Monday, February 16, 2009

जाग रहा है सोया अजगर

लगता है एक अरसे के बाद बिहार का नेतृत्व परिपक्व होता जा रहा है। पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर गौर कीजिए-नीतीश और लालू में विकास पुरुष बनने की होड़ लग गई है। दोनों एक दूसरे को मात देना चाहते हैं-लालू के लिए ये काम थोड़ा मुश्किल इसलिए है कि उनके 15 साला हुकूमत को लोग जल्दी से भूल नहीं पा रहे हैं लेकिन फिर भी उन्होने काफी भरपाई कर ली है। नीतीश कुमार को इसका एक नेचुरल एडवांटेज इसलिए हासिल है कि उन्होने शुरु से ही अपनी इमेज एक गंभीर, कम बोलनेवाले और विकास के लिए समर्पित नेता की बना रखी है और उसकी अपनी ब्रांडिंग हो चुकी है-लालू अभी उस फेज में नहीं पहुंच पाए हैं। बात करें रामविलास पासवान की तो उनकी भी छवि एक जुझारु नेता की है-ये रामविलास पासवान ही थे जिन्होने एक अरसे के बाद सूबे में अपनी आक्रामक रेल योजनाओं से लोगों को ललित नारायण मिश्र की याद दिला दी थी। ये बात अलग है कि हाल के दिनों में उनके जिम्मे ऐसा कोई मंत्रालय नहीं है जो सीधे आम जनता से सरोकार रखता हो।

एक तरफ जहां नीतीश कुमार ने अपने कामों से सूबे में और देश के स्तर पर अवार्ड पाने का रिकार्ड बना लिया है तो लालू भी नए-नए धमाके करते जा रहे हैं। हाल में नीतीश को एक प्रमुख चैनल द्वारा पॉलिटिशियन ऑफ द ईयर का अवार्ड मिला वहीं भारत सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में सूबे की काफी सराहना की। बिहार सरकार को ई-गवर्नेंस के लिए भी नवाजा गया। इससे पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी नीतीश के कामों की सराहना की। दूसरी तरफ लालू ने अपने इमेज को लगभग यूटर्न ही दे दिया। लगातार बढ़ते रेलवे के मुनाफे ने इस ग्लोबलाइजेशन और मंदी के दौर में लालू की इमेज को काफी पुख्ता कर दिया। फिर लालू ने बिहार के लिए रेलवे की योजनाओं का पिटारा ही खोल दिया। केंद्र में बिहार के नेताओं की मजबूत उपस्थिति ने कई केंद्रीय योजनाओं के दरवाजे भी बिहार के लिए खोले।

कुल मिलाकर हालात इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि अब बिहार के नेता जनता की बढ़ती उम्मीदों को न सिर्फ भांफ गए हैं बल्कि उनके मन में अतीत में हुए अ-विकास को लेकर एक भय भी समा गया है। याद कीजिए, ये वहीं बिहार था जहां सिर्फ एक दशक पहले तक एक भी बड़ा केंद्रीय संगठन नहीं था। कुछ लोग कह सकते हैं कि झारखंड में (जो उस समय बिहार का ही हिस्सा था) में कई केंद्रीय कारखाने थे लेकिन वो उस इलाके की भौगोलिक और प्राकृतिक बढ़त थी, बिहार के बंटवारे के बाद तो हालत और भी नाजुक हो गई। यहां ये लिखने का मतलब बिहार बनाम केंद्र या बिहार के साथ हुआ भेदभाव नहीं है बल्कि बिहारी नेताओं के स्वभाव में हुआ बदलाव है जो अब धीरे धीरे आकार ले रहा है।

