Thursday, June 5, 2008

चावला सर...और जनसंचार संस्थान

जिंदगी में कुछ हसीन लम्हे होते हैं..जिसे शायद कोई भी भूलना नहीं चाहता। इसी तरह जिंदगी में कुछ लोग भी होते हैं जिन्हे आप कभी नहीं भूलते। उनकी याद, तनाव भरे लम्हों में भी राहत देती है। शायद चावला सर ऐसी ही शख्सियत हैं जो हमारे संस्थान की पीढ़ियों को ताउम्र याद रहेंगे।मैने कहंीं एसआरसीसी के किसी प्रोफेसर के बारे में(अभी नाम भूल गया हूं) ऐसा ही पढ़ा था कि खाली वक्त में वो अपने लैपटॉप पर किसी पार्क में कॉलेज के बच्चों का सीवी टाईप करते हुए परम आनंद का अनुभव करते हैं। चावला सर भारतीय जनसंचार संस्थान के उन कर्मचारियों की नुमांइदगी करते हैं जिनके लिए संस्थान ही सब कुछ है..और छात्र बिल्कुल अपने बच्चे सरीखे।जब मैंने आईआईएमसी में दाखिला लिया था तो पहली बार चावला सर से डाक्यूमेंट जमा करबाते वक्त मुलाकात हुई। अंदर एक हिचक थी जो चावला सर के पहले ही संवोधन से छू मंतर हो गई। धीरे-धीरे चावला सर का मतलब एक आश्वासन हो गया। इस महानगर में हजारों किलोमीटर दूर से आए हुए बच्चों के लिए वो पहले ही दिन अपने हो गए।बैंक में एकांउट खुलबाना हो या कोई डाक्यूमेंट एटेस्ट करबाना..चावला सर हर मर्ज की दबा थे। उन्हे ये भी चिंता रहती थी कि उत्तर बिहार में बाढ़ की वजह से डाक वक्त पर नहीं पहुंच पाएगी और बच्चे दाखिला लेने से वंचित रह जाएंगे। बस चावला सर दिनरात फोन पर चिपके रहते..और एक-एक कर सारे बच्चों को फोन पर बता कर ही दम लेते।चावला सर के शख्सियत का बखान करने के लिए शव्द कम पड़ जाते हैं। आज संस्थान से निकलने के तीन साल बाद जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो ये कहना मुश्किल है कि खुशी के उन लम्हों में किसका योगदान ज्यादा था। संस्थान के शिक्षकों से कतई कम चावला सर नहीं थे। चावला सर तो हमें ये भी बताते थे कि नौकरी की संभावना कहां ज्यादा है और हमें किससे संपर्क करना चाहिए।चावला सर के पास अक्सर पास आउट हुए लड़कों के शादी का कार्ड पड़ा रहता। वो मास कॉम के कई जोड़ो की शादी के गवाह थे।मुझे वो लम्हा याद है जब पिछले साल एल्यूमिनाई मीट में दीपक चौरसिया ने चावला सर को शॉल पहना कर सम्मानित किया था। और मजे की बात ये थी कि दीपक अपने व्यस्त प्रोग्राम में से सिर्फ चावला सर के कहने पर ही संस्थान में बरसों बाद आए थे। राजीव ने पिछले दिनों फोन पर बताया कि चावला सर का फोन आया था और वो उसका हालचाल पूछ रहे थे । बाद में चावला सर ने मिलने के लिए भी बुलाया था। सच कहूं तो मैं जलभुन गया था कि चावला सर ने सिर्फ उसे ही क्यों फोन किया...ये बात कुछ ऐसी ही है जैसे दो बच्चे अपने मां-बाप का प्यार पाने के लिए लड़ते हैं। राजीव के पिताजी उस दिन आईआईएमसी गए थे तो चावला सर के साथ बड़े अपनेपन के माहौल में चाय-ठंडा का दौर चला था।चावला सर ने कहा था कि मेरी नौकरी अभी 18 साल बाकी है..तुम लोग अपने कागजात के लिए 18 साल तक मुझ पर भरोसा कर सकते हो।दरअसल चावला सर वन मेन आर्मी थे। आईआईएमसी के प्रशासनिक विभाग का मतलब ही हमारे लिए चावला सर थे।आईआईएमसी के दिनों में मुझे गुटखा खाने की आदत पड़ गई थी और हमारे सेमेस्टर का इम्तिहान चल रहा था। मिनी ऑडिटोरियम में हमें बैठाया गया था। आईआईआईएमसी का ऑडिटोरियम जिसे मंच कहा जाता है, वो तो भव्य है ही, मिनी ऑडिटोरियम भी काफी भव्य है। मैंने गुटखा चुपके से उसकी कालीन पर फेंक दिया। मैं पीछे वाली कतार में था। मास कॉम का एक और वफादार स्टाफ था गोपाल..(पता नहीं वो अभी है भी कि नहीं...गोपाल नेपाल का रहने वाला था और संस्थान का केयर टेकर था... संस्थान की सारी खूबसूरती, साफ सफाई और सैकड़ो तरह के फूल उसी आदमी के बदौलत थे) किसी तरह गोपाल को इस बात की भनक लग गई और वह वहां पहुंच गया।मैंने आनन फानन में अपने रोल नंबर की पर्ची उस जगह से हटाई और दूसरे जगह पर बैठ गया। गोपाल ने चावला सर को बुला लिया। चावला सर ने बड़े प्यार से हमें समझाया कि बेटे ये संस्थान आपका ही है...और आपके ही टैक्स से इसका खर्च चलता है। यहां िवदेशी भी आते हैं..वे क्या कहेंगे। इस घटना से मुझे इतनी ग्लानि हुई कि मैंने गुटका खाना छोड़ दिया(ये अलग बात है कि मुई आदत फिर से दबे पांव वापस आ गई और बहुत हाल में एक लड़की के कहने पर छूटी है)..इस तरह चावला सर की न जाने कितनी ही यादें हैं..जिनका तफसील में जिक्र शायद ब्लाग जैसे मीडियम को रास नहीं आएगा।
चावला सर का पूरा नाम मैं आज भी नहीं जानता...और शायद उनका व्यक्तित्व किसी नाम का मोहताज भी नहीं... चावला सर जैसे लोग उन घड़ियों में और भी याद आते हैं...जब हम मेंटल अलूफनेस से संघर्ष कर रहे होते हैं....यहां भी हमें ये किसी तकलीफ से बच निकलने में मदद करते हैं....क्योकि चावला सर हमारी यादों में पूरे आवेग से ...आते हैं ...हल्का अहसास कराते हैं.....परिस्थतियों में अकेले फंसे पा हमारे दिमाग का अचेतन हिस्सा उन्हे खोजते हुए आईआईएमसी पहुंच ही जाता है.....और फिर सामने चावला सर खड़े होते हैं...
(इस लेख को संपादन में मुझे मेरे इंडिया न्यूज के सहकर्मी महेंद्र सिंह यादव का कीमती सहयोग मिला...शायद ऐसे लोग आपको हर जगह मिल ही जाते हैं।)

