आपको मालूम है कि ये अनिल अग्रवाल कौन है ? मुकेश अंबानी और पी चिदंबरम वैसे भी किसी परिचय के मुंहताज नहीं हैं । इधर कुछ दिनों से जयराम रमेश भी याद करने लायक बन गए हैं। एक ग्लैमरस स्टोरी है जिसके ये अहम किरदार हैं। मधुर भंडारकर में अगर हिम्मत होती तो इसे जरुर पर्दे पर उतार देते और ‘कॉरपोरेट पार्ट टू’ बना देते। अब इस स्क्रिप्ट में राहुल गांधी की भी एंट्री हो चुकी है। राहुल गांधी ने नियामगिरी के उस पहाड़ी इलाके का दौरा किया है जहां बाक्साईट खनन का ठेका लेने में वेदांता को तगड़ा झटका लगा। राहुल गांधी ने खुलेआम कहा कि उन्ही की वजह से वेदांता को ये ठेका नहीं मिला और कि वे दिल्ली में आदिवासी हितों के एकमात्र पहरुआ हैं। आमीन।
अनिल अग्रवाल और उनकी वेदांता पर भ्रष्टाचार और धांधली के कई आरोप लगे। बाल्को अधिग्रहण के वक्त भी और हाल ही में नियामगिरी हिल्स में बाक्साइट के खदान हथियाने की कोशिशों को लेकर भी। एन सी सक्सेना कमेटी ने वहां चल रही माईनिंग को अवैध करार दे दिया। वेदांत पर जमीन हड़पने, फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लंजीगढ़ (उड़ीसा) में एल्यूमिनियम रिफाइनरी खोलने के आरोप लगाए गए। उन्होंने तमाम नियम कानून ताक पर रख दिया और ऐसा मीडिया मैनेज किया कि मुख्यधारा की मीडिया इस खबर को सिर्फ सूंघकर रह गई।बहुत दिन नहीं हुए जब हमारे गृहमंत्री पी चिदंबरम वेदांता के एक डायरेक्टर हुआ करते थे। बाद में जब उन्हें गृहमंत्री बनाया गया तो अरुंधती राय ने कहा कि वे तो वेदांता के खनन हितों की सुरक्षा के लिए चौकीदार बने है। कई लोगों को अरुंधती सही भी लगी। बहरहाल, वेदांता उस वक्त विवादों में फंस गई जब उड़ीसा के नियामगिरी की पहाड़ियों में बाक्साइट के खदानों के लिए उड़ीसा सरकार हजारों आदिवासियों को उजाड़ने पर आमादा हो गई। पुनर्वास के बदले में आदिवासियों को 30 किलोमीटर दूर बने अपार्टमेंटनुमा मकानों में बसा दिया जाना था! लेकिन जिस दिन वेदांता ने केर्न इंडिया पर दावा ठोका, उसी दिन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने वेदांता के नियामगिरी प्रोजेक्ट पर पानी फेर दिया। बहरहाल, तेज रफ्तार से दौड़ रहे अनिल अग्रवाल, जयराम रमेश के दिए घावों को सहला रहे हैं और अगले वार की तैयारी में है।
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के अंदर के सत्ता समीकरण में चिदंबरम, मनमोहन सिंह और मोंटेक एक ‘कोटरी’ के हैं जो धुर उदारवादी माना जाता है। आप इसे कांग्रेस आलाकमान का कॉरपोरेट या उदार चेहरा(?) कह सकते हैं। दूसरी तरफ एक खेमा वो है जो पार्टी आलाकमान के हिसाब से पार्टी का समाजिक चेहरा बनना चाहता है। इसके नए अगुआ बने हैं दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश और सीपी जोशी। ये कांग्रेस आलाक
मान का समाजिक चेहरा है, बिल्कुल सौम्य, सरल और निश्चल! इस खेमे को ‘आम आदमी’ के ‘सरोकारों’ की सोते जागते चिंता रहती है। वो सरकार की कॉरपोरेट लॉबी के बरक्श हमेशा बयानवाजी करता है और जनता को आश्वस्त करता जाता है। सूत्रों की माने तो रिलांयस ने इसी खेमे को साधा है। इनके अलावा मुरली देवड़ा और रिलायंस के रिश्ते पर तो चर्चा होती ही रहती है। केर्न इंडिया को निगलने की फिराक में लगी वेदांता की बाक्साइट खदानों पर ताला जड़े जाने की घटना को इन संदर्भों में देखा जाना चाहिए। मजे की बात ये कि इधर जयराम ने वादांता के मनसूबों पर पानी फेरा और उधर राहुल गांधी, इस काम का श्रेय लेने नियामगिरी पहुंच गए। वैसे हमें याद है कि एक बार साल 1994 में तब के पर्यावरण मंत्री राजेश पायलट का रातोंरात तबादला कर दिया गया था जब उन्होंने चंद्रास्वामी से पंगा लिया था। लेकिन इस बार जयराम रमेश के पीछे मुकेश अंबानी खड़े हैं जिनकी कांग्रेस के बड़े नेताओं में आकंठ घुसपैठ है। इसलिए फिलहाल उनकी नौकरी सुरक्षित लगती है।इधर जिस हिसाब से माओवाद के बहाने दिग्विजय सिंह, चिदंबरम पर निशाना साध रहे हैं उससे कई बार चिदंबरम की नौकरी खतरे में लगती दिखती है। जाहिर है, दिग्गी राजा का ये माओवाद प्रेम महज दिखावा है, खेल तो कहीं और से खेला जा रहा है। आधिकारिक तौर पर दिग्विजय सिंह की हैसियत बातौर कांग्रेस महासचिव यूपी के प्रभारी की है और वे राहुल गांधी के हाथ-पैर-नाक और मुंह भी हैं !
देखा जाए तो वेदांता जिस राह पर आगे बढ़ती हुई इस मुकाम पर पहुंची है, लगभग रिलांयस ने भी वहीं तरीका अपनाया था। धीरुभाई अंबानी हों या उनके सुपुत्र अंबानी बंधु-उन्होंने कारोबार में आगे बढ़ने के लिए हर उपलब्ध तरीका अख्तियार किया। ऐसे में ये कॉरपोरेट वार किस मंत्री को हलाल करेगा ये आगे देखने वाली बात होगी।
दुर्भाग्य से हम एक ऐसे युग के गवाह हैं जहां ठेकेदारों, दलालों और खनन माफियाओं ने सरकार पर कब्जा कर लिया है। हिंदुस्तान में आर्थिक सुधार(?),खान माफियाओं का उदय, आदिवासियों का बड़े पैमाने पर विस्थापन और माओवाद के उदय का कालक्रम लगभग एक ही है। इस हिसाब से आप कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को अनिल अग्रवाल और अंबानी बंधुओं का लघु रूप मान सकते हैं। दुनिया के विशालतम लोकतंत्र में आपका फिर भी स्वागत है! चलिए कॉमनवेल्थ गेम्स में अतिथियों का स्वागत करें !