आजादी के बाद से लालू युग के आगमन तक-जब केंद्र और राज्य में लगभग कांग्रेस का एकछत्र राज्य था, बिहार के नेता अपने सूबे के हित की बात केंद्र के सामने उठाने से डरते रहे। सूबा जातिवाद में इस कदर उलझा हुआ था कि किसी को विकास की चिंता ही नहीं थी। लगभग पूरा का पूरा लालू युग तो जातीय अहं के टकराव और फिर उसके स्थिरीकरण में ही बीत गया-लेकिन इसका सकारात्मक असर ये हुआ कि समाज के सभी तबके थकहार कर कुछ आगे की सोंच के लिए मजबूर हो गए। ये वहीं दौर भी था जब बिहारियों का सबसे ज्यादा पलायन महानगरों की तरफ हुआ और देश के दूसरे हिस्सों में उनके प्रति हिकारत का भाव भी उसी अनुपात में बढ़ा। दिल्ली जैसे कई शहरों की तो डेमोग्राफी ही बदल गई। लेकिन साल 2000 के बाद से हालात में तब्दीली आनी शुरु हो गई। 15 साल के लालू राज में जनता अब समाजिक न्याय से ज्यादा कुछ चाहने लगी थी और लोग कुछ नया करने को बैचेन हो रहे थे। इसका उदाहरण साल 1999 का विधानसभा चुनाव था जिसमें पिछड़ें वर्ग के लगभग प्रतीक बन चुके लालू यादव की पार्टी अल्पमत में आ गई-कांग्रेस की मदद से उसे सरकार बनानी पड़ी।

बिहार की राजनीति में जातिवाद अभी भी एक अहम मुद्दा है( बल्कि देश का ज्यादातर हिस्सा इससे मुक्त नहीं) लेकिन उसमें अब विकास की चाशनी घोल दी गई है। और मजे की बात ये है कि जातीय राजनीति के सूरमा लालू प्रसाद भी अब विकास की बात करने को मजबूर हो गए हैं।

कुल मिलाकर बिहार में सबेरा बहुत देर से आया है। जो चीज 60 के दशक में हो जानी थी वो 2000 में हुई है और इस हिसाब से बिहार अभी भी लगभग 2-3 दशक पीछे है। इस बीच दुनिया बहुत बदल गई है, देश के कई सूबे प्रति व्यक्ति आय और आधारभूत संरचना में बिहार से लगभग 4-5 गुना आगे चले गए हैं। कोई शक नहीं इसमें गलती बिहार के नेताओं की ही है, लेकिन अगर समाजिक न्याय के सिद्धांत की बात करें तो बिहार वाकई एक मजबूत केंद्रीय पैकेज का अभी भी हकदार है।

4 comments:

गुस्ताख़ said...

बिहार में विकास की बयार देर से ही सही बहने ज़रुर लगी है। सड़के पुख्ता होने लगी हैं। हाल ही में मैं कवरेज के सिलसिले में जयनगर तक रेल से और वापसी में पटना तक सड़क के रास्ते आया, तो बदलाव की इस झलक ने आंखो के कोर गीले कर दिए। लेकिन, अभी भी जिस चीज़ की ज्यादा ज़रुरत है वो अडंगेबाज जैसी भूमिका निभाने वाले दलालों को हटाने की है। मानसिकता में बदलाव ही विकास की इस नई और ताज़ा धारा को सतत रख सकता है। अभी भी बहुत कुछ किए जाने की ज़रुरत है और पीछे मुड़कर नहीं बल्कि आगे ही आगे देखते रहने की आवश्यकता है।

जहां तक लालू की छवि का सवाल है। लालू की छवि आम हिंदुस्तानी के ज़ेह्न में अभी भी भदेस और जातीय राजनीति करने वाले ठेठ की है। विकास का जिससे कोई वास्ता नहीं। लफ्फाजी करके चुनाव जीतने की उनकी अदा काबिलेगौर है। उन्हें भी अपनी इमेज सुधारने की कवायद करनी पड़ी तो महज इसलिए कि सूबे की राजनीति में उनका आधार खिसक चुका था, केंद्र की राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था। इसके साथ ही जिन गुंडा तत्वों के बल पर लालू की राजनीति चल रही थी उसके कस-बल एक हद तक नीतिश ने अपने गुडो के ज़रिए ढीले कर दिए हैं। आम लोगों में भी एक डर-सा है कि काम-धाम करने वाले नीतिश कहीं इस बार चुनाव में हार न जाएं।

और जहां तक रेल को मुनाफे में ले जाने की उनकी बात है। इसकी नींव नीतिश ने ही रख दी थी। हां, ये और बात है, और इसके लिए लालू की पीठ थपथापाई जानी चाहिए कि विरोधी दल का होने पर भी लालू ने उन सुधारों को उलट नहीं दिया।

नज़दीक से मुआयना करने पर एक बात और दिखती है कि जिस रेल को जरसी गाय कहकर लालू ने दूहना शुरु किया है। अगले कुछ साल में उसके लाभांश में कमी आएगी। माल और सवारी डब्बों की गिनती बढ़ाकर लालू ट्रैक के विय़र-एंड-टीयर की ओर ध्यान नहीं दे पा रहे। सरकार बदलेगी, या फिर से यूपीए की ही सरकार बने तो देखना, लालू रेल मंत्री नहीं ही बनेंगे और दुर्घटनाओं का ठीकरा किसी और मंत्री के सिर फूटेगा।

Pravin Jha said...

