Tuesday, June 24, 2008

प्राची पाठक के बहाने अपनी कहानी...

बात 2007 की है..मैंने एक न्यूज वेबसाईट ज्वाईन किया था। मेरा काम डेस्क का था और मुझे आउटस्टेशन रिपोर्टर की रिपोर्ट एडीट करनी होती थी। कलकत्ता से कुछ अच्छी स्टोरीज आ रही थी और उसके रिपोर्टर का नाम सबके जुबां पर था। ज्वाईन करने के चार दिन बाद ही मुझे उससे बात करना पड़ा। कान में एक संयमित, परिपक्व और मन को तरंगित करनेवाली आवाज सुनाई दी। हेलो...मैं प्राची बोल रही हूं...प्राची पाठक फ्रॉम कोलकाता ब्यूरो...मेरी उससे थोड़ी देर बात होती रही..फिर रुक रुक के अक्सर बात होती थी। लेकिन बातों का दायरा बिल्कुल प्रोफेशनल था।िनजी बातें करने का मौका ही नहीं था। पांच महिना बीत चुका था। ऑफिस में मेरा वक्त खराव चल रहा था। टेक्निकल डाइरेक्टर से मेरा पंगा हो गया था। वो नं-एक का शरावी था और उसने मेरे साथ बदतमीजी की थी। मैनें उसकी शिकायत की,लेकिन मेनेजमेंट ने उसकी सुनी..और मुझे बड़ी मुलायम आवाज में रिजाइन देने को कहा गया। मैनें रिजाइन कर दिया।अब फिर से मै सड़क पर था। लेकिन प्राची से मेरी बात होती रहती थी।
मैं नौकरी खोजने के लिए उस वक्त परेशान था। मेरे पास देश के सबसे बड़े मीडिया स्कूल का डिप्लोमा था लेकिन नौकरी नही थी। और वो इसलिए कि मैं नेटवर्क बनाने की कला नहीं जानता था और शायद थोड़े अंतर्मुखी स्वभाव का था। बहरहाल, काफी मशक्कत के बाद मैने इंडिया न्यूज ज्वाईन किया। बेरोजगारी के दौर में मैने अपने घर वालों को कभी नहीं बताया कि मैने नौकरी छोड़ दी है। दोस्तों और अपने भैया की मदद से मै किसी तरह अपनी गाड़ी खींच रहा था। मेरे मानसिक तनाव के उन दिनों में दोस्तों ने अगर मदद न की होती तो मै आज बिखर गया होता। उनमें मेरे दो-तीन नजदीकी दोस्त और प्राची का नाम सबसे उपर है..जिनसे बात करके लगता था कि अपने उपर का विश्वास जिंदा है।प्राची का फोटो मैने ऑरकुट पर देखा था। एक बला की खूबसूरत लड़की..जिसका सपना जर्नलिज्म के इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाना था..वो कोलकाता के माहौल में शायद घुटन महसूस कर रही थी। उसके पापा पूर्वी यूपी से ताल्लुक रखते हैं और कोलकाता में चार्टर एकांउन्टेट हैं। प्राची ने कोलकाता युनिवर्सिटी से हिंदी में एम ए और मास कॉम किया है। उसकी अंग्रेजी पर बेहतरीन पकड़ है। उससे मेरी बात, शुरु में चैट पर होती थी..और उसका कॉमन टापिक होता था-लिटरेचर। प्राची ने लिटरेचर में एमए किया था और मेरी लिटरेचर में दिलचस्पी थी। लेकिन धीरे-2 मैं प्राची से खुलता गया। शायद मैं सोचता था कि मैं प्राची जैसी लड़की से बहुत देर से मिला हूं...प्राची ने मुझे बताया था कि वो एक पंजाबी लड़के को पसंद करती थी जिसका प्राची के घर वाले काफी विरोध कर रहे थे। एक वजह ये भी थी कि मुझे लगता था कि प्राची ब्राह्मण परिवार से है...इसलिए उससे दोस्ती करने में कोई बुराई नहीं है। ये एक जेएनयू कैम्पस में पढ़े और दुनिया भर की बड़ी-2 बातें करने वाले लड़के की कायरता भरी स्वीकारोक्ति है कि वो अपनी जाति के लड़की को देखकर उत्साहित हो जाता है।..क्या इसमें मेरी गलती है कि मैं अंतर्जातीय विवाह की बात करता हूं तो मेरे मां की तबीयत खराव हो जाती है...या ये अभी तक परंपराओं और कस्वाई मानसिकता में चिपके रहने का नतीजा है। और सबसे बड़ी बात ये कि क्या ये एक बहाना नहीं है??...
बहरहाल..बात प्राची की हो रही थी। इधर प्राची से कुछ ज्यदा बात होने लगी है।कई बातें..जो अपने बॉस की आलोचना से शुरु होकर...अपने मम्मी-पापा और करियर के नए एवेन्यू खोजने तक होते हैं। मेरी दीदी ने कैलिफोर्निया से मेरी भांजी की तस्वीर भेजी है जो प्राची को काफी पसंद है..उसकी भी भतीजी मेरी भांजी के उम्र की ही है...उसके भैया-भाभी दुबई में है..प्राची अपने लाडली भतीजी की ढ़ेरों कहांनिया सुनाती है। शायद लड़कियां ऐसी ही होती है। मुझे भी बच्चों से प्यार है...लेकिन अपनी प्रज्ञा की चर्चा से ज्यादा मुझे ओबामा और मनमोहन सिंह के भविष्य की चिंता होती है। प्राची ने अपने फोटो ऑरकुट से हटा दिए हैं..जिसमें वो  खूबसूरत पंजाबी लड़का भी था। शायद..आजकल दोनों में कुछ मतभेद हो गया है और वह लड़का उस पर अपनी मर्जी थोपने लगा है। प्राची को उड़ने के लिए अनंत आसमान चाहिए.. उसे पिंजड़े में नहीं बांधा जा सकता..और प्राची का आसमान दिल्ली की मीडिया में है। मैं अपनी भरसक उसकी मदद करना चाहता हूं। लेकिन क्या यह मेरा स्वार्थ नहीं है?...क्या मैं चाहने लगा हूं कि प्राची दिल्ली आए..और मैं ज्यादा से ज्यादा वक्त उसके साथ गुजार सकूं..मैं उससे मिला नहीं हूं..सिर्फ फोटो देखा है..ओर फोन पर बात की है...लेकिन क्या मैं शुरु में उसकी खूबसूरती पर रीझ नहीं गया था ?...क्या मैं भी उन्ही आम लोगों जैसा हूं जो किसी सुन्दर लड़की को देखकर हर हथकंडा अपनाने लगते हैं... क्य़ा प्राची एक औसत लड़की होती तो मैं उससे बात करता...दिल्ली के संघर्षों ने मुझे इतना मतलबी बना दिया है कि मैं मुस्कुराता भी तभी हूं जब कोई काम की बात होती है...क्या मैं विशुद्ध कारोबारी मानसिकता का नहीं हो गया हूं ?... क्या मैं इतना गिरा हुआ आदमी हूं ? ..मेरा दिमाग चकरा रहा है...लेकिन इसके जवाब में तर्क ये है कि क्या किसी खूबसूरत और जहीन लड़की से दोस्ती की कोशिश एक अपराध है...?
दिमाग कई दिशाओं में सोचता है। लड़कियां कभी-कभी करियर में बाधा लगती है। मुझे हजारों किताब पढ़ना है। मुझे पांच सौ पन्नो से कम की किताब अच्छी नहीं लगती। मैं..रामचंद्र गुहा और डोमनिक लेपियर से लेकर मार्क्स और चेखव की सारी किताबें चाट जाना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि मैं भी आगे चलकर किताबे लिखूं...और सेमिनार में आमंत्रित किया जाउं...मेरे लेख भी अखवारों के संपादकीय पन्नों पर छपे। शायद अभी तक लड़कियों की बहुत कम संगत ने पढ़ने के लिए मुझे पर्याप्त वक्त दिया है। लेकिन फिर मैं सोचता हूं कि मैं ऐसी एकांगी सोच का शिकार क्यो हो गया हूं...क्या लड़कियों को करियर में बाधा कहना उनका अपमान नहीं है..?क्या ऐसा नहीं हुआ है कि लोग प्रेम में पड़कर या शादी के बाद कई बार ज्यादा सफल हो गए हैं..?
बहरहाल, इतना तय है कि आज न कल प्राची दिल्ली आएगी...और ये भी तय है कि वो दिन कम से कम मेरे लिए इंतजार करने लायक होगा...लेकिन मैं उसका इंतजार क्यों कर रहा हूं...?

