हाल के दिनों में साहित्य और दलित चिंतन में मौलिकता और उभार देखने को आया है। इस सिलसिले में ऐसे लेखकों को खारिज कर देने की प्रबृत्ति भी बढ़ी है जो गैर-दलित हैं। दलित लेखकों का एक वर्ग कहता है कि दलितों को सहानुभूति का लेखन नहीं बल्कि स्व-अनुभूति का लेखन चाहिए। एक ऐसा लेखन जो भोगे हुए यथार्थ पर आधारित हो। लेकिन ऐसा उचित नहीं जान पड़ता। कई दूसरे गैर-दलित लेखक भी हो सकते हैं जिन्होने दलितों जैसे कुछ हालात झेले हों। जातीय और समाजिक भेदभाव की बात अगर छोड़ दी जाए तो आर्थिक आभाव कमोवेश हरेक इंसान को समान रुप से प्रभावित करता है।
दूसरी बात ये है कि अगर कोई गैर-दलित लेखक दलित हितों के बारे में कोई मौलिक विचार पेश करता है तो उसे लेने में क्या बुराई है भले ही वो सहानुभूति ही क्यों न हो। हमें याद रखनी चाहिए कि अमेरिका में अश्वेतों के समर्थन में एक निर्णायक लड़ाई को अंजाम देने वाले शख्स का नाम एब्राहम लिंकन था जो श्वेत था। दूसरी बात ये कि हिंदुस्तान में दलितों के सबसे बड़े हितचिंतक, राजनीतिज्ञ और विचारक बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर को भी एक महाराजा ने विदेश जाने में वित्तीय मदद की थी। कहने का मतलब ये कि नीयत अगर सही हो तो कोई काम बुरा नहीं है।
दलित लेखकों का एक वर्ग इस बात पर जोर दे रहा है कि अगर दलितों तरक्की करनी है तो उन्हे अंग्रेजी सीखनी होगी। ये बात सही है, और दलित ही नहीं- हर वर्ग के लिए सही है। लेकिन हमें याद रखनी चाहिए अग्रेजी सीखना एक क्रमिक प्रक्रिया है और इसके सहारे एक बड़े वर्ग के विकास का लंबे समय तक इंतजार नहीं किया जा सकता। इस वर्ग में दलित ही नहीं कई दूसरे वर्गों के लोग भी शामिल है।
आज के हिंदुस्तान में अंग्रेजी न जानने वाला तकरीबन हर हिंदुस्तानी कई स्तरों पर भेदभाव का शिकार है। तो क्या कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला जा सकता जिससे अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी सम्मानजनक जिंदगी जीने का रास्ता खुलता हो ? जो लोग सिर्फ अंग्रेजी के सहारे विकास की बात करते हैं वे प्रकारांतर से उसी समाजिक समूहों के हाथ में पूरी शक्ति देने की वकालत करते हैं जिसमें दलितों मौजूदगी शून्य से ज्यादा नहीं है। दुर्भाग्य से ये विमर्श आजादी के बाद से ही चल रहा है लेकिन इससे निपटने का कोई रास्ता किसी को नहीं सूझ रहा।
इसके लिए हाल ही का एक उदाहरण देना काफी है। ताजा लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जब अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करने की बात की तो जिस तरह का हाय तौबा मचा उससे .यहीं लगता है कि प्रवुद्धजनों,, हालात और तंत्र में अग्रेजी ने किस कदर अपना जड़ जमाया है। भाषाई विमर्श दलित हितों से सीधे जुड़ा हुआ है। या तो पूरे हिंदुस्तान में सरकारी स्तर पर अंग्रेजी की संस्थागत और ठोस पढ़ाई की व्यवस्था की जानी चाहिए या फिर उच्च स्तर पर भी क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई की माकूल व्यवस्था होनी चाहिए और नौकरियों में अंग्रेजी के आतंक को खत्म किया जाना चाहिए।
लेकिन सवाल ये है कि निजी क्षेत्र क्यों अंग्रेजी छोड़ेगा और क्षेत्रीय भाषाओं को अपनाएगा ? यहां फिर से सरकारी प्रोत्साहन की जरुरत है। सरकार को ऐसा कुछ करना होगा- चाहे वो प्रोत्साहनात्मक हो या निषेधात्मक- कि भाषाई आधार पर किसी से भेदभाव न किया जाए। सरकार क्षेत्रीय और राष्ट्रीय भाषा में कामकाज करनेवाली कंपनी को प्रोत्साहित कर सकती है। इसके आलावा सरकार क्षेत्रीय भाषाओं में ज्ञान के कई विषयों की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहन दे सकती है। हरेक भाषा में अनुवाद और मौलिक लेखन को प्रोत्साहित कर के सामग्री की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए बड़ी इच्छाशक्ति की आवश्यकता है जो हमारे नेतृत्व में नहीं दिखती।(जारी)
Saturday, May 23, 2009
Friday, May 22, 2009
दलित, समाज, सरकार और हकीकत-5
सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है। आज के युग में जब अधिकांश नौकरियां निजी क्षेत्र से आ रहीं हैं तो दलितों के लिए यहां दोहरा संकट है। एक तो यहां आरक्षण नहीं है दूसरी बात ये अंग्रेजी एक बड़ी वाध्यता है। निजी क्षेत्र की अधिकांश अच्छी नौकरियों में अंग्रेजी का ज्ञान जरुरी है। यहां अगर सरकार और निजी क्षेत्र मिलजुल कर काम करे तो बात बन सकती है। इसका अच्छा उदाहरण मायावती का फॉर्मूला हो सकता था जिसमें एक खास फीसदी में दलितों को आरक्षण देने पर सरकार नजी क्षेत्रों को कुछ रियायते देती। लेकिन ये फॉर्मूला पूरे देश के स्तर पर लागू नहीं हो पाया है।
दूसरी बात ये कि कई नौकरियां ऐसी हैं जहां तकनीकी दक्षता की ज्यादा जरुरत होती है और भाषाई ज्ञान कम चाहिए होता है। सरकार ऐसे क्षेत्रों को तलाश कर दलितों के बच्चों को वहां पढ़ा सकती है जिससे वो आसानी से नौकरी हासिल कर सकें। सरकार को ज्यादा से ज्यादा आईटीआई और वोकेशनल कोर्स के संस्थान खोलने चाहिए या फिर प्राइवेट क्षेत्र को इसमें पूंजी लगाने के लिए हौसलाआफजाई करनी चाहिए। हमारे देश में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी तो पैदा हो गई है लेकिन यहां जरुरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा छोटी नौकरियां पैदा की जाएं जिससे लाखों लोगों को खपाया जा सके।
हमारे यहां कृषि क्षेत्र को अभीतक पूरी तरह खंगाला नहीं गया है। जैसा कि मैंने हरियाणा में देखा-वहां की सरकार अब कृषि उत्पादन बढ़ाने की जगह कृषि विविधिकरण पर जोर दे रही है। चूंकि देश अब खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है इसलिए खेती को ऐसे दिशा में मोड़ने में जरुरत है कि कम जमीन में ज्यादा से ज्यादा आमदनी हो सके। देश में अब फलों, सब्जियों और अन्य वाणिज्यिक खेती को बढ़ावा देने की नीति पर विचार होनी चाहिए। दुग्ध उत्पादन, अंडा, मांस, मधुमक्खी, मशरुम और मछली के उत्पादन पर सरकार को बड़ी नीति बनाने की जरुरत है। इससे रोजगार का विकेंद्रीकरण होगा और बड़ी आबादी को फायदा होगा जिससे दलित भी लाभान्वित होंगे।
दूसरी बात दलितों में कई ऐसी जातियां हैं जो हस्तकरघा और कलाकृतियां बनाती हैं। बांस की टोकड़िया, चटाईयां, बेंत की कुर्सियां और मिट्टी के बरतन जैसी कई चीजें हैं जो अभी तक सिर्फ स्थानीय बाजार में ही खपती है। बड़े पैमाने पर इनके कारोबार की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार को इस दिशा में भी सोचना होगा। हमारी सरकार इन सब चीजों को लेकर उदासीन है। हमने कोई ऐसी बड़ी नीति नहीं बनाई है या उसे बढ़ावा नहीं दिया है कि इसका बाजार बन सके और इसका विज्ञापन हो। हमें इन सब बातों को चिह्नित करना होगा कि वे कौन से तरीके हैं जिससे आमलोगों को फायदा हो।(जारी)
दूसरी बात ये कि कई नौकरियां ऐसी हैं जहां तकनीकी दक्षता की ज्यादा जरुरत होती है और भाषाई ज्ञान कम चाहिए होता है। सरकार ऐसे क्षेत्रों को तलाश कर दलितों के बच्चों को वहां पढ़ा सकती है जिससे वो आसानी से नौकरी हासिल कर सकें। सरकार को ज्यादा से ज्यादा आईटीआई और वोकेशनल कोर्स के संस्थान खोलने चाहिए या फिर प्राइवेट क्षेत्र को इसमें पूंजी लगाने के लिए हौसलाआफजाई करनी चाहिए। हमारे देश में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी तो पैदा हो गई है लेकिन यहां जरुरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा छोटी नौकरियां पैदा की जाएं जिससे लाखों लोगों को खपाया जा सके।
हमारे यहां कृषि क्षेत्र को अभीतक पूरी तरह खंगाला नहीं गया है। जैसा कि मैंने हरियाणा में देखा-वहां की सरकार अब कृषि उत्पादन बढ़ाने की जगह कृषि विविधिकरण पर जोर दे रही है। चूंकि देश अब खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है इसलिए खेती को ऐसे दिशा में मोड़ने में जरुरत है कि कम जमीन में ज्यादा से ज्यादा आमदनी हो सके। देश में अब फलों, सब्जियों और अन्य वाणिज्यिक खेती को बढ़ावा देने की नीति पर विचार होनी चाहिए। दुग्ध उत्पादन, अंडा, मांस, मधुमक्खी, मशरुम और मछली के उत्पादन पर सरकार को बड़ी नीति बनाने की जरुरत है। इससे रोजगार का विकेंद्रीकरण होगा और बड़ी आबादी को फायदा होगा जिससे दलित भी लाभान्वित होंगे।
दूसरी बात दलितों में कई ऐसी जातियां हैं जो हस्तकरघा और कलाकृतियां बनाती हैं। बांस की टोकड़िया, चटाईयां, बेंत की कुर्सियां और मिट्टी के बरतन जैसी कई चीजें हैं जो अभी तक सिर्फ स्थानीय बाजार में ही खपती है। बड़े पैमाने पर इनके कारोबार की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार को इस दिशा में भी सोचना होगा। हमारी सरकार इन सब चीजों को लेकर उदासीन है। हमने कोई ऐसी बड़ी नीति नहीं बनाई है या उसे बढ़ावा नहीं दिया है कि इसका बाजार बन सके और इसका विज्ञापन हो। हमें इन सब बातों को चिह्नित करना होगा कि वे कौन से तरीके हैं जिससे आमलोगों को फायदा हो।(जारी)
Tuesday, May 12, 2009
मायावती, अम्बेदकर, सेक्यूलरिज्म और बीजेपी
मायावती ने सत्ता हासिल करने के लिए जितनी भी कलाबाजियां खाईं हों लेकिन उनकी पार्टी अम्बेदकर के विचारों को ही पूरा करने का दंभ भरती है। कई लिखित साक्ष्यों से ये साबित हुआ है कि अम्बेदकर के मन में इस्लाम को लेकर कोई अच्छी धारणा नहीं थी। अम्बेदकर ने जब धर्म परिवर्तन का फैसला लिया तो उनको मनाने कई इसाई मिशनरियां, इस्लामिक और सिख धर्माचार्य भी पहुंचे थे लेकिन अम्बेदकर ने सबको ठुकरा कर बौद्ध धर्म चुना था। शायद अम्बेदकर के मन में ये बात थी कि जिन दलितों ने अतीत में इस्लाम, इसाई और सिख धर्म अपनाया था उनकी हालात जस की तस ही रही, समाजिक-आर्थिक रुप से उनमें कोई खास बदलाव नहीं आय़ा। अम्बेदकर की मुख्य लड़ाई हिंदू धर्म में भेदभाव को लेकर थी और वे दलितों को इस ढ़ांचे में सम्मानजनक स्थान दिलाना चाहते थे। जब एक हिंदू धर्माचार्य अम्बेदकर के पास हिंदू धर्म में ही बने रहने का आग्रह कर रहे थे तो अम्बेदकर ने उनसे कहा भी था कि क्या हिंदू समाज, शंकराचार्य के पद पर एक दलित को स्वीकार कर लेगा ?कुल मिलाकर अम्बेदकर हिंदू समाज के आंतरिक सुधार को लेकर ज्यादा चिंतित थे। ये विचारधारा आरएसएस के विचारधारा से मेल खाती है लेकिन फर्क यह है कि आरएसएस सुधारों की क्रमिक प्रक्रिया में यकीन रखता है और इसके सुधार का मॉडल ऊपर से नीचे की ओर है जबकि अम्बेदकर इस क्रम को पलटना चाहते थे। दूसरी बात ये कि आरएसएस का विचार गैर-हिंदू सम्प्रदायों के विद्वेष पर टिका है, जिससे अम्बेदकर सहमत नहीं थे।
तो मायावती ऐसे स्कूल की छात्रा रही हैं जिसमें इस्लाम को लेकर कोई ज्यादा लगाव नहीं है। गौरतलब है कि मायावती या उनके मेंटर कांशीराम ने कभी भी हिंदू धर्म से अलग होने की बात नहीं की। कई विश्लेषकों का ये भी मानना है कि दलित जहां भी सशक्त होते हैं या उनमें सशक्तिकरण की भावना आती हैं वो हिंदुत्ववादियों के पाले में चले जाते हैं, उनका हिंदूकरण हो जाता है। इसका उदाहरण गुजरात और दूसरे कई जगहों के दंगे हैं जहां दलितों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया या उनका इस्तेमाल किया गया।
दूसरी बात ये कि हिंदुस्तान में सदियों से जो तबका सबसे गरीब और बंचित रहा है उनमें दलित और मुसलमानों की तादाद खासी है। कई बार दोनों वर्गों के आर्थिक हित भी टकराते हैं और उनमें विद्वेष पनपता है।
दूसरी अहम बात हाल की घटनाओं से ताल्लुक रखती है। पिछले सालों में जिस तरह राहुल गांधी ने दलितों को अपने पाले में लाने के लिए प्रयास किए हैं मायावती उससे सशंकित है। ये बात गौरकरने लायक है कि पूरे देश में जहा बीएसपी का ढ़ांचा नहीं है वहां दलित अभी भी कांग्रेस को वोट करता है। मायावती को लगता है कि अगर कांग्रेस फिर से सत्ता में आ गई तो वो सरकारी संसाधन के बल पर ऐसी-ऐसी योजनाएं बनाएगी जो दलितों को फिर से कांग्रेस की तरफ मोड़ सकती है। लालु-मुलायम, मुसलमानों के बारे में ये चोट बिहार-यूपी में सहला रहे हैं जब कांग्रेस ने केंद्र में रहकर अल्पसंख्यकों के लिए योजनाओं का पिटारा खोल दिया। दूसरी बात ये कि मुलायम सिंह यादव के फिर से कांग्रेस पाले में जाने की संभावना है, और मुलायम ने अपनी शर्त रख भी दी है कि जो भी सरकार मायावती को बर्खास्त करेगी वे उसी को समर्थन देंगे। कुलमिलाकर माया को खतरा, बीजेपी से नहीं-कांग्रेस से ज्यादा है।ऐसी स्थिति में मायावती क्यों अपनी सियासी आत्महत्या चाहेंगी ? कांग्रेस और बीएसपी दोनो जानती है कि बीएसपी के विस्तार से अगर किसी को घाटा है तो वो कांग्रेस ही है। ऐसे में मायावती पहले अपनी जान बचाना पसंद करेंगी क्योंकि वो जानती हैं कि अगर फिर से कांग्रेस सत्ता में आई तो वो सीबीआई के चंगुल से नहीं बच पाएंगी।
ऐसे में मायावती का सेक्यूलर होना कोई मायने रखता है ? उनके वरुण गांधी पर रासुका लगाने को जो लोग उसके सेक्यूलर हृदय से जोड़कर देखते हैं उन्हे ये समझनी चाहिए कि मायावती बीजेपी के सहयोग से ही यूपी की तीन बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं।
Saturday, May 9, 2009
दलित, समाज, सरकार और हकीकत- 4
एक सवाल ये भी है कि दलितों के बच्चों को कमसे कम क्लास दसवीं तक कैसे स्कूल में रोक कर रखा जाए। देखने में ये आया है कि जैसे ही वो 12-14 साल के होते हैं उनपर परिवार चलाने की जिम्मेवारी आ जाती है, उनका परिवार इतना बड़ा होता है, उनके परिवार में अशिक्षा-जनित जागरुकता की कमी इतनी होती है कि उन्हे पढ़ाई जारी रखने में बड़ी मशक्कत होती है। सरकार ने स्कूलों में दोपहर का भोजन लागू करके इस दिशा में थोड़ा सा प्रयास किया है लेकिन सिर्फ ये कदम काफी नहीं है।
दोपहर का भोजन तो सिर्फ मिडिल स्कूल तक ही मिल पाता है, उससे आगे ऐसा कोई प्रोत्साहन नहीं है। हमारे देश के स्कूलों में सबसे ज्यादा ड्रॉप आउट दर अगर किसी की है तो वो दलितों के बच्चों की ही है। अगर यहां हम उनकी तुलना आदिवासियों से करें तो वहां स्थिति थोड़ी सी भिन्न है। सरकार से इतर इसाई मिशन और कई दूसरे संस्थाओं ने वहां शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर काम किया है, लेकिन दलितों के लिए खासकर के मैदानों में रहनेवाले दिलितों के बीच ये संस्थाएं काम नहीं कर रही। अभी तक हमारे देश की सरकारें इस ड्राप आउट को रोकने का कोई मुकम्मल तरीका नहीं खोज पाईं हैं।
यहां मामला उलझ जाता है। हमारी व्यवस्था ने संविधान में दलितों को आबादी के हिसाब से आरक्षण देकर अपने आपको जिम्मेदारियों से मुक्त कर लिया है। तो फिर सवाल ये है कि जिस वर्ग के पास जमीन नहीं है, शिक्षा में तमाम दिक्कते हैं वो अपनी तरक्की कैसे करे। क्या सिर्फ उसके घर के पास स्कूल खोल देने से वो अपनी पढ़ाई पूरी करके उन वर्गों के समकक्ष आ पाएगा जिनके घर पीढ़ियों से शिक्षा की ज्योति और संसाधनों की बरसात में नहाए हुए हैं ?
यहां कुछ साहसिक कदम उठाने की जरुरत है। सरकार कुछ ऐसे प्रोत्साहन के कदम उठा सकती है जिससे दलितों के बच्चे कम से कम हाई स्कूल या उससे ऊपर तक की शिक्षा ले सके। सरकार दलितों के बच्चों को प्रतिदिन कक्षा में उपस्थित होने के एवज में एक न्यूनतम राशि दे सकती है और ऐसे स्कूलों को सम्मानित कर सकती है जहां दलितों के बच्चे अच्छा परफॉर्म करते हों।
सरकार ऐसा भी कर सकती है कि दलितों के लिए एक न्यूनतम शिक्षा स्तर के बाद एक ब्याजमुक्त कर्ज की व्यवस्था करे जिससे वो अपना कोई व्यापार खडा कर सकें। मेरा मानना है कि दलितों के लिए वैसे भी सरकार को न्यूनतम ब्याज पर व्यापारिक ऋण का इंतजाम करना चाहिए। अगर कोई दलित दसबीं पास कर जाता है तो उसे कम से कम 25,000 रुपये प्रोत्साहन राशि के तौर पर मिलनी चाहिए। ये कदम कुछ वैसा ही होगा जैसे सरकार लाड़ली योजना के तहत कई सूबों में लड़कियों के जन्म पर कुछ रकम बैंको में जमा करवाती है।
दूसरी बात जो अहम है वो ये कि दलितों की आबादी का एक बड़ा वर्ग मेहनत मजदूरी करके कमाता है। सरकार ने नरेगा लागू किया है जो अच्छा कदम है लेकिन इसमें न्यूनतम मजदूरी इतनी कम है कि ये नाकाफी लगता है। वर्तमान में शायद सरकार रोजगार गारंटी योजना के तहत 65 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से 100 का रोजगार देती है, इसे बढ़ाकर 100 रुपये प्रतिदिन करने की जरुरत है। (जारी)
दोपहर का भोजन तो सिर्फ मिडिल स्कूल तक ही मिल पाता है, उससे आगे ऐसा कोई प्रोत्साहन नहीं है। हमारे देश के स्कूलों में सबसे ज्यादा ड्रॉप आउट दर अगर किसी की है तो वो दलितों के बच्चों की ही है। अगर यहां हम उनकी तुलना आदिवासियों से करें तो वहां स्थिति थोड़ी सी भिन्न है। सरकार से इतर इसाई मिशन और कई दूसरे संस्थाओं ने वहां शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर काम किया है, लेकिन दलितों के लिए खासकर के मैदानों में रहनेवाले दिलितों के बीच ये संस्थाएं काम नहीं कर रही। अभी तक हमारे देश की सरकारें इस ड्राप आउट को रोकने का कोई मुकम्मल तरीका नहीं खोज पाईं हैं।
यहां मामला उलझ जाता है। हमारी व्यवस्था ने संविधान में दलितों को आबादी के हिसाब से आरक्षण देकर अपने आपको जिम्मेदारियों से मुक्त कर लिया है। तो फिर सवाल ये है कि जिस वर्ग के पास जमीन नहीं है, शिक्षा में तमाम दिक्कते हैं वो अपनी तरक्की कैसे करे। क्या सिर्फ उसके घर के पास स्कूल खोल देने से वो अपनी पढ़ाई पूरी करके उन वर्गों के समकक्ष आ पाएगा जिनके घर पीढ़ियों से शिक्षा की ज्योति और संसाधनों की बरसात में नहाए हुए हैं ?
यहां कुछ साहसिक कदम उठाने की जरुरत है। सरकार कुछ ऐसे प्रोत्साहन के कदम उठा सकती है जिससे दलितों के बच्चे कम से कम हाई स्कूल या उससे ऊपर तक की शिक्षा ले सके। सरकार दलितों के बच्चों को प्रतिदिन कक्षा में उपस्थित होने के एवज में एक न्यूनतम राशि दे सकती है और ऐसे स्कूलों को सम्मानित कर सकती है जहां दलितों के बच्चे अच्छा परफॉर्म करते हों।
सरकार ऐसा भी कर सकती है कि दलितों के लिए एक न्यूनतम शिक्षा स्तर के बाद एक ब्याजमुक्त कर्ज की व्यवस्था करे जिससे वो अपना कोई व्यापार खडा कर सकें। मेरा मानना है कि दलितों के लिए वैसे भी सरकार को न्यूनतम ब्याज पर व्यापारिक ऋण का इंतजाम करना चाहिए। अगर कोई दलित दसबीं पास कर जाता है तो उसे कम से कम 25,000 रुपये प्रोत्साहन राशि के तौर पर मिलनी चाहिए। ये कदम कुछ वैसा ही होगा जैसे सरकार लाड़ली योजना के तहत कई सूबों में लड़कियों के जन्म पर कुछ रकम बैंको में जमा करवाती है।
दूसरी बात जो अहम है वो ये कि दलितों की आबादी का एक बड़ा वर्ग मेहनत मजदूरी करके कमाता है। सरकार ने नरेगा लागू किया है जो अच्छा कदम है लेकिन इसमें न्यूनतम मजदूरी इतनी कम है कि ये नाकाफी लगता है। वर्तमान में शायद सरकार रोजगार गारंटी योजना के तहत 65 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से 100 का रोजगार देती है, इसे बढ़ाकर 100 रुपये प्रतिदिन करने की जरुरत है। (जारी)
Sunday, May 3, 2009
दलित, समाज, सरकार और हकीकत- 3
फिर सवाल ये है कि इन तमाम वाधाओं के रहते हुए एक दलित क्या करे ? क्या वो अपने मेहनत की गाढ़ी कमाई बैंक में महज कुछेक फीसदी ब्याज के लिए जमा करता जाए और एक उपभोक्ता बन कर रह जाए या फिर अपनी उत्पादकता भी बढ़ाए। अगर सरकार इस दिशा में कुछ पहल करे तो बात बन सकती है।
जिस तरह दिल्ली में या कुछेक दूसरे सूबों में भी जमीन की रजिस्ट्री पत्नी के नाम पर कराने से उसके फीस में कुछेक फीसदी की माफी मिलती है उसी तरह का कुछ कानून दलितों के हक में बने तो कुछ उम्मीद जग सकती है। सरकार संसद में अगर इस तरह का कानून पास करती है तो ये शायद दलितों के हक में बड़ी बात होगी। दुर्भाग्य से दलित हितों की बात करनेवालों के एजेंडे से ये बात अभी तक गायब है।
दूसरी बात ये कि सरकार को ये भी ध्यान रखना होगा कि योजनाएं बनाते समय इस बात का ज्यादा से ज्यादा खयाल रखा जाए कि उस योजना से दलितों को ज्यादा लाभ मिले। मसलन कोई हाईवे या हास्पिटल या फिर कॉलेज ऐसे इलाके में खोला जाए जहां दलितों की आबादी सघन हो या नजदीक हो। इसके लिए सरकार को व्यापक तौर पर एक सर्वे करना होगा कि देश के किन कुछेक सौ-ब्लॉक में दलितों की आबादी सघन है। ये पहल सच्चर कमेटी की उस रिपोर्ट से मिलती जुलती होगी जिसमें उसने देश के तकरीबन 90 ब्लॉकों में अल्पसंख्यकों के लिए खास योजनाएं बनाने की सिफारिश की है। इसमें कोई शक नहीं कि इससे फायदा दूसरे समुदायों को भी होगा, लेकिन हमें ये बात समझनी होगी कि अगर हमनें दलितों को फोकस में रखा तो पूरे देश की भलाई होगी।
जहां तक मुझे याद है इससे मिलता-जुलता सुझाव दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में भोपाल घोषणापत्र में भी किया गया था जिसमें दलितों के सर्वांगीण के लिए कई सुझाव सामने आए थे, लेकिन उसमें भी ठेकेदारी और टेंडरों में दलितों की भागीदारी को ही ज्यादा प्रकाशित किया गया। जाहिर है, ऐसे उपाय दलितों के लिए प्रतीकात्मक तो हो सकते हैं कि उनके समुदाय से कुछेक लोग करोड़पति ठेकेदार हों जाए लेकिन उनकी विशाल आबादी को मुख्यधारा में लाने के लिए बड़े उपाय करने होंगे।
मुझे याद है कि किस तरह बुनियादी ढ़ांचा नजदीक होने से कोई दलित आसानी से आगे बढ़ जाता है। मेरे गांव में हाईस्कूल तक की पढ़ाई होती है। इसका फायदा ये हुआ कि नजदीक में हाईस्कूल होने से मेरे गांव के कई दलित लड़के लड़कियां दसबीं तक पढ़ पाए लेकिन वहीं बगल के गांव में जहां हाईस्कूल नहीं है दलितों के बच्चे प्राइमरी से ज्यादा नहीं पढ़ पाए। मेरे गांव के हाईस्कूल में दूसरे गांव के गैरदलितों के बच्चे भी आते थे जिनमें जागरुकता का स्तर बहुत ज्यादा था। लेकिन दलितों का दुर्भाग्य उनका पीछा यहां भी नहीं छोड़ रहा था, वे प्राइमरी के बाद 12-14 साल की उम्र में अपने मामा या चाचा के साथ दिल्ली-मुम्बई की फैक्ट्रियों, कोठियों और दुकानों में अपना सस्ता श्रम बेचने को रेलगाड़ियों में सबार हो जाते थे।(जारी)
जिस तरह दिल्ली में या कुछेक दूसरे सूबों में भी जमीन की रजिस्ट्री पत्नी के नाम पर कराने से उसके फीस में कुछेक फीसदी की माफी मिलती है उसी तरह का कुछ कानून दलितों के हक में बने तो कुछ उम्मीद जग सकती है। सरकार संसद में अगर इस तरह का कानून पास करती है तो ये शायद दलितों के हक में बड़ी बात होगी। दुर्भाग्य से दलित हितों की बात करनेवालों के एजेंडे से ये बात अभी तक गायब है।
