Tuesday, January 24, 2012

कोसी(पुल) कथा-1

पिछले महीना गांव गया तो कोसी पुल देखने चला गया। बहुत दिनों से मन में इच्छा थी कि कोसी पुल को देखा जाए, कोसी नदी को देखा जाए। सो इस बार गांव जाते ही एक दोस्त के साथ बाईक पर सबार हुआ और चला निर्मली की तरफ... जहां कोसी पर महासेतु का निर्माण किया गया है।

निर्मली में जहां कोसी महासेतु है, वो जगह मेरे गांव खोजपुर(मधुबनी) से करीब 45 किलोमीटर पूरब है। सड़कें अच्छी हो गई है। मेरे गांव से खुटौना 7 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है और वहां से फुलपरास करीब 18 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व । फुलपरास में हमें एनएच 57 मिल जाती है जो ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर का हिस्सा है। ये सड़क चार लेन की है जो गुजरात से मिजोरम तक जाती है। पोरबंदर से शुरु होकर यह सड़क, राजकोट, कांडला, उदयपुर, कोटा, झांसी, कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर होते हुए गोपालगंज में बिहार में प्रवेश करती है। फिर मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी होते हुए सुपौल, अरड़िया, पुर्णिया चली जाती है। फिर वहां से बंगाल, असम और मिजोरम। ऐसी सड़क इससे पहले बिहार में सिर्फ जीटी रोड थी जो स्वर्णिम चतुर्भुज का हिस्सा है और गया के पास से गुजरती है। अब तो बिहार में कई जगह चार लेन की सड़के बन रही है।

तो हम बात कर रहे थे
कोसी महासेतु की। हम सुबह करीब 10 बजे चले थे। पुराना वक्त होता तो हम जाने की हिम्मत नहीं कर पाते। एक तो पहले सड़कें खराब थी और फिर उस इलाके को कोसिकंधा बोलते थे। पता नहीं कब क्या हो जाए। कोसिकंधा अपने आप में नकारात्मक भाव छुपाए रखता था, कोसी ने इलाके को तबाह कर दिया था। फिर भी लोग कोसी को महारानी या मैइया बोलते! शायद इसका कारण भय रहा हो, या नदियों के प्रति हमारी श्रद्धा! लेकिन अब माहौल दूसरा था। हम फुलपरास में रुके, वहां पान खाया, बाईक में तेल डलवाया और फिर रवाना हुए निर्मली की तरफ।
चार लेन की सड़क पर थे। निर्मली महज 20 किलोमीटर दूर थी, यानी बीस मिनट का सफर था। ये बाढ़ का इलाका है, कोसी की कई सहायक नदियां इधर से बहती हैं। भुतही बलान, तिलयुगा, सुगरवे और न जाने क्या-क्या। इन नदियों का नाम मैं बचपन से सुनता आ रहा था, लेकिन इस इलाके
में जाना पहली बार हो रहा था। सड़क जमीन से काफी ऊपर बनी है। शायद ऐसा इसलिए कि बाढ़ का पानी उस पर चढ़ न जाए। हरेक किलोमीटर-दो किलोमीटर पर पानी के बहाव के लिए साईफन बनाया गया है। हरेक नदी-नाले के ऊपर भीमकाय पुल बनाया गया है। हम हरेक पुल पर उतर कर वहां से नीचे पानी के बहाव को देखते। ये बरसाती नदियां हिमालय से नेपाल की तरफ से आती हैं। ये नदियां कभी बाढ़ के लिए कुख्यात रही हैं, इतनी कुख्यात की लोगों ने इनका नाम भुतही, सुगरवे न जाने क्या-क्या रख दिया!

फुलपरास से आगे(पूरब) भुतही बलान है, फिर नरहिया गांव और उसके पूरब कोसी। यानी नरहिया, भुतही और कोसी के बीच में है। बुजुर्गों का कहना है कि नरहिया पहले बाजार हुआ करता था। लेकिन पश्चिम से भुतही ने और पूरब से कोसी ने उसे काटना शुरु कर दिया। नरहिया बाजार उजड़ गया। ये सन् 50 के दशक की बात होगी। नरहिया के व्यापारी आस-पड़ोस के गांवों-कस्बों में पलायन कर गए। नरहिया से पूरब और भी ऐसे कई गांव थे जो अब कोसी के पेट में समा चुके हैं। उनका नामो-निशान इस दुनिया से मिट चुका है। वहां के लोग प्रवासियों की तरह दिल्ली-मुम्बई और पटना-सहरसा में रह रहे हैं। बहरहाल ये कहानी आगे।

नरहिया से आगे गए तो तिलयुगा घार( ये बरसाती नदी भी नेपाल की तरफ से आती है, जो फिर कोसी में ही मिल जाती है) मिला, फिर कोसी का पुराना पश्चिमी तटबंध। वो तटबंध कोसी के पश्चिमी किनारे पर बनाई गई थी और नेपाल की तरफ से आती है। उस पर पक्की सड़क बन रही थी। बिहार सरकार तन्मयता से सड़क निर्माण कार्य में जुटी हुई थी। उसके बाद कोसी का मूल इलाका शुरु होता है। यानी वो इलाका जो नदी का पाट नहीं था लेकिन जब नदी में पानी आती थी तो वहां तक का कम से कम पूरा हिस्सा जलाप्लावित हो जाता था। ऐसा ही तटबंध कोसी के पूर्वी तट पर भी बनाया गया था। यानी कोसी का पाट मान लीजिए 4-5 किलोमीटर चौड़ा होगा तो दोनो तटबंधों के बीच का इलाका कम से कम 15 किलोमीटर चौड़ा होगा। यानी ये इलाका कोसी के रहमोकरम पर था। इसमें कई गांव थे, हैं, जो बाढ़ के वक्त प्रकृति के रहमोकरम पर जिंदा रहते हैं। यों, इस वजह से यहां की आबादी बिरल है।

