हाल के सालों मे कई बातें दलितों और आदिवासियों के हक में अच्छी हुई। भारत सरकार ने आदिवासियों को जंगल की जमीन और उसके उत्पादों पर उनका हक दिलाने के लिए आदिवासी कानून पास किया तो हरियाणा में हुड्डा सरकार ने हरेक दलित परिवार को सौ-सौ गज जमीन घर बनाने के लिए मुफ्त में देने की घोषणा की। बिहार सरकार ने दलितों में से महादलित को खास सुविधाएं देने की घोषणा की हलांकि कई लोग इसे राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। उधर, यूपी में मायावती की सरकार है है, जो कम से कम प्रतीकात्मक महत्व तो रखता ही है।
उधर, एक सर्वे के मुताबिक देश भर में दलित-आदिवासी वर्ग से पिछले पचास साल में कम से कम 50 लाख लोगों को सरकारी नौकरियों में रोजगार मिला है जिसका मतलब यह है कि लगभग 3 करोड़ दलितों-आदिवासियों का एक मध्यमवर्ग बन चुका है।
लेकिन देश की आबादी में लगभग एक चौथाई कि हिस्सेदारी रखनेवाला वर्ग अभी भी बहुत तरक्की नहीं कर पाया है। एक अनुमान के मुताबिक अगर देश की आबादी 115 करोड़ मानी जाए तो दलित-आदिवासियों की आबादी कम से कम 29 करोड़ के आसपास है-लेकिन अभीतक उनमें से लगभग 3-4 करोड़ ही ठीकठाक हालत में आ पाए हैं।
दूसरी तरफ सरकारों के पास हाशिए पर आए इस वर्ग के लिए भले ही योजनाओं का अंबार हो लेकिन तस्वीर अभी भी भयावह है। अभी तक हमारे पास कोई प्रमाणिक सर्वेक्षण मौजूद नहीं है कि देश की जेलों में दलितों-आदिवासियों की फीसदी क्या है, उनकी मृत्युदर क्या है, उनकी साक्षरता क्या है और जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी क्या है। जो सर्वे हैं भी वे तस्वीर के सभी पहलुओं को नहीं छूते और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
हाल ही में मैं बिहार में अपने गांव गया था। मेरे गांव में तकरीबन 60 दलित परिवार हैं जिनमें से 40 का घर उनकी जमीन पर नहीं है। वे या तो सरकारी जमीन पर रहते हैं या पूर्व जमींदारों के जमीन पर। उस जमीन पर उनका कोई कानूनी हक नहीं है, कोई भी अगर उनको जबरन बेदखल कर दे तो वे कुछ नहीं कर पाएंगे। कई दफा दलितों के ही परिवार आपसी झगड़ों में दूसरों के जमीन पर कब्जा कर लेते हैं और वो कुछ कर नहीं पाता क्योंकि कानूनन जमीन उसकी है ही नहीं। सरकार उनको इंदिरा आवास देती है लेकिन वो इंदिरा आवास किस जमीन पर बनेगा इसकी कोई योजना नहीं है।
मैंने ये महसूस किया कि अगर हरेक दलित परिवार को कम से कम घर बनाने के लिए जमीन मिल जाए तो उनको काफी सहूलियत होगी। ऐसा करना मुश्किल भी नहीं है। हिंदुस्तान के हरेक गांव में काफी सरकारी जमीन है जिसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा या दबंगों ने कब्जा कर लिया है। अगर सरकार नरेगा और आदिवासी बिल की तरह संसद में ऐसा कानून पास करे तो ये एक क्रान्तिकारी काम हो सकता है।(जारी)
Thursday, April 30, 2009
Tuesday, April 28, 2009
लालूजी, आपकी चिंता जायज है....
किसी ने कहा कि लालू पिछले ൨൦ सालों में पहली बार बौखलाए हुए दिख रहें हैं। नब्बे के दशक में जातीय रैली करने वाले और बयानवाजी करनेवाले लालू इतने असुरक्षित कभी नहीं दिखे जितना इस चुनाव में दिख रहे हैं। टीवी चैनलों पर उनकी बाडी लेंग्वेज और अखबारों में उनकी तस्वीर उनकी चुगली कर रही है। एक जमाना था जब लालू ने कथित तौर पर कहा था कि 'भूराबाल' साफ करो जिसका बेहतरीन लाभ भी उनको मिला था। हलांकि लालू इस बात से अब इंकार करते हैं। अब बीस साल बाद लालू ने कुछ इसी तरह का नारा दिया कि वरुण गांधी पर बुलडोजर चलवा देंगे। ये लालू की बढ़ती असुरक्षा का प्रतीक है।
इसकी वजहें भी हैं। बिहार में मुस्लिम मतों का बड़े पैमाने पर विभाजन हो रहा है, ऐसा यूपी में भी हो रहा है। इसकी वजह ये है कि लालू और मुलायम लगातार मुस्लिम मतों का भयादोहन करते रहे हैं, जबकि पिछले दो-तीन सालों से नीतीश और मायावती के राज में मुसलमान उस तरह से भयाक्रांत नहीं है। जब मुसलमान भयाक्रांत नहीं होता है तो वो भले ही नीतीश को वोट न करे, लेकिन वो अपनी मर्जी से गैर-बीजेपी उम्मीदवार को वोट दे ही सकता है। लालू यहीं पर फंस गए हैं। पांच-पांच मुसलमान उम्मीदवार उतारने के बावजूद लालू को यकीन नहीं कि मुसलमानों का सारा वोट उनको मिल ही जाएगा। दूसरी बात ये कि कांग्रेस के पिछले पांच साला केंद्रीय शासन से मुसलमानों का एक बड़ा तबका कांग्रेस की तरफ आकर्षित हुआ है। दूसरी बात ये कि लालू ने कई सिटींग कांग्रेसी सीट पर भी अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। मुसलमान इस खुन्नस भरी कार्रवाई से नाराज है। उदाहरण के लिए मधुबनी लोकसभा सीट से लालू ने अपने प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी को टिकट दे दिया है, जिससे शकील अहमद के जीतने की संभावना धूमिल हो गई है। मुसलमान इसे गलत मानता है।
लेकिन लालू को इतने घवराने की जरुरत नहीं है। अभी भी उनके पास एक हिलता डुलता ही सही, वोटबैंक है और नीतीश ने कई कमजोर उम्मीदवार उतारकर उनकी राह थोड़ी सी आसान कर दी है। लेकिन नीतीश कुमार ने पीछले तीन साल में जो छवि बनाई है, लालू उससे पार हो पाएंगे-कहना मुश्किल है।
इसकी वजहें भी हैं। बिहार में मुस्लिम मतों का बड़े पैमाने पर विभाजन हो रहा है, ऐसा यूपी में भी हो रहा है। इसकी वजह ये है कि लालू और मुलायम लगातार मुस्लिम मतों का भयादोहन करते रहे हैं, जबकि पिछले दो-तीन सालों से नीतीश और मायावती के राज में मुसलमान उस तरह से भयाक्रांत नहीं है। जब मुसलमान भयाक्रांत नहीं होता है तो वो भले ही नीतीश को वोट न करे, लेकिन वो अपनी मर्जी से गैर-बीजेपी उम्मीदवार को वोट दे ही सकता है। लालू यहीं पर फंस गए हैं। पांच-पांच मुसलमान उम्मीदवार उतारने के बावजूद लालू को यकीन नहीं कि मुसलमानों का सारा वोट उनको मिल ही जाएगा। दूसरी बात ये कि कांग्रेस के पिछले पांच साला केंद्रीय शासन से मुसलमानों का एक बड़ा तबका कांग्रेस की तरफ आकर्षित हुआ है। दूसरी बात ये कि लालू ने कई सिटींग कांग्रेसी सीट पर भी अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। मुसलमान इस खुन्नस भरी कार्रवाई से नाराज है। उदाहरण के लिए मधुबनी लोकसभा सीट से लालू ने अपने प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी को टिकट दे दिया है, जिससे शकील अहमद के जीतने की संभावना धूमिल हो गई है। मुसलमान इसे गलत मानता है।
लेकिन लालू को इतने घवराने की जरुरत नहीं है। अभी भी उनके पास एक हिलता डुलता ही सही, वोटबैंक है और नीतीश ने कई कमजोर उम्मीदवार उतारकर उनकी राह थोड़ी सी आसान कर दी है। लेकिन नीतीश कुमार ने पीछले तीन साल में जो छवि बनाई है, लालू उससे पार हो पाएंगे-कहना मुश्किल है।
Thursday, April 23, 2009
कांग्रेस, बीजेपी और चुनाव प्रचार
यूं तो चुनाव प्रचार की अहमियत विकसित देशों में भी काफी होती है, लेकिन पिछड़ापन, गरीबी और अशिक्षा से ग्रस्त देशों में चुनाव प्रचार कुछ ज्यादा ही मायने रखता है। यहां मतदाताओं के एक बड़े तबके को प्रचार, पैसा और संसाधनों के बल पर आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। मौजूदा लोकसभा चुनाव के प्रचार पर अगर गौर करें तो साफ हो जाता है कि कांग्रेस तमाम सकारात्मक चीजों के बावजूद इस मायने में बीजेपी से पिछड़ रही है।
बात करें अगर इलेक्ट्रानिक, होर्डिंग्स और इंटरनेट पर बीजेपी के प्रचार की तो ये कांग्रेस से कई गुना ज्यादा आक्रामक,भावुक और आकर्षक है। बीजेपी ने बड़ी चतुराई से अपने परंपरागत वोटरों को हिंदुत्व का संदेश दिया है, ये टेलिविजन पर उसके प्रचार अभियान से साफ है। एक अपुष्ट खबर के मुताबिक बीजेपी का चुनाव प्रचार बजट भी कांग्रेस से ज्यादा है, हलांकि इसकी सत्यता में संदेह है।
पांच साल सत्ता में रहने और आम जनता के हित में काफी काम करने के बावजूद कांग्रेस उन कामों को जनता में भुना नहीं पा रही। वो बीजेपी को उस तरह नहीं घेर रही जिसकी उम्मीद उससे की जाती है। नरेगा, दोपहर का भोजन, किसानों की ऋण माफी और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट सिर्फ राहुल और सोनिया के जुबान से निकलते हैं। पार्टी संस्थागत रुप से इस के प्रचार पर अमल नहीं कर रही।
दूसरी तरफ कांग्रेस ने अपने अपने प्रचारकों की फौज भी सीमित कर रखी है। उसके पास राहुल और सोनिया ही स्टार प्रचारक हैं जिसमें सोनिया गांधी की हिंदी लोगों के लिए एक बड़ी कठिनाई है। कांग्रेस ने अपने बड़े नेताओं प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, शीला दीक्षित जैसों को ज्यादा अहिमियत नहीं दी है। इसके उलट बीजेपी के पास नेताओं की एक कतार हैं जो संवाद की कला में माहिर है। वो टेलिविजन स्टूडियों से लेकर आम जनसभाओं तक में लोगों को अपनी भाषण कला से प्रभावित करते हैं।
इसके अलावे बीजेपी उस दिशा में कांग्रेस को फंसाना चाहती है जिससे पूरी की पूरी सियासत गैर-भाजपावाद पर निर्भर हो जाए। भाजपा खुद ही इस चुनाव का केंद्र बनना चाहती है। बीजेपी नेताओं का मनमोहन सिंह को कमजोर और कांग्रेस को बुढ़िया बताने का बयान इसी दिशा में दी गई एक सोंची समझी चाल है। कांग्रेस के मीडिया मैनेजर इस बात को समझ नहीं रहे और सोनिया मनमोहन सिंह आडवाणी को जवाब देने में लग गए हैं। बीजेपी चाहती है कि सियासत का एजेंडा वो तय करे। वो चाहती है कि कांग्रेस सिर्फ उसके आरोपों का जवाब देती फिरती रहे और अपनी सारी उर्जा अपने सकारात्मक कामों के प्रचार में न लगाए। कांग्रेस इस चाल में फंसती जा रही है। ये भगवा पार्टी का घोषित लक्ष्य है कि चुनाव ध्रुवीकृत हो, क्योंकि खंडित जनादेश कांग्रेस के पक्ष में जाएगा जबकि ध्रुवीकृत जनादेश बीजेपी की जागीर है।
हलांकि इतना तय है कि हिंदुस्तान जैसे विविधताओं वाले देश में जहां जनता अपनी पूर्व धारणा के मुताबिक ही मतदान करती है वहां ऐसे प्रचार व्यापक बदलाव नहीं लाते लेकिन जहां 10-20 सीटों से सरकार बनने बिगड़ने की बात हो वहां इस प्रचार का अपना महत्व तो है ही।
बात करें अगर इलेक्ट्रानिक, होर्डिंग्स और इंटरनेट पर बीजेपी के प्रचार की तो ये कांग्रेस से कई गुना ज्यादा आक्रामक,भावुक और आकर्षक है। बीजेपी ने बड़ी चतुराई से अपने परंपरागत वोटरों को हिंदुत्व का संदेश दिया है, ये टेलिविजन पर उसके प्रचार अभियान से साफ है। एक अपुष्ट खबर के मुताबिक बीजेपी का चुनाव प्रचार बजट भी कांग्रेस से ज्यादा है, हलांकि इसकी सत्यता में संदेह है।
पांच साल सत्ता में रहने और आम जनता के हित में काफी काम करने के बावजूद कांग्रेस उन कामों को जनता में भुना नहीं पा रही। वो बीजेपी को उस तरह नहीं घेर रही जिसकी उम्मीद उससे की जाती है। नरेगा, दोपहर का भोजन, किसानों की ऋण माफी और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट सिर्फ राहुल और सोनिया के जुबान से निकलते हैं। पार्टी संस्थागत रुप से इस के प्रचार पर अमल नहीं कर रही।
दूसरी तरफ कांग्रेस ने अपने अपने प्रचारकों की फौज भी सीमित कर रखी है। उसके पास राहुल और सोनिया ही स्टार प्रचारक हैं जिसमें सोनिया गांधी की हिंदी लोगों के लिए एक बड़ी कठिनाई है। कांग्रेस ने अपने बड़े नेताओं प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, शीला दीक्षित जैसों को ज्यादा अहिमियत नहीं दी है। इसके उलट बीजेपी के पास नेताओं की एक कतार हैं जो संवाद की कला में माहिर है। वो टेलिविजन स्टूडियों से लेकर आम जनसभाओं तक में लोगों को अपनी भाषण कला से प्रभावित करते हैं।
इसके अलावे बीजेपी उस दिशा में कांग्रेस को फंसाना चाहती है जिससे पूरी की पूरी सियासत गैर-भाजपावाद पर निर्भर हो जाए। भाजपा खुद ही इस चुनाव का केंद्र बनना चाहती है। बीजेपी नेताओं का मनमोहन सिंह को कमजोर और कांग्रेस को बुढ़िया बताने का बयान इसी दिशा में दी गई एक सोंची समझी चाल है। कांग्रेस के मीडिया मैनेजर इस बात को समझ नहीं रहे और सोनिया मनमोहन सिंह आडवाणी को जवाब देने में लग गए हैं। बीजेपी चाहती है कि सियासत का एजेंडा वो तय करे। वो चाहती है कि कांग्रेस सिर्फ उसके आरोपों का जवाब देती फिरती रहे और अपनी सारी उर्जा अपने सकारात्मक कामों के प्रचार में न लगाए। कांग्रेस इस चाल में फंसती जा रही है। ये भगवा पार्टी का घोषित लक्ष्य है कि चुनाव ध्रुवीकृत हो, क्योंकि खंडित जनादेश कांग्रेस के पक्ष में जाएगा जबकि ध्रुवीकृत जनादेश बीजेपी की जागीर है।
हलांकि इतना तय है कि हिंदुस्तान जैसे विविधताओं वाले देश में जहां जनता अपनी पूर्व धारणा के मुताबिक ही मतदान करती है वहां ऐसे प्रचार व्यापक बदलाव नहीं लाते लेकिन जहां 10-20 सीटों से सरकार बनने बिगड़ने की बात हो वहां इस प्रचार का अपना महत्व तो है ही।
Saturday, April 18, 2009
मेरी शुभकामनाएं नीतीश के साथ है...