दूसरी बात ये कि सरकार को ये भी ध्यान रखना होगा कि योजनाएं बनाते समय इस बात का ज्यादा से ज्यादा खयाल रखा जाए कि उस योजना से दलितों को ज्यादा लाभ मिले। मसलन कोई हाईवे या हास्पिटल या फिर कॉलेज ऐसे इलाके में खोला जाए जहां दलितों की आबादी सघन हो या नजदीक हो। इसके लिए सरकार को व्यापक तौर पर एक सर्वे करना होगा कि देश के किन कुछेक सौ-ब्लॉक में दलितों की आबादी सघन है। ये पहल सच्चर कमेटी की उस रिपोर्ट से मिलती जुलती होगी जिसमें उसने देश के तकरीबन 90 ब्लॉकों में अल्पसंख्यकों के लिए खास योजनाएं बनाने की सिफारिश की है। इसमें कोई शक नहीं कि इससे फायदा दूसरे समुदायों को भी होगा, लेकिन हमें ये बात समझनी होगी कि अगर हमनें दलितों को फोकस में रखा तो पूरे देश की भलाई होगी।
जहां तक मुझे याद है इससे मिलता-जुलता सुझाव दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में भोपाल घोषणापत्र में भी किया गया था जिसमें दलितों के सर्वांगीण के लिए कई सुझाव सामने आए थे, लेकिन उसमें भी ठेकेदारी और टेंडरों में दलितों की भागीदारी को ही ज्यादा प्रकाशित किया गया। जाहिर है, ऐसे उपाय दलितों के लिए प्रतीकात्मक तो हो सकते हैं कि उनके समुदाय से कुछेक लोग करोड़पति ठेकेदार हों जाए लेकिन उनकी विशाल आबादी को मुख्यधारा में लाने के लिए बड़े उपाय करने होंगे।
मुझे याद है कि किस तरह बुनियादी ढ़ांचा नजदीक होने से कोई दलित आसानी से आगे बढ़ जाता है। मेरे गांव में हाईस्कूल तक की पढ़ाई होती है। इसका फायदा ये हुआ कि नजदीक में हाईस्कूल होने से मेरे गांव के कई दलित लड़के लड़कियां दसबीं तक पढ़ पाए लेकिन वहीं बगल के गांव में जहां हाईस्कूल नहीं है दलितों के बच्चे प्राइमरी से ज्यादा नहीं पढ़ पाए। मेरे गांव के हाईस्कूल में दूसरे गांव के गैरदलितों के बच्चे भी आते थे जिनमें जागरुकता का स्तर बहुत ज्यादा था। लेकिन दलितों का दुर्भाग्य उनका पीछा यहां भी नहीं छोड़ रहा था, वे प्राइमरी के बाद 12-14 साल की उम्र में अपने मामा या चाचा के साथ दिल्ली-मुम्बई की फैक्ट्रियों, कोठियों और दुकानों में अपना सस्ता श्रम बेचने को रेलगाड़ियों में सबार हो जाते थे।(जारी)
Saturday, May 2, 2009
दलित, समाज, सरकार और हकीकत-2
आजादी के तकरीबन छह दशक बाद भी दलितों की मूल समस्याएं क्या हैं। दलितों की मूल समस्या ये है कि उनके पास अभी भी देश में उपलब्ध भौतिक परिसंपत्तियों का एक बहुत ही छोटा हिस्सा है जिसके फलस्वरुप गरीबी और उससे पैदा हुई तमाम तकलीफों का समना दलितों को करना पड़ता है। गरीबी की वजह से दलितों में भयावह अशिक्षा है, उनकी जन्मदर ज्यादा है और वो सिर्फ शारीरिक श्रम के बदौलत जीवन जीने को अभिशप्त हैं। उनमें अशिक्षा की एक वजह सदियों के शोषण और समाजिक पृथिक्करण-अलगाव-भेदभाव की वजह से कम जागरुकता का होना भी है जैसा कि अन्य समुदायों में नहीं है। तमाम सरकारी कोशिशों के बावजूद अत्यधिक आकांक्षा और संघर्ष के बल पर ही एक दलित आगे बढ़ पाता है। इसको आप सोसलाईजेशन भी कह सकते है। उनके पास उस सोसलाईजेशन का अभाव है जो किसी सवर्ण या पिछड़े को स्वभाविकत: ही तरक्की करने का हौसला देती है।
दलितों में सोशलाईजेशन न होने की मुख्य वजह हमारे समाज की क्रूर संरचना है जिसने उन्हे गांव से अलग या फिर एक खास लोकेलिटी में बसने को मजबूर किया है। वो लोगों से उस तरीके से घुलमिल नहीं पाते जिस तरह से दूसरे वर्ग के बच्चे मिलते जुलते हैं। अभी भी गांवो में दलितों का मेलजोल दूसरे वर्गों के साथ सिर्फ कामकाजी स्तर तक सीमित है, वो समाजिक रुप नहीं ले पाया है। इससे वो उन तमाम अनुभवों, सूचनाओं और रास्तों से बंचित हो जाते हैं जो अन्य समुदायों को सहज सुलभ है। इस बात को शहरी आईने में नहीं समझा जा सकता जहां आईआईटी या दूसरे संस्थानों में सारे बच्चे परस्पर घुलमिल कर रहते हैं। हलांकि यदाकदा वहां भी इस तरह के भेदभाव की खबर आती ही रहती है।
भौतिक परिसंपत्तियों में उनकी भागीदारी और सोशलाईजेशन सिर्फ ऐसी समस्या नहीं है जिसे जादू की छड़ी से दूर की जा सके। दरअसल यह एक मनोविज्ञान है जिसका इलाज सिर्फ सर्वांगीन साक्षरता और समाजिक आन्दोलनों से ही संभव है।
लेकिन सवाल ये है कि भौतिक परिसंपत्तियों में दलितों की भागीदारी कैसे बढ़े ? ध्यान देने की बात ये भी है कि यहां हम खाते पीते शहरी-सरकारी नौकरीवाले दलित की बात नहीं कर रहे। भौतिक परिसंपत्तियों में दलितों की भागीदारी का एक रास्ता देश में सही ढ़ंग से लागू किया गया भूमिसुधार हो सकता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं सका। दूसरा रास्ता ये है कि दलित अपने मेहनत के बल पर जमीन खरीदें और अपनी उत्पादकता बढ़ाएं। लेकिन इस राह में भी तमाम बाधाएं है।
दरअसल, सदियों के छूआछूत की प्रथा की वजह से दलितों का मेलजोल अभीतक जमीन की मल्कियत रखनेवाले वर्गों के साथ नहीं हो पाया है। तकरीबन पूरे हिंदुस्तान की जमीन या तो सवर्णों के कब्जे में हैं या मध्यमवर्ती दबंग जातियों के। ऐसे में जब कोई जमीन बिकता भी है तो वो सवर्णों के हाथ से निकलकर मध्यमवर्ती जातियों के हाथ ही आता है। ऐसा अक्सर होता है कि उचित मूल्य देने का बावजूद एक दलित वो जमीन नहीं खरीद पाता जबकि मध्यमवर्ती जातियां वो जमीन उसी दर पर ले लेती है। ऐसा किसी नीति के तहत भले ही न किया जाता हो, लेकिन समाज की संरचना ही ऐसी है कि अमूमन ऐसा ही होता है।
इसे समझने के लिए कई बातें समझनी आवश्यक है। हमारे देश में जातियों का ऐसा पदानुक्रम बना हुआ है जिसमें दलितों को छूआछूत की वजह से गांवों में कई ऐसे काम नहीं मिल पाते जो वो आसानी से कर सकते हैं। उत्तर भारत में खासकर बिहार की बात करें तो पानी चलनेवाली जातियों का एक सिद्धांत हैं। इसके मुताबिक गैर-दलित जातियों का पानी ब्राह्मण और सवर्ण पी सकते हैं। इसके वजह से घरेलू काम करने और समाजिक मेलजोल बढ़ाने में मध्यमवर्ती जातियों को आसानी होती है जो उनके व्यापक सोशलाईजेशन का आधार है। ये काम दलितों के लिए बर्जित हैं। उदाहरण के लिए एक यादव, कोईरी, कुर्मी या नाई एक ब्राह्मण के घर उसी थाली में या उसी के कप में चाय पी सकता है जबकि दलित ऐसा नहीं कर सकते।
दलितों के साथ इतना अन्याय किया गया है, उन्हे इतना अलग थलग रखा गया है कि किसी भी गैर-दलित का पंडित ब्राह्मण ही होता है लेकिन दलितों के यहां ब्राह्मण पूजा करवाने नहीं जाते। ये ऐसी भयावह स्थिति है जिसमें किसी भी मध्यमवर्ती जाति को सवर्णों के साथ उठने बैठने और घुलने मिलने में आसानी होती है जबकि दलितों के साथ ऐसा नहीं हो पाता। कुल मिलाकर मध्यमवर्ती जातियां, सवर्णों से समाजिक रुप से ज्यादा निकट हैं और इसका फायदा उन्हे तमाम चीजों में मिला है। यहीं पर जब भौतिक संपत्तियों के हस्तांतरण की बात आती है तो दलित पीछे छूट जाता है। उसे लाख काबिलियत के बावजूद इसका एक छोटा सा हिस्सा ही मिल पाता है, और फिर सरकारी प्रयासों का ही आसरा रह जाता है।(जारी)
दलितों में सोशलाईजेशन न होने की मुख्य वजह हमारे समाज की क्रूर संरचना है जिसने उन्हे गांव से अलग या फिर एक खास लोकेलिटी में बसने को मजबूर किया है। वो लोगों से उस तरीके से घुलमिल नहीं पाते जिस तरह से दूसरे वर्ग के बच्चे मिलते जुलते हैं। अभी भी गांवो में दलितों का मेलजोल दूसरे वर्गों के साथ सिर्फ कामकाजी स्तर तक सीमित है, वो समाजिक रुप नहीं ले पाया है। इससे वो उन तमाम अनुभवों, सूचनाओं और रास्तों से बंचित हो जाते हैं जो अन्य समुदायों को सहज सुलभ है। इस बात को शहरी आईने में नहीं समझा जा सकता जहां आईआईटी या दूसरे संस्थानों में सारे बच्चे परस्पर घुलमिल कर रहते हैं। हलांकि यदाकदा वहां भी इस तरह के भेदभाव की खबर आती ही रहती है।
भौतिक परिसंपत्तियों में उनकी भागीदारी और सोशलाईजेशन सिर्फ ऐसी समस्या नहीं है जिसे जादू की छड़ी से दूर की जा सके। दरअसल यह एक मनोविज्ञान है जिसका इलाज सिर्फ सर्वांगीन साक्षरता और समाजिक आन्दोलनों से ही संभव है।
