Showing posts with label Dalit politics in India. Show all posts
Showing posts with label Dalit politics in India. Show all posts

Sunday, July 12, 2015

बिहार विधान परिषद परिणाम: पप्पू, मांझी और बीजेपी संगठन फैक्टर

बिहार में विधान परिषद चुनाव में बीजेपी-गठबंधन की जीत की अलग-अलग व्याख्या जारी है। आज हम सामान्य तथ्यों और धन-बल से इतर कुछ अन्य फैक्टर की चर्चा करेंगे।

पप्पू यादव ने अपने फेसबुक वाल पर संकेत किया कि राजद-जद-यू की हार में उनकी अहम भूमिका है-क्योंकि लोकसभा चुनाव में जब वे राजद के साथ थे तो कोसी से पूरव बीजेपी का खाता नहीं खुल पाया। जबकि इस चुनाव में जब वे राजद से निष्काषित हैं तो राजद-जद-यू का खाता नहीं खुला। आंशिक रूप से वे सही है, उस इलाके में उनका एक निश्चित प्रभाव है। 

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में पूरे पूर्वी बिहार में-गंगा के उत्तर और दक्षिण-दोनों जगह बीजेपी साफ हो गई थी। उन सीटों में सुपौल, अररिया, मधेपुरा, कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज, भागलपुर और बांका की सीटें थीं। इतना तो पप्पू भी मानते होंगे कि उन आठो सीटों पर उनका असर नहीं है! दरअसल, उस चुनाव में अन्य कारकों के अलावा पश्चिम की तरफ से आ रही बीजेपी की लहर को बंग्लादेश की सीमा से सटे एक ‘पूर्वी लहर’ ने भी रोक लिया था। पप्पू महज एक ‘बैलेंसिंग फैक्टर’ थे, जो वे इस बार भी थे- जब वे साइलेंट रह गए तो बीजेपी वहां से जीत गई। जहां पप्पू का असर नहीं था(बांका-भागलपुर) वहां फिर से जद-यू जीत गया।
एक फैक्टर जीतनराम मांझी भी है। स्थानीय निकायों में दलितों के लिए आबादी के हिसाब से सीटें रिजर्व हैं। यह बिल्कुल संभव है कि मांझी प्रकरण के बाद से दलितों का बड़ा हिस्सा जद-यू-राजद से नाराज हो गया हो।
चुनावों में बीजेपी की जीत को सिर्फ पैसे से जोड़ना पूरी तरह सही नहीं है। लोग इस बात को नजर अंदाज कर देते हैं कि बीजेपी और संघ ने पिछले 10-15 सालों में ग्रासरूट स्तर पर अपने संगठन का कितना फैलाव किया है। संघ का अपना नेटवर्क तो बना ही है, बीजेपी ने पिछले दशक में ग्राम पंचायत स्तर तक अपनी इकाई और अध्यक्ष बना लिए हैं। मेरे ग्राम पंचायत का बीजेपी अध्यक्ष एक मुसलमान है और उसकी अपनी कमेटी है। जबकि राजद या जद-यू ब्लॉक और जिला स्तर पर भी नहीं दिखते। उनका कार्यालय किसी चाय या पान की दुकान में चलता पाया जाता है। मेरे ब्लॉक में जद-यू की दो-दो कमेटियां हैं जो आपस में प्रमाणिकता के लिए लड़ती रहती हैं।


मैं अपने जिले(मधुबनी) की बात अगर करुं तो इस चुनाव में बीजेपी ने हमारे ब्लॉक(बाबूबरही) के कुल 20 ग्राम पंचायतों में हरेक 3 पंचायतों पर पांच कार्यकर्ताओं की कमेटी बनाई थी। इसके अलावा प्रखंड कमेटी और जिला कमेटी के लोग भी उसका सुपरविजन कर रहे थे। अब तीन पंचायत में विधान परिषद के करीब 45 वोटर थे जबकि उसके पीछे बीजेपी-संघ और उस खास उम्मीदवार और गठबंधन के सहयोगी दल के करीब 20 हार्डकोर वर्कर लोग लगे हुए थे। इतना टारगेटेड प्रचार क्या जद-यू और राजद से संभव है, जहां ये ही नहीं पता चलता कि प्रखंड अध्यक्ष कौन है और प्रखंड में अन्य कितनी कमेटिया हैं? बीजेपी की प्रखंड कमेटी में करीब दर्जन भर विभाग हैं जिसकी बकायदा पाक्षिक-मासिक बैठकें होती हैं, सुपरविजन होता है और रिपोर्ट तैयार होती है।

 हां, बीजेपी अगर कहीं कमजोर है तो अपने बौद्धिक विभाग में। लेकिन उसकी भरपाई उसने एक दुर्जेय पार्टी मशीनरी बनाकर करने की कोशिश की है। उसने पिछले दशकों में ‘आदमी’ बनाए हैं, तंत्र बनाया है जो शायद थोड़ा-थोड़ा कम्यूनिस्टों से प्रेरित भी लगता है। अब बीजेपी का वह निचला तंत्र कभी बीजेपी के लिए ‘एलियन’ माने जानेवाले अल्पसंख्यक समूहों तक में घुसपैठ कर रहा है, उन्हें प्रभावित कर रहा है। बाकी का काम अन्य ‘कारक’ पूरा कर देते हैं। 
अन्य दलों के पास विचार तो है, लेकिन उसे नीचे ले जाने के लिए तंत्र नहीं है, आदमी नहीं है। ऐसे में सिर्फ समाजिक गठबंधन करके या मीडिया की बहसों में हिस्सा लेकर बीजेपी ले लड़ना नाकाफी है। जद-यू-राजद जैसी पार्टियों को अपने उन विभागों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

Monday, February 9, 2015

ठिठकी हुई दलित राजनीति के लिए ऐेसा झटका जरूरी है !

