Tuesday, May 12, 2009

मायावती, अम्बेदकर, सेक्यूलरिज्म और बीजेपी

मायावती ने सत्ता हासिल करने के लिए जितनी भी कलाबाजियां खाईं हों लेकिन उनकी पार्टी अम्बेदकर के विचारों को ही पूरा करने का दंभ भरती है। कई लिखित साक्ष्यों से ये साबित हुआ है कि अम्बेदकर के मन में इस्लाम को लेकर कोई अच्छी धारणा नहीं थी। अम्बेदकर ने जब धर्म परिवर्तन का फैसला लिया तो उनको मनाने कई इसाई मिशनरियां, इस्लामिक और सिख धर्माचार्य भी पहुंचे थे लेकिन अम्बेदकर ने सबको ठुकरा कर बौद्ध धर्म चुना था। शायद अम्बेदकर के मन में ये बात थी कि जिन दलितों ने अतीत में इस्लाम, इसाई और सिख धर्म अपनाया था उनकी हालात जस की तस ही रही, समाजिक-आर्थिक रुप से उनमें कोई खास बदलाव नहीं आय़ा। अम्बेदकर की मुख्य लड़ाई हिंदू धर्म में भेदभाव को लेकर थी और वे दलितों को इस ढ़ांचे में सम्मानजनक स्थान दिलाना चाहते थे। जब एक हिंदू धर्माचार्य अम्बेदकर के पास हिंदू धर्म में ही बने रहने का आग्रह कर रहे थे तो अम्बेदकर ने उनसे कहा भी था कि क्या हिंदू समाज, शंकराचार्य के पद पर एक दलित को स्वीकार कर लेगा ?

कुल मिलाकर अम्बेदकर हिंदू समाज के आंतरिक सुधार को लेकर ज्यादा चिंतित थे। ये विचारधारा आरएसएस के विचारधारा से मेल खाती है लेकिन फर्क यह है कि आरएसएस सुधारों की क्रमिक प्रक्रिया में यकीन रखता है और इसके सुधार का मॉडल ऊपर से नीचे की ओर है जबकि अम्बेदकर इस क्रम को पलटना चाहते थे। दूसरी बात ये कि आरएसएस का विचार गैर-हिंदू सम्प्रदायों के विद्वेष पर टिका है, जिससे अम्बेदकर सहमत नहीं थे।

तो मायावती ऐसे स्कूल की छात्रा रही हैं जिसमें इस्लाम को लेकर कोई ज्यादा लगाव नहीं है। गौरतलब है कि मायावती या उनके मेंटर कांशीराम ने कभी भी हिंदू धर्म से अलग होने की बात नहीं की। कई विश्लेषकों का ये भी मानना है कि दलित जहां भी सशक्त होते हैं या उनमें सशक्तिकरण की भावना आती हैं वो हिंदुत्ववादियों के पाले में चले जाते हैं, उनका हिंदूकरण हो जाता है। इसका उदाहरण गुजरात और दूसरे कई जगहों के दंगे हैं जहां दलितों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया या उनका इस्तेमाल किया गया।

दूसरी बात ये कि हिंदुस्तान में सदियों से जो तबका सबसे गरीब और बंचित रहा है उनमें दलित और मुसलमानों की तादाद खासी है। कई बार दोनों वर्गों के आर्थिक हित भी टकराते हैं और उनमें विद्वेष पनपता है।
दूसरी अहम बात हाल की घटनाओं से ताल्लुक रखती है। पिछले सालों में जिस तरह राहुल गांधी ने दलितों को अपने पाले में लाने के लिए प्रयास किए हैं मायावती उससे सशंकित है। ये बात गौरकरने लायक है कि पूरे देश में जहा बीएसपी का ढ़ांचा नहीं है वहां दलित अभी भी कांग्रेस को वोट करता है। मायावती को लगता है कि अगर कांग्रेस फिर से सत्ता में आ गई तो वो सरकारी संसाधन के बल पर ऐसी-ऐसी योजनाएं बनाएगी जो दलितों को फिर से कांग्रेस की तरफ मोड़ सकती है। लालु-मुलायम, मुसलमानों के बारे में ये चोट बिहार-यूपी में सहला रहे हैं जब कांग्रेस ने केंद्र में रहकर अल्पसंख्यकों के लिए योजनाओं का पिटारा खोल दिया। दूसरी बात ये कि मुलायम सिंह यादव के फिर से कांग्रेस पाले में जाने की संभावना है, और मुलायम ने अपनी शर्त रख भी दी है कि जो भी सरकार मायावती को बर्खास्त करेगी वे उसी को समर्थन देंगे। कुलमिलाकर माया को खतरा, बीजेपी से नहीं-कांग्रेस से ज्यादा है।

ऐसी स्थिति में मायावती क्यों अपनी सियासी आत्महत्या चाहेंगी ? कांग्रेस और बीएसपी दोनो जानती है कि बीएसपी के विस्तार से अगर किसी को घाटा है तो वो कांग्रेस ही है। ऐसे में मायावती पहले अपनी जान बचाना पसंद करेंगी क्योंकि वो जानती हैं कि अगर फिर से कांग्रेस सत्ता में आई तो वो सीबीआई के चंगुल से नहीं बच पाएंगी।

ऐसे में मायावती का सेक्यूलर होना कोई मायने रखता है ? उनके वरुण गांधी पर रासुका लगाने को जो लोग उसके सेक्यूलर हृदय से जोड़कर देखते हैं उन्हे ये समझनी चाहिए कि मायावती बीजेपी के सहयोग से ही यूपी की तीन बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं।

2 comments:

अक्षत विचार said...

बहुत ही अच्छा और सूक्ष्म विश्लेषण 16 तारीख के बाद की राजनीतिक जोड़तोड़ पर आपकी बारीक पकड़ दीखती हैं साधुवाद

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मौका लगा तो बीजेपी ही कांग्रेस और कम्युनिस्टों को रोकने के लिए मायावती को प्रधानमंत्री बनाने से न चूकेगी।