लेकिन सवाल ये है कि भौतिक परिसंपत्तियों में दलितों की भागीदारी कैसे बढ़े ? ध्यान देने की बात ये भी है कि यहां हम खाते पीते शहरी-सरकारी नौकरीवाले दलित की बात नहीं कर रहे। भौतिक परिसंपत्तियों में दलितों की भागीदारी का एक रास्ता देश में सही ढ़ंग से लागू किया गया भूमिसुधार हो सकता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं सका। दूसरा रास्ता ये है कि दलित अपने मेहनत के बल पर जमीन खरीदें और अपनी उत्पादकता बढ़ाएं। लेकिन इस राह में भी तमाम बाधाएं है।
दरअसल, सदियों के छूआछूत की प्रथा की वजह से दलितों का मेलजोल अभीतक जमीन की मल्कियत रखनेवाले वर्गों के साथ नहीं हो पाया है। तकरीबन पूरे हिंदुस्तान की जमीन या तो सवर्णों के कब्जे में हैं या मध्यमवर्ती दबंग जातियों के। ऐसे में जब कोई जमीन बिकता भी है तो वो सवर्णों के हाथ से निकलकर मध्यमवर्ती जातियों के हाथ ही आता है। ऐसा अक्सर होता है कि उचित मूल्य देने का बावजूद एक दलित वो जमीन नहीं खरीद पाता जबकि मध्यमवर्ती जातियां वो जमीन उसी दर पर ले लेती है। ऐसा किसी नीति के तहत भले ही न किया जाता हो, लेकिन समाज की संरचना ही ऐसी है कि अमूमन ऐसा ही होता है।
इसे समझने के लिए कई बातें समझनी आवश्यक है। हमारे देश में जातियों का ऐसा पदानुक्रम बना हुआ है जिसमें दलितों को छूआछूत की वजह से गांवों में कई ऐसे काम नहीं मिल पाते जो वो आसानी से कर सकते हैं। उत्तर भारत में खासकर बिहार की बात करें तो पानी चलनेवाली जातियों का एक सिद्धांत हैं। इसके मुताबिक गैर-दलित जातियों का पानी ब्राह्मण और सवर्ण पी सकते हैं। इसके वजह से घरेलू काम करने और समाजिक मेलजोल बढ़ाने में मध्यमवर्ती जातियों को आसानी होती है जो उनके व्यापक सोशलाईजेशन का आधार है। ये काम दलितों के लिए बर्जित हैं। उदाहरण के लिए एक यादव, कोईरी, कुर्मी या नाई एक ब्राह्मण के घर उसी थाली में या उसी के कप में चाय पी सकता है जबकि दलित ऐसा नहीं कर सकते।
दलितों के साथ इतना अन्याय किया गया है, उन्हे इतना अलग थलग रखा गया है कि किसी भी गैर-दलित का पंडित ब्राह्मण ही होता है लेकिन दलितों के यहां ब्राह्मण पूजा करवाने नहीं जाते। ये ऐसी भयावह स्थिति है जिसमें किसी भी मध्यमवर्ती जाति को सवर्णों के साथ उठने बैठने और घुलने मिलने में आसानी होती है जबकि दलितों के साथ ऐसा नहीं हो पाता। कुल मिलाकर मध्यमवर्ती जातियां, सवर्णों से समाजिक रुप से ज्यादा निकट हैं और इसका फायदा उन्हे तमाम चीजों में मिला है। यहीं पर जब भौतिक संपत्तियों के हस्तांतरण की बात आती है तो दलित पीछे छूट जाता है। उसे लाख काबिलियत के बावजूद इसका एक छोटा सा हिस्सा ही मिल पाता है, और फिर सरकारी प्रयासों का ही आसरा रह जाता है।(जारी)
Thursday, April 30, 2009
दलित, समाज, सरकार और हकीकत-1
हाल के सालों मे कई बातें दलितों और आदिवासियों के हक में अच्छी हुई। भारत सरकार ने आदिवासियों को जंगल की जमीन और उसके उत्पादों पर उनका हक दिलाने के लिए आदिवासी कानून पास किया तो हरियाणा में हुड्डा सरकार ने हरेक दलित परिवार को सौ-सौ गज जमीन घर बनाने के लिए मुफ्त में देने की घोषणा की। बिहार सरकार ने दलितों में से महादलित को खास सुविधाएं देने की घोषणा की हलांकि कई लोग इसे राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। उधर, यूपी में मायावती की सरकार है है, जो कम से कम प्रतीकात्मक महत्व तो रखता ही है।
उधर, एक सर्वे के मुताबिक देश भर में दलित-आदिवासी वर्ग से पिछले पचास साल में कम से कम 50 लाख लोगों को सरकारी नौकरियों में रोजगार मिला है जिसका मतलब यह है कि लगभग 3 करोड़ दलितों-आदिवासियों का एक मध्यमवर्ग बन चुका है।
लेकिन देश की आबादी में लगभग एक चौथाई कि हिस्सेदारी रखनेवाला वर्ग अभी भी बहुत तरक्की नहीं कर पाया है। एक अनुमान के मुताबिक अगर देश की आबादी 115 करोड़ मानी जाए तो दलित-आदिवासियों की आबादी कम से कम 29 करोड़ के आसपास है-लेकिन अभीतक उनमें से लगभग 3-4 करोड़ ही ठीकठाक हालत में आ पाए हैं।
दूसरी तरफ सरकारों के पास हाशिए पर आए इस वर्ग के लिए भले ही योजनाओं का अंबार हो लेकिन तस्वीर अभी भी भयावह है। अभी तक हमारे पास कोई प्रमाणिक सर्वेक्षण मौजूद नहीं है कि देश की जेलों में दलितों-आदिवासियों की फीसदी क्या है, उनकी मृत्युदर क्या है, उनकी साक्षरता क्या है और जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी क्या है। जो सर्वे हैं भी वे तस्वीर के सभी पहलुओं को नहीं छूते और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
हाल ही में मैं बिहार में अपने गांव गया था। मेरे गांव में तकरीबन 60 दलित परिवार हैं जिनमें से 40 का घर उनकी जमीन पर नहीं है। वे या तो सरकारी जमीन पर रहते हैं या पूर्व जमींदारों के जमीन पर। उस जमीन पर उनका कोई कानूनी हक नहीं है, कोई भी अगर उनको जबरन बेदखल कर दे तो वे कुछ नहीं कर पाएंगे। कई दफा दलितों के ही परिवार आपसी झगड़ों में दूसरों के जमीन पर कब्जा कर लेते हैं और वो कुछ कर नहीं पाता क्योंकि कानूनन जमीन उसकी है ही नहीं। सरकार उनको इंदिरा आवास देती है लेकिन वो इंदिरा आवास किस जमीन पर बनेगा इसकी कोई योजना नहीं है।
मैंने ये महसूस किया कि अगर हरेक दलित परिवार को कम से कम घर बनाने के लिए जमीन मिल जाए तो उनको काफी सहूलियत होगी। ऐसा करना मुश्किल भी नहीं है। हिंदुस्तान के हरेक गांव में काफी सरकारी जमीन है जिसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा या दबंगों ने कब्जा कर लिया है। अगर सरकार नरेगा और आदिवासी बिल की तरह संसद में ऐसा कानून पास करे तो ये एक क्रान्तिकारी काम हो सकता है।(जारी)
उधर, एक सर्वे के मुताबिक देश भर में दलित-आदिवासी वर्ग से पिछले पचास साल में कम से कम 50 लाख लोगों को सरकारी नौकरियों में रोजगार मिला है जिसका मतलब यह है कि लगभग 3 करोड़ दलितों-आदिवासियों का एक मध्यमवर्ग बन चुका है।
लेकिन देश की आबादी में लगभग एक चौथाई कि हिस्सेदारी रखनेवाला वर्ग अभी भी बहुत तरक्की नहीं कर पाया है। एक अनुमान के मुताबिक अगर देश की आबादी 115 करोड़ मानी जाए तो दलित-आदिवासियों की आबादी कम से कम 29 करोड़ के आसपास है-लेकिन अभीतक उनमें से लगभग 3-4 करोड़ ही ठीकठाक हालत में आ पाए हैं।
दूसरी तरफ सरकारों के पास हाशिए पर आए इस वर्ग के लिए भले ही योजनाओं का अंबार हो लेकिन तस्वीर अभी भी भयावह है। अभी तक हमारे पास कोई प्रमाणिक सर्वेक्षण मौजूद नहीं है कि देश की जेलों में दलितों-आदिवासियों की फीसदी क्या है, उनकी मृत्युदर क्या है, उनकी साक्षरता क्या है और जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी क्या है। जो सर्वे हैं भी वे तस्वीर के सभी पहलुओं को नहीं छूते और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
हाल ही में मैं बिहार में अपने गांव गया था। मेरे गांव में तकरीबन 60 दलित परिवार हैं जिनमें से 40 का घर उनकी जमीन पर नहीं है। वे या तो सरकारी जमीन पर रहते हैं या पूर्व जमींदारों के जमीन पर। उस जमीन पर उनका कोई कानूनी हक नहीं है, कोई भी अगर उनको जबरन बेदखल कर दे तो वे कुछ नहीं कर पाएंगे। कई दफा दलितों के ही परिवार आपसी झगड़ों में दूसरों के जमीन पर कब्जा कर लेते हैं और वो कुछ कर नहीं पाता क्योंकि कानूनन जमीन उसकी है ही नहीं। सरकार उनको इंदिरा आवास देती है लेकिन वो इंदिरा आवास किस जमीन पर बनेगा इसकी कोई योजना नहीं है।
मैंने ये महसूस किया कि अगर हरेक दलित परिवार को कम से कम घर बनाने के लिए जमीन मिल जाए तो उनको काफी सहूलियत होगी। ऐसा करना मुश्किल भी नहीं है। हिंदुस्तान के हरेक गांव में काफी सरकारी जमीन है जिसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा या दबंगों ने कब्जा कर लिया है। अगर सरकार नरेगा और आदिवासी बिल की तरह संसद में ऐसा कानून पास करे तो ये एक क्रान्तिकारी काम हो सकता है।(जारी)
Tuesday, April 28, 2009
लालूजी, आपकी चिंता जायज है....