8 comments:

poemsnpuja said...

chawla sir ki yaad to sabko aati hai, koi bhi problem lekar unke paas jao wo koi na koi raasta jaroor bata dete the. aur baat cheet mein itna apnapan ki itne sare students mein bhi har ek ka naam yaad rahta unhein. aaj iimc ki yaadein taaza ho gayi padh kar. chawla sir pe likhne ke liye thanks.
puja upadhyay

राजीव कुमार said...

प्रिय सुशांत जी,
चावला सर का संस्थान में होना कितनी ही च़ीजों को आसान बना गई थी। फिर चाहे स्कालरशिप हो या मार्कशीट। मेरा तो ग्रेजुएशन का डिग्री भी पटना में छूट गया था। लेकिन फिर भी एडमिशन लेने में कोई भी परेशानी नहीं हुई। चावला सर ने मुझे किसी बहुत जरूरी जिम्मेवारी सौपने के लिए फ़ोन किया था। वो आपको भी, बल्कि सबको एक समान प्यार करते हैं। एक माँ की तरह। जलने-भुनने की कोई ज़रूरत नहीं है। दूसरी बात यह कि गुटखा की तरह आपको ब और व में अंतर करने की आदत भी दुरुस्त कर लेनी चाहिए। इस संबंध में मेरा यह पांचवी बार रिक्वेस्ट है।

आपका -

राजीव कुमार
उम्र - 27 साल
कद - 5'8"
रंग - सांवला
शिक्षा - पोस्ट ग्रेजुएट
पता - आपके दिल में

sushant jha said...

Thanks Puja...perhaps u r same na..who had improved the grammatical mistake of my first post..Thanks agn.

sushant jha said...

राजीव, मैं आपकी सलाह याद रखूंगा।

सुबोध said...

यादों से यादें जुड़ती है सुशांत जी...आपकी याद के बहाने हमें अपने कुमुद नागर जी याद आ गए.. अब वो दुनिया में नहीं हैं... उनकी जीवटता गजब की थी...कभी राधे से पूछियेगा...अमृतलाल नागर के पुत्र थे...उनकी यादों को संजोने का इरादा है..अच्छा लगा आपको पढ़कर

dheeraj said...

Sushant,
achha laga Chawla jee ke bare me padhkar, beshak IIMC me wo ek aise shakhs the, jo sabhi ki madad ke liye hamesha maujood hote the. 3 saal ke dauran humne unhe kai baar apni baton ka subject to banaya hai,lekin aaj unke bare me padhkar ek bar unse milne ki ichchha hone lagi hai.jab kabhi Delhi aana hoga, main unse jaroor milne ki koshish karoonga

Dileep pandey said...

चावला सर मुझे भी बहुत याद आते हैं

chup kyun ho said...

sushant jee
aaj achanak hi aapka blog padha.......aur chawla sir ki yaad aa gaye.....chawla sir jaise log yadi sansthan mein rahen to koi bhi vidyarthi yadi bahar se delhi padhne aaye .to use sansthan kabhi ajnabi nahi lagta......