Thursday, June 5, 2008

चावला सर...और जनसंचार संस्थान

जिंदगी में कुछ हसीन लम्हे होते हैं..जिसे शायद कोई भी भूलना नहीं चाहता। इसी तरह जिंदगी में कुछ लोग भी होते हैं जिन्हे आप कभी नहीं भूलते। उनकी याद, तनाव भरे लम्हों में भी राहत देती है। शायद चावला सर ऐसी ही शख्सियत हैं जो हमारे संस्थान की पीढ़ियों को ताउम्र याद रहेंगे।मैने कहंीं एसआरसीसी के किसी प्रोफेसर के बारे में(अभी नाम भूल गया हूं) ऐसा ही पढ़ा था कि खाली वक्त में वो अपने लैपटॉप पर किसी पार्क में कॉलेज के बच्चों का सीवी टाईप करते हुए परम आनंद का अनुभव करते हैं। चावला सर भारतीय जनसंचार संस्थान के उन कर्मचारियों की नुमांइदगी करते हैं जिनके लिए संस्थान ही सब कुछ है..और छात्र बिल्कुल अपने बच्चे सरीखे।जब मैंने आईआईएमसी में दाखिला लिया था तो पहली बार चावला सर से डाक्यूमेंट जमा करबाते वक्त मुलाकात हुई। अंदर एक हिचक थी जो चावला सर के पहले ही संवोधन से छू मंतर हो गई। धीरे-धीरे चावला सर का मतलब एक आश्वासन हो गया। इस महानगर में हजारों किलोमीटर दूर से आए हुए बच्चों के लिए वो पहले ही दिन अपने हो गए।बैंक में एकांउट खुलबाना हो या कोई डाक्यूमेंट एटेस्ट करबाना..चावला सर हर मर्ज की दबा थे। उन्हे ये भी चिंता रहती थी कि उत्तर बिहार में बाढ़ की वजह से डाक वक्त पर नहीं पहुंच पाएगी और बच्चे दाखिला लेने से वंचित रह जाएंगे। बस चावला सर दिनरात फोन पर चिपके रहते..और एक-एक कर सारे बच्चों को फोन पर बता कर ही दम लेते।चावला सर के शख्सियत का बखान करने के लिए शव्द कम पड़ जाते हैं। आज संस्थान से निकलने के तीन साल बाद जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो ये कहना मुश्किल है कि खुशी के उन लम्हों में किसका योगदान ज्यादा था। संस्थान के शिक्षकों से कतई कम चावला सर नहीं थे। चावला सर तो हमें ये भी बताते थे कि नौकरी की संभावना कहां ज्यादा है और हमें किससे संपर्क करना चाहिए।चावला सर के पास अक्सर पास आउट हुए लड़कों के शादी का कार्ड पड़ा रहता। वो मास कॉम के कई जोड़ो की शादी के गवाह थे।मुझे वो लम्हा याद है जब पिछले साल एल्यूमिनाई मीट में दीपक चौरसिया ने चावला सर को शॉल पहना कर सम्मानित किया था। और मजे की बात ये थी कि दीपक अपने व्यस्त प्रोग्राम में से सिर्फ चावला सर के कहने पर ही संस्थान में बरसों बाद आए थे। राजीव ने पिछले दिनों फोन पर बताया कि चावला सर का फोन आया था और वो उसका हालचाल पूछ रहे थे । बाद में चावला सर ने मिलने के लिए भी बुलाया था। सच कहूं तो मैं जलभुन गया था कि चावला सर ने सिर्फ उसे ही क्यों फोन किया...ये बात कुछ ऐसी ही है जैसे दो बच्चे अपने मां-बाप का प्यार पाने के लिए लड़ते हैं। राजीव के पिताजी उस दिन आईआईएमसी गए थे तो चावला सर के साथ बड़े अपनेपन के माहौल में चाय-ठंडा का दौर चला था।चावला सर ने कहा था कि मेरी नौकरी अभी 18 साल बाकी है..तुम लोग अपने कागजात के लिए 18 साल तक मुझ पर भरोसा कर सकते हो।दरअसल चावला सर वन मेन आर्मी थे। आईआईएमसी के प्रशासनिक विभाग का मतलब ही हमारे लिए चावला सर थे।आईआईएमसी के दिनों में मुझे गुटखा खाने की आदत पड़ गई थी और हमारे सेमेस्टर का इम्तिहान चल रहा था। मिनी ऑडिटोरियम में हमें बैठाया गया था। आईआईआईएमसी का ऑडिटोरियम जिसे मंच कहा जाता है, वो तो भव्य है ही, मिनी ऑडिटोरियम भी काफी भव्य है। मैंने गुटखा चुपके से उसकी कालीन पर फेंक दिया। मैं पीछे वाली कतार में था। मास कॉम का एक और वफादार स्टाफ था गोपाल..(पता नहीं वो अभी है भी कि नहीं...गोपाल नेपाल का रहने वाला था और संस्थान का केयर टेकर था... संस्थान की सारी खूबसूरती, साफ सफाई और सैकड़ो तरह के फूल उसी आदमी के बदौलत थे) किसी तरह गोपाल को इस बात की भनक लग गई और वह वहां पहुंच गया।मैंने आनन फानन में अपने रोल नंबर की पर्ची उस जगह से हटाई और दूसरे जगह पर बैठ गया। गोपाल ने चावला सर को बुला लिया। चावला सर ने बड़े प्यार से हमें समझाया कि बेटे ये संस्थान आपका ही है...और आपके ही टैक्स से इसका खर्च चलता है। यहां िवदेशी भी आते हैं..वे क्या कहेंगे। इस घटना से मुझे इतनी ग्लानि हुई कि मैंने गुटका खाना छोड़ दिया(ये अलग बात है कि मुई आदत फिर से दबे पांव वापस आ गई और बहुत हाल में एक लड़की के कहने पर छूटी है)..इस तरह चावला सर की न जाने कितनी ही यादें हैं..जिनका तफसील में जिक्र शायद ब्लाग जैसे मीडियम को रास नहीं आएगा।
चावला सर का पूरा नाम मैं आज भी नहीं जानता...और शायद उनका व्यक्तित्व किसी नाम का मोहताज भी नहीं... चावला सर जैसे लोग उन घड़ियों में और भी याद आते हैं...जब हम मेंटल अलूफनेस से संघर्ष कर रहे होते हैं....यहां भी हमें ये किसी तकलीफ से बच निकलने में मदद करते हैं....क्योकि चावला सर हमारी यादों में पूरे आवेग से ...आते हैं ...हल्का अहसास कराते हैं.....परिस्थतियों में अकेले फंसे पा हमारे दिमाग का अचेतन हिस्सा उन्हे खोजते हुए आईआईएमसी पहुंच ही जाता है.....और फिर सामने चावला सर खड़े होते हैं...
(इस लेख को संपादन में मुझे मेरे इंडिया न्यूज के सहकर्मी महेंद्र सिंह यादव का कीमती सहयोग मिला...शायद ऐसे लोग आपको हर जगह मिल ही जाते हैं।)

Thursday, May 22, 2008

रो रही है वो अहिल्या, राम आएंगे कहां से...?

ये कविता मैने तकरीबन १२ बरस पहले लिखी थी। मैं उम्र के दूसरे दशक में पैर रख चुका था। ये कविता उस समय लिखी गई थी जब लालू यादव नामका एक आदमी बिहार का मुख्यमंत्री बन चुका था। यह कविता एक सामंती संस्कार से ओतप्रोत लड़के का अपने इलाके के पिछड़ेपन को लेकर किया गया आत्मोद्गार है जिसमें अतीत के स्वर्णयुग को ही बेहतरीन समझने की नासमझी भी है..और एक खास किस्म के नायक की परिकल्पना भी। व्याकरण संबंधी त्रुटियां तो हैं ही खैर...आज मैं पीछे मुड़कर जब इस कविता को देखता हूं तो मुझे खुद पर हंसी आती है। लेकिन फिर भी न जाने क्यों ये कविता मुझे अभी भी प्रिय है..शायद पहले प्यार की तरह..या पहली बार रेलगाड़ी के सफर के यादों की तरह...

भारतीयता की अमरगाथा सुनाता पूण्यभूमि,
मैथिली का जन्मस्थल है उपेक्षित आज भी।
हाय! किससे करुं विनती नहीं है कोई कन्हैया,
लुट रही बाजार में है द्रौपदी की लाज भी।
इस धरा ने ही जना है भारती सी विदुषियों को,
फिर भी क्यों वाचस्पति की माता आज तक असहाय है?
नहीं है कोई खेवैया इस अगम मंझधार में,
मैथिलों की मौन क्रंदन आज तक असहाय है।
आज भी अमराईयां मिथिलांचल की गूंजती हैं,
भक्त विद्यापति रचित उन अमर गीतों के स्वरों सेI
धूल में लेटे हुए हैं सैकड़ों मंडन अभी भी
हाय कोई है जो नहलाए उन्हे अपने करों से?
याद आती है वो नगरी जो विदेहों से अंटी थी,
स्वर्ण मणिमाणिक्य की क्या यहां कोई भी कमी थी?
शस्य श्यामला थी धरती और थी जनता प्रफुल्लित,
भय नहीं था दस्युओं का और न कोई रहजनी थी।
इस धरा ने खींच लाया था अवध से राम को भी,
दास बन कर खुद मृत्युंजय जा चुके है इस जहां से।
आज भी पाषाण बन कर रो रही है वो अहिल्या,
कर रही फिर भी प्रतीक्षा राम आएंगे कहां से?
आज सड़के भी नहीं है, नहरों में पानी भी नहीं है,
आज भी मिथिला की रातें बीतती हैं जागकर।
कौन अब ये दुख सुनेगा? ललित बाबू भी नहीं है,
धूर्त है नेतृत्व, हम भी चुप हैं नियति मानकर।
खेलने की उम्र में वे भागते पंजाब को हैं,
क्या करें ?ये पेट की ज्वाला भी कब तक मानेगी?
रहने को झोपड़ें मयस्सर और तन पर मात्र चिथड़े,
मैथिलों की इस दशा को कब ये दुनिया जानेगी?
मधुबनी की चित्रकारी, नानियों की वे कथाएं,
लुप्त होती जा रही है गांव की सब लोकगीते।
छा गया पाश्चात्य जीवन, हो गया अपनत्व अब कम,
हाय! मृग कैसे बचेगा आ गए खूंखार चीते।
मातृभाषा है उपेक्षित शत्रु सत्ता की कृपा से,
विश्व की प्राचीन भाषा मिट रही है इस जहां से।
कोई क्यूं चिंता करेगा ,वक्त क्यों जाया करेगा,
फंस गया है फंद में गज विष्णु आंएगें कहां से।
काल के पंजों से घायल, हेय दुनिया की नजर में,
दौड़ में पीछे हुए क्यों मैथिलों में क्या कमी थी?
विष बुझे से प्रश्न हैं ये, ये हमें जीने न देंगे,
आज भी हम हैं अहिंसक, सिर्फ क्या इतनी कमी थी?
 

Saturday, May 17, 2008

जीवन मृत्यु

शिखर हमारे साथ काम करती है...और एक बेहतरीन कवियत्री भी है..उसने एक कविता भेजी है...

आज मै चुपचाप बैठी सोच रही थी

अपने ही भावो मे कितनी उलझ रही थी

कि जिन्दगी और मौत कितनी करीब है

एक संसार मे लाती है तो दुसरी ले जाती है

लेकिन शमशान घाट पर ही

जाकर वैराग्य क्यो जागते .है

और मृत्यु पर ही सारे सगे सम्बन्धी ,

बिलख बिलख कर रोते क्यो है

शायद यहाँ हम एक पूरी जिन्दगी

का अन्त पाते है.

मरने वाले तो मर जाते है

पर कुछ लोग उनकी मृत्यु मे

अपना सारा जीवन तलाशते है(मेरी माँ)

Thursday, May 8, 2008

कया बलिराज गढ़ मिथिला की प्राचीन राजधानी है..?

मेरे गांव खोजपुर से 1 किलोमीटर दिक्षिण बलिराजपुर नामका गांव है। इसकी दूरी मधुबनी जिला मुख्यालय से करीब 34 किलोमीटर है। यहां एक प्राचीन किला है जो तकरीबन 365 बीघे में फैला हुआ है। यह किला पुरातत्व विभाग के अधीन है । किले के बाहर लगी साइनबोर्ड के मुताबिक यह किला मौर्य कालीन है और यहां उस समय के मिट्टी के बर्तन और सोने के सिक्के मिले हैं। आसपास के गांवो में यह किंवदन्ती फैली हुई है कि ये किला राक्षस राज बलि की राजधानी थी और आज भी कभी-कभी वो किले में देखे जाते है। लोगबाग शाम के बाद किले की तरफ जाने से डरते हैं। शायद ये अफवाहें सरकारी कर्मचारियों की फैलाई हुई है ताकि लोग किले का अतिक्रमण न करे और उन्हे ढ़ंग से ड्यूटी न करनी पड़े।

किला वाकई अद्भुत है। किले की दीवार अपने भग्नावस्था में भी अपने यौवन की याद दिलाती है।किले की दीवार इतनी चौड़ी है कि इसपर आसानी से एक रथ तो गुजर ही जाता होगा। दीवार की ईंटे दो फीट लंबी, और तकरीबन एक फीट चौड़ी है। किले की के बीच में एक तालाब है..कहा जाता है कि इसके बीच में एक कूंआ है जिसमें एक सुरंग है। और इस सुरंग का रास्ता कहीं और निकलता है। पुराने जमाने में राज परिवार के लोगों के लिए आपातकाल के लिए इस तरह का सुरंग बनाया जाता था।

इस किले के अगल-बगल के गांवो का नाम भी काफी रोचक है और थोड़ा-थोड़ा एतिहासिक भी..। किले के पूरब में है -फुलबरिया गांव और उससे सटा हुआ है गढ़ी जो अब अपभ्रंश होकर गरही बन गया है। किले के पश्चिम में है रमणीपट्टी और उससे सटा हुआ है भूप्पटी। किले के दक्षिण के गांव है बिक्रमशेर जहां प्राचीन सूर्य मंदिर के अवशेष मिले हैं। गौरतलब है कि सूर्य का मंदिर पूरे देश में बहुत कम जगह है।

बलिराज गढ़ की खुदाई पहली बार 1976 के आसपास हुई थी जब केंद्र में कर्ण सिंह इस बिभाग के मंत्री थे। इसके उद्धार के लिए मधुबनी के सांसद भोगेन्द्र झा और कुदाल सेना के सीताराम झा ने काफी काम किया है। ।

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि बलिराज गढ़ बंगाल के पाल राजाओं का किला हो सकता है । जबकि कुछ का कहना है कि यह मौर्यों का उत्तरी सुरक्षा किला भी हो सकता है। हालांकि कुछ इतिहासकार इसे मिथिला की प्राचीन राजधानी मानने से भी इंकार नहीं करते। इसकी वजह वो ये बताते हैं कि आज का जनकपुर(जो
नेपाल में स्थित है) काफी नयी जगह है और वहां के मंदिर बहुत हाल में, तकरीबन 18वीं सदीं में इंदौर की रानी दुर्गावती के समय बनाए गए थे और उसकी एतिहासिकता भी संदिग्ध है। बहरहाल, मुझे दस साल पहले की कहानी याद है जब वैशाली के एक सज्जन ने इस बावत मुझ से कहा था कि वाकई बलिराजगढ़, मिथिला की प्राचीन राजधानी है।

उन्होने ह्वेनसांग के पुस्तक का जिक्र करते हुए कहा जिसके मुताबिक पाटलिपुत्र से एक खास दूरी पर वैशाली है..और उससे एक खास दूरी पर काठमांडू है उसके बिल्कुल दक्षिण-पूर्वी दिशा में मिथिला की प्राचीन राजधानी है। आज का जनकपुर उस खास दूरी व दिशा में सही नहीं बैठता। पता नही ये बात कितनी सच है। इसके आलावा, रामायण में भी मिथिला की प्राचीन राजधानी के संदर्भ कुछ संकेत हैं। और वो भी इसी जगह को संकेत कर मिथिला की राजधानी बताते हैं।

सांसद भोगेन्द्र झा के मुताबिक, राजा बलि की राजधानी महाबलीपुरम हो सकती है जो  दक्षिण भारत में स्थित है। सबसे बड़ी बात है कि पूरे मिथिलांचल में इतना पुराना कोई किला नहीं है जो यहां कि प्राचीन राजधानी होने का दावेदार हो सके। किले के भीतर उबड़-खाबड़ जमीन है जो प्राचीन राजमहलों के जमीन के अंदर धंस जाने का प्रमाण है। यहां एक-आध जगह ही खुदाई की गई है और यहां कीमती धातु और सोनेचांदी की वस्तुएं मिली हैं।अगर कुछ और खुदाई की जाए तो कई रहस्यों से आवरण उठ जाएगा। सरकार की तरफ से कोई ठोस प्रयास ऐसा नहीं हो पाया है कि बलिराज गढ़ की प्राचीनता को दुनिया के सामने रखने की कोशिश की जाए।

एक सामान्य सी सड़क से इसे नजदीक के गांव खोजपुर से जोड़ दिया गया है और इतिश्री कर दी गई है। अगर, बलिराज गढ़ की खुदाई कायदे से की जाए और एक संग्रहालय बना दिया जाए तो काफी कुछ हो सकता है। मिथिलांचल के हृदय मे स्थित होने की वजह से यहां मिथिला पेंटिंग का भी कोई संस्थान और आर्ट गैलरी वगैरह बनाया जा सकता है। एक अच्छी सड़क के साथ आधुनिक विज्ञापन, बलिराज गढ़ को पर्यटकों की निगाह में ला सकता है और इस इलाके के पिछड़ेपन को दूर कर सकता है।

Saturday, April 19, 2008

क्या आप डॉ मुख्तार अंसारी को जानते हैं?

चौंक गए न...हम उस आदमी की बात नहीं कर रहे जिसके बारे में आप सोंच रहे हैं। जी हां, डॉ मुख्तार अंसारी भी उसी गाजीपुर में पैदा हुए थे जिस इलाके से 'मुख्तार अंसारी' ताल्लुक रखते हैं। आज गाजीपुर से उनके जुड़ाव के नाम पर जिला चिकित्सालय का नामकरण ही बचा है जो उन्हे और लोगों को गाजीपुरी होने पर गर्व की अनुभूति कराता है। डॉ मुख्तार अंसारी आजादी के लड़ाई में अगली कतार के नेता थे। उनका जन्म 25 दिसम्वर 1880 को उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले में युसुफपुर-मोहमदावाद नामके गांव में हुआ था। अंसारी, जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे।उन्होने मद्रास मेडिकल कालेज से डिग्री लेने के बाद इंग्लैन्ड से एमएस और एमडी की डिग्री हासिल की। अपनी काबिलियत के बल पर उन्होने इग्लैंड के कई बड़े अस्पतालों में काम किया और वहां के स्वास्थ्य विभाग में ऊंचे अोहदे तक पहुंचे। एक भारतीय का ऊंचे पद पर जा पहुंचना वहां के तत्कालीन नस्लवादी समाज को रास नहीं आया और उनके खिलाफ हाउस अॉफ कामंस में मामला उठाया गया। ऐसा कहा जाता है कि वहां के तत्कालीन हेल्थ सेक्रेटरी ने संसद को बताया कि डॉ अंसारी की नियुक्ति इसलिए की गई कि उस समय उस पद के लिए उनसे काबिल कोई नहीं था। आज भी लंदन के केयरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में डॉ अंसारी के सम्मान में एक अंसारी वार्ड है । लेकिन हिंदुस्तान की गुलामी ने अंसारी के मन को विचलित कर दिया और अपनी एशो-आराम की जिंदगी छोड़कर वे वतन की राह में कुर्वान होने के लिए वापस चले आए।उन्होने कांग्रेस ज्वाइन किया और 1916 में हुए लखनऊ पैक्ट में अहम किरदार निभाया।वे कई दफा कांग्रेस महासचिव बने और और 1927 में तो वे कांग्रेस के अध्यक्ष बना दिए गए। जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना में डॉ अंसारी का अहम योगदान था और जामिया के स्थापना में मुख्य योगदान देने बाले डॉ अजमल खान की मौत के बाद डॉ अंसारी जामिया के वाइस चांसलर भी बने।
दिल्ली में डॉ अंसारी का दरियागंज के इलाके में अपना भव्य मकान था और महात्मा गांधी अक्सर उनके मेहमान होते थे। जाहिर है उनकी हवेली उस समय राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करती थी। आजादी के बाद सरकार ने उनके सम्मान में एक सड़क का नाम अंसारी रोड रखा है। डॉ अंसारी नई पीढ़ी के प्रगतिशील मुसलमानों में से थे जो इस्लाम की एक उदार तस्वीर दुनिया के सामने रख रहे थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। वे बहुत ही कम उम्र में इस दुनिया से चले गए। सन् 1936 में मसूरी से दिल्ली आते समय हार्ट एटेक की वजह से ट्रेन में ही डॉ अंसारी की मौत हो गई। कितने संयोग की बात है कि डॉ अंसारी के ही उम्र के मुंशी प्रेमचंद भी थे( मुंशी जी का जन्म भी 1880 में ही हुआ था) और उनकी भी मौत भी 1936 में ही हुई। पुनर्जागरण का एक बड़ा सितारा समय से पहले बुझ गया-जिसकी शायद उस समय सबसे ज्यादा जरुरत थी।

डॉ अंसारी से कुछ और भी बातें जुड़ी है। वर्तमान उपराष्ट्रपति डॉ हामिद अंसारी भी उसी परिवार से ताल्लुक रखते हैं और बाहुवली सांसद मुख्तार अंसारी भी...जिसमें डॉ अंसारी पैदा हुए थे। दरअसल, गाजीपुर-आजमगढ़ में मुगलों के जमाने से ही(जानकारों का कहना है कि मुगलसराय का नाम मुगल सेना की छावनी बनने की वजह से ही रखा गया जो उस रास्ते अक्सर बंगाल जाया करती थी) या उससे पहले सल्तनत काल में ही मुसलमान सिपहसलारों की कुछ जागीरें थी। और उन्ही परिवारों में से कई प्रगतिशील मुस्लिम चेहरे बाद में उभरकर सामने आए..जिसमें डॉ अंसारी भी एक थे।
आज की पीढ़ी डॉ मुख्तार अंसारी को नहीं जानती। वो तो उस मुख्तार अंसारी को जानती है जो बाहुवली सांसद है और टेलिविजन पर्दे पर किसी रॉविनहुड सा चमकता है। अगर आप नामके पीछे डॉ भी लगाएंगे तो भी यह पीढ़ी नहीं समझ पाएगी क्योंकि पीएचडी करना अब बहुत 'आसान' हो गया है।

Friday, April 18, 2008

छोटा शहर..बड़ा शहर..

मुहल्ले पर नीलेश जी ने छोटे शहर से खत लिखकर सिर्फ हमारे भावनात्मक तंतु को ही नहीं छेड़ा है...बल्कि यह तो एक पूरा विमर्श है जो अभी तक सही ढंग से मीडीया में पल्लवित नहीं हो पाया है। हिंदी मीडीया में तो खैर इस विषय पर बहुत ही कम लिखा गया है, अंग्रेजी में भी जब कुछ आता है तो वह बस तुलनात्मक अध्ययन होता है .या फिर छोटे शहरों के बच्चों की उपलव्धियों पर आश्चर्य जताया जाता है मानो वे उस एलीट कल्व में कैसे आ गए..जो बरसों से महानगरीय नौनिहालों की बपौती था। अक्सर छोटे शहरों से आनेबालों को जाहिल या संकीर्ण मानसिकता का समझ लिया जाता है..जिन्हे बोलने, चलने, पहनने और खाने के मैनर्स भी सीखने होते हैं..। बड़े शहरों में आनेबाले पहली पीढ़ी के लोगों के लिए ये इंटर्नशिप जिंदगी भर चलती रहती है। और ऐसे में रह-रह कर अपने शहर की याद आ ही जाती है..। लेकिन सवाल कहीं ज्यादा बड़ा है-आधुनिक सभ्यता और तेज रफ्तार विकास के नाम पर महानगरों का होना और उसमें रहना गौरव की बात मानी जाने लगी है...और एक ही तरह के सोंच, व्यवहार, और जीवनशैली यहां की अनिवार्यता है...और सतरंगी संस्कृति,वहुभाषी-वहुनस्लीय समाज की बात पीछे छूट जाती है..जो कुछ भी है वह 'मुख्यधारा' के लिए है..और उसे मुख्यधारा में विलुप्त हो जाना है। यह मुख्यधारा पूरी दुनियां के संदर्भ में अमरीकन सभ्यता हो सकती है..और भारत के संदर्भ में इसकी मुकम्मल तस्वीर अभी तक सामने नहीं आई है. हलांकि कुछ जानकार लोग इसे हिंदीभाषियों के लिए पंजाबी कल्चर का सांस्कृतिक फैलाव कहने लगे हैं-जो धारावाहिकों, मुम्वैया सिनेमा और अनेकानेक सांस्कृतिक दूतों के बदौलत सुदूर गांवों तक में अपना प्रभाव दिखा रहा है..जहां करबा चौथ तो दरभंगा तक पहुंच गया है--लेकिन कई पुराने रश्मो-रिवाज ऑउटडेटेड होते जा रहे हैं। ऐसे में बड़े शहर की अवधारणा निश्चय ही, उसकी विशालता और आर्थिक विकास से आगे तक का है-यह तो एक विचार है जो दुनियां में जो कुछ भी छोटा है उसे निगल कर एकरुप बना डालना चाहता है। एक तरफ तो इस 'मेल्टिंग पॉट' में सब कुछ अच्छा लगता है जहां सामाजिक समानता है, आपके विचारों का(माफ कीजिए-सिर्फ नए विचारों का,जिसका व्यवसायिक उपयोग हो सके) स्वागत है और तरक्की करने की आजादी है..लेकिन साथ ही आपके निजी मूल्यों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों पर निरंतर मुख्यधारा में शामिल होने का दवाव होता है और हमले होते हैं। तो फिर चारा क्या है...महानगरों के उलट विकास की धारा बहाई जा सकती है..?.छोटे शहरों को सुबिधासंपन्न नहीं बनाया जा सकता? दो-दो करोड़ के दस महानगर के उलट 1-1 लाख के एक हजार शहर क्यों नहीं हैं.. जहां एक साथ कई आकांक्षाएं जी सके?लेकिन क्या मुख्यधारा ऐसा होने देगी जिसका सत्ता से लेकर आवारा पूंजी और संचार के साधनों से लेकर कला और वैचारिक संस्थानों तक पर कब्जा है? ऐसा लगता है कि सदियों के अपने अनुभव से सोशल और पोलिटिकल एलीट ने यह सीख लिया है कि बिखरे हुए आवादी पर शासन करना और उन्हें अपना बाजार बनाना बहुत मुश्किल भरा काम है-इसलिए पूरी दुनियां में ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं कि आवादी को एक ही जगह बसा दिया जाए। (इसका एक छोटा सा उदाहरण है छत्तीसगढ़ का सलबा जुडूम जहां आदिवासियों को एक जगह बसाने की कवाय़द जारी है)..ऐसे में लगता है कि छोटा शहर ही लोकतंत्र है..और बनारस के घाट व पटना का रेलवे स्टेशन..अंसल प्लाजा से ज्यादा चमकदार है। लेकिन मैं ऐसा क्यों सोंचता हूं..? सिर्फ इसलिए की मैं छोटे शहर से आया हूं?

Wednesday, February 20, 2008

इतिहास के दोराहे पर नेपाल.........

नेपाल की समस्या अभी तक सुलझ नहीं सकी है और शांति के राह में बाधाएं खत्म नहीं हुई है। माओवादियों द्वारा युद्ध विराम की घोषणा और चुनाव में भाग लेने का फैसला ही सिर्फ शांति का गारंटीकार्ड नहीं है। आज नेपाल, इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से एक तरफ स्थिरता और विकास के तमाम रास्ते खुलते हैं तो दूसरी तरफ बर्बादी का अथाह समंदर है। दरअसल नेपाल, भारत और चीन की क्षेत्रीय महात्वाकांक्षाओँ का शिकार हो गया है। लेकिन ये इसकी असली बीमारी नहीं है। नेपाल जैसे देशों की कोई भी समस्या भारत से ही शुरु होती है और भारत में ही जाकर खत्म भी होती है।
नेपाल के इतिहास की थोड़ी सी पड़ताल करें तो असली समस्या तब शुरु हुई जब भारत की आजादी के कुछ ही समय बाद नेपाल में वर्तमान शाह राजवंश को भारत सरकार की मदद से पुनर्स्थापित किया गया-इससे पहले लगभग सौ सालों तक वास्तविक सत्ता राणा परिवार ने हथिया रखी थी। १८४४ में महल हत्याकांड के बाद राणा जंगबहादुर ने सत्ता अपने हाथों में ले ली थीं और सन सत्तावन के भारतीय विद्रोह के समय अंग्रेजों के सबसे काबिल चमचों में उसका नाम सिंधिया और सिख रजवारों के साथ आता है। लेकिन भारत की आजादी के बाद भारत ने अपने देश में तो लोकतंत्र को बढ़ावा दिया, लेकिन नेपाल की ओर से आंखे मूंद ली। नेपाल में निरंकुश राजतंत्र को फलने-फूलने का भरपूर मौका दिया गया-एक ऐसे देश द्वारा जो खुद को लोकतंत्र का अगुआ मानता था। गौर कीजिए- भारत ने दक्षिण अफ्रिका और म्यांमार को लंवे अर्से तक इसी बिना पर वहिष्कृत किए रखा, लेकिन पड़ोस की घटनाएं भारत के लिए क्षम्य बन गई। और इस शुतुरमुर्गी रबैये का खमियाजा भारत को भुगतना ही था।
दरअसल भारत ने अपनी विग व्रदर बाली भूमिका का निर्वाह करते हुए नेपाल की छोटी-मोटी जरुरतों का तो ख्याल रखा, लेकिन अपनी सुरक्षा के नाम पर कई एकतरफा संधि भी किए जिसका नेपाल की जनता के एक छोटे से लेकिन प्रभावशाली तबके ने सदा विरोध किया। नेपाल में एक परजीवी एलीट का विकास होता रहा जिसकी फैंटेसी भारत के बड़े शहरों में बसने की होती थी और जिनके बच्चे आईआईटी में पढ़ने का ख्वाब देखते थे। और राजा इस तबके का नेता हुआ करता था। जनता को इस दर्जे तक अशिक्षित और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से दूर रखा गया था कि राजा ही बिष्णु अबतार था शायद बिष्णु का ग्यारहवां अबतार। भारत का सत्ताधारी वर्ग सोंचता था कि एक कमजोर नेपाल और उसका कमजोर नेतृत्व बड़ी आसानी से काबू में रह सकता है। किसी लोकतांत्रिक नेता से बात करने की तुलना में तानाशाह या राजा टाइप के नेता से बात मनबाना बड़ी ताकतों के लिए हमेशा से आसान रहा है।
लेकिन एक ऐसे देश में, जो दुरुह घाटियों से भरा पड़ा हो और जिसके दोनों तरफ दो विशाल विकासशील और गतिशील देश हों, यह लगभग असंभव ही है कि ज्यादा दिन तक उस देश में युग-सत्य न पहुंचे। कायदे से भारत को पचास के दशक से ही नेपाल में एक स्वस्थ और गतिशील लोकतंत्र के प्रयास करना चाहिए था और ऐसा न करके भारत ने राजनीति की लगभग सारी जमीन ही किसी बैकल्पिक ताकत के खाली छोड़ दी और माओवादियों ने इसे सिर्फ दस सालों में भर दिया। लेकिन सवाल सिर्फ राजशाही के खात्मे और बैकल्पिक शासन व्यवस्था की नहीं है- नेपाल में कई अन्य विवाद भी हैं। नेपाल की आवादी में भारत से गये लोगों या भारतवंशियों की संख्या उसकी कुल आवादी का लगभग ४८ प्रतिशत है औप पहाड़ी लोगों की जनसंख्यया ५२ फीसदी है। जबकि प्रशासन में मधेशी १० फीसदी भी नहीं है। नेपाल का राज परिवार मधेशी मूल का है और अपनी सत्ता बचाने के लिए उसने शताव्दियों से पहाड़ियो का तुष्टीकरण किया है। मधेशी अभी तक राजा को अपना मानते थे-पहाड़ी इसलिए शान्त थे क्योंकि सत्ता में उनका सीधा दखल था। आश्चर्य की बात तो यह है कि धुर कम्युनिस्ट माओवादियों के दल में भी मधेशी बहुत कम हैं। नेपाल के सभी दलों में पहाड़ियों का दबदबा है। तो ऐसे में चुनाव होता भी है तो मधेशियों के साथ कितना न्याय हो पाएगा? क्या उन्हे युगों तक फिर अपने अधिकारों के संघर्ष नहीं करना पड़ेगा?
यहीं वह बिन्दु है जहां राजा अपने को फिर से मजबूत पाता है और उसने अपने पत्ते चल भी दिए हैं। तराई में मधेशियों का अांदोलन शुरु हो गया हैं। नेपाली कांग्रेस, नेपाली सेना, भारत और अमरीका पहले से ही राजा के समर्थक हैं-कम से कम सांविधानिक राजतंत्र तक तो जरुर ही।अगर मधेशी आंदोलन जोर पकड़ता है जिसकी संभावना ज्यादा है( उनकी संख्या को देखते हुए) तो ये माओवादियों के लिए बहुत बड़ा धक्का होगा और शोषितों व दलितों के बीच बहुत मेहनत से बनाया गया उनका आधार दो फाड़ हो जाएगा। दरअसल तब राजा नाम की संस्था ही वो विकल्प रह जाएगी जिस पर पहाड़ी और मधेशी दोनों ही भरोसा कर सकते हैं। और यहीं नेपाल नरेश की दिली इच्छा है और भारत -अमरीका की भी। भारत के हित में चीन को नेपाल की राजनीति से बाहर रखने का अभी यहीं एकमात्र उपाय है जिसपर अमल होना चाहिए, हलांकि भारत काफी देर से जागा है। चीन की विराट सैन्य और आर्थिक ताकत नेपाल में इतनी जल्दी शांति होने देगी, मानना मुश्किल है। लेकिन भारत अगर अभी भी नेपाल नरेश को काबू में रखकर दृढ़ता और इमानदारी से नेपाल में लोकतंत्र बहाल करवाए- तो बाजीं अभी भी अपने हाथ में है।

Sunday, February 10, 2008

ब्राह्मणों के आंगन में तुम्हारा क्या काम है... बनाम सोशल नेटवर्किंग

मीडिया में दलितों के प्रवेश को लेकर काफी अच्छी बहस चल रही है। लेकिन सवाल कई हैं। एक तो मीडिया के ब्राह्मणवादी चरित्र को लेकर है जो अब उससे भी आगे गोत्रवादी और भतीजावादी या चेलावादी हो गया है। तमाम पुराने पत्रकारों के वच्चों (अगर मीडीया में ही हैं तो) या संबंधियो को कोई दिक्कत नहीं होती जॉव खोजने में। अगर आप कुछ खास नहीं हैं तो बिना पैरवी के दरबान भी पानी नहीं पूछता। या नहीं तो एक आध बरस भटकिए..कोई इंस्टीट्यूट का आपका सीनियर मिल जाएगा..और उसकी मदद से आप फिट हों जाएंगे। मतलब की जॉव के लिए एक आध साल भटकना भी एक इंटर्नशिप है। कई पुरानी कहाबते हैं मीडिया में नौकरी खोजने के बारे में-मसलन कि सीवी डालने से कॉल नहीं आता.आदि..आदि.. लेकिन जो बात महत्वपूर्ण हैं वह है सोशलाइजेशन या नेटवर्किंग। जो कुछ मुट्ठीभर दलित मीडिया में हैं भी उनमें अपने वर्गीय हितों से बहुत लगाव नहीं रह गया है, मुझे माफ कीजिए- वे मुद्दे तो दलितों के हक में उठा सकते है, भाषण भी देते हैं.. लेकिन बहुत कम हैं जो मिशनरी जील रखते हैं। उनका घुलना मिलना सवर्ण समाज में ही ज्यादा है। वजहें कई हैं-या तो वे उस पोजीशन में नहीं है या खुलकर फेवर करने में डरते हैं या अपने बगल के फ्लैट में उन्हे कोई दलित का बच्चा नही मिल पाता जो आवश्यक रुप से पत्रकारिता का ही कोर्स कर रहा हो। तो कुल मिलाकर वो एकदम सिर्फ दलित होने के नाते किसी दलित की मदद नहीं करते। तो क्या दलित पत्रकार भाई-भतीजावाद से मुक्त एकदम अादर्श व्यक्ति हैं? नहीं..ऐसी बात नहीं है।
मेरे संस्थान में (जहां से मैंने पत्रकारिता का कोर्स किया था) जो मेरे दलित साथी थे-उनका वर्गीय चरित्र एकदम से वैसा नहीं था जैसा कि दलित शव्द बोलने भर से दिमाग में आता है। वे सब दूसरी पीढी के साक्षर शहरी दलित थे और वो तेवर और आक्रोश भूल चुके थे जो कभी शायद उनके पिता ने महसूस किया होगा। समय भी बदल चुका था...शायद दलित मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति पाने के बाद वो हीनभावना से भी बहुत हद तक मुक्त थे। वो एकदम से गांव से आनेवाले पहली पीढी के दलित लड़कों के लिए अनुपलव्ध थे। कई बार तो उन्होने अपने संस्थान के ही किसी जूनियर सवर्ण छात्र की मदद भी की। ठीक ऐसा ही कई बार मेरे ब्राह्मण मित्रों ने भी किया-उन्होने भी अपने दलित जूनियरर्स की मदद की। लेकिन क्या ये कभी भी इस भावना से किया गया था कि समाज में कोई समांजस्य बनाना है? बिल्कुल नहीं..ये तो संस्थान का भाईचारा था..या एल्युमुनाई का 'पावन कर्तव्य' था जो एक नए तरह के जातिवाद की तरह उभरा है।
दूसरी बात जो महत्वपूर्ण है वो यह कि पिछले साठ सालों में दलितो के लगभग ५० लाख परिवार या लगभग ३ करोड़ की आवादी अाज सरकारी सेवा के बदौलत ठीक-ठाक हो चुकी हैं। लेकिन कला, साहित्य या इस तरह के अन्य क्षेत्रों में उनकी नगण्य उपस्थिति कुछ और भी कहती है। पहली बात तो यह इस वर्ग के पढे लिखे लोगों को आरक्षण के कारण सरकारी नौकरी की सुलभता दूसरो के मुकाबले ज्यादा है जहां पत्रकारिता का संघर्ष लाख ग्लैमर के बावजूद अपना आकर्षण खो देता है। दूसरी बात है सोशल नेटवर्किंग की-जहां दलित पत्रकार चाहने पर भी जगह नहीं बना पाते। तीसरी बात है कि सवर्णों का तबका लगभग पूर्ण साक्षर और सभी क्षेत्रों में अपनी पीढीगत बढत के कारण-और नौकरियों के सिकुड़ते जाने के कारण भी-सभी फील्ड में बेतरह घुसपैठ किए हुआ है ।अब तो सुलभ शौचालय भी अपवाद नहीं। एक बात यह भी है कि अमूमन बौद्धिक क्षेत्रों में ऐसे ही वर्ग का दखल है जो निम्न वर्ग से मध्यम वर्ग का सफर पहले ही तय कर चुका हो, और दलितों का तो मध्यम वर्ग अभी ताजा-ताजा बना ही है। ऐसे में वो विराट दलित वर्ग पत्रकारिता में कहां 'फिट' होता है? हां, जातिवाद भी यहां एक महत्वपूर्ण तत्व है, लेकिन हमेशा इसकी वजह वो परंपरागत ब्राह्मणीय अहंकार और दलितों के प्रति नफरत नहीं होती-अपने सगे संवंधियों और इष्ट मित्रों के उपकार का भाव अवश्य होता है-लेकिन यही सबसे वड़ा विरोधाभासी तथ्य है कि ब्राह्मणों के इष्ट-मित्रों में आज भी ज्यादा दलित नहीं है। और यहीं बात सबसे ज्यादा परेशान करती है।

Friday, January 11, 2008

मेरा गांव और बाढ......-2

मेरे गांव के बारे में लोगों का कहना यह है कि मेरे पुरखे आज से तकरीवन ढाई सौ साल पहले मधुबनी से करीब तीस किलोमीटर पश्चिम बसैठ-चनपुरा से आए थे। बसैठ चानपुरा वहीं गांव है जहां इंदिरा गांधी के नजदीकी और बिवादास्पद योगी धीरेंद्र व्रह्मचारी का जन्म हुआ था। उस गांव मे अभी भी हमलोगों के मूल के व्राह्मण काफी संख्या में है। उस जमाने में पता नहीं हैजा या बाढ की बजह से लोग पलायन करते रहते थे। हिंदुस्तान में वो मुगलो का अवसान काल था और यह इलाका बंगाल के नवाब के अधीन था। दरभंगा महाराज उनके सामंत हुआ करते थे। कहते है कि उस जमाने में इस इलाके में बडे बडे जंगल थे, कुछ तो बिहार के उत्तरी भाग से लेकर हिमालय की निचली श्रृखलांओं तक फैले हुए थे। गांव में अक्सर तेंदुआ या बाघ आ जाता था और ऐसा आजादी मिलने के समय तक सुनने में आता था। अब पता नहीं वो जंगल कहां है, बढती आबादी ने जंगलो के बेतरह लील लिया और अब तो उसके अवशेष भी यहां मिलना मुश्किल है। आज यह इलाका भारत के घनी आबादी बाले इलाकों में गिना जाता है। पुराने लोगों की बातों पर यकीन करें तो बाढ तब भी आता था लेकिन उसका प्रकोप इतना नहीं था। बडे-बडे जंगल विशेषकर नेपाल की तराई के जंगल बाढ के पानी को आहिस्ता आहिस्ता मैदानों में आने देते थे और तकरीवन हरेक गांव में पोखरों की श्रृखला, ताल-तलैया और छोटी-छोटी धाराएं बडे-2 बाढ को पचा जाती थी। आज भी उत्तर बिहार के इस इलाके में-जिसे मिथिलांचल के नाम से जाना जाता है-हरेक गांव में आठ-दस पोखर या तालाव हैं जो दिन व दिन अतिक्रमण की बजह से उथले होते जा रहे है। पहले ये तालाबें जमींदारो की मल्कियत थी, लेकिन आजादी मिलने का बाद से इनका सरकारीकरण हो गया और लोगों ने तालाब को भरकर घर वनाना शुरु कर दिया। पतली-पतली जल धाराएं- जो पता नहीं नेपाल से कहीं से आती थी- जिनका हरेक गांव में अलग अलग नाम था और जो बडी नदियों में जाकर मिल जाती थी, लोगों द्वारा भर कर खेत बना ली गई है और स्वभाविकत; इससे पानी का प्राकृतिक प्रवाह रुका है। विकास की तमाम योजनाएं ऐसी वनाई गई जिससे उत्तर से आने वाली नदियों के पानी का प्रवाह अवरुद्ध हुआ-जिसका सवसे बडा उदाहरण दरभंगा -निर्मली रेलवे लाइन है जो पश्चिम से पूरब लगभग सत्तर किलोमीटर तक पानी के लिए एक कृत्रिम अवरोध के रुप में डटी है। इसके आलावा दरभंगा-मुजफ्फरपुर हाइवे भी इसी तरह का है। कहने का तात्पर्य यह विल्कुल नहीं है कि विकास की योजनाएं गैर-जरुरी है। मतलब सिर्फ इतना है कि इसका कोई लाजिकल तरीका खोजा जा सकता था। नेपाल की तराई में पहले घने जंगल थे-सागवान की लकडियो के लिए प्रसिद्ध। पिछले पचास साल में वहां की राजशाही के दौरान विकास के आधुनिक माडल के तहत जो जंगलों की हृदयहीन लूट हुई है उसने हिमालय के ढलान को नंगा कर दिया है और उसका सीधा असर उत्तर बिहार पर पडा है। इसके आलावा, कुछ न कुछ असर ग्लोवल वार्मिग का भी जरुर हुआ है जिसने वर्षा के चक्र को वेतरह प्रभावित किया है।
बाढ की समस्या में नदियों का सिल्टिंग एक महत्वपूर्ण कारण है। पिछले कई दशकों से बिहार के नदियों की सिल्टिंग नहीं हटाई गई है और बाढ जव आती है तो किनारों में अकल्पनीय क्षति पहुचाती है।

Monday, January 7, 2008

मेरा गांव खोजपुर- 1............

मुझे शुरु में लगता था कि खोजपुर नामका जो यह गांव है वो मेरो ही पुरखे द्बारा बसाया गया है, लेकिन बाद मे यह भ्रम भी दूर हो गया। दरअसल इस गाव का जिक्र टोडरमल के 16वीं सदी के सर्वे में भी आता है जबकि मेरे पुरखे इस गांव मे करीब 1750 ई के आसपास आए होगें। दरअसल, ये बाते मुझे पूर्व सांसद भोगेद्र झा ने बतायी जिनका इतिहास आदि विषयों में खासा दखल है। अपने आसपास की चीजों के बारे में हम कितना कम जानतेहै। अधिकांश को तो अपने गांव या अपने पडोस का ही इतिहास नहीं मलूम है-जवकि उन्हे हडप्पा-मोहनजोदडो के बारे में तोता की तरह रटाया जाता है। खैर, बात खोजपुर नामके गांव की हो रही थी जो बिहार के मधुबनी जिले में,जिला मुख्यालय से 34 किलोमीटर उत्तर-पूर्व की दिशा में बसा हुआ है। नेपाल की सीमा यहां से मह़ज 20 किलोमीटर है-और सीमापार बेरोकटोक आवाजाही होती है,शादी व्याह भी। सन् 84 तक गांव में बस नहीं चलती थी, कारण की सडक पक्की नहीं थी और कमला-बलान पर पुल नहीं था। पुल बनबाने में ललितनारायण मिश्र का योगदान अहम था। यों उन्होने और भी कई उल्लेखनीय काम किये थे-जैसे, दरभंगा में विश्वविद्यालय, मेडिकल कालेज, झंझारपुर-लौकहा रेलवेलाइन और पश्चिमी कोशी नहर आदि। जनता उन्हे भगवान की तरह मानती थी। इतना सम्मान बिहार में बहुत कम नेताओं को नसीव हुआ। खोजपुर की आबादी आठेक हजार है जिनमें, ब्राह्मण,हरिजन ,यादव और कई पिछडी जातियां शामिल है। गांव की तकरीबन 80 फीसदी जमीन आज भी व्राह्मणों की मल्कियत है-हलांकि जमीन का हस्तांतरण पिछडी जातियों को हो रहा है-मगर उसकी रफ्तार अभी भी कम है। आज खोजपुर में बैक है, स्कूल है, डाकघर है, पटना के लिए बसें मिलती है और एक छोटा सा चौक भी है जहां आप दैनिक जीवन की वस्तुएं खरीद सकते है। लेकिन मुझे उस खोजपुर की याद आती है जो व्राह्मणों के कठोर चंगुल मे जकडा हुआ था-ये बात 80 के दशक की है, जब पटना में लालू यादव नामका आदमी मुख्यमंत्री नहीं बना था, जब कमला-बलान पर पुल नहीं बना था और जब अधिकांश व्राह्मण खेती खुद करते थे या करबाते थ। मेरे छुटपन तक तो सवर्णों का आत्याचाक कम हो गया था अलबत्ता आतंक अभी भी व्याप्त था। अभी भी पुराने लोग उन्हें देखकर पायलागी करते ही थे..अलबत्ता दिल्ली और पंजाव से कमाकर आई दलितो की नई पौध ने उन्हे चुनौती देना शुरु कर दिया था..ये बात तो लालू यादव के आने के पहले ही शुरु हो गयी थी।. हां लालू के आने के बाद वो आवाज और भी मुखरित हो चली थी और कई बार तो अन्याय के हद तक ब्राह्मणों से बदला लिया गया था। एक व्यक्ति के सत्ता में आने से कैसे सामाजिक संवंध बदलते है इसका नायाब उदाहरण नव्वे का वो शुरुआता दशक था , जहां लालू की आलोचना का मतलव सरेआम राह चलते पिटाई हो सकती थी।

मेरा गांव खोजपुर........

पिछले एक साल पर गांव जाने का मौका मिला था और मैं हिंदुस्तान के गांवो की बदलती तस्वीर को अपने गांव के आईने में देखना चाहता था। उपर से सबकुछ वैसा ही था, बाढ के बाद का अटका हुआ पानी,उबड-खाबड सडके जिसपर नीतीश सरकार बडी शिद्दत के साथ कोलतार बिछा रही थी और मगध एक्सप्रेस से उतरकर शाही तिरुपति और जयमातादी जैसे बसों में बैठंने बालों का रैला। लेकिन कहीं गहराई में बहुत कुछ बदल रहा है। नेपाल की सीमा से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर मेरे गांव खोजपुर तक सडकें डवल लेन की बनाई जा रही थी। पिछले पचास साल में जो काम सरकारी टेलीफोन कंपनियां नहीं कर पाई थी, उसे सिर्फ एक साल में एयरटेल और रिलांयस ने निबटा दिया था। घर -घर में मोबाइल पहुच चुका था, और बिहार के खेतों में मोबाइल बजना मेरे लिए वाकई किसी सपने से कम नहीं था।सबसे बडी और सकारात्मक बात मैने यह मैंने जो देखा वो यह कि लडकियो की शिक्षा पर सरकार का और लोगों का खासा जोर है। सरकार का सर्वशिक्षा अभियान, अपने कई कमियों के बावजूद इस दिशा में खासा कामयाव रहा है।मिड डे मील स्कीम, लडकियों के लिए मुफ्त की किताबें, साल में दो बार ड्रेस और हाईस्कूल की लडकियों के लिए साईकिले-इन तमाम योजनाओं ने वाकई लडकियोंको वडी तादाद में स्कूल की तरफ खीचा है।मुझे यकीन नहीं हुआ जब मैंने अपने गांव के स्कूल में आठ सौसे ज्यादा बच्चों को देखा, जो मेरे जमाने में कभी चार सौ से उपर नहीं गया, जबकि उस समय पडोस के गांव के बच्चे भी वहां पढने आते थे। जाहिर सी बात है कि गांव के ज्यादातर ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियां शहरों की ओर पलायन कर चुकी है और उन आठ सौ बच्चों में ज्यादातर पिछडों और दलितों के बच्चे थे जो एक नए भविष्य की तरफ इशारा कर रहे थे। गांव में अब आंगनबाडी केंद्र है, महिला स्वास्थ्य सेविका है और नये शिक्षा-मित्रों में एक तिहाई महिलाएं है। मेरे गांव में अब पर्दा के घुटन से महिलाएं आजाद हो रही हैं और साईकिल पर सबार लडकियां जब अपने सतरंगी परिधानों मे स्कूल की तरफ निकलती है तो लगता है कि वाकई पूरा कायनात मुसकुरा रहा है। पढने की भूख कुछ इस कदर हावी है कि दोयम दर्जे के अंग्रजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह खुल गये है और काफी पैसा भी बना रहे है। ट्यूटरों की एक फौज खडी हो गयी है जिसकी मासिक आमदनी दो हजार से आठ हजार रु तक है। नीतीश सरकार ने शिक्षा व्यबस्था को पटरी पर लाने की काफी कोशिशें की हैं लेकिन कुछ लोग शिक्षा-मित्र की बहाली पर सबालिया निशान लगा रहे हैं। अलबत्ता सरकार का दावा अपनी जगह है कि एक गरीब राज्य चार हजार रु प्रतिमाह में शिक्षा-मित्रों की सहायता से अभी अपनी सिर्फ अपनी प्राथमिकता निबाह रही है।सरकार की स्वास्थ्य नीति की भी तारीफ हो रही है जिसके तहत सरकार ने स्वास्थ्य केंद्रों के रखरखाव की जिम्मेवारी निजी संस्थानों को दे दी है।
लेकिन बिहार की समस्या सिर्फ भ्रष्टाचार की नहीं है जिसको लेकर वर्तमान सरकार परेशान दिख रही है।एक गरीब प्रांत जिसको सिलसिलेवद्ध रुप से पिछले साठ बरस से जातीय गिरोहों ने बिभिन्न राजनैतिक दलों के बैनर तले लूटा है और जो स्वभाविक रुप से अपराध , असामनता, भ्रष्टाचार और कुत्सित जातिवाद का शिकार हो गया है, वहां यह आश्चर्य की बात है कि प्रति एक लाख जनसंख्या पर सबसे कम पुलिस बाले ,डाक्टर और शिक्षक है। ऐसे में बिहारी छात्रों का बिहार के बाहर जाकर कामयाबी का झंडा गाडना वाकई काबिलेतारीफ है।कई दफा तो वे दूसरे प्रांत के लोगों के लिए जलन का पात्र बन जाते है। साधनबिहीन और कम संख्या में पुलिस का रिकार्ड भी तब खराब नहीं कहा जा सकता।
कुल मिलाकर सबसे बडी चीज जो देखने में आ रही है कि जनता में एक आशा का संचार हुआ है और प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप कम हुआ है। बिहार की गाडी को रफ्तार पकडने में भले ही दस बर्ष और लग जाए, लेकिन चीजें सकारात्मक हुई हैं। पटना बस स्टैंड में बस में बैठते बक्त अगर आप सरकारी कर्मचारियों की बातचीत का जायजा लें, तो एक बात साफ तौर पर झलक कर सामने आती है कि वे नितीश सरकार से वाकई नाखुश हैं। बास्तव में यहीं वो तबका है जिसने लालू यादव के कार्यकाल में नेताओं के साथ मिलकर जमकर लूट मचाया था, एश किया था और सवर्ण चरित्र होने के कारण लालू को गाली भी यहीं तबका सबसे ज्यादा देता था। मजे की बात यह है कि यहीं जन-विरोधी वर्ग अब नीतीश सरकार की आलोचना कर रहा है क्योंकि उसे नीतीश का चंद्राबाबू बनना पसंद नहीं है।