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Tuesday, May 7, 2013

वैशाली यात्रा-10


अब हमारे एजेंडे में था भगवान महावीर की जन्मस्थली को देखना जो वैशाली की शायद सबसे महत्वपूर्ण जगह है लेकिन लोगबाग अशोक स्तंभ की प्रसिद्धि के सामने अक्सर इसे भूल जाते हैं। वैशाली में जहां अशोक स्तंभ है, उससे करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर मुख्य सड़क से दाईं तरफ एक पक्की सड़क निकलती है जो वासोकुंड गांव चली जाती है। इसे प्राचीन ग्रंथों में विदेहकुंड, कुंडलग्राम या कुंडग्राम भी कहा गया है। आज से करीब 2600 साल पहले जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म यहीं हुआ था।


वासोकुंड सांस्कृतिक-भौगोलिक रूप से वैशाली का ही हिस्सा है लेकिन प्रशासनिक रूप से जिला वैशाली की सीमा यहां खत्म हो जाती है और अब यह मुजफ्फरपुर का हिस्सा है। कह सकते हैं कि यह वैशाली-मुजफ्फरपुर के बिल्कुल बीच में है। वासोकुंड की तरफ जाते हुए आपको लीचियों के बागान दिखने लगते हैं और आप समझने लगते हैं कि कुछ-कुछ अलग सा है।

मैं जब वासोकुंड जा रहा था तो मेरे मन में एक गजब सा उल्लास था। मैं दुनिया में एक प्रमुख धर्म के तीर्थंकर के जन्मस्थल की तरफ जा रहा था जहां मेरी कल्पना में हजारो श्रद्धालुओं की जमघट होगी। लेकिन रास्ते में वीरानगी छाई हुई थी। इक्का दुक्का साईकिल सवार और यदा कदा गाय-भैंसों के अलावा कुछ नहीं मिला। गांव शुरू होने से पहले सड़क की दाईं तरफ एक जैन शोध संस्थान दिखा, तो लगा कि हम वासोकुंड के नजदीक हैं।

आगे चौक पर किसी से पूछने पर पता चला कि वासोकुंड यहीं है। महावीर का जन्मस्थल कहां है? ‘दाएं लीजिए, सामने बोर्ड लगा है।


वह पांचेक एकड़ में फैला हुआ एक परिसर था, जो निर्माणाधीन था। ईंट की चारदीवारी से घिरी हुई जमीन थी जहां सड़क की तरफ से एक लोह का फाटक लगा हुआ था। अंदर लीची के पेड़ और ईंट और पत्थरों के ढ़ेर। दूर-दूर तक कोई नहीं। हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ की हमारी कल्पना को गहरा धक्का लगा। वहां तो सन्नाटा पसरा हुआ था। फाटक से अंदर जाने पर एक गार्डनुमा व्यक्ति बैठा मिला जिसने बताया कि मंदिर पिछले कई सालों से निर्माणाधीन है और विस्तृत जानकारी मंदिर के मुख्य प्रबंधक जमुना प्रसाद देंगे जो मध्यप्रदेश के सागर के रहनेवाले थे।

बहरहाल, हम ईंट-पत्थरों के ढ़ेर से होकर आगे बढ़े तो एक विशालकाय निर्माणाधीन मंदिर था जिसमें जगह-जगह ऊपर से लेकर नीचे तक बांस के बल्ले लगे हुए थे। उस मंदिर में महावीर स्वामी की एक मूर्ति स्थापित थी और चबूतरे पर मंदिर का एक भव्य डिजायन था। बगल में दीवार पर एक पोस्टर टंगा था जिसमें मंदिर कमेटी के सदस्यों और उसके संरक्षक आचार्य विद्यानंदजी की तस्वीर थी। विद्यानंदजी का मंदिर निर्माण में बहुत बड़ा योगदान बताया जा रहा था और वे दिल्ली में रहते थे।


मंदिर के पहले माले से बाईं तरफ एक गेस्ट हाउस का निर्माण किया जा रहा था और दाईं तरफ एक जैन कमेटी का भोजनालय था जिसमें सस्ते दर पर भोजन की व्यवस्था थी। अलबत्ता दिन के चार बज चुके थे, तो भोजनालय बंद था।

कुर्सी पर मंदिर के प्रबंधक जमुना प्रसाद बैठे थे और सामने एक गेस्ट रजिस्टर और दानपेटी थी। उनसे बात करने पर टुकड़े-टुकड़े में जो जानकारी मिली उसके मुताबिक यह जगह 1957 तक भारत सरकार के अधीन थी और बाद में बिहार सरकार की देखरेख में आ गई। जैन कमेटी ने मुकदमा दायर किया तो सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई के बाद सन् 2007 में इसे जैन कमेटी को सुपुर्द कर दिया गया जिसने आसपास की पांचेक एकड़ जमीन खरीदकर इस पर एक भव्य मंदिर बनवाने का काम शुरू किया। मंदिर सन् 2013 में बनकर तैयार हो जाने की उम्मीद थी।हालांकि वहां काम के रफ्तार को देखकर कतई नहीं लग पा रहा था कि सन् 2013 में मंदिर बन पाएगा।

जमुना प्रसाद ज्यादा कुरेदने पर बातों को कुछ छुपाते नजर आए और बार-बार वे मंदिर के मुख्य इंजिनीयर से बात करने की सलाह देते नजर आए जो थोड़ी दूर खड़े किसी से मोबाईल पर लंबी वार्ता में तल्लीन थे।

तो जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर के जन्मस्थली का ये हाल था। बिहार या भारत की सरकार ने उसे जैन कमेटी के हवाले कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी और जैन कमेटी वाले भी बहुत उत्साहित नहीं लग रहे थे। मुझे पिछले साल अपनी जयपुर यात्रा का स्मरण हो आया जहां शहर से बाहर पदमपुर जैन मंदिर में हजारों पर्यटकों और श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ था और उस इलाके का वह एक लैंडमार्क था। लेकिन महावीर स्वामी की जन्मस्थली की यह अवहेलना क्यों थी, मेरी समझ से बाहर थी।

Monday, May 6, 2013

वैशाली यात्रा-9


हमारे पास समय कम था और अब हम अशोक स्तंभ देखने के लिए चले जो वहां से करीब 2 किलोमीटर उत्तर की दिशा में था। उस जगह को कोल्हुआ गांव कहते हैं। अशोक स्तंभ को बचपन से हम किताबों मे देखते आ रहे थे।

हमने परिसर में जाने का टिकट लिया और बाहर ही बाईक खड़ी की। बाहर कुछ दुकानें थी जो अमूमन इस तरह के जगहों पर होती हैं। बोतलबंद पानी, कोल्डड्रिंक, बुद्ध की काष्ठ और प्रस्तर मूर्तियों के साथ गणेश और बहुत सारी आकृतियां बिक रही थीं। लेकिन वहां भी बहुत भीड़-भाड़ नहीं थी। बाहर सन्नाटा सा था और फरवरी का सूरज प्यारा लग रहा था।


अंदर जाते ही स्तूप का भग्नावशेष और स्तंभ दिखा। परिसर में प्रवेश करते ही खुदाई में मिली इंटों से निर्मित गोलाकार स्तूप और अशोक स्तम्भ दिखायी दे जाता है। एकाश्म स्‍तंभ का निर्माण लाल बलुआ पत्‍थर से हुआ है। इस स्‍तंभ के ऊपर घंटी के आकार की बनावट है (लगभग १८.३ मीटर ऊंची ) जो इसको और आकर्षक बनाता है। अशोक स्तंभ को स्थानीय लोग भीमसेन की लाठी कहकर पुकारते हैं। यहीं पर एक छोटा सा कुंड है, जिसको रामकुंड के नाम से जाना जाता है। पुरातत्व विभाग ने इस कुण्ड की पहचान मर्कक-हद के रूप में की है। कुण्ड के एक ओर बुद्ध का मुख्य स्तूप है और दूसरी ओर कुटाग्रशाला है जिसका जिक्र बुद्ध साहित्य में व्यापक तौर पर आता है।

 परिसर में बड़े करीने से रंग-बिरंगे गुलाब लगाए गए थे और घासों की छंटाई की गई थी। सामने स्तंभ के पास एक दक्षिण कोरियाई दल(जिसमें करीब 30 लोग थे) बैठकर कुछ मंत्रोच्चार कर रहा था जिसमें कॉरपोरेट किस्म के लोग थे और कुछ बौद्ध भिक्षु उन्हें मंत्र पढ़वा रहे थे।

उस मंत्र सभा में हम भी बैठ गए। हमें मंत्र तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था-पता नहीं वो पालि भाषा में था या कोरियन में। लेकिन उसकी धुन गजब की थी। मन के गहरे तल तक एक शांति पसर आई। हमने राजीव की तरफ देखा, वो मुस्कुरा रहा था। शायद वह सोच रहा था कि इस दल में जरूर सैमसंग या हुंडई मोटर्स का चेयरमैन बैठा होगा जिससे वह दोस्ती गांठ लेगा !


कोरियन दल के अलावा वहां कुछ हिंदुस्तानी जोड़े भी थे जो शायद बुद्ध से अपने लिए आशीर्वाद मांगने आए थे। मोबाईल और डिजिटल कैमरों के इस दौर में फोटोग्राफरों का धंधा दम तोड़ रहा था।

वैशाली में जिस जगह पर अशोक का स्तंभ है वह एक बौद्ध विहार था जिसका नाम कुटाग्रशाला विहार था और जहां महात्मा बुद्ध अक्सर ठहरा करते थे। वहां पर जिस स्तूप का भग्नावशेष है उसे आनंद स्तूप कहते हैं और इस स्तंभ का निर्माण सम्राट अशोक ने करीब 2300 साल पहले करवाया था। एक अन्य कथा के अनुसार यह बौद्धविहार और इससे लगा वन आम्रपाली ने बुद्ध को भेंट स्वरूप दी थी।

हमने स्तंभ को छुआ, स्तूप और वहां के ईंटों को छुआ मानो हम इतिहास को टटोलने की कोशिश कर रहे हों। हमने सोचा कि इन ईंटो को सम्राट अशोक ने भी जरूर छुआ होगा।

Friday, May 3, 2013

वैशाली यात्रा-8


अस्थि स्तूप या रेलिक स्तूप के सामने की सड़क पर कुछ बालक भिक्षु नजर आए। हमने उनसे बात की और पूछा कि वे कब भिक्षु बने? बातचीत से पता चला कि वे बोधगया के रहनेवाले हैं और वहीं उन्हें दीक्षा दी गई। हमने उनसे उनका नाम पूछा, तो जैसा कि भिक्षुओं का नाम होता है, उसी तरह का उनका नाम था जिसके शुरु में भंते लगा हुआ था। वे भगवा और पीले वस्त्रों में थे और उनके सिर मुंडे हुए थे।


शुरू में हमारे सवालों का जवाब देते हुए वे हिचक रहे थे। हमने उनसे पूछा कि क्या वे पढ़ते लिखते भी हैं, तो पता चला बगल के बौद्ध मठ में एक स्कूल है जहां उनके पढ़ने और रहने-खाने की व्यवस्था है। उनमें से अधिकांश या सबके सब दलित और पिछड़ी जातियों के गरीब बच्चे थे जिनमें से किसी का पिता मध्य बिहार में खेतिहर मजदूर था तो कोई गया में रिक्शा चलाता था। आसपास मूर्तियां और कैलेंडर बेचनेवाले बच्चे उन्हें छेड़ रहे थे और वे शरमाकर कर भाग रहे थे। मुझे ऐसा लगा मानो किसी नाटक में उन्हें जबरन अभिनय करने भेज दिया गया हो ! बौद्ध भिक्षु बनने-बनाने की यह भी एक कहानी थी।  

आगे चलकर सड़क बाईं और दाईं तरफ मुड़ गई है। अभिषेक पुष्करिणी के किनारे आगे से बाईं ओर मुड़ने पर खूबसूरत और विशाल सा शांति स्तूप दिखता है जो मन मोह लेता है। दूसरी तरफ कुछ होटलनुमा इमारतें दिखीं, जो शायद सरकारी थी।


वैशाली के शांति स्तूप का निर्माण जापान के निप्पोनजन मायहोजी पंथ ने राजगीर के बुद्ध विहार सोसाईसटी के साथ संयुक्त रूप से किया है। द्वीतीय विश्वयुद्ध के बाद जापान के हिरोशिमा और नागाशाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद से जापान के निचिदात्सु फूजिई गुरूजी ने पूरी दुनिया में शांति स्तूपों के निर्माण की शुरुआत की थी और वैशाली का शांति स्तूप भी उसी सिलसिले में एक कड़ी है। गोल घुमावदार गुम्बद, अलंकृत सीढियां और उनके दोनों ओर स्वर्ण रंग के बड़े सिंह जैसे पहरेदार शांति स्तूप की रखवाली कर रहे प्रतीत होते हैं। सीढियों के सामने ही ध्यानमग्न बुद्ध की चमकती हुई प्रतिमा दिखायी देती है। शांति स्तूप के चारों ओर बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में अत्यन्त सुन्दर मूर्तियां ओजस्विता की चमक से भरी दिखाई देती हैं।


शांति स्तूप के सामने अभिषेक पुष्करिणी है और उसके उस पार बुद्ध का रेलिक या अस्थि स्तूप। दूसरी तरफ गेहूं के हरे-भरे खेत और सरसो के फूल। बड़ा मनमोहक दृश्य बन पड़ता है। मन करता है घंटों वहीं बैठे रहे। ढ़ेर सारे स्कूली बच्चे और स्थानीय लोग वहां फोटो खिंचवा रहे थे जिसमें से तो बहुत सारे नव-विवाहित जोड़े थे जो आसपास के गांवों से आए हुए थे।

Thursday, April 25, 2013

वैशाली यात्रा-7


अभिषेक पुष्करिणी की दाईं तरफ वैशाली म्यूजियम, सरकारी इस्पेक्शन बंग्लो और बुद्ध के अस्थि स्तूप हैं लेकिन उस दिन म्यूजियम बंद था और लोगों ने कहा कि वहां देखने को बहुत कुछ है भी नहीं। सरकारी इस्पेक्शन बंग्लो दूर से ही चमक रहा था और ऐसा लग रहा था कि अधिकारियों ने अपने रहने-खाने का शानदार इंतजाम किया था।  


हम वहां से बुद्ध के अस्थि स्तूप देखने गए जिसे अपेक्षाकृत ठीकठाक तरीके से संरक्षित किया गया है। दसेक एकड़ जमीन को दीवारों से घेर दिया गया था और पुरातत्व विभाग ने नाम पट्टिका लगा रखी थी। अंदर मैदान में रंग-बिरंगे फूल खिले था जहां पचास के करीब देशी-विदेशी पर्यटक थे। मजे की बात ये उस जगह के बारे में तो कि नाम पट्टिका थोड़ा भीतर लगाई गई थी, लेकिन आदेशात्मक लहजे में क्या करें और क्या नहीं करें कई जगह लिखा हुआ था। ऐसा वैशाली में कई जगह मिला। पता नहीं पुरातत्व विभाग इतना गुरुत्व का भाव क्यों पाले हुआ था।
वैशाली में बुद्ध का अस्थि स्तूप


बुद्ध की अस्थि जहां रखी हुई थी उस जगह को लोहे से घेर कर स्तूपनुमा बना दिया गया था। ऊपर एस्बेस्टस या टीन की छत थी। बीच में पत्थर की आकृति थी और हमें बताया गया कि बुद्ध के अस्थि अवशेष के कुछ अंश यहां जमीन के अंदर रखे गए थे। बौद्ध श्रद्धालू उस जगह की परिक्रमा कर रहे थे। वहां हमें एक बौद्ध भिक्षु भंते बुद्धवरण मिले जो तफ्सील से लोगों को उस जगह के बारे में बता रहे थे।

भंते बुद्धवरण ने हमें बताया, अपनी मृत्यु(महापरिनिर्वाण) से पहले बुद्ध वैशाली आए थे और उसके बाद वे कुशीनारा चले गए जहां उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उनके अस्थि अवशेष को आठ भागों में बांटा गया जिसका एक हिस्सा वैशाली गणतंत्र को मिला था। वहीं वो अस्थि अवशेष है जिसे यहां रखा गया है और बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए यह जगह अत्यंत ही पवित्र है।


भंते बुद्धवरण से हमने पूछा कि वो कब से बौद्ध भिक्षु हैं? उनका कहना था कि उनका जन्म नेपाल के लुंबिनी में(महात्मा बुद्ध का जन्मस्थल) हुआ था और उनके माता-पिता भी बौद्ध थे। उसके बाद वहीं उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हासिल की और बाद में नालंदा चले आए। वहां उन्होंने पालि और बौद्ध साहित्य में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की और एक बौद्ध भिक्षु का जीवन जी रहे हैं और जगह-जगह घूमते रहते हैं। मैंने उनसे पूछा कि उनका खर्च कैसे चलता है? वे मुस्कराने लगे। उनके चेहरे पर एक अपूर्व शांति थी। उन्होंने कहा, बौद्ध भिक्षुओं का जीवन सदा से भिक्षा पर आधारित रहा है। आप जैसे लोग कुछ न कुछ दे देते हैं जो जीवन जीने के लिए काफी होता है।

बुद्ध के अस्थि स्तूप परिसर में काफी लोग हिमाचल प्रदेश के भी मिले जो अपने आराध्य के स्थल को देखने आए थे। बाहर बौद्ध साहित्य, माला, काष्ठ प्रतिमाएं और कैलेंडर बिक रहे थे। हम स्तूप से बाहर आए तो अभिषेक पुष्करिणी के किनारे सैकड़ों की संख्या में स्कूली बच्चे बैठकर पूरी जलेबी और सब्जी का भोज खा रहे थे। पता चला एक सरकारी स्कूल का ट्रिप है जिसे वैशाली घुमाने लाया गया है। हमें ये तो पता था कि बिहार सरकार आजकल इस तरह का ट्रिप करवा रही है, लेकिन बच्चों को पूरी जलेबी खिलाया जाता होगा, इसकी कल्पना नहीं थी !


हमने स्कूल के एक शिक्षक से पूछा तो उन्होंने कहा कि सरकारी फंड तो पांच हजार का ही था, लेकिन शिक्षकों ने अपने वेतन से पैसा जमाकर बच्चों को ये ट्रिप करवाया जिसका कुल खर्च करीब बीस हजार का आया था। सुनकर अच्छा लगा कि कुछ शिक्षकों में जरूर इतिहासबोध बाकी है। बदलते बिहार का यह एक नमूना था।

Monday, February 25, 2013

वैशाली यात्रा-3


विशालगढ़ अवशेष के सुरक्षा प्रहरी ने हमें बताया था कि यहां जो जगहें देखने लायक हैं उसमें बाईं तरफ चमगादड़ पेड़, माया मीर साहब की दरगाह और बौना पोखर का जैन मंदिर है और दाईं तरफ मोनेस्टरीज, अभिषेक पुष्करिणी, संग्रहालय, बुद्ध के अस्थि कलश, शांति स्तूप, अशोक स्तंभ और आगे की तरफ भगवान महावीर का जन्मस्थल वासोकुंड है। हमने पहले वहां से सटे जगहों को देखने का फैसला किया।
 विशालगढ अवशेष के पास चमगादड़ पीपल का पेड़

विशालगढ़ अवशेष से करीब एक किलोमीटर दक्षिण जाने पर एक पीपल का पुराना पेड़ था जिस पर सैकड़ों की संख्या में विशालकाय चमगादड़ लटके हुए थे। लोगों का कहना था कि वह पेड़ सैकड़ों सालों से चमगादड़ों का डेरा है। पेड़ को देखकर ऐसा तो नहीं लगा कि वह हजारों साल पुराना होगा, लेकिन कुछेक सौ साल पुराना होने में कोई संदेह नहीं। हां, आसपास दूसरे पेड़ भी थे लेकिन उन पर चमगादड़ नहीं थे! इसका क्या रहस्य था, पता नहीं चल पाया। लेकिन जो लोग वैशाली घूमने जाते हैं, उन्हें उस पेड़ के बारे में जरूर बताया जाता है। हमने चमगादड़ों के साथ तस्वीरें खिंचवाई और साईकिल पर सवार लोगों ने हमें मुस्कुराकर देखा।

बगल में ही एक गांव था जिससे होकर हमें काजी मीरन सुतारी की दरगाह तक जाना था। उस गांव का नाम बसाढ़ है जिसका जिक्र आचार्य चतुरसेन ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास वैशाली की नगरबधू में किया है। छोटा सा गांव था जिसे देखकर लग रहा था कि खातेपीते लोगों का गांव है जिसमें अधिकांश घरों पर ताला लटका था और लोग अप्रवासी हो गए थे।
काजी मीरन सुतारी की दरगाह, वैशाली


गांव से बाहर दाईं तरफ एक ऊंचे से चबूतरे पर काजी साहब की मजार थी। नीचे कुछ झोपड़िया थीं, जहां कुछ कुपोषित बच्चे खेल रहे थे। मजार पर सन्नाटा छाया हुआ था और वहां कोई नहीं था। वहां का इतिहास बतानेवाला कोई जानकार नहीं मिला। ऊपर से देखने पर वैशाली का विहंगम दृश्य दिख रहा था। खेतों में सरसों के फूल चमक रहे थे और खेतों के पार विशालगढ़ के अवशेष और मोनेस्टरीज।

जब हम वहां से बौना पोखर में जैनमंदिर देखने गए तो वहां के पुजारी ने हमें बताया कि काजी साहब की मजार करीब 600 साल पुरानी है और वह एक विवादित स्थल है। विवादित स्थल ? लेकिन हमें तो विशालगढ़ के कर्मचारी ने बताया था कि वो भी कोई ऐतिहासिक जगह है जिसे देखना चाहिए। बहरहाल जो भी हो, दिल्ली आकर गूगल के सहारे जो जानकारी मिली उसका लव्वोलुआब ये था कि काजी साहब एक प्रसिद्ध संत थे जिनकी वो मजार थी। लेकिन बिहार सरकार या भारतीय पुरातत्व विभाग ने वहां कोई पट्टिका क्यों नहीं लगवाई थी? अपने ऐतिहासिक धरोहरों की ये अवहेलना हमें वैशाली में कई जगह महसूस हुई।

Monday, February 18, 2013

वैशाली यात्रा-2


वैशाली में घुसते ही चौक से दाईं तरफ कुछ सरकारी कार्यालय नजर आए। वहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और बिहार पर्यटन विभाग के कुछ बोर्ड लगे थे। हमने लोगों से पूछा कि पुरानी ऐतिहासिक जगह कहां है। पता चला कि हम विशालगढ़ के अवशेष के पास ही है।

वो एक विशाल सा मैदान था, तीसेक एकड़ में फैला हुआ। उबड़-खाबड़ जमीन और बगल से निकलती हुई खड़ंजे की सड़क जो पास के ही बसाढ़ गांव की तरफ चली गई थी। उस मैदान के एक हिस्से को लोहे की चारदीबारी से घेर दिया गया था जहां पुरातत्व विभाग वालों ने नाम पट्टिका लगा रखी थी। वहां से करीब दो किलोमीटर दूर थाई और जापानी मोनेस्ट्ररीज का प्यारा सा नजारा दिख रहा था। हमने सोचा फोटो सेशन तो बनता है। वो मैदान बिल्कुल वैसा ही लेकिन थोड़ा छोटा सा था जैसा मधुबनी में बलिराजगढ़ किले के प्राचीन अवशेष हैं।

बहरहाल हम आगे बढे और उस लोहे की चारदीबारी वाले जगह पर पहुंचे जहां राजा विशाल का गढ़ के नाम से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपनी पट्टिका लगा रखी थी। उसे घेरी हुई जमीन का रकबा करीब 10 एकड़ रहा होगा जिसमें प्राचीन किले के अवशेष थे। पट्टिका पर लिखा था कि यह राजा विशाल के किले का अवशेष है जिसके नाम पर इस जगह का नाम वैशाली पड़ा। वहां के सुरक्षा कर्मचारी ने बताया कि यह जगह कम से कम 2600 साल पुरानी है और यहां कुछेक बार खुदाई हुई है। दिल्ली आकर हमने गूगल से तस्दीक किया तो पता चला कि राजा विशाल महाभारत कालीन थे और उस हिसाब से उस किले की प्राचीनता ज्यादा होनी चाहिए। लेकिन इतिहास भी क्या लोचा है, सही तिथि का पता इतनी आसानी से चल जाए तो बात ही क्या हो।

लेकिन उस किले या राजमहल के अवशेष को जितनी जमीन में घेरा गया था वह कम लगी। किसी राजा का महल या किला महज इतना छोटा कैसे हो सकता है? वहां जानकारी के एकमात्र स्रोत उस कर्मचारी रामबृक्ष राय ने बताया कि सरकार और विभाग इस जगह की खोज के लिए बहुत उत्सुक नहीं दिखती। जितना काम अंग्रेजों के जमाने में हो पाया था, उतनी ही जगह अभी भी घेरी गई है।

ऐतिहासिक स्थलों खुदाई में बहुत एहतियात की जरूरत होती है। खुदाई हाथ से ही की जाती है ताकि किसी वस्तु को क्षति न पहुंचे।

उस जगह पर कमरों के वर्गाकार अवशेष थे। ईंटे काफी लंबी और मोटी सी थी। आजकल की ईंटों से बिल्कुल अलहदा। वर्गाकार कमरे और लंबे बरामदे। बीच-बीