Wednesday, January 13, 2010

जब आंख ही से न टपके तो फिर लहू क्या है...

प्रतिभा कटियार
अभी-अभी कैलेंडर बदला है. अभी-अभी हमने पिछले बरस के अचीवमेंट्स का बहीखाता बंद किया है. अभी तक हमारे चेहरों पर सक्सेस की मुस्कुराहटें कायम हैं. जश्न दर जश्न...टीआरपी दर टीआरपी...सर्कुलेशन दर सर्कुलेशन... बेहद झूठी, खोखली सफलताओं के शोर में हमारी रूहें तबाह हो चुकी हैं. खाल को खुरचो तो फिर खाल ही निकलती है...खून नहीं...दर्द नहीं...कहकहे...कयामत बरपाने वाली हंसी. तमिलनाडु वाली वो खबर जैसे जेहन में कैद है अब तक. वो सड़क पर पड़ा कराह रहा था...तड़प रहा था...खून ही खून...दर्द ही दर्द. चिल्लाता, कराहता वह सब इंस्पेक्टर हमारे कहकहों के शोर में दम तोड़ गया. सत्तानशीनों के काफिले गुजरते गये...लेकिन किसी के कानों में उसकी आवाज नहीं गयी. कोई नहीं रुका...कोई नहीं. मरना उसकी नियति थी. वो मर गया. हमारे पास चैनल बदलने के ऑप्शन थे. लाफ्टर शो थे, सीरियल, एमटीवी...रजाइयां नींदें...सवेरा और जिन्दगी...उसके पास नहीं था कुछ भी. उसके परिवार के पास भी कुछ नहीं था. सोचती हूं तो क्या वो इंस्पेक्टर ही मरा था सड़क पर जिंदगी मांगते हुए. वो जिंदगी जो उसकी थी. जिसे किसी की भी एक छोटी सी पहल से सहेजा जा सकता था. नहीं, वो इंस्पेक्टर नहीं मरा था, वो हमारी मौत थी. हमारी आत्माओं की मौत. ढूंढिये तो हमारे शरीरों में बहता हुआ खून सफेद हो चुका है. कहकहों के शोर में तकलीफें गुम हो चुकी हैं. हममें से कितने लोग हैं जो सिर्फ सांस भर नहीं ले रहे बल्कि जी रहे हैं. मंजूनाथ जी रहा था...चंद्रशेखर भी जीना चाहता था...और भी बहुत सारे नाम हैं. जो सचमुच जीना चाहते हैं लेकिन हम उन्हें जीने नहीं देते. वे दम तोड़ देते हैं इसी तरह सड़कों पर, गलियारों में, घरों में, कैम्पस में. ऐसे किसी भी व्यक्ति की मौत हर उस व्यक्ति की मौत भी होती है जो कहीं जिंदा है अब तक अपनी आत्मा के साथ. सवाल किससे करें. जवाब कौन देगा. हम आतंकवादियों से लडऩे की बात कर रहे हैं (सिर्फ बात). वो तो खुले दुश्मन हैं. उनके इरादे पता हैं हमें. तरीके भी. लेकिन क्या होगा उन दुश्मनों का जो हमारे ही भीतर छुपा बैठा है. जो हमारी आत्माओं में दीमक की तरह लग गया है. किस उल्लास में डूबे हैं हम. क्या सचमुच उल्लास का, सुख का कोई कारण है? जीडीपी ग्रोथ बढ़ रही है और हम अंदर ही अंदर खोखले हो रहे हैं. हमारे बच्चे खुदकुशी कर रहे हैं. हमारे रिश्ते हमसे मुंह चुरा रहे हैं. हमारे अपने हमारी ओर हसरत से देखते हुए दम तोड़ रहे हैं और हम खुश हैं. क्या हर पल अपनी आत्मा के मरने की आवाज सचमुच किसी को सुनाई नहीं देती. क्या यह एक बड़े जनआंदोलन का वक्त नहीं है. जिस समाज में निदोर्षों को किसी भी पल मौत का खौफ सता रहा हो, उस समाज में कहकहों के सहारे जीने की कोशिश को क्या कहा जाये. यह तो कुछ ऐसा ही है कि घर चाहे जैसा हो दरवाजे पर मखमल के पर्दे $जरूर लटकाना. हमारी लहूलुहान आत्माओं पर, किसी के दुख से विचलित होने की, आंखों की कोरें नम होने की इंसानी जरूरतों पर पर्दा डाल रहे हैं ये सक्सेस आंकड़े, ये ग्लैमर, ये शोर, कहकहे. गालिब याद आते हैं कि रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल...जब आंख ही से न टपके तो फिर लहू क्या है...

6 comments:

Krishna Kumar Mishra said...

सुन्दर वर्णन, जै हो

Udan Tashtari said...

झंकझोरता आलेख. आभार हम तक लाने का.

महेन्द्र मिश्र said...

अच्छा आलेख.... मकरसंक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामनाये ....

चण्डीदत्त शुक्ल said...

कुछ लोग हिम्मत के साथ जीते हैं, मरते भी हैं हिम्मत के साथ. वो कराह रहा था पर हारा नहीं. हार तो गए वो लोग, जिनकी रूहें मर गई हैं. अहसास मर गए हैं. भावुक हो गया पढ़कर।
चौराहा

rana said...

bhawook kar diya aapne to..sachmuch...ham jinda kahna hai. bas saans le rahe hain.

Nikhil Srivastava said...

भैया, आपके सवालों के जवाब इन कमेंट्स में ही तो छिपे हैं...जरा ध्यान से पढ़िए.
वैसे मेरी भी दिली तमन्ना है कि एक दिन हम खुली आँखों से सपनों की जगह सच्चाई देखना शुरू कर दें...