मांझी नेता नहीं हैं, प्रतीक भर हैं। लेकिन राजनीति में प्रतीक बड़े काम का होता है। कई बार प्रतीक ऐसा काम कर देता है जैसा बड़े-बड़े हाकिम नहीं कर पाते हैं। जैसे यूपी में जब पहली दफा मायावती आईँ थीं तो ET ने लिखा कि दलितों में बीए-एमए करने की होड़ लग गई। एक दशक में दलितों की साक्षरता दर पूरे देश के मुकाबले दोगुनी हो गई। मुझे याद है जब लालू यादव बिहार के CM बने तो मेरे कई यादव दोस्तों ने कहा कि वह सिर्फ इसलिए पढता है कि शायद उसकी शादी मीसा भारती से हो सकती है। शादी तो नहीं हुई, लेकिन ढेर सारे यादव ग्रेजुएट जरूर हो गए!
मांझी ने विद्रोह कर अच्छा किया। हार-जीत अलग बात है लेकिन उनका यह विद्रोह उनके समुदाय को अतिरिक्त ऊर्जा देगा। मैं सलमान खान होता तो कहता कि इस विद्रोह में एक 'किक' है! यह विद्रोह दलितों को भविष्य में बेहतर लडाई के लिए प्रेरित करेगा। 

बाबा साहेब ने जाति-विहीन राजनीति की बात की थी, दलित राजनेता दूसरों की तरह ही जाति से चिपकने लगे। हालांकि दलित राजनीति, मंडल राजनीति की तुलना में ज्यादा गतिशील है और प्रगतिशील भी। वह शून्य से शुरू होकर डिक्की तक पहुंची है। पहले उसमें सरकारी मध्यमवर्ग का जन्म हुआ, फिर उसने राजनीति पर दावा ठोका। इसके उलट पिछड़ों ने पहले राजनीति पर दावा ठोका,उसके बाद वहां मध्यमवर्ग पैदा होना शुरू हुआ। उस हिसाब से पिछड़ा राजनीति कूपमंडूक है और सिर्फ संख्याबल पर ही इतराती है। वह हमेशा क्षत्रिय बनने का ख्वाब देखती रहती है जैसे कोई हिंदी का लेखक अंग्रेजी में छपने का ख्वाब देखता रहता है। इस मामले में वह प्रयोगधर्मी नहीं है। दलित ज्यादा साहसी हैं, कम संख्या-बल पर भी उन्होंने अपने हिसाब से मोल-भाव किया है और जगह बनाई है।

भारत का दलित, पिछड़ों की आक्रामकता और सवर्णों की राजनीतिक कुशलता की वजह से बीजेपी की गोद में जा बैठा है। देखा जाए तो उस हिसाब से पिछड़ा वर्ग ज्यादा सनातन-वादी है। बाबा साहब ने कहीं लिखा है कि ये मंझोली जातियां ब्राह्मणों की समाजिक पुलिस है, जब सवर्ण गांव छोड़कर शहर में बस जाएंगे तो ये जातियां सवर्णों से भी ज्यादा आक्रामकता से दलितों पर हमला करेंगी। लगता है कि लिटरली तो नहीं लेकिन क्लासिकल रूप से ऐसा ही हो रहा है।

बाबा साहब ग्राम्य-व्यवस्था के भी एक हद तक आलोचक थे। उनके हिसाब से गांव दलितों का कब्रगाह है। आज की तारीख में वहां पर सवर्णों की जायदाद भी सुरक्षित नहीं है। यानी शहर दलितों के लिए गतिशीलता देता है और सवर्णों को तो मानो पंख ही दे देता है। तो गांव किसके लिए सुरक्षित है? पिछड़ो के लिए? शायद ये भी पूरा सच नहीं है। वे गांव में सुरक्षित रहकर भी क्या कर पाएंगे जहां विकास की धारा ही सूख गई है। गांधी ने अलग अर्थों में ग्राम-स्वराज्य की बात की थी। वह विकेंद्रीकरण का मॉडेल था। हूबहू गांव न सही तो छोटे-छोटे 100-500 कस्बे-शहर जिसकी बात मोदी भी कर रहे हैं। तो ऐसे में बापू का विकेंद्रीकरण और अम्बेदकर के नगरीय व्यवस्था की तरफ झुकाव को मिला दिया जाए तो दलितों का कुछ हो सकता है। 

लेकिन सावधान। कहीं ऐसा न हो कि गांव से उठकर शहरी दलित, मजदूर का मजदूर बना रह जाए। इसके लिए कौन उपाय करेगा? सरकार? वह सिर्फ हिंदी पढाएगी, कुछेक नौकरियां दे देगी। समाज? समाज तो दलितों के लिए उपेक्षा का भाव रखता है और नीतीश कुमार की तरह इस्तेमाल भी करता है। दलितों का समाज सक्षम नहीं है-जो सक्षम हैं वे नव-ब्राह्मण बन गए हैं ! ये ऐसे कुछ सवाल हैं जिनसे दलितों को और पूरे समाज को टकराना होगा और मांझी जैसे प्रकरण उन्हें बार-बार अपनी हकीकत की याद दिलाते रहेंगे।