आमतौर पर लोग मान रहे हैं कि बिहार में इसबार नीतीश के सुशासन से लालू चारो खाने चित्त हो जाएंगे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और भी हो सकती है। नीतीश कुमार की लोकप्रियता उफान पर है इसमें कोई दो मत नहीं लेकिन उन्होने कुछ ऐसी गलतियां की हैं जिससे उन्हे लेने के देने पड़ सकते हैं। लोकप्रियता और प्रचार में नीतीश कुमार भले बीस हों लेकिन टिकटों के बंटवारे में उन्होने चूक कर दी है। लालू यादव के मुकाबले नीतीश के उम्मीदवार हल्के और नए हैं साथ ही इसमें समाजिक समीकरणों की भी अनदेखी की गई है।
नीतीश कुमार ने ऐसा इसलिए किया है उन्हे यकीन है कि ये चुनावी बैतरणी वे अपनी इमेज के बल पर पार हो जाएंगे। दूसरी वजह इसकी ये है कि उन्हे अपने पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गजों को दरवाजा भी दिखाना था। ये कुछ ऐसी गलती है जो किसी के गले नहीं उतर रही। बिहार की जनता को ये बात अभी तक गले नहीं उतर रही की जार्ज, दिग्विजय, नीतीश मिश्र और नागमणि को क्यों चलता कर दिया गया। नीतीश कुमार के पास इस बात को कोई माकूल जवाब नहीं है। आज नीतीश कुमार के पास शरद यादव जैसे जनाधारहीन नेता हैं और लल्लन सिंह नंबर दो बन गए हैं जो उनके सचिव-वत थे।
नीतीश कुमार कुछ-कुछ उसी तरह से अपनी पार्टी में दबदबा बनाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं जैसा कि लालू ने नब्बे की दशक के शुरुआत में किया था। लेकिन लालू को मंडल के दौर में समाज के व्यापक वर्ग का समर्थन थाली में परोस कर मिला था ये बात शायद नीतीश भूल रहे हैं। नीतीश का आधार संवेदनशील है, उसमें कमिटमेंट का अभाव है और बहुत हदतक लालू विरोध की नकारात्मकता से ग्रस्त भी है। वो नीतीश के लिए अभी तक सकारात्मक वोट नहीं बन पाया है चाहे ऊपर से वो उनके विकास की कितनी भी तारीफ करे।
हां, नीतीश ने अत्यंत पिछड़ों में अपना आधार जरुर मजबूत किया है जिसकी आबादी अहम है।लेकिन इस चक्कर में नीतीश ने ब्राह्मणों को नाराज कर दिया है जो उनका आधार वोट था। लोकसभा की तकरीबन बीस सीटों पर अपना प्रभाव डालने वाले ब्राह्मणों को जेडी-यू ने एक भी टिकट नहीं दिया। इसके अलावे पार्टी से कोईरियों के कद्दावर नेता नागमणि का इस्तीफा भी नीतीश पर भारी पड़ सकता है। राजपूत इसलिए खफा हैं कि जेडी-यू में भुमिहारों का दबदबा बढ़ गया है।
तो फिर नीतीश ने किसके भरोसे दांव खेला है? इतना तय है कि अगर अति पिछड़ों का पूरा वोट उन्हे मिल गया तो फिर उन्हे रोकनेवाला कोई नहीं है, लेकिन अगर उसमें अभी भी लालू ने हिस्सेदारी जता दी तो फिर नीतीश की सारी सड़के और बिजली के पोल धरे के धरे रह जाएंगे।
ये लेख चुनावी संभावनाओं को लेकर है, अलबत्ता ये भी तय है कि बिहार को अभी तक नीतीश जैसा प्रशासक नहीं मिला था। मेरी शुभकामनाएं नीतीश के साथ है।
नीतीश कुमार ने ऐसा इसलिए किया है उन्हे यकीन है कि ये चुनावी बैतरणी वे अपनी इमेज के बल पर पार हो जाएंगे। दूसरी वजह इसकी ये है कि उन्हे अपने पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गजों को दरवाजा भी दिखाना था। ये कुछ ऐसी गलती है जो किसी के गले नहीं उतर रही। बिहार की जनता को ये बात अभी तक गले नहीं उतर रही की जार्ज, दिग्विजय, नीतीश मिश्र और नागमणि को क्यों चलता कर दिया गया। नीतीश कुमार के पास इस बात को कोई माकूल जवाब नहीं है। आज नीतीश कुमार के पास शरद यादव जैसे जनाधारहीन नेता हैं और लल्लन सिंह नंबर दो बन गए हैं जो उनके सचिव-वत थे।
नीतीश कुमार कुछ-कुछ उसी तरह से अपनी पार्टी में दबदबा बनाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं जैसा कि लालू ने नब्बे की दशक के शुरुआत में किया था। लेकिन लालू को मंडल के दौर में समाज के व्यापक वर्ग का समर्थन थाली में परोस कर मिला था ये बात शायद नीतीश भूल रहे हैं। नीतीश का आधार संवेदनशील है, उसमें कमिटमेंट का अभाव है और बहुत हदतक लालू विरोध की नकारात्मकता से ग्रस्त भी है। वो नीतीश के लिए अभी तक सकारात्मक वोट नहीं बन पाया है चाहे ऊपर से वो उनके विकास की कितनी भी तारीफ करे।
हां, नीतीश ने अत्यंत पिछड़ों में अपना आधार जरुर मजबूत किया है जिसकी आबादी अहम है।लेकिन इस चक्कर में नीतीश ने ब्राह्मणों को नाराज कर दिया है जो उनका आधार वोट था। लोकसभा की तकरीबन बीस सीटों पर अपना प्रभाव डालने वाले ब्राह्मणों को जेडी-यू ने एक भी टिकट नहीं दिया। इसके अलावे पार्टी से कोईरियों के कद्दावर नेता नागमणि का इस्तीफा भी नीतीश पर भारी पड़ सकता है। राजपूत इसलिए खफा हैं कि जेडी-यू में भुमिहारों का दबदबा बढ़ गया है।
तो फिर नीतीश ने किसके भरोसे दांव खेला है? इतना तय है कि अगर अति पिछड़ों का पूरा वोट उन्हे मिल गया तो फिर उन्हे रोकनेवाला कोई नहीं है, लेकिन अगर उसमें अभी भी लालू ने हिस्सेदारी जता दी तो फिर नीतीश की सारी सड़के और बिजली के पोल धरे के धरे रह जाएंगे।
ये लेख चुनावी संभावनाओं को लेकर है, अलबत्ता ये भी तय है कि बिहार को अभी तक नीतीश जैसा प्रशासक नहीं मिला था। मेरी शुभकामनाएं नीतीश के साथ है।
Monday, April 13, 2009
तो मामला महज 20 सीटों का है......
ये तो पक्की बात है कि सरकार वही बनाएगा जो आंकड़ों के खेल में बीस होगा। अब वो आंकड़ा क्या है ? बहुत पहले तक वो 272 होता था, लेकिन नोटों, स्वार्थों और कलाबाजियों के दौर में वह घटकर लगभग 200 रह गया है। यानी जो भी गठबंधन 200 ले आएगा, सरकार बना लेगा। यहां चकराने की जरुरत बिल्कुल नहीं है। जी हां, 50-60 सीट दोनों ही गठबंधन चुटकी में जुगाड़ लेगी, ये उन्हे पता है। कांग्रेस के लिए वाम और बीजेपी के लिए चंद्राबाबू-जयललिता इतनी सीटें थाली में लेकर बैठी हुईं हैं। हां, मुद्रास्फीति के इस दौर में कीमत कुछ ज्यादा हो सकती है।
अब सवाल ये है कि वो 200 सीटे किसके पास है। सवाल यहां आकर थोड़ा टेढ़ा हो जाता है। पूरे देश में लगभग सवा दो सौ सीटों पर भाजपा और कांग्रेस की सीधी भिड़ंत हैं इसमें शामिल हैं-हिमाचल(4), उत्तराखंड(4) राजस्थान(25), गुजरात(21) मध्यप्रदेश(29) छत्तीसगढ़(11) कर्नाटक(28) दिल्ली(7) झारखंड (12), महाराष्ट्र (48) असम(14), पंजाब(13), हरियाणा(10), गोवा(2) अरुणाचल प्रदेश(2), और इस भिड़ंत में भाजपा बीस दिख रही है। कहने का मतलब ये कि भाजपा यहां से तकरीबन 120 से 130 सीटें जीत सकती है। इसके आलावे बिहार(40), यूपी(80) और उड़ीसा(21) की वो 140 सीटें हैं जहां भाजपा कमजोर नहीं हैं। इसमें भाजपा गठबंधन 50 तक सीटें अपनी झोली में डाल सकती है। और छिटपुट सीटें पार्टी, केरल, तमिलनाडू आंध्रप्रदेश में भी लाएगी। तो बदतरीन हालात में भी पार्टी 180 सीटों से ऊपर है। हलांकि अभी भी वो 200 से नीचे है लेकिन नजदीक दिखती है।
अब जरा कांग्रेस के आंकड़ों पर गौर करें। सबसे ऊपर के सवा दो सौ सीटों में कांग्रेस के पास पाने को ज्यादा नहीं है। जो उम्मीद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात में पार्टी ने पाल रखी थी, उसमें भाजपा ने अपने तमाम ढ़ीले नट-वोल्ट कस दिए हैं। राजस्थान और दिल्ली को लेकर पार्टी खुशफहमी पाल सकती है, लेकिन भाजपा ने बड़ी तेजी से डेमेज कंट्रोल किया है। उसकी विधानसभा में हार आपसी कलह से ज्यादा, कांग्रेस की काबिलियत से कम हुई थी। एक निर्मम समीक्षा यह भी कहता है कि कांग्रेस खुद 100 सीट जीतने की हालत में नहीं है,जबकि यूपीए जो कि कागजों पर ही बचा है, 150 पर अटक सकता है।
कांग्रेस की उम्मीदें उड़ीसा और बंगाल और केरल से है। बंगाल और केरल में तो वह तरक्की पर है लेकिन उड़ीसा में भाजपा कमजोर नहीं। उसने अपना साम्प्रदायिक होमवर्क करके काफी सोच समझकर नवीन पटनायक से पल्ला झाड़ा है। भाजपा वहां इस हालात में है कि वो सूबे को अगला कर्नाटक बनाने की राह पर है। दो-तीन चुनावों में खंडित जनादेश-और फिर सूबे पर कब्जा भाजपा की रणनीति है। चुनाव के बाद नवीन पटनायक भाजपा के सबसे विश्वस्त सहयोगी बनने को फिर से अभिशप्त हो सकते हैं।
अब भाजपा को जो 20-30 सीटों की कमी महसूस हो रही है उसे वो आक्रामक चुनाव प्रचारों से पाटना चाहती है। पार्टी का वार रुम कांग्रेस से बेहतर है। टीवी चैनल से लेकर वेबसाईट तक पर भाजपा कांग्रेस पर भारी है। उसके पास प्रचारकों की एक सीरीज है जबकि कांग्रेस के पास महज सोनिया-राहुल हैं। हलांकि मुद्दे, संसाधन और हालात कांग्रेस के पक्ष में ज्यादा थे, लेकिन पार्टी उसका फायदा नहीं उठा पा रही। रोजगार गारंटी योजना, किसानों की कर्ज़ माफी, दोपहर का भोजन, सर्व शिक्षा अभियान और ग्रामीण विद्युतीकरण को कांग्रेस मतदाताओं को बेच नहीं पा रही।
दूसरी तरफ भाजपा चाहती है कि चुनाव ध्रुवीकृत हो। वो चाहती है कि बीजेपी खुद मुद्दा बन जाए। इसमें आडवाणी की टीम सफल दिख रही है। पहले वरुण गांधी का बयान, फिर आडवाणी का मनमोहन को डिवेट की चुनौती, फिर मोदी का बुढ़िया-गुड़िया प्रकरण बीजेपी की शातिर चाल है, जिसमें कांग्रेस फंसती जा रही है। खंडित जनादेश कांग्रेस के पक्ष में जाएगा, जबकि ध्रुवीकृत जनादेश भाजपा की जागीर है। भाजपा इसी चक्कर में है। तो मामला अब महज 20 सीटों का रह गया है।
Monday, February 23, 2009
कुत्ता, मंदी....एक्सेक्ट्रा...!
अचानक कुत्ते का जिक्र आया। यों दिल्ली में रहते-रहते ‘कुत्ते’ हमारी ज़िंदगी में कम ही दखल देते हैं, सिवाय इसके की कटवारिया सराय की छतों से रात को कभी-2 नवजात कुत्तों के कोंकियाने की आवाज़ आती है (गौरतलब है कि जमीन पर उनके लिए न्यूनतम जगह है, बाईक और कारों ने उन्हे रिप्लेस कर दिया है)। राजीव ने कहा कि उसके पिताजी ने दो ब्रांडेड कुत्ते पाल लिए हैं, तो मंदी के इस मौसम में मेरा चौंकना लाजिमी था। राजीव के पापा ने जो कुत्ते पाले हैं वो खालिस कुलीन हैं - पिता की तरफ से सात पीढ़ी से जर्मन और मां की तऱफ से फ्रेंच। राजीव ने संक्षेप में कुत्ता महात्म्य समझाया और कहा कि कुत्तों से लगाव एक ख़तरनाक बीमारी है। कुत्तों के सानिध्य में रहने से आपकी क्रिएटिव क्षमता बढ़ जाती है, और आप ज्यादा कल्पनाशील हो जाते हैं वगैरह वगैरह। मेरा मानना है कि अब राजीव की शादी में दहेज ज्यादा मिलेगा, वजह- लड़के के घर दो-दो खानदानी कुत्ते हैं। अब राजीव अपनी शादी के विज्ञापन में लिख सकता है कि Bridegroom working with India’s No. 1 news channel and having two Labradors, father working with a top University of India’s one of the eastern states. आजकल के हिसाब से जहां वर-वधू की मानसिकताओं में कम से कम दूरी को आदर्श माना जाता है ,वहीं ये भी खयाल रखा जाता है कि दोनों एक दूसरे की संवेदनाओं का खयाल रखें। ऐसे में राजीव की होनेवाली दुल्हन ऐसी होनी चाहिए जिसके घर में कम से दो खानदानी कुतिया जरुर हो।
इधर एक भाई ने दावा किया कि पटना में दिल्ली से ज्यादा कुत्ते हैं। मैंने पूछा कैसे तो उसका कहना था गंगा के तट पर रोज कम से कम दस हजार से कम कुत्ते क्या बैठते होंगे। मैंने विरोध किया कि नहीं, दिल्ली के वसंत विहार में ही उतने के करीब कुत्तें होंगे। लेकिन मित्र ने उन कुत्तों को ‘कुत्ते’ मानने से इनकार कर दिया। एक आइडिया ये भी था कि अगर कुत्ते, मनुष्य मात्र के सबसे प्राचीन और भरोसेमंद साथी हैं तो अलग-अलग इलाकों के कुत्ते अलग जुबान बोलते होंगे। मसलन पटना के कुत्तें मगही और झांसी के कुत्ते बुंदेलखंडी। राजीव के छोटे भाई संजीव का दावा है कि जेएनयू के कुत्तों को मार्क्स की थ्योरी पूरी रटी रटाई होगी और झंडेवालान के कुत्ते जुबान से क्या रंगरुप से भी भगवे होंगे। कोई ताज्जुब नहीं कि ऐसा किसी शोध में सामने आ ही जाए।
बहरहाल एक बात जो तय है कि बड़े शहर ‘कुत्तों’ के लिहाज से ज्यादा मुफीद नहीं हैं। यहां उनके लिए लोकतंत्र नहीं है। यहां ‘कुत्तें’ नहीं रह सकते, अलबत्ता ‘भेड़ियों’ के लिए ये जगह काफी सही है। ऐसे में जब कभी संजीव पिल्लों की आवाज की नकल करता है, तो मुझे वो वैसे ही बैचेन कर देता है, जैसे कभी-कभी दिल्ली में रहकर भी चिड़ियों की चहचहाहट का अरसे तक न सुन पाना।
Saturday, February 21, 2009
चुनाव, मंदी और उफान मारता ज्योतिष
चुनाव आयोग ने मंदी में भले ही चुनावी सर्वे करने वालों की आशा पर तुषारापात किया हो लेकिन है कोई माई का लाल जो ज्योतिषियों की भविष्यवाणी को रोक सके। रोक भी नहीं सकता…भई आस्था का सवाल है। मुस्कुराईये नहीं..साब जिस देश में अधिकांश लोग अपनी शादी और बच्चों का नाम ज्योतिषियों से पूछकर रखते हों वहां वो अपनी तकदीर वैसे ही किसी के नाम थोड़े ही लिख देंगे ? ये भी कह सकते हैं कि चुनावी सर्वे पर रोक ने संबंधित लोगों का सारा फोकस ज्योतिषियों पर टिका दिया है। टीवी चैनलों ने जब से ज्योतिष उद्योग में नई जान फूंकी हैं तब से एक अनुमान के मुताबिक इस क्षेत्र में तकरीबन 10,000 से ज्यादा प्रत्यक्ष और 1 लाख से ज्यादा अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पनपे हैं और यह क्षेत्र औसतन 20 फीसदी की दर से तरक्की करता जा रहा है। कोई ताज्जुब नहीं कल को कोई रेटिंग एजेंसी ये दावा कर दे कि देश की जीडीपी में इस क्षेत्र का योगदान 1 फीसदी से ऊपर का है और सरकार को एक ज्योतिष मंत्रालय ही बनाना पड़े।
आगामी लोकसभा चुनाव में अगर विज्ञापन एजेंसियों की झोली में हजार करोड़ से ऊपर की रकम जाएगी तो ज्योतिषियों को भी 500 करोड़ से ऊपर के राजस्व का अनुमान है। इसमें बड़ा हिस्सा उनकी कंसल्टेसी फी, अनुष्ठान, अंगूठी और पोलिटिकल लावीईंग से आएगा। कुछ ज्योतिषी तो ऐसे हैं जो सीधे टिकट दिलवाने में अहम भूमिका निभाएंगे। 543 सीट में से कम से कम 25 -30 सीट तो जरुर ज्योतिषियों के लावीईंग के बदौलत बांटी जाएगी। नेताओं में बेहतरीन और रिफ्ररेंस से भेजे गए ज्योतिषियों की पूछ अचानक बढ़ गई है। यकीन न हो तो नॉर्थ एवेन्यू या साउथ एवेन्यू का एक चक्कर लगा लीजिए- वहां सैकड़ो की तादाद में विध्याचल, ऋषिकेष और बनारस के बाबाओं ने नेताओं के आउट हाउस में डेरा जमा लिया है। कॉरपोरेट सेक्टर से बेरोजगार कुछ होनहार अध्यवसीयी युवा भी ज्योतिष की तरफ आकर्षित हुए हैं।
दूसरी बात ये कि इस आर्थिक मंदी ने भले ही सारे सेक्टर की मां-बहन एक कर दी हो सिर्फ एक ज्योतिष ही ऐसा है जो ताल ठोक के खड़ा है। वामपंथी नेता लाख कहें कि 20 लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं लेकिन मान लीजिए इसमें से 5 लाख ने भी सितारों पर शक किया तो बाबाओं की पौ-बारह है। मुझे लगता है कि अगर तमाम मौजूदा ज्योतिषियों पर सर्वे किया जाए तो उनके कारोबार में भारी इजाफा पाया जाएगा।
जिस तरह पूरी दुनिया की अर्थव्यव्यस्थाएं अमेरिका से जुड़ी हुई है उसी तरह जिंदगी के तार भी एक दूसरे से किस तरह जुड़े हुए हैं इसकी एक बानगी देखिए। मेरे एक मित्र हाल ही में बेरोजगार हुए हैं। वो लव मैरिज करने वाले थे, लेकिन मंदी ने उनकी कमर तोड़ दी। अब मित्र अलग से ज्योतिष के चक्कर में हैं और मित्रानी चुपके से किसी दूसरे ज्योतिष के चक्कर में है। ऐसे एक नहीं, दो नहीं लाखों लोग हैं जो बाबाओं की झोली भर रहे हैं। इधर मैं जहां कटवारिया सराय में रहता हूं वहां भले ही कई दुकानें बंदी के कगार पर हों लेकिन अचानक 4-5 ज्योतिष की दुकानें खुल गई है।
शायद ज्योतिष का धंधा इतिहास में इतना मुफीद कभी नहीं था या यूं कहें कि ये ज्योतिष का सबसे स्वर्णिम काल है।
आगामी लोकसभा चुनाव में अगर विज्ञापन एजेंसियों की झोली में हजार करोड़ से ऊपर की रकम जाएगी तो ज्योतिषियों को भी 500 करोड़ से ऊपर के राजस्व का अनुमान है। इसमें बड़ा हिस्सा उनकी कंसल्टेसी फी, अनुष्ठान, अंगूठी और पोलिटिकल लावीईंग से आएगा। कुछ ज्योतिषी तो ऐसे हैं जो सीधे टिकट दिलवाने में अहम भूमिका निभाएंगे। 543 सीट में से कम से कम 25 -30 सीट तो जरुर ज्योतिषियों के लावीईंग के बदौलत बांटी जाएगी। नेताओं में बेहतरीन और रिफ्ररेंस से भेजे गए ज्योतिषियों की पूछ अचानक बढ़ गई है। यकीन न हो तो नॉर्थ एवेन्यू या साउथ एवेन्यू का एक चक्कर लगा लीजिए- वहां सैकड़ो की तादाद में विध्याचल, ऋषिकेष और बनारस के बाबाओं ने नेताओं के आउट हाउस में डेरा जमा लिया है। कॉरपोरेट सेक्टर से बेरोजगार कुछ होनहार अध्यवसीयी युवा भी ज्योतिष की तरफ आकर्षित हुए हैं।
दूसरी बात ये कि इस आर्थिक मंदी ने भले ही सारे सेक्टर की मां-बहन एक कर दी हो सिर्फ एक ज्योतिष ही ऐसा है जो ताल ठोक के खड़ा है। वामपंथी नेता लाख कहें कि 20 लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं लेकिन मान लीजिए इसमें से 5 लाख ने भी सितारों पर शक किया तो बाबाओं की पौ-बारह है। मुझे लगता है कि अगर तमाम मौजूदा ज्योतिषियों पर सर्वे किया जाए तो उनके कारोबार में भारी इजाफा पाया जाएगा।
जिस तरह पूरी दुनिया की अर्थव्यव्यस्थाएं अमेरिका से जुड़ी हुई है उसी तरह जिंदगी के तार भी एक दूसरे से किस तरह जुड़े हुए हैं इसकी एक बानगी देखिए। मेरे एक मित्र हाल ही में बेरोजगार हुए हैं। वो लव मैरिज करने वाले थे, लेकिन मंदी ने उनकी कमर तोड़ दी। अब मित्र अलग से ज्योतिष के चक्कर में हैं और मित्रानी चुपके से किसी दूसरे ज्योतिष के चक्कर में है। ऐसे एक नहीं, दो नहीं लाखों लोग हैं जो बाबाओं की झोली भर रहे हैं। इधर मैं जहां कटवारिया सराय में रहता हूं वहां भले ही कई दुकानें बंदी के कगार पर हों लेकिन अचानक 4-5 ज्योतिष की दुकानें खुल गई है।
शायद ज्योतिष का धंधा इतिहास में इतना मुफीद कभी नहीं था या यूं कहें कि ये ज्योतिष का सबसे स्वर्णिम काल है।
Monday, February 16, 2009
जाग रहा है सोया अजगर
लगता है एक अरसे के बाद बिहार का नेतृत्व परिपक्व होता जा रहा है। पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर गौर कीजिए-नीतीश और लालू में विकास पुरुष बनने की होड़ लग गई है। दोनों एक दूसरे को मात देना चाहते हैं-लालू के लिए ये काम थोड़ा मुश्किल इसलिए है कि उनके 15 साला हुकूमत को लोग जल्दी से भूल नहीं पा रहे हैं लेकिन फिर भी उन्होने काफी भरपाई कर ली है। नीतीश कुमार को इसका एक नेचुरल एडवांटेज इसलिए हासिल है कि उन्होने शुरु से ही अपनी इमेज एक गंभीर, कम बोलनेवाले और विकास के लिए समर्पित नेता की बना रखी है और उसकी अपनी ब्रांडिंग हो चुकी है-लालू अभी उस फेज में नहीं पहुंच पाए हैं। बात करें रामविलास पासवान की तो उनकी भी छवि एक जुझारु नेता की है-ये रामविलास पासवान ही थे जिन्होने एक अरसे के बाद सूबे में अपनी आक्रामक रेल योजनाओं से लोगों को ललित नारायण मिश्र की याद दिला दी थी। ये बात अलग है कि हाल के दिनों में उनके जिम्मे ऐसा कोई मंत्रालय नहीं है जो सीधे आम जनता से सरोकार रखता हो।
एक तरफ जहां नीतीश कुमार ने अपने कामों से सूबे में और देश के स्तर पर अवार्ड पाने का रिकार्ड बना लिया है तो लालू भी नए-नए धमाके करते जा रहे हैं। हाल में नीतीश को एक प्रमुख चैनल द्वारा पॉलिटिशियन ऑफ द ईयर का अवार्ड मिला वहीं भारत सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में सूबे की काफी सराहना की। बिहार सरकार को ई-गवर्नेंस के लिए भी नवाजा गया। इससे पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी नीतीश के कामों की सराहना की। दूसरी तरफ लालू ने अपने इमेज को लगभग यूटर्न ही दे दिया। लगातार बढ़ते रेलवे के मुनाफे ने इस ग्लोबलाइजेशन और मंदी के दौर में लालू की इमेज को काफी पुख्ता कर दिया। फिर लालू ने बिहार के लिए रेलवे की योजनाओं का पिटारा ही खोल दिया। केंद्र में बिहार के नेताओं की मजबूत उपस्थिति ने कई केंद्रीय योजनाओं के दरवाजे भी बिहार के लिए खोले।
कुल मिलाकर हालात इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि अब बिहार के नेता जनता की बढ़ती उम्मीदों को न सिर्फ भांफ गए हैं बल्कि उनके मन में अतीत में हुए अ-विकास को लेकर एक भय भी समा गया है। याद कीजिए, ये वहीं बिहार था जहां सिर्फ एक दशक पहले तक एक भी बड़ा केंद्रीय संगठन नहीं था। कुछ लोग कह सकते हैं कि झारखंड में (जो उस समय बिहार का ही हिस्सा था) में कई केंद्रीय कारखाने थे लेकिन वो उस इलाके की भौगोलिक और प्राकृतिक बढ़त थी, बिहार के बंटवारे के बाद तो हालत और भी नाजुक हो गई। यहां ये लिखने का मतलब बिहार बनाम केंद्र या बिहार के साथ हुआ भेदभाव नहीं है बल्कि बिहारी नेताओं के स्वभाव में हुआ बदलाव है जो अब धीरे धीरे आकार ले रहा है।
आजादी के बाद से लालू युग के आगमन तक-जब केंद्र और राज्य में लगभग कांग्रेस का एकछत्र राज्य था, बिहार के नेता अपने सूबे के हित की बात केंद्र के सामने उठाने से डरते रहे। सूबा जातिवाद में इस कदर उलझा हुआ था कि किसी को विकास की चिंता ही नहीं थी। लगभग पूरा का पूरा लालू युग तो जातीय अहं के टकराव और फिर उसके स्थिरीकरण में ही बीत गया-लेकिन इसका सकारात्मक असर ये हुआ कि समाज के सभी तबके थकहार कर कुछ आगे की सोंच के लिए मजबूर हो गए। ये वहीं दौर भी था जब बिहारियों का सबसे ज्यादा पलायन महानगरों की तरफ हुआ और देश के दूसरे हिस्सों में उनके प्रति हिकारत का भाव भी उसी अनुपात में बढ़ा। दिल्ली जैसे कई शहरों की तो डेमोग्राफी ही बदल गई। लेकिन साल 2000 के बाद से हालात में तब्दीली आनी शुरु हो गई। 15 साल के लालू राज में जनता अब समाजिक न्याय से ज्यादा कुछ चाहने लगी थी और लोग कुछ नया करने को बैचेन हो रहे थे। इसका उदाहरण साल 1999 का विधानसभा चुनाव था जिसमें पिछड़ें वर्ग के लगभग प्रतीक बन चुके लालू यादव की पार्टी अल्पमत में आ गई-कांग्रेस की मदद से उसे सरकार बनानी पड़ी।
बिहार की राजनीति में जातिवाद अभी भी एक अहम मुद्दा है( बल्कि देश का ज्यादातर हिस्सा इससे मुक्त नहीं) लेकिन उसमें अब विकास की चाशनी घोल दी गई है। और मजे की बात ये है कि जातीय राजनीति के सूरमा लालू प्रसाद भी अब विकास की बात करने को मजबूर हो गए हैं।
कुल मिलाकर बिहार में सबेरा बहुत देर से आया है। जो चीज 60 के दशक में हो जानी थी वो 2000 में हुई है और इस हिसाब से बिहार अभी भी लगभग 2-3 दशक पीछे है। इस बीच दुनिया बहुत बदल गई है, देश के कई सूबे प्रति व्यक्ति आय और आधारभूत संरचना में बिहार से लगभग 4-5 गुना आगे चले गए हैं। कोई शक नहीं इसमें गलती बिहार के नेताओं की ही है, लेकिन अगर समाजिक न्याय के सिद्धांत की बात करें तो बिहार वाकई एक मजबूत केंद्रीय पैकेज का अभी भी हकदार है।
एक तरफ जहां नीतीश कुमार ने अपने कामों से सूबे में और देश के स्तर पर अवार्ड पाने का रिकार्ड बना लिया है तो लालू भी नए-नए धमाके करते जा रहे हैं। हाल में नीतीश को एक प्रमुख चैनल द्वारा पॉलिटिशियन ऑफ द ईयर का अवार्ड मिला वहीं भारत सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में सूबे की काफी सराहना की। बिहार सरकार को ई-गवर्नेंस के लिए भी नवाजा गया। इससे पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी नीतीश के कामों की सराहना की। दूसरी तरफ लालू ने अपने इमेज को लगभग यूटर्न ही दे दिया। लगातार बढ़ते रेलवे के मुनाफे ने इस ग्लोबलाइजेशन और मंदी के दौर में लालू की इमेज को काफी पुख्ता कर दिया। फिर लालू ने बिहार के लिए रेलवे की योजनाओं का पिटारा ही खोल दिया। केंद्र में बिहार के नेताओं की मजबूत उपस्थिति ने कई केंद्रीय योजनाओं के दरवाजे भी बिहार के लिए खोले।
कुल मिलाकर हालात इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि अब बिहार के नेता जनता की बढ़ती उम्मीदों को न सिर्फ भांफ गए हैं बल्कि उनके मन में अतीत में हुए अ-विकास को लेकर एक भय भी समा गया है। याद कीजिए, ये वहीं बिहार था जहां सिर्फ एक दशक पहले तक एक भी बड़ा केंद्रीय संगठन नहीं था। कुछ लोग कह सकते हैं कि झारखंड में (जो उस समय बिहार का ही हिस्सा था) में कई केंद्रीय कारखाने थे लेकिन वो उस इलाके की भौगोलिक और प्राकृतिक बढ़त थी, बिहार के बंटवारे के बाद तो हालत और भी नाजुक हो गई। यहां ये लिखने का मतलब बिहार बनाम केंद्र या बिहार के साथ हुआ भेदभाव नहीं है बल्कि बिहारी नेताओं के स्वभाव में हुआ बदलाव है जो अब धीरे धीरे आकार ले रहा है।
आजादी के बाद से लालू युग के आगमन तक-जब केंद्र और राज्य में लगभग कांग्रेस का एकछत्र राज्य था, बिहार के नेता अपने सूबे के हित की बात केंद्र के सामने उठाने से डरते रहे। सूबा जातिवाद में इस कदर उलझा हुआ था कि किसी को विकास की चिंता ही नहीं थी। लगभग पूरा का पूरा लालू युग तो जातीय अहं के टकराव और फिर उसके स्थिरीकरण में ही बीत गया-लेकिन इसका सकारात्मक असर ये हुआ कि समाज के सभी तबके थकहार कर कुछ आगे की सोंच के लिए मजबूर हो गए। ये वहीं दौर भी था जब बिहारियों का सबसे ज्यादा पलायन महानगरों की तरफ हुआ और देश के दूसरे हिस्सों में उनके प्रति हिकारत का भाव भी उसी अनुपात में बढ़ा। दिल्ली जैसे कई शहरों की तो डेमोग्राफी ही बदल गई। लेकिन साल 2000 के बाद से हालात में तब्दीली आनी शुरु हो गई। 15 साल के लालू राज में जनता अब समाजिक न्याय से ज्यादा कुछ चाहने लगी थी और लोग कुछ नया करने को बैचेन हो रहे थे। इसका उदाहरण साल 1999 का विधानसभा चुनाव था जिसमें पिछड़ें वर्ग के लगभग प्रतीक बन चुके लालू यादव की पार्टी अल्पमत में आ गई-कांग्रेस की मदद से उसे सरकार बनानी पड़ी।
बिहार की राजनीति में जातिवाद अभी भी एक अहम मुद्दा है( बल्कि देश का ज्यादातर हिस्सा इससे मुक्त नहीं) लेकिन उसमें अब विकास की चाशनी घोल दी गई है। और मजे की बात ये है कि जातीय राजनीति के सूरमा लालू प्रसाद भी अब विकास की बात करने को मजबूर हो गए हैं।
कुल मिलाकर बिहार में सबेरा बहुत देर से आया है। जो चीज 60 के दशक में हो जानी थी वो 2000 में हुई है और इस हिसाब से बिहार अभी भी लगभग 2-3 दशक पीछे है। इस बीच दुनिया बहुत बदल गई है, देश के कई सूबे प्रति व्यक्ति आय और आधारभूत संरचना में बिहार से लगभग 4-5 गुना आगे चले गए हैं। कोई शक नहीं इसमें गलती बिहार के नेताओं की ही है, लेकिन अगर समाजिक न्याय के सिद्धांत की बात करें तो बिहार वाकई एक मजबूत केंद्रीय पैकेज का अभी भी हकदार है।
Sunday, February 15, 2009
...तो लालू कामयाब न्यूज डाइरेक्टर होते
लालू यादव अगर सियासत में नहीं होते तो क्या होते ? मेरे एक दोस्त की राय है कि वो तब कामयाब टीवी पत्रकार होते और संभवत किसी बड़े हिंदी चैनल के न्यूज डाइरेक्टर होते। लालू में वो तमाम खूबियां हैं जो दर्शकों को बांधे रह सकती है, आखिरकार पिछले दो दशकों से यहीं कलावाजी तो वो दिखाते आ रहे हैं। पब्लिक के एटेंसन को कैसे बांध के रखा जा सकता है बात चैनलों को लालू सीखनी चाहिए। जब जैसा माहौल तब वैसा कंटेट। टीवी चैनल तो अभी भी नाग-नागिन और भूत-प्रेत के बाद रियलीटी शो पर ही ठहरे हुए हैं लेकिन लालू जातीय रैली से सीधे विकास पुरुष बनने को आमादा हैं।
आखिर यहीं लालू यादव थे जिन्होने 90 के दशक में बिहार में जातीय रैलियों की झड़ी लगा दी थी और सोते-जागते उनकी जुबां पर सिर्फ समाजिक न्याय का जुमला और गैर-कांग्रेसवाद का नारा होता था। टीवी की भाषा में आप इसे किसी खास प्रोग्राम का नाम दे सकते हैं। लेकिन बिहार में नीतिश क्या आए, सियासत में एजेंडा तय करने का लालू का विशेषाधिकार खत्म होता चला गया। नीतीश ने सुशासन और विकास का वो राग अलापा कि देखते ही देखते लालू उस पर रियलीटी शो के कटेंस्टेंट की तरह थिरकने लगे।
रेलमंत्री से कामयाब रेल सीईओ और बिहार के मुहल्लों तक में गरीब रथ पहुंचाने के साथ अपनी बेहतरीन पब्लिशिटी करके लालू ने बड़े बड़े प्रबंधन गुरुओं को चकरा दिया।
कह सकते हैं कि लालू ने बड़ी चतुराई से अपने आप को नए रोल में ढ़ालने की कोशिश की, कुछ-कुछ ठीक उसी तरह जैसा बिग बी ने टेलिविजन क्रान्ति होने के बाद की। आप ये भी कह सकते हैं कि ये लालू की सनातन राजनीति की हार है जिसमें सिर्फ समाजिक समीकरण के बदौलत चुनाव जीतने का दंभ था या फिर ये जनता की मानसिकता का क्रमिक विकास है जिसने लालू को ये सब करने को मजबूर कर दिया है...?