किसी ने कहा कि लालू पिछले ൨൦ सालों में पहली बार बौखलाए हुए दिख रहें हैं। नब्बे के दशक में जातीय रैली करने वाले और बयानवाजी करनेवाले लालू इतने असुरक्षित कभी नहीं दिखे जितना इस चुनाव में दिख रहे हैं। टीवी चैनलों पर उनकी बाडी लेंग्वेज और अखबारों में उनकी तस्वीर उनकी चुगली कर रही है। एक जमाना था जब लालू ने कथित तौर पर कहा था कि 'भूराबाल' साफ करो जिसका बेहतरीन लाभ भी उनको मिला था। हलांकि लालू इस बात से अब इंकार करते हैं। अब बीस साल बाद लालू ने कुछ इसी तरह का नारा दिया कि वरुण गांधी पर बुलडोजर चलवा देंगे। ये लालू की बढ़ती असुरक्षा का प्रतीक है।
इसकी वजहें भी हैं। बिहार में मुस्लिम मतों का बड़े पैमाने पर विभाजन हो रहा है, ऐसा यूपी में भी हो रहा है। इसकी वजह ये है कि लालू और मुलायम लगातार मुस्लिम मतों का भयादोहन करते रहे हैं, जबकि पिछले दो-तीन सालों से नीतीश और मायावती के राज में मुसलमान उस तरह से भयाक्रांत नहीं है। जब मुसलमान भयाक्रांत नहीं होता है तो वो भले ही नीतीश को वोट न करे, लेकिन वो अपनी मर्जी से गैर-बीजेपी उम्मीदवार को वोट दे ही सकता है। लालू यहीं पर फंस गए हैं। पांच-पांच मुसलमान उम्मीदवार उतारने के बावजूद लालू को यकीन नहीं कि मुसलमानों का सारा वोट उनको मिल ही जाएगा। दूसरी बात ये कि कांग्रेस के पिछले पांच साला केंद्रीय शासन से मुसलमानों का एक बड़ा तबका कांग्रेस की तरफ आकर्षित हुआ है। दूसरी बात ये कि लालू ने कई सिटींग कांग्रेसी सीट पर भी अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। मुसलमान इस खुन्नस भरी कार्रवाई से नाराज है। उदाहरण के लिए मधुबनी लोकसभा सीट से लालू ने अपने प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी को टिकट दे दिया है, जिससे शकील अहमद के जीतने की संभावना धूमिल हो गई है। मुसलमान इसे गलत मानता है।
लेकिन लालू को इतने घवराने की जरुरत नहीं है। अभी भी उनके पास एक हिलता डुलता ही सही, वोटबैंक है और नीतीश ने कई कमजोर उम्मीदवार उतारकर उनकी राह थोड़ी सी आसान कर दी है। लेकिन नीतीश कुमार ने पीछले तीन साल में जो छवि बनाई है, लालू उससे पार हो पाएंगे-कहना मुश्किल है।
इसकी वजहें भी हैं। बिहार में मुस्लिम मतों का बड़े पैमाने पर विभाजन हो रहा है, ऐसा यूपी में भी हो रहा है। इसकी वजह ये है कि लालू और मुलायम लगातार मुस्लिम मतों का भयादोहन करते रहे हैं, जबकि पिछले दो-तीन सालों से नीतीश और मायावती के राज में मुसलमान उस तरह से भयाक्रांत नहीं है। जब मुसलमान भयाक्रांत नहीं होता है तो वो भले ही नीतीश को वोट न करे, लेकिन वो अपनी मर्जी से गैर-बीजेपी उम्मीदवार को वोट दे ही सकता है। लालू यहीं पर फंस गए हैं। पांच-पांच मुसलमान उम्मीदवार उतारने के बावजूद लालू को यकीन नहीं कि मुसलमानों का सारा वोट उनको मिल ही जाएगा। दूसरी बात ये कि कांग्रेस के पिछले पांच साला केंद्रीय शासन से मुसलमानों का एक बड़ा तबका कांग्रेस की तरफ आकर्षित हुआ है। दूसरी बात ये कि लालू ने कई सिटींग कांग्रेसी सीट पर भी अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। मुसलमान इस खुन्नस भरी कार्रवाई से नाराज है। उदाहरण के लिए मधुबनी लोकसभा सीट से लालू ने अपने प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी को टिकट दे दिया है, जिससे शकील अहमद के जीतने की संभावना धूमिल हो गई है। मुसलमान इसे गलत मानता है।
लेकिन लालू को इतने घवराने की जरुरत नहीं है। अभी भी उनके पास एक हिलता डुलता ही सही, वोटबैंक है और नीतीश ने कई कमजोर उम्मीदवार उतारकर उनकी राह थोड़ी सी आसान कर दी है। लेकिन नीतीश कुमार ने पीछले तीन साल में जो छवि बनाई है, लालू उससे पार हो पाएंगे-कहना मुश्किल है।
Thursday, April 23, 2009
कांग्रेस, बीजेपी और चुनाव प्रचार
यूं तो चुनाव प्रचार की अहमियत विकसित देशों में भी काफी होती है, लेकिन पिछड़ापन, गरीबी और अशिक्षा से ग्रस्त देशों में चुनाव प्रचार कुछ ज्यादा ही मायने रखता है। यहां मतदाताओं के एक बड़े तबके को प्रचार, पैसा और संसाधनों के बल पर आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। मौजूदा लोकसभा चुनाव के प्रचार पर अगर गौर करें तो साफ हो जाता है कि कांग्रेस तमाम सकारात्मक चीजों के बावजूद इस मायने में बीजेपी से पिछड़ रही है।
बात करें अगर इलेक्ट्रानिक, होर्डिंग्स और इंटरनेट पर बीजेपी के प्रचार की तो ये कांग्रेस से कई गुना ज्यादा आक्रामक,भावुक और आकर्षक है। बीजेपी ने बड़ी चतुराई से अपने परंपरागत वोटरों को हिंदुत्व का संदेश दिया है, ये टेलिविजन पर उसके प्रचार अभियान से साफ है। एक अपुष्ट खबर के मुताबिक बीजेपी का चुनाव प्रचार बजट भी कांग्रेस से ज्यादा है, हलांकि इसकी सत्यता में संदेह है।
पांच साल सत्ता में रहने और आम जनता के हित में काफी काम करने के बावजूद कांग्रेस उन कामों को जनता में भुना नहीं पा रही। वो बीजेपी को उस तरह नहीं घेर रही जिसकी उम्मीद उससे की जाती है। नरेगा, दोपहर का भोजन, किसानों की ऋण माफी और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट सिर्फ राहुल और सोनिया के जुबान से निकलते हैं। पार्टी संस्थागत रुप से इस के प्रचार पर अमल नहीं कर रही।
दूसरी तरफ कांग्रेस ने अपने अपने प्रचारकों की फौज भी सीमित कर रखी है। उसके पास राहुल और सोनिया ही स्टार प्रचारक हैं जिसमें सोनिया गांधी की हिंदी लोगों के लिए एक बड़ी कठिनाई है। कांग्रेस ने अपने बड़े नेताओं प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, शीला दीक्षित जैसों को ज्यादा अहिमियत नहीं दी है। इसके उलट बीजेपी के पास नेताओं की एक कतार हैं जो संवाद की कला में माहिर है। वो टेलिविजन स्टूडियों से लेकर आम जनसभाओं तक में लोगों को अपनी भाषण कला से प्रभावित करते हैं।
इसके अलावे बीजेपी उस दिशा में कांग्रेस को फंसाना चाहती है जिससे पूरी की पूरी सियासत गैर-भाजपावाद पर निर्भर हो जाए। भाजपा खुद ही इस चुनाव का केंद्र बनना चाहती है। बीजेपी नेताओं का मनमोहन सिंह को कमजोर और कांग्रेस को बुढ़िया बताने का बयान इसी दिशा में दी गई एक सोंची समझी चाल है। कांग्रेस के मीडिया मैनेजर इस बात को समझ नहीं रहे और सोनिया मनमोहन सिंह आडवाणी को जवाब देने में लग गए हैं। बीजेपी चाहती है कि सियासत का एजेंडा वो तय करे। वो चाहती है कि कांग्रेस सिर्फ उसके आरोपों का जवाब देती फिरती रहे और अपनी सारी उर्जा अपने सकारात्मक कामों के प्रचार में न लगाए। कांग्रेस इस चाल में फंसती जा रही है। ये भगवा पार्टी का घोषित लक्ष्य है कि चुनाव ध्रुवीकृत हो, क्योंकि खंडित जनादेश कांग्रेस के पक्ष में जाएगा जबकि ध्रुवीकृत जनादेश बीजेपी की जागीर है।
हलांकि इतना तय है कि हिंदुस्तान जैसे विविधताओं वाले देश में जहां जनता अपनी पूर्व धारणा के मुताबिक ही मतदान करती है वहां ऐसे प्रचार व्यापक बदलाव नहीं लाते लेकिन जहां 10-20 सीटों से सरकार बनने बिगड़ने की बात हो वहां इस प्रचार का अपना महत्व तो है ही।
बात करें अगर इलेक्ट्रानिक, होर्डिंग्स और इंटरनेट पर बीजेपी के प्रचार की तो ये कांग्रेस से कई गुना ज्यादा आक्रामक,भावुक और आकर्षक है। बीजेपी ने बड़ी चतुराई से अपने परंपरागत वोटरों को हिंदुत्व का संदेश दिया है, ये टेलिविजन पर उसके प्रचार अभियान से साफ है। एक अपुष्ट खबर के मुताबिक बीजेपी का चुनाव प्रचार बजट भी कांग्रेस से ज्यादा है, हलांकि इसकी सत्यता में संदेह है।
पांच साल सत्ता में रहने और आम जनता के हित में काफी काम करने के बावजूद कांग्रेस उन कामों को जनता में भुना नहीं पा रही। वो बीजेपी को उस तरह नहीं घेर रही जिसकी उम्मीद उससे की जाती है। नरेगा, दोपहर का भोजन, किसानों की ऋण माफी और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट सिर्फ राहुल और सोनिया के जुबान से निकलते हैं। पार्टी संस्थागत रुप से इस के प्रचार पर अमल नहीं कर रही।
दूसरी तरफ कांग्रेस ने अपने अपने प्रचारकों की फौज भी सीमित कर रखी है। उसके पास राहुल और सोनिया ही स्टार प्रचारक हैं जिसमें सोनिया गांधी की हिंदी लोगों के लिए एक बड़ी कठिनाई है। कांग्रेस ने अपने बड़े नेताओं प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, शीला दीक्षित जैसों को ज्यादा अहिमियत नहीं दी है। इसके उलट बीजेपी के पास नेताओं की एक कतार हैं जो संवाद की कला में माहिर है। वो टेलिविजन स्टूडियों से लेकर आम जनसभाओं तक में लोगों को अपनी भाषण कला से प्रभावित करते हैं।
इसके अलावे बीजेपी उस दिशा में कांग्रेस को फंसाना चाहती है जिससे पूरी की पूरी सियासत गैर-भाजपावाद पर निर्भर हो जाए। भाजपा खुद ही इस चुनाव का केंद्र बनना चाहती है। बीजेपी नेताओं का मनमोहन सिंह को कमजोर और कांग्रेस को बुढ़िया बताने का बयान इसी दिशा में दी गई एक सोंची समझी चाल है। कांग्रेस के मीडिया मैनेजर इस बात को समझ नहीं रहे और सोनिया मनमोहन सिंह आडवाणी को जवाब देने में लग गए हैं। बीजेपी चाहती है कि सियासत का एजेंडा वो तय करे। वो चाहती है कि कांग्रेस सिर्फ उसके आरोपों का जवाब देती फिरती रहे और अपनी सारी उर्जा अपने सकारात्मक कामों के प्रचार में न लगाए। कांग्रेस इस चाल में फंसती जा रही है। ये भगवा पार्टी का घोषित लक्ष्य है कि चुनाव ध्रुवीकृत हो, क्योंकि खंडित जनादेश कांग्रेस के पक्ष में जाएगा जबकि ध्रुवीकृत जनादेश बीजेपी की जागीर है।
हलांकि इतना तय है कि हिंदुस्तान जैसे विविधताओं वाले देश में जहां जनता अपनी पूर्व धारणा के मुताबिक ही मतदान करती है वहां ऐसे प्रचार व्यापक बदलाव नहीं लाते लेकिन जहां 10-20 सीटों से सरकार बनने बिगड़ने की बात हो वहां इस प्रचार का अपना महत्व तो है ही।
Saturday, April 18, 2009
मेरी शुभकामनाएं नीतीश के साथ है...
आमतौर पर लोग मान रहे हैं कि बिहार में इसबार नीतीश के सुशासन से लालू चारो खाने चित्त हो जाएंगे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और भी हो सकती है। नीतीश कुमार की लोकप्रियता उफान पर है इसमें कोई दो मत नहीं लेकिन उन्होने कुछ ऐसी गलतियां की हैं जिससे उन्हे लेने के देने पड़ सकते हैं। लोकप्रियता और प्रचार में नीतीश कुमार भले बीस हों लेकिन टिकटों के बंटवारे में उन्होने चूक कर दी है। लालू यादव के मुकाबले नीतीश के उम्मीदवार हल्के और नए हैं साथ ही इसमें समाजिक समीकरणों की भी अनदेखी की गई है।
नीतीश कुमार ने ऐसा इसलिए किया है उन्हे यकीन है कि ये चुनावी बैतरणी वे अपनी इमेज के बल पर पार हो जाएंगे। दूसरी वजह इसकी ये है कि उन्हे अपने पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गजों को दरवाजा भी दिखाना था। ये कुछ ऐसी गलती है जो किसी के गले नहीं उतर रही। बिहार की जनता को ये बात अभी तक गले नहीं उतर रही की जार्ज, दिग्विजय, नीतीश मिश्र और नागमणि को क्यों चलता कर दिया गया। नीतीश कुमार के पास इस बात को कोई माकूल जवाब नहीं है। आज नीतीश कुमार के पास शरद यादव जैसे जनाधारहीन नेता हैं और लल्लन सिंह नंबर दो बन गए हैं जो उनके सचिव-वत थे।
नीतीश कुमार कुछ-कुछ उसी तरह से अपनी पार्टी में दबदबा बनाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं जैसा कि लालू ने नब्बे की दशक के शुरुआत में किया था। लेकिन लालू को मंडल के दौर में समाज के व्यापक वर्ग का समर्थन थाली में परोस कर मिला था ये बात शायद नीतीश भूल रहे हैं। नीतीश का आधार संवेदनशील है, उसमें कमिटमेंट का अभाव है और बहुत हदतक लालू विरोध की नकारात्मकता से ग्रस्त भी है। वो नीतीश के लिए अभी तक सकारात्मक वोट नहीं बन पाया है चाहे ऊपर से वो उनके विकास की कितनी भी तारीफ करे।
हां, नीतीश ने अत्यंत पिछड़ों में अपना आधार जरुर मजबूत किया है जिसकी आबादी अहम है।लेकिन इस चक्कर में नीतीश ने ब्राह्मणों को नाराज कर दिया है जो उनका आधार वोट था। लोकसभा की तकरीबन बीस सीटों पर अपना प्रभाव डालने वाले ब्राह्मणों को जेडी-यू ने एक भी टिकट नहीं दिया। इसके अलावे पार्टी से कोईरियों के कद्दावर नेता नागमणि का इस्तीफा भी नीतीश पर भारी पड़ सकता है। राजपूत इसलिए खफा हैं कि जेडी-यू में भुमिहारों का दबदबा बढ़ गया है।
तो फिर नीतीश ने किसके भरोसे दांव खेला है? इतना तय है कि अगर अति पिछड़ों का पूरा वोट उन्हे मिल गया तो फिर उन्हे रोकनेवाला कोई नहीं है, लेकिन अगर उसमें अभी भी लालू ने हिस्सेदारी जता दी तो फिर नीतीश की सारी सड़के और बिजली के पोल धरे के धरे रह जाएंगे।
ये लेख चुनावी संभावनाओं को लेकर है, अलबत्ता ये भी तय है कि बिहार को अभी तक नीतीश जैसा प्रशासक नहीं मिला था। मेरी शुभकामनाएं नीतीश के साथ है।
नीतीश कुमार ने ऐसा इसलिए किया है उन्हे यकीन है कि ये चुनावी बैतरणी वे अपनी इमेज के बल पर पार हो जाएंगे। दूसरी वजह इसकी ये है कि उन्हे अपने पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गजों को दरवाजा भी दिखाना था। ये कुछ ऐसी गलती है जो किसी के गले नहीं उतर रही। बिहार की जनता को ये बात अभी तक गले नहीं उतर रही की जार्ज, दिग्विजय, नीतीश मिश्र और नागमणि को क्यों चलता कर दिया गया। नीतीश कुमार के पास इस बात को कोई माकूल जवाब नहीं है। आज नीतीश कुमार के पास शरद यादव जैसे जनाधारहीन नेता हैं और लल्लन सिंह नंबर दो बन गए हैं जो उनके सचिव-वत थे।
नीतीश कुमार कुछ-कुछ उसी तरह से अपनी पार्टी में दबदबा बनाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं जैसा कि लालू ने नब्बे की दशक के शुरुआत में किया था। लेकिन लालू को मंडल के दौर में समाज के व्यापक वर्ग का समर्थन थाली में परोस कर मिला था ये बात शायद नीतीश भूल रहे हैं। नीतीश का आधार संवेदनशील है, उसमें कमिटमेंट का अभाव है और बहुत हदतक लालू विरोध की नकारात्मकता से ग्रस्त भी है। वो नीतीश के लिए अभी तक सकारात्मक वोट नहीं बन पाया है चाहे ऊपर से वो उनके विकास की कितनी भी तारीफ करे।
हां, नीतीश ने अत्यंत पिछड़ों में अपना आधार जरुर मजबूत किया है जिसकी आबादी अहम है।लेकिन इस चक्कर में नीतीश ने ब्राह्मणों को नाराज कर दिया है जो उनका आधार वोट था। लोकसभा की तकरीबन बीस सीटों पर अपना प्रभाव डालने वाले ब्राह्मणों को जेडी-यू ने एक भी टिकट नहीं दिया। इसके अलावे पार्टी से कोईरियों के कद्दावर नेता नागमणि का इस्तीफा भी नीतीश पर भारी पड़ सकता है। राजपूत इसलिए खफा हैं कि जेडी-यू में भुमिहारों का दबदबा बढ़ गया है।
तो फिर नीतीश ने किसके भरोसे दांव खेला है? इतना तय है कि अगर अति पिछड़ों का पूरा वोट उन्हे मिल गया तो फिर उन्हे रोकनेवाला कोई नहीं है, लेकिन अगर उसमें अभी भी लालू ने हिस्सेदारी जता दी तो फिर नीतीश की सारी सड़के और बिजली के पोल धरे के धरे रह जाएंगे।
ये लेख चुनावी संभावनाओं को लेकर है, अलबत्ता ये भी तय है कि बिहार को अभी तक नीतीश जैसा प्रशासक नहीं मिला था। मेरी शुभकामनाएं नीतीश के साथ है।
Monday, April 13, 2009
तो मामला महज 20 सीटों का है......
ये तो पक्की बात है कि सरकार वही बनाएगा जो आंकड़ों के खेल में बीस होगा। अब वो आंकड़ा क्या है ? बहुत पहले तक वो 272 होता था, लेकिन नोटों, स्वार्थों और कलाबाजियों के दौर में वह घटकर लगभग 200 रह गया है। यानी जो भी गठबंधन 200 ले आएगा, सरकार बना लेगा। यहां चकराने की जरुरत बिल्कुल नहीं है। जी हां, 50-60 सीट दोनों ही गठबंधन चुटकी में जुगाड़ लेगी, ये उन्हे पता है। कांग्रेस के लिए वाम और बीजेपी के लिए चंद्राबाबू-जयललिता इतनी सीटें थाली में लेकर बैठी हुईं हैं। हां, मुद्रास्फीति के इस दौर में कीमत कुछ ज्यादा हो सकती है।
अब सवाल ये है कि वो 200 सीटे किसके पास है। सवाल यहां आकर थोड़ा टेढ़ा हो जाता है। पूरे देश में लगभग सवा दो सौ सीटों पर भाजपा और कांग्रेस की सीधी भिड़ंत हैं इसमें शामिल हैं-हिमाचल(4), उत्तराखंड(4) राजस्थान(25), गुजरात(21) मध्यप्रदेश(29) छत्तीसगढ़(11) कर्नाटक(28) दिल्ली(7) झारखंड (12), महाराष्ट्र (48) असम(14), पंजाब(13), हरियाणा(10), गोवा(2) अरुणाचल प्रदेश(2), और इस भिड़ंत में भाजपा बीस दिख रही है। कहने का मतलब ये कि भाजपा यहां से तकरीबन 120 से 130 सीटें जीत सकती है। इसके आलावे बिहार(40), यूपी(80) और उड़ीसा(21) की वो 140 सीटें हैं जहां भाजपा कमजोर नहीं हैं। इसमें भाजपा गठबंधन 50 तक सीटें अपनी झोली में डाल सकती है। और छिटपुट सीटें पार्टी, केरल, तमिलनाडू आंध्रप्रदेश में भी लाएगी। तो बदतरीन हालात में भी पार्टी 180 सीटों से ऊपर है। हलांकि अभी भी वो 200 से नीचे है लेकिन नजदीक दिखती है।
अब जरा कांग्रेस के आंकड़ों पर गौर करें। सबसे ऊपर के सवा दो सौ सीटों में कांग्रेस के पास पाने को ज्यादा नहीं है। जो उम्मीद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात में पार्टी ने पाल रखी थी, उसमें भाजपा ने अपने तमाम ढ़ीले नट-वोल्ट कस दिए हैं। राजस्थान और दिल्ली को लेकर पार्टी खुशफहमी पाल सकती है, लेकिन भाजपा ने बड़ी तेजी से डेमेज कंट्रोल किया है। उसकी विधानसभा में हार आपसी कलह से ज्यादा, कांग्रेस की काबिलियत से कम हुई थी। एक निर्मम समीक्षा यह भी कहता है कि कांग्रेस खुद 100 सीट जीतने की हालत में नहीं है,जबकि यूपीए जो कि कागजों पर ही बचा है, 150 पर अटक सकता है।
कांग्रेस की उम्मीदें उड़ीसा और बंगाल और केरल से है। बंगाल और केरल में तो वह तरक्की पर है लेकिन उड़ीसा में भाजपा कमजोर नहीं। उसने अपना साम्प्रदायिक होमवर्क करके काफी सोच समझकर नवीन पटनायक से पल्ला झाड़ा है। भाजपा वहां इस हालात में है कि वो सूबे को अगला कर्नाटक बनाने की राह पर है। दो-तीन चुनावों में खंडित जनादेश-और फिर सूबे पर कब्जा भाजपा की रणनीति है। चुनाव के बाद नवीन पटनायक भाजपा के सबसे विश्वस्त सहयोगी बनने को फिर से अभिशप्त हो सकते हैं।
अब भाजपा को जो 20-30 सीटों की कमी महसूस हो रही है उसे वो आक्रामक चुनाव प्रचारों से पाटना चाहती है। पार्टी का वार रुम कांग्रेस से बेहतर है। टीवी चैनल से लेकर वेबसाईट तक पर भाजपा कांग्रेस पर भारी है। उसके पास प्रचारकों की एक सीरीज है जबकि कांग्रेस के पास महज सोनिया-राहुल हैं। हलांकि मुद्दे, संसाधन और हालात कांग्रेस के पक्ष में ज्यादा थे, लेकिन पार्टी उसका फायदा नहीं उठा पा रही। रोजगार गारंटी योजना, किसानों की कर्ज़ माफी, दोपहर का भोजन, सर्व शिक्षा अभियान और ग्रामीण विद्युतीकरण को कांग्रेस मतदाताओं को बेच नहीं पा रही।
दूसरी तरफ भाजपा चाहती है कि चुनाव ध्रुवीकृत हो। वो चाहती है कि बीजेपी खुद मुद्दा बन जाए। इसमें आडवाणी की टीम सफल दिख रही है। पहले वरुण गांधी का बयान, फिर आडवाणी का मनमोहन को डिवेट की चुनौती, फिर मोदी का बुढ़िया-गुड़िया प्रकरण बीजेपी की शातिर चाल है, जिसमें कांग्रेस फंसती जा रही है। खंडित जनादेश कांग्रेस के पक्ष में जाएगा, जबकि ध्रुवीकृत जनादेश भाजपा की जागीर है। भाजपा इसी चक्कर में है। तो मामला अब महज 20 सीटों का रह गया है।
Monday, February 23, 2009
कुत्ता, मंदी....एक्सेक्ट्रा...!
अचानक कुत्ते का जिक्र आया। यों दिल्ली में रहते-रहते ‘कुत्ते’ हमारी ज़िंदगी में कम ही दखल देते हैं, सिवाय इसके की कटवारिया सराय की छतों से रात को कभी-2 नवजात कुत्तों के कोंकियाने की आवाज़ आती है (गौरतलब है कि जमीन पर उनके लिए न्यूनतम जगह है, बाईक और कारों ने उन्हे रिप्लेस कर दिया है)। राजीव ने कहा कि उसके पिताजी ने दो ब्रांडेड कुत्ते पाल लिए हैं, तो मंदी के इस मौसम में मेरा चौंकना लाजिमी था। राजीव के पापा ने जो कुत्ते पाले हैं वो खालिस कुलीन हैं - पिता की तरफ से सात पीढ़ी से जर्मन और मां की तऱफ से फ्रेंच। राजीव ने संक्षेप में कुत्ता महात्म्य समझाया और कहा कि कुत्तों से लगाव एक ख़तरनाक बीमारी है। कुत्तों के सानिध्य में रहने से आपकी क्रिएटिव क्षमता बढ़ जाती है, और आप ज्यादा कल्पनाशील हो जाते हैं वगैरह वगैरह। मेरा मानना है कि अब राजीव की शादी में दहेज ज्यादा मिलेगा, वजह- लड़के के घर दो-दो खानदानी कुत्ते हैं। अब राजीव अपनी शादी के विज्ञापन में लिख सकता है कि Bridegroom working with India’s No. 1 news channel and having two Labradors, father working with a top University of India’s one of the eastern states. आजकल के हिसाब से जहां वर-वधू की मानसिकताओं में कम से कम दूरी को आदर्श माना जाता है ,वहीं ये भी खयाल रखा जाता है कि दोनों एक दूसरे की संवेदनाओं का खयाल रखें। ऐसे में राजीव की होनेवाली दुल्हन ऐसी होनी चाहिए जिसके घर में कम से दो खानदानी कुतिया जरुर हो।
इधर एक भाई ने दावा किया कि पटना में दिल्ली से ज्यादा कुत्ते हैं। मैंने पूछा कैसे तो उसका कहना था गंगा के तट पर रोज कम से कम दस हजार से कम कुत्ते क्या बैठते होंगे। मैंने विरोध किया कि नहीं, दिल्ली के वसंत विहार में ही उतने के करीब कुत्तें होंगे। लेकिन मित्र ने उन कुत्तों को ‘कुत्ते’ मानने से इनकार कर दिया। एक आइडिया ये भी था कि अगर कुत्ते, मनुष्य मात्र के सबसे प्राचीन और भरोसेमंद साथी हैं तो अलग-अलग इलाकों के कुत्ते अलग जुबान बोलते होंगे। मसलन पटना के कुत्तें मगही और झांसी के कुत्ते बुंदेलखंडी। राजीव के छोटे भाई संजीव का दावा है कि जेएनयू के कुत्तों को मार्क्स की थ्योरी पूरी रटी रटाई होगी और झंडेवालान के कुत्ते जुबान से क्या रंगरुप से भी भगवे होंगे। कोई ताज्जुब नहीं कि ऐसा किसी शोध में सामने आ ही जाए।
बहरहाल एक बात जो तय है कि बड़े शहर ‘कुत्तों’ के लिहाज से ज्यादा मुफीद नहीं हैं। यहां उनके लिए लोकतंत्र नहीं है। यहां ‘कुत्तें’ नहीं रह सकते, अलबत्ता ‘भेड़ियों’ के लिए ये जगह काफी सही है। ऐसे में जब कभी संजीव पिल्लों की आवाज की नकल करता है, तो मुझे वो वैसे ही बैचेन कर देता है, जैसे कभी-कभी दिल्ली में रहकर भी चिड़ियों की चहचहाहट का अरसे तक न सुन पाना।
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