गुस्‍ताख जी, काफी सटीक विश्‍लेषण । दरअसल, बिहार में अभी विकास की जमीन ही तैयार हो रही है । अभी बहुत कुछ होना बाकी है । विकास के मुद्दे पर नेताओं की ढपोरशंखी बयानों से भ्रमित हुए बिना अगर गौर करके देखा जाय, तो बिहार में अभी विकास हुआ ही कहॉं है । प्रत्‍येक साल आनेवाली बाढ् से उत्‍तर बिहार 6 महीने तक पानी में डूबा रहता है । बाढ आप्‍लावित क्षेत्र में सडकों का निर्माण जिस कच्‍छप गति से हो रहा है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि पता नही उनका निर्माण कब तक संपन्‍न हो पाएगा या भविष्‍य में आनेवाली प्रलयंकारी बाढ में वे बचेंगी भी अथवा नही । दक्षिण बिहार में अभी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है, जिसे विकास का नाम दिया जा सके । बिहार की राजधानी पटना से उत्‍तर बिहार को जोडनेवाला महात्‍मा गॉंधी सडक सेतु जर्जर अवस्‍था अपने अंतिम दिन गिन रहा है और वहॉं कभी भी कोई बडा हादसा हो सकता है । रही रेल की बात तो यहॉं भी उत्‍साहवर्द्धक स्थिति नही है । बिहार में अभी तक एक भी मेगा सेतु परियोजना अपने अंजाम तक नही पहुंची है । कुछ परियोजनाओं पर ही मंथर गति से काम हो रहा है, बाकी परियोजनाऍं लालफीताशाही के कारण अधर में लटकी हुई हैं । चाहे वह गंगा रेल सह सडक पुल हो, या कोसी नदी पर बनने वाला महासेतु । हॉ, बिहार की जनता इस बात पर खुश हो सकती है कि 15 साल पहले जिस‍ बिहार में विकास की बात भी हसीन ख्‍वाब की मानिन्‍द लगती थी वहॉं अब कम से कम विकास की बयार तो बहनी शुरू हुई है । बिहार के नेता अब इस बात को भलीभॉंति समझ चुके हैं कि केवल जातिवाद की राजनीति से अब बिहार में चुनाव नहीं जीता जा सकता, इसलिए शिलान्‍यास नाम पर पत्‍थर गाडने से अगर बिहार की भोली जनता भ्रमित होती हो तो शिलान्‍यास करने की होड् क्‍यों न लगे, भले ही परियोजनाऍं पूरी हो या न हो, उनकी बला से । आखिर शिलान्‍यास के आयोजन में भी तो जनता का पैसा ही खर्च होता है।

Pravin Jha said...
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sanjay saxena said...

asal me baat yah hai ki vikas ki baat karna lalu ki majboori hai kuoki jaati ko lekar politics 15 saal tak kiya wahan bhi bihario ke emotion ka fayada udaya,baat yah important nahi hai vikas kam ya jaada hua baat yah hai ki vote jaati ke naam par liya gaya jo bahut hi sramnaak hai,vikas modi ne bhi khoob kiya hai par vote usane vikas ke naam par nahi balki hindutwa katarpanthi ke naam par mila hai,koi bhi vote agar samaj ke baatne ke naam par liya jaata hai to wo har halat me wah samaj ko picche dhakelna hai,jitna aarthik vikas jaruri hai utna hi smajik vikas aur shanti, ak ke naam par dusre ki bali nahi chhadayi ja sakti aur yah baat janta ko samajh lena bahut jaruri hai,abhi ye neta kab aur kitni turn lenge iska koi andaja nahi laga sakta par janta ko apni turn samajhni bahut hi aawashyak hogi....