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ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्रालय में पहली बार खुफियागिरी की गई है। बड़े कॉरपोरेट हाउस, दलाल, टेंडर माफिया पहले भी वहां से गुप्त सूचनाएं हासिल करते थे लेकिन वो खुफियागिरी नहीं बल्कि मिलीभगत होती थी। कहते हैं कि 'घोषित तौर पर' देश का सबसे अमीर अंबानी परिवार इन्ही कुछ वजहों से इतनी लंबी छलांगे मार पाया। लेकिन देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी वित्तमंत्री ने अपने कार्यालय में 'सेंध' लगाने की घटना को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया हो। मजे की बात ये भी कि उसकी जांच निजी जासूसों से भी करवाई गई। बकौल वित्तमंत्री, उन्होंने सितंबर में ही प्रधानमंत्री को इस बावत चिट्ठी लिखी थी और आईबी ने इसकी जांच की थी जिसमें उसने 'कुछ नहीं' पाया था। फिर निजी जासूसों से जांच करवाई गई और जांच अपने विभिन्न चरण में है।
मीडिया अभी तक यहीं सवाल पूछ रहा है कि इस मामले की निजी जासूसों से जांच करवाने की क्या जरुरत थी और मुखर्जी ने गृहमंत्रालय में शिकायत न करके सीधे प्रधानमंत्री से ये बात क्यों कही। ये कहा जा रहा है कि मुखर्जी के चिदंबरम् से गंभीर मतभेद है ! ये बातें इस आधार पर की जा रही है कि मुखर्जी चाहते तो दिल्ली पुलिस, सीबीआई या फिर आईबी से जांच करवाते या फिर चिंदंबरम् से शिकायत करते। लेकिन जो सवाल मीडिया नहीं पूछ पा रहा है वो ये कि क्या वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, राजीव गांधी के कार्यकाल में वित्तमंत्री रहे वी पी सिंह की राह पर अग्रसर हैं? और क्या उनकी जांच 10 जनपथ ने करवाई है? क्या कांग्रेस आलाकमान को ये एहसास हो गया था कि वे ब्लैक मनी की सूचनाओं का इस्तेमाल उसी तरह कर सकते हैं जिस तरह वी पी सिंह ने बोफोर्स घोटाले का किया था?
हाल ही में दिग्विजय सिंह ने बयान दिया था कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए 'बिल्कुल' तैयार है ! जाहिर सी बात है कि ये बयान मनमोहन सिंह के खिलाफ तो नहीं ही था। सो मनमोहन सिंह को इसका दुख भी नहीं हुआ क्योंकि वे जानते हैं कि जिस दिन से वे प्रधानमंत्री बने हैं उसी दिन से राहुल गांधी तैयारी कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह का बयान दरअसल प्रणब मुखर्जी के खिलाफ था जो सन् 1984 से इस पद के दावेदार हैं। मौजूदा भ्रष्टाचार के आलम में सरकार का सबसे मजबूत चेहरा प्रणब मुखर्जी ही हैं जिसका अपराध यहीं है कि उनमें राजनीतिक काबिलियत कूट-कूट कर भरी हैं और वे राजनीतिक पृष्ठभूमि के रहे हैं। नेहरु परिवार अब वो जोखिम मोल नहीं ले सकता जो उसने सन् 1991 में नरसिंह राव के लिए रास्ता खालीकर लिया था।
सत्ता-सुरंग में आवाजाही करनेवाले कई लोग ये भी कहते हैं कि बाबा रामदेव के अनशन पर 'पुलिसिया आक्रमण' में भी प्रणब मुखर्जी को भरोसे में नहीं लिया गया। ये सब चिदंबरम्( जो वैसे भी दिल्ली पुलिस के सुपर-मुखिया हैं) और 10, जनपथ के इशारे पर किया गया ताकि मामला इतना तूल न पकड़ ले कि उसकी लपट में 10,जनपथ तक आ जाए। प्रणब मुखर्जी अपने बयान में कह चुके हैं कि उन्हें ब्लैक मनी जमा करनेवाले लोगों के बारे में मालूम है लेकिन कानून और 'परंपराओं' के तहत उनके हाथ 'बंधे' हुए हैं।
देखा जाए, तो मुखर्जी को अपनी जिंदगी में वो सब हासिल हो चुका है जिसकी आकांक्षा एक औसत कांग्रेसी राजनेता को होती है। हां, अभी तक उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं मिली है। लेकिन कांग्रेस में भी ऐसे महात्वाकांक्षी नेताओं की लंबी लिस्ट रही है जिन्होंने नेहरु राजवंश से दो-दो हाथ किए हैं और लड़-झगड़कर एक-आध साल के लिए ही सही प्रधानमंत्री जरुर बने है। मोरारजी देसाई और वी पी सिंह ऐसे ही उदाहरण रहे हैं।
लेकिन सवाल ये है कि क्या प्रणब मुखर्जी, वी पी सिंह की तरह कांग्रेस छोड़कर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व कर सकते हैं या उनमें ये मा्द्दा है? सपाट तौर पर इसका जवाब ना में है। वे लड़ाकू राजनेता और व्यापक जनाधार वाले नहीं है,उन्होंने हमेशा टेबुल की पॉलिटिक्स की है। लेकिन कांग्रेस के अंदर रहकर ही वे अपने नाम पर मुहर लगवाने का ख्वाब जरुर पाल सकते हैं या पालते रहे हैं। इसकी बानगी उनके कई बयानों में देखने को मिलती है, मसलन जब हाल ही में उनसे उनके बेटा को टिकट मिलने के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि टिकट पर किसी का कोई नैतिक दावा नहीं हो सकता, मैं भी सन् 1984 में 'वरिष्टतम' कैबिनेट मंत्री था।
कांग्रेस जिस विश्वासहीनता के भंवर में फंसी दिखती है उसमें मुखर्जी के लिए इससे मुफीद वक्त कोई नहीं हो सकता। उन्हें कांग्रेस छोड़कर जाने या बिगुल फूंकने की कोई जरुरत नहीं है, न ही इसका उन्हें फायदा ही होगा। एक 'ढ़ीलीढ़ाली' और 'नेतृत्व-विहीन' सरकार में उनके सामने प्रधानमंत्री बनने के भरपूर अवसर है सिवाय नेहरु परिवार रुपी रोड़े के। तो क्या प्रणब मुखर्जी कुछ ऐसा करनेवाले थे जिससे नेहरु परिवार की बड़े पैमाने पर बदनामी होती? यही् वो सवाल है जिसमें ये राज छुपा है कि वित्तमंत्रालय की खुफियागिरी कौन कर रहा था।
बहरहाल, बुढ़ापा भी जोखिम उठाने के लिए बुरा वक्त नहीं माना जाता खासकर तब जब दाव ऊंचे लगे हों।
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