बहरहाल, हम पश्चिमी तटबंध के नजदीक एक पान की दुकान पर रुके। महासेतु की दूरी पूछी तो पता चला कि महज 5 किलोमीटर है। हाईवे पर खूबसूरत साईनबोर्ड चमक रहे थे...पूर्णिया 140 किलोमीटर, फारबिसगंज 80 किलोमीटर, गोहाटी 700 किलोमीटर...! यकीन नहीं हो रहा था कि यहां से पूर्णिया मात्र तीन घंटे की दूरी पर है...और फारबिसगंज मात्र सवा घंटे में...! रेणु के उपन्यास का पुरनियां...फारबिसगंज....मैलां आंचल का इलाका...!


रास्ते में हाईवे पर कई मरे हुए जानवर मिले। खासकर गीदड़ और कुत्ते। एक जगह कुछ भेड़ भी मरे हुए मिले। लोगों ने बताया कि हाईवे पर इतनी तेज रफ्तार से गाड़िया चलने लगी है कि बहुत जानवर मरते हैं। भेड़हरों(गड़ड़िये) के एक समूह से बात हुई, उसने कहा कि वो सुपौल की तरफ से आया है। उसने पूछा कि बाबू आपकी तरफ भी हमारी जाति के लोग हैं क्या..?
ज्यों-ज्यों कोसी के नजदीक जाता गया, आबादी बिरल होने लगी। मीलों तक निर्जन जमीन...उजाड़ सी धरती। नीची जमीन...लो लैंड..नदी के किनारें कई किलोमीटर तक बालू ही बालू...। अतीत में आई बाढ़ की विभिषिका ने मानों जीवन को लील लिया था।

आखिरकार हम कोसी महासेतु के नजदीक पहुंच गए। पुल से पहले हाईवे टॉल प्लाजा बनाया जा रहा था। उसका रंग-रोगन किया जा रहा था। पूछने पर पता चला कि 6 फरवरी को पुल का उद्घाटन होनेवाला है। प्रधानमंत्री आएंगे।

हमने बीच पुल पर अपनी बाईक खड़ी की। हमारा दिल धड़क रहा था। हम उस नदी को गौर से देखना चाहते थे जो उत्तर-बिहार का शोक कही जाती थी। जिसने मिथिला को भौगोलिक रूप से दो भागों में बांट दिया था। ऐसा लग रहा था मानो भारत-पाकिस्तान बन गया हो। मधुबनी-दरभंगा एक तरफ और सहरसा-पूर्णिया एक तरफ। हम पुल के उस पार यानी नदी से पूरब की तरफ कुछ दूर गए। हमने पूरब के आसमान को ताका। दूर क्षितिज पर कुछ पंछी उड़ रहे थे। शायद वे पुर्णिया की तरफ से आ रहे थे...! (जारी)

7 comments:

MapmyIndia said...

Bahut hi badhiya aur orignal post. padhte samay aisa mehsoos ho raha tha ki khud hi dekh raha hu. Part II kab post kar rahe hai bhaiya.

Saurabh Paramjyoti

sushant jha said...

कोसी और कोसी इलाके से जुड़ी हुई बहुत सी यादें हैं सौरभजी। सबको समेट रहा हूं। जल्दी ही दूसरा पोस्ट भी डालूंगा। उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।

केवल राम : said...

इतिहास और भूगोल को समेटे आपकी यह पोस्ट निर्मली के बारे में बेहतर जानकारी हम सबके साथ सांझा कर रही है .....

गिरीन्द्र नाथ झा said...

सुशांत भाय,अच्छा लगा पढ़कर और सबसे अच्छा यह लगा कि यह जारी रहेगा, खेप दर खेप। हमारे लिए तो यह पुल वरदान है क्योंकि इसी पुल के जरिए मेरी कथा इस पार से उस पार का चक्कर लगाएगी। हम पुल के जरिए आपके समाजशास्त्रीय, लोकरंजन और लोगबाग की बानगी भी देखना चाहेंगे। आशा है कोसी की उन्मुक्ता की तरह ही महासेतु की कहानी आप जारी रखेंगे।
शुक्रिया
आपका
गिरीन्द्र

ASH said...

सुशांत जी. बैठे बैठे कोसी महासेतु का दर्शन कराने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. इस पुल पर हम सबकी नहीं पूरे देश की निगाहें हैं. मेरे सगे संबंधी भी कोसी पार अररिया, सहरसा, पुर्णिया में हैं. ये महासेतु मिथिला और कोसी को ही नहीं बल्कि दो दिलों को भी जोड़ रहा है. इस बार दरभंगा गया तो इस महासेतु को पार कर इसे करीब से महसूस करूंगा.

Pratibha Katiyar said...

Badhiya!

Manjit Thakur said...

भाई, तुम्हारे तथ्यपरक लेखन केतो हम कायल थे ही..अब तुम्हारी शैली भी मनमोहक हो चली है। क्या शानदार लिखते हो यार, मजा आगया। भाई ऐसा लगा मैं खुद उस इलाके में हूं...पढने का मौका बहुत दिनों के बाद मिला. लेकिन तुमने सारे गिल-शिकवे दूर कर दिेए।