलावा सरकार क्षेत्रीय भाषाओं में ज्ञान के कई विषयों की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहन दे सकती है। हरेक भाषा में अनुवाद और मौलिक लेखन को प्रोत्साहित कर के सामग्री की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए बड़ी इच्छाशक्ति की आवश्यकता है जो हमारे नेतृत्व में नहीं दिखती।(जारी)

1 comment:

गुस्ताख़ said...

अंग्रेजी में वाम मोर्चे के लिए एक बात चल रही है। जाहिर है उसके पतन के संदर्भ में। वह है वाम में एक नए क्लास का उदय। द रिलेटिव ऑटोक्रेसी ऑफ़ द लीडरशिप.. इस नए क्लास ने वाम के नेतृत्व पर क़ब्जा कर लिया है और विचारधारा के बारे में इनकी पढाई डॉगमेटिक है। मैं मानता हूं कि दलित चिंतन में भी ऐसे ही स्वयंभू रेबिलियन का तबके ने नेतृत्व पर कब्जा कर लिया है । जिससे आम दलित बिलकुल भी जुडा नहीं है। भावनात्मक बातें करके और मुद्दे भड़का कर दलितों को असल लक्ष्य से दूर ले जाया जा रहा है।
पूछता हूं जिस देश में अंग्रेजी का अस्तित्व नहीं है वहां वंचित और कमजोर तबके का सामाजार्थिक विकास होता है या नहीं?