Sunday, July 4, 2010

बी हैप्पी...बी पोजिटिव...

क्या आपने कभी महसूस किया है कि अचानक कोई आता है और आपका चेहरा खिल उठता है, जबकि कुछ लोगों के आते ही आप नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं ! कई बार तो ऐसा होता है कि कई लोगों के जिक्र भर करने से, आप अपने आप को खिला हुआ महसूस करते हैं भले ही आप उससे न मिले हों! अध्यात्म और मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो कुछ लोग पोजिटिव इनर्जी लेकर आते हैं और आपको एक पोजिटिव फीलींग से भर देते हैं जबिकि दूसरी तरफ कुछ लोग हमेशा निगेटिव इनर्जी ही छोड़ते रहते है। वे हमेशा दुख ही बांटते रहते हैं और सामने वाले को भी दुखी कर जाते हैं। दरअसल, निगेटिव इनर्जी बांटने वाले को लोग पसंद नहीं करते और उनसे बचना भी चाहिए। वे दुनिया की ऐसी भयावह तस्वीर आपके सामने खींचते हैं कि आपका आत्मविश्वास तो कमजोर होता ही है साथ ही आप भी निगेटिविटी से भर जाते हैं। ऐसे लोगों को लोग पसंद नहीं करते हैं और उनसे कन्नी काटने की कोशिश करते हैं।

अपने आसपास रहने वाले ऐसे लोगों को आप आसानी से पहचान सकते हैं। आप उनके कुछ बयानों पर महज गौर करते रहिए। मेरा टाईम ही खराब है... मैं ये नहीं कर सकता...ये कैसे हो सकता है...पूरी दुनिया स्वार्थी हो गई है...ये कुछ ऐसे बयान है जो बताते हैं कि सामने वाले की सोच कैसी है। ऐसे लोग अक्सर निंदा पुराण में भी खासी दिलचस्पी रखते हैं। इसको जानने का दूसरा तरीका ये भी है आप ये गौर करिये कि सामने वाला बंदा जिन-जिन लोगों का जिक्र कर रहा है वो उसके कैरेक्टर के किन पहलूओं को उजागर कर रहा है। अक्सर ऐसा होता है कि कुछ लोगों को दुनिया के किसी भी इंसान में कोई अच्छाई नहीं दिखाई देती। ऐसे लोगों से भी बचने की जरुरत है।
दरअसल, ये दुनिया अच्छाई और बुराई का मिला-जुला रुप है। पोजिटिव सोच वाले लोग अक्सर लोगों की अच्छाईयों की बात करते हैं, वे उनमें कुछ सीखने लायक चीज खोजते हैं। जबकि निगेटिव सोच वाले लोग अपने दिमाग का पोजिटिव रिशेप्टर ही बंद करके रखते हैं।

दरअसल, पोजिटिव इनर्जी वाला इंसान ही लीडरशिप एबलिटी पाल सकता है। वो उम्मीदें जगाता है, सपने दिखाता है और उसे पूरा करने का रोडमैप तैयार करता है। ऐसा ही इंसान टैलेंट को पहचान सकता है और उसे बढ़ावा भी दे सकता है। लेकिन यहां एक सवाल ये भी है कि मान लीजिए कोई निगेटिव इनर्जी से भर ही गया है तो क्या किया जाए ?

निगेटिविटी के कई कारण हो सकते हैं। व्यक्ति विशेष का पारिवारिक-सामाजिक माहौल, उसकी अपब्रिंगिग और उसको मिलने वाला गाईडेंस का इसमें रोल तो होता ही है, लेकिन उससे भी बड़ा रोल होता है उसे अपने जिंदगी में मिलने वाली नाकामयाबियों का।

अक्सर नाकामयाबी को लोग एक चुनौती की तरह नहीं लेते-वे उसे जिंदगी का अंत मान लेते हैं। दरअसल, ये दुनिया हमारी बदौलत नहीं चलती, हां हम उसे थोड़ा बेहतर बनाने में अपना योगदान जरुर दे सकते हैं। निगेटिविटी से भरे लोगों को चाहिए की वे हमेशा इनगेज रहें। खालीपान, निगेटिव उर्जा को और भी ज्यादा बढ़ाता है। निगेटिविटी से भरे लोग समाज से कटने लगते हैं, उन्हे लगता है कि उनके पास बांटने को कुछ भी नहीं है। जबकि ऐसे वक्त लोगों को नए-नए लोगों से मेलजोल की सबसे ज्यादा जरुरत होती है।
ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलने और बात करने पर कई तरह के अनुभव, विचार और मौके सामने आते हैं। सच्चाई तो ये है कि कोई काम तभी हो पाता है जब दो आदमी मिलते हैं। ऑनलाईन या टेलीफोनिक मीटींग्स से ज्यादा जरुरी वन-टू वन मीटिंग होता है क्योंकि तभी लोग आपकी पूरी परसनाईल्टी से वाकिफ हो पाते हैं।
इसके अलावा, दुनिया के कामयाब लोगों की बायोग्राफीज भी निगेटिव उर्जा से मुक्त होने में मददगार साबित होती है जिन्होंने खाक से उठकर आसमान को छुआ है। परिवार के लोगों और दोस्तों का प्रोत्साहन ऐसी दशा में बहुत मददगार साबित होता है।

तो चलिए, हम आज ही तय करें कि अपने को पोजिटिव इनर्जी से भरपूर बना लें। अगर हमें सुबह-सुबह चिड़ियों की चहचहाहट, खेतों में काम करते किसानों की मुस्कुराहट और मेहनतकश लोगों के चेहरों में कोई उम्मीद नजर आती है तो यकीन मानिए कि हम पोजिटिव इनर्जी से लवरेज हैं। बस हमें करना ये है कि इस पोजिटिव इनर्जी को बांटने में कोई कंजूसी नहीं करनी है। फिर देखिए जिंदगी किस तरह आगे बढ़कर आपका हाथ थाम लेती है!

(यह लेख आई नेक्स्ट में छप चुका है)

5 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत सार्थक पोस्ट..अमल में लाने योग्य!!

pratibha said...

अच्छा...?

Krishna Kumar Mishra said...

सुन्दर व उत्साह वर्धक शब्दावली! भाई आप को ऐसे ही लिखते रहने के लिए मेरी शुभकामनायें

गुस्ताख़ मंजीत said...

राजनैतिक चिंतक अब मनोवैज्ञानिक भी बना..बधाई

sumanji said...

amal karna jaroori hai