Sunday, February 5, 2012

कोसी (पुल) कथा-4

कोसी पुल तक जाने के लिए हम फुलपरास से होकर गए थे जो कोसी से करीब 20 किलोमीटर पश्चिम है। इसका जिक्र हमने पहले भी किया है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है फुलपरास का नाम पलाश से पड़ा है। कहते हैं कि यहां कभी पलाश के पेड़ों का घना जंगल था। पिताजी बताते हैं कि उनके बचपने तक पलाश के जंगल तो गायब हो चुके थे लेकिन करीब सौ साल पहले तक फुलपरास से लेकर उत्तर में हिमालय की तलहटी तक(नेपाल में) वनों की एक श्रृंखला फैली हुई थी जिसमें हिंसक जानवर बिचरते थे ! ऐसा ही मेरे गांव से एक किलोमीटर दक्षिण बलिराजगढ़ के किले में भी था। वहां भी घने जंगल थे। यानी बहुत दिन नहीं हुए जब हमारे इलाके में भी घने जंगल थे, जानवर थे। आज उनका नामोनिशान नहीं मिलता।

पिछले सौ सालों में सारे जंगल खेत में तब्दील हो चुके हैं और नदियां कुछ ज्यादा ही उफनने लगी हैं। ये वहीं इलाके हैं जहां हर दस-बीस किलोमीटर के बाद कोई न कोई नदी हिमालय से निकलकर गंगा की तरफ आती है और अब तो कुछ ज्यादा ही गुस्से में आने लगी है। जंगलों के गायब होने का ये स्वभाविक नतीजा है। पहले जंगलों की वजह से पहाड़ से पानी धीरे-धीरे मैदान में उतरता था। लेकिन अब वो सुरक्षा कवच गायब हो चुका है।

बहरहाल, फुलपरास में पलाश के जंगल थे, तो क्या पहले पलाश के पेड़ इस इलाके में बहुतायत से पाए जाते थे? पलाश से पलासी याद आती है जहां हुई एक लड़ाई ने भारतीय इतिहास की धारा बदलकर रख दी थी। लेकिन हमारा फुलपरास भी कुछ कम नहीं। इसने भी बिहार की राजनीतिक धारा को अपने तरीके से प्रभावित किया है। राजनीतिक रूप से अति-जागरुक यह क्षेत्र बिहार में समाजवादियों का गढ़ रहा है। कद्दावर समाजवादी नेता और एक तरह से लालू-नीतीश-पासवान के राजनीतिक गुरु कर्पूरी ठाकुर जब निर्णयात्मक रूप से दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तो फुलपरास ने ही उन्हें चुनकर विधानसभा पहुंचाया था। कर्पूरी उस समय सांसद थे और फुलपरास के तत्कालीन विधायक देवेंद्र प्रसाद यादव(जो बाद में कई बार सांसद और केंद्रीय मंत्री भी बने। वे उस बार पहली दफा विधायक बने थे।) ने उनके लिए फुलपरास सीट से इस्तीफा दे दिया था। कहना न होगा कि बिहार के पिछड़ों-दलितों में राजनीतिक चेतना जगाने का जो काम कर्पूरी ठाकुर ने किया, वह भी एक कारण था कि नब्बे के दशक तक आते-आते पिछड़े दलित बिहार की राजनीति के केंद्रविंदु बन गए।

जिक्र देवेंद्र प्रसाद यादव का आया तो यहां एक बात लिखनी जरूरी है। दरभंगा-मधुबनी-सुपौल से होकर ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर और इसी वजह से कोसी पर सड़क पुल बनवाने की योजना में देंवेंद्र प्रसाद यादव का अहम योगदान था। वे उस समय झंझारपुर के सांसद थे। कहते हैं कि वाजपेयी सरकार जब ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर का खाका खींच रही थी तो कुछ राजनेता और नौकरशाह इसे मुजफ्फरपुर-बरौनी-खगड़िया से होकर ले जाना चाहते थे। लेकिन देवेंद्र यादव ने कई सांसदों का समर्थन जुटाकर और मजबूत तर्कों के आधार पर वाजपेयी सरकार को इस बात के लिए मनाया कि इलाके के पिछड़ेपन को देखते हुए ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर दरभंगा-मधुबनी-सुपौल से ही जाना चाहिए। और ऐसा ही हुआ। लेकिन इस हाईवे के लिए जो श्रेय देवेंद्र प्रसाद यादव को मिलना चाहिए था, वो उन्हें नसीब नहीं हुआ। लोगबाग सिर्फ वाजपेयी या नीतीश की चर्चा करते हैं देवेंद्र यादव की लोग चर्चा भी नहीं करते !

नदियों से अंटे पड़े इस इलाके का जिक्र हमने पहले भी किया है। सुगरवे, तिलयुगा और भुतही बलान का जिक्र हम कर चुके हैं। हाईवे जिधर से गुजरती है कोसी से पहले एक चौक का नाम ही भुतहा चौक है। पल-पल रंग बदलनेवाली नदियों और विनाशकारी बाढ़लानेवाली धाराओं के इलाके में ऐसे नाम होने अस्वभाविक नहीं हैं। यहां हम कलात्मक, सजे-धजे, और गढ़े हुए नामों की उम्मीद भी नहीं कर सकते। न ही किसी रजवाड़े, कुंअंर या जमींदार के नाम पर किसी खूबसूरत नगर या पुर की कल्पना !

हमने इससे पहले नरहिया बाजार का भी जिक्र किया था जिसे पूरब से कोसी ने और पश्चिम से भुतही बलान ने काटकर तबाह कर दिया था। वह बाजार इतिहास के अनलिखे अध्यायों में विलीन हो गया। नरहिया नामके पीछे भी एक दंतकथा है। कहते हैं कि इस जगह का नाम इतिहास में हुए किसी भीषण नरसंहार के नाम पर पड़ा है। किसी इलाकाई सरदार ने तत्कालीन शासक के खिलाफ बगावत की थी। पता नहीं वो बगावत दरभंगा महाराज के खिलाफ थी या उससे भी पहले के किसी शासक के खिलाफ। नरहिया से होकर कोसी पुल की तरफ जाते हुए बरबस ही वो लोककथा याद आ गई। मैं पुल की तरफ जाते हुए एक-एक गांव के बारे में जानना चाहता था जो नदियों की अठखेलियों के शिकार हो गए थे।(जारी)

2 comments:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

फटाफट पोस्ट पढ़ी, कोसी शब्द पढ़ते ही। पोस्ट के जरिए राजनीति भी समझी, जो जरुरी है। लेकिन जहां मैं सबसे करीब होता गया, सुशांत भाई, वह यह पंक्ति है- मैं पुल की तरफ जाते हुए एक-एक गांव के बारे में जानना चाहता था जो नदियों की अठखेलियों के शिकार हो गए थे...

Manjit Thakur said...

तुम्हारा लेख एक किताब की पृष्ठभूमि बन रहा है। एक छोटी किताब तो हो ही गई है। राजनीतिक कोण की चर्चा भी तुमने कर ही दी है। पलाश के जंगल फुलपरास में होंगे ही..क्योंकि दक्षिणी बिहार जो अब झारखंड है वहां पलाश के जंगल अब भी हैं। मैथिल ब्राह्मणों में यज्ञोपवीत के दौरान पलाश दंड हाथ में रखे रहने की प्रथा है...शायद एक लिंक तो है ही।