ताजा रेल बजट में लालू ने जिस तरह से बिहार को कुछ ज्यादा ही देकर चुनाव से एन पहले समां बांधने की कोशिश की है वो अपने आप में एक मास्टरस्ट्रोक है। उनके इस काम की चर्चा बिहार के हर नुक्कड़-चौराहों पर हो रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि ये काम लालू यादव जैसा कद्दावर, दवंग और अक्खड़ नेता ही कर सकता था जिसके सामने पूरा का पूरा यूपीए गठबंधन बोलने की हिम्मत नहीं करता है। रेल बजट के दौरान लालू ने कहा कि बिहार पहले से ही पिछड़ा हुआ है इसलिए उसे ज्यादा दिया गया है। बात कुछ हद तक सही भी है, बिहार में अभी तक केंद्र सरकार का कोई बड़ा प्रोजे्क्ट नहीं था-न ही कोई सेंट्रल यूनिवर्सिटी और न कोई आईआईटी न ही कोई बड़ा कारखाना। ऐसे में केंद्रीय प्रोजेक्ट की छीनाझपटी में जो राज्य अरसे से मलाई खा रहे थे उन्हे ये बात नागवार लगनी स्वभाविक है।
लेकिन सवाल ये है कि सियासत में दो दशक की लगभग नाबाद पारी खेलने के बाद लालू का ये विकास प्रेम स्वभाविक है या मजबूरी का दूसरा नाम। जैसा विद्यापति के बारे में किसी साहित्यिक आलोचक ने लिखा है कि ‘ विद्यापति मूलत श्रृंगारिक कवि थे और भक्ति उनके बुढ़ापे की उपज थी‘, उसी प्रकार ये कहा जा सकता है कि लालू मूलत: छलिया नेता है, विकास तो हालात की मजबूरी है। लालू जैसे दबंग और कद्दावर नेता के लिए उनका 15 साला कार्यकाल सबसे मुफीद वक्त था जब वो एक पिछड़े सूबे और इसकी 9 करोड़ आबादी के लिए वाकई कुछ कर सकते थे। लेकिन वो वक्त बिहार की एक पीढ़ी के लिए त्रासदी से कम नहीं था। यहीं वो वक्त था जब देश के दूसरे राज्य देखते ही देखते बिहार से बहुत आगे निकल गए। लेकिन फिर भी अगर लालू देर से ही सही, जागे हैं तो ये बिहार जैसे सूबे के लिए बड़ी खुशी की बात होनी चाहिए।
एक बात और तय हो गया है कि मीडिया वार में लालू आगे हैं तो इमेज वार में नीतीश। दूसरे शब्दों में लालू की टीआरपी आजतक की तरह है तो नीतीश की इमेज एनडीटीवी जैसी । अब देखना ये है कि वोटों का विज्ञापन टीआरपी को मिलता है या इमेज को-वैसे एड जगत में काम करनेवालों की मानें तो गंभीर इमेज वालों को महंगे विज्ञापन ज्यादा मिलते हैं।
आखिर यहीं लालू यादव थे जिन्होने 90 के दशक में बिहार में जातीय रैलियों की झड़ी लगा दी थी और सोते-जागते उनकी जुबां पर सिर्फ समाजिक न्याय का जुमला और गैर-कांग्रेसवाद का नारा होता था। टीवी की भाषा में आप इसे किसी खास प्रोग्राम का नाम दे सकते हैं। लेकिन बिहार में नीतिश क्या आए, सियासत में एजेंडा तय करने का लालू का विशेषाधिकार खत्म होता चला गया। नीतीश ने सुशासन और विकास का वो राग अलापा कि देखते ही देखते लालू उस पर रियलीटी शो के कटेंस्टेंट की तरह थिरकने लगे।
रेलमंत्री से कामयाब रेल सीईओ और बिहार के मुहल्लों तक में गरीब रथ पहुंचाने के साथ अपनी बेहतरीन पब्लिशिटी करके लालू ने बड़े बड़े प्रबंधन गुरुओं को चकरा दिया।
कह सकते हैं कि लालू ने बड़ी चतुराई से अपने आप को नए रोल में ढ़ालने की कोशिश की, कुछ-कुछ ठीक उसी तरह जैसा बिग बी ने टेलिविजन क्रान्ति होने के बाद की। आप ये भी कह सकते हैं कि ये लालू की सनातन राजनीति की हार है जिसमें सिर्फ समाजिक समीकरण के बदौलत चुनाव जीतने का दंभ था या फिर ये जनता की मानसिकता का क्रमिक विकास है जिसने लालू को ये सब करने को मजबूर कर दिया है...?
ताजा रेल बजट में लालू ने जिस तरह से बिहार को कुछ ज्यादा ही देकर चुनाव से एन पहले समां बांधने की कोशिश की है वो अपने आप में एक मास्टरस्ट्रोक है। उनके इस काम की चर्चा बिहार के हर नुक्कड़-चौराहों पर हो रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि ये काम लालू यादव जैसा कद्दावर, दवंग और अक्खड़ नेता ही कर सकता था जिसके सामने पूरा का पूरा यूपीए गठबंधन बोलने की हिम्मत नहीं करता है। रेल बजट के दौरान लालू ने कहा कि बिहार पहले से ही पिछड़ा हुआ है इसलिए उसे ज्यादा दिया गया है। बात कुछ हद तक सही भी है, बिहार में अभी तक केंद्र सरकार का कोई बड़ा प्रोजे्क्ट नहीं था-न ही कोई सेंट्रल यूनिवर्सिटी और न कोई आईआईटी न ही कोई बड़ा कारखाना। ऐसे में केंद्रीय प्रोजेक्ट की छीनाझपटी में जो राज्य अरसे से मलाई खा रहे थे उन्हे ये बात नागवार लगनी स्वभाविक है।
लेकिन सवाल ये है कि सियासत में दो दशक की लगभग नाबाद पारी खेलने के बाद लालू का ये विकास प्रेम स्वभाविक है या मजबूरी का दूसरा नाम। जैसा विद्यापति के बारे में किसी साहित्यिक आलोचक ने लिखा है कि ‘ विद्यापति मूलत श्रृंगारिक कवि थे और भक्ति उनके बुढ़ापे की उपज थी‘, उसी प्रकार ये कहा जा सकता है कि लालू मूलत: छलिया नेता है, विकास तो हालात की मजबूरी है। लालू जैसे दबंग और कद्दावर नेता के लिए उनका 15 साला कार्यकाल सबसे मुफीद वक्त था जब वो एक पिछड़े सूबे और इसकी 9 करोड़ आबादी के लिए वाकई कुछ कर सकते थे। लेकिन वो वक्त बिहार की एक पीढ़ी के लिए त्रासदी से कम नहीं था। यहीं वो वक्त था जब देश के दूसरे राज्य देखते ही देखते बिहार से बहुत आगे निकल गए। लेकिन फिर भी अगर लालू देर से ही सही, जागे हैं तो ये बिहार जैसे सूबे के लिए बड़ी खुशी की बात होनी चाहिए।
एक बात और तय हो गया है कि मीडिया वार में लालू आगे हैं तो इमेज वार में नीतीश। दूसरे शब्दों में लालू की टीआरपी आजतक की तरह है तो नीतीश की इमेज एनडीटीवी जैसी । अब देखना ये है कि वोटों का विज्ञापन टीआरपी को मिलता है या इमेज को-वैसे एड जगत में काम करनेवालों की मानें तो गंभीर इमेज वालों को महंगे विज्ञापन ज्यादा मिलते हैं।
Tuesday, February 10, 2009
2040 में हमारे बच्चे जिन चीजों पर हसेंगे...
अमर सिंह ने राज्यपाल को दलाल कहा था ।
भारत सरकार ने कहा कि आरटीआई के तहत मंत्रियों की संपत्ति सार्वजनिक नहीं होगी।
बीजेपी ने कहा मंदिर बनाके रहेंगे-अगर पॉवर मिले।
श्रीराम सेना हमारे देश में पैदा हुई थी। एक रणवीर सेना भी थी।
मुल्लाओं ने जय भीम कहने के खिलाफ फतवा दिया।
सत्यम घोटाला से पहले राजू जेंटलमेन था।
राहुल गांधी ने राजनीति से परिवारवाद और चमचावाद हटाने की बात की थी।
टीवी मीडिया नागनागिन से ऊबकर हंसी के गुलगुल्ले दिखा रहा था।
टीवी वाले दूरदर्शन युग की खिल्ली उड़ाते थे।
इसके अलावा वो और भी बातों पर हसेंगें-आप अपनी तरफ से जोड़ सकते हैं।
भारत सरकार ने कहा कि आरटीआई के तहत मंत्रियों की संपत्ति सार्वजनिक नहीं होगी।
बीजेपी ने कहा मंदिर बनाके रहेंगे-अगर पॉवर मिले।
श्रीराम सेना हमारे देश में पैदा हुई थी। एक रणवीर सेना भी थी।
मुल्लाओं ने जय भीम कहने के खिलाफ फतवा दिया।
सत्यम घोटाला से पहले राजू जेंटलमेन था।
राहुल गांधी ने राजनीति से परिवारवाद और चमचावाद हटाने की बात की थी।
टीवी मीडिया नागनागिन से ऊबकर हंसी के गुलगुल्ले दिखा रहा था।
टीवी वाले दूरदर्शन युग की खिल्ली उड़ाते थे।
इसके अलावा वो और भी बातों पर हसेंगें-आप अपनी तरफ से जोड़ सकते हैं।
Monday, February 9, 2009
ताल तो भोपाल का और सब तलैया-पार्ट चार
भोपाल के बारे में कई लोगों ने टिप्पणी की कि महज चार-छह दिन शहर में रहकर उसे जानने का दम नहीं भरा जा सकता। बेशक ये बात सही है, लेकिन मैंने अपनी जानकारी और अनुभव से बाहर जाकर लफ्फाजी नहीं की। अब इतना तो कसूर है ही कि ज्यादा समेटने की कुव्वत नहीं थी। बहरहाल, कुछ लोगों को जरुर लग सकता है कि बड़ा तालाब अब वो नहीं रहा जो पहले था या कि पटिए की परंपरा सूख रही है-लेकिन एक बाहरवाले के नजरिए से वो अभी भी खूबसूरत है-और हां, शहर के लोगों का इसके गिरते हालात पर चिंता जताना स्वभाविक भी।
दूसरी बात ये कि अगर मुझे शहर में पुलिसवालों की मौजूदगी कम दिखी तो इसे मैं तारीफ के काबिल कैसे नहीं मानूं ? क्या दिल्ली में ऐसा है। हां, कुछ बातें जो अखरने वाली थी वो ये कि ऑटो का किराया बहुत था। उतने पैसे में तो दिल्ली में भी ज्यादा दूर जाया जा सकता है। मुझे शहर में कई दफा पब्लिक ट्रांसपोर्ट की भी दिक्तत महसूस हुई। नए शहर में शेयर्ड ऑटो नहीं थे और रिजर्व करके चलना कम खर्चीला नहीं था।
हां, कई बार मुझे ये भी लगा कि शहर में लड़कियों की तादाद कुछ कम है। मैने इस बात का कई लोगों से जिक्र भी किया, लेकिन लोगों ने मुझे फिर से विचार करने को कहा। मुक्ता भाभी से भी मैंने इस बात का जिक्र किया कि क्या मध्यप्रदेश भी पंजाब सिंड्रोम का शिकार हो रहा है?
दूसरी बात ये कि अगर मुझे शहर में पुलिसवालों की मौजूदगी कम दिखी तो इसे मैं तारीफ के काबिल कैसे नहीं मानूं ? क्या दिल्ली में ऐसा है। हां, कुछ बातें जो अखरने वाली थी वो ये कि ऑटो का किराया बहुत था। उतने पैसे में तो दिल्ली में भी ज्यादा दूर जाया जा सकता है। मुझे शहर में कई दफा पब्लिक ट्रांसपोर्ट की भी दिक्तत महसूस हुई। नए शहर में शेयर्ड ऑटो नहीं थे और रिजर्व करके चलना कम खर्चीला नहीं था।
हां, कई बार मुझे ये भी लगा कि शहर में लड़कियों की तादाद कुछ कम है। मैने इस बात का कई लोगों से जिक्र भी किया, लेकिन लोगों ने मुझे फिर से विचार करने को कहा। मुक्ता भाभी से भी मैंने इस बात का जिक्र किया कि क्या मध्यप्रदेश भी पंजाब सिंड्रोम का शिकार हो रहा है?
Sunday, February 8, 2009
ताल तो भोपाल का और सब तलैया-पार्ट तीन
भोपाल में कई चीजें जानने को मिली। वहीं मुझे पता चला कि विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों में कैसे जुगाड़ चलता है। अगर आप किसी लॉवी के मेंम्बर हैं, तो ये काम कितना आसान हो जाता है। वहीं पता चला कि जिनका जुगाड़ नहीं था वो लाख प्रतिभाशाली और डिग्रियों के अंबार होने के बावजूद कैसे जिंदगी भर परिसरों के चक्कर काटते रहे। कैसे एक यूनिवर्सिटी के विभागाध्यक्ष ने तीन साल तक सारे उम्मीदवारों को नाकाबिल घोषित कर दिया, क्योंकि चौंथे साल उसके बेटे की पीएचडी पूरी होने वाली थी। ये भी एहसास हो गया कि क्यों राजेंद्र यादव और उदय प्रकाश जैसे लोग लाख काबिलियत के बावजूद यूनिवर्सिटियों में जगह नहीं बना पाए और ये भी कि उनके लेखन में एकेडमिक साहित्यकारों के लिए क्यों आलोचना का भाव है। ऐसे एक नहीं दो नहीं बल्कि सैकड़ों उदाहरण सुनने को मिले जिसमें यूनिवर्सिटियों को खानदानी चारागाह बना कर रख दिया गया। बड़े यूनिवर्सिटी में ऐसे-ऐसे लोग नियुक्त कर दिए गए जिन्हे विषय की बेसिक जानकारी तक नहीं थी। भोपाल के साहित्य सम्मेलन में रवीन्द्र कालिया के नया ज्ञानोदय विवाद और ममता कालिया का अंग्रेजी के प्रोफेसर के तौर पर नियुक्ति काफी चर्चा में थी। दूसरी बात साहित्य के क्षेत्र में दिए जानेवाले पुरस्कारों और आलोचनाओं की भी थी। कई दफा काफी औसत दर्जे के साहित्यकारों को कैसे पुरस्कृत कर दिया गया और जिस कवि पर किसी बड़े आलोचक की वक्र दृष्टि पड़ गई कैसे उसे धरासायी कर दिया गया।
शुरु में मुझे लगता था कि हिंदी साहित्य का स्तर बंग्ला या देश के अन्य भाषाओं की तुलना में पिछड़ा हुआ ही होगा। भोपाल साहित्य सम्मेलन में जाकर मुझे पता चला कि नहीं ऐसा खास कुछ नहीं है। साहित्य के बारे में जानकारी देने के लिए पंकज पराशर जी को मैं खासतौर पर धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होने कई बारीक बातें बताई। मसलन, बंग्ला में कथा और उपन्यास की परंपरा काफी प्राचीन और समृद्ध है और वहां हिंदी कुछ कमजोर लग सकती है। लेकिन कविता और दूसरी विधाओं में हिंदी में काफी काम हुआ है, बल्कि इसने नई ऊचाईंया पाईं है। दूसरे भाषाओं के साहित्यकार हिंदी में अब छपने के लिए कितने लालायित हो रहे हैं-इसका भी पता चला (जारी)
शुरु में मुझे लगता था कि हिंदी साहित्य का स्तर बंग्ला या देश के अन्य भाषाओं की तुलना में पिछड़ा हुआ ही होगा। भोपाल साहित्य सम्मेलन में जाकर मुझे पता चला कि नहीं ऐसा खास कुछ नहीं है। साहित्य के बारे में जानकारी देने के लिए पंकज पराशर जी को मैं खासतौर पर धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होने कई बारीक बातें बताई। मसलन, बंग्ला में कथा और उपन्यास की परंपरा काफी प्राचीन और समृद्ध है और वहां हिंदी कुछ कमजोर लग सकती है। लेकिन कविता और दूसरी विधाओं में हिंदी में काफी काम हुआ है, बल्कि इसने नई ऊचाईंया पाईं है। दूसरे भाषाओं के साहित्यकार हिंदी में अब छपने के लिए कितने लालायित हो रहे हैं-इसका भी पता चला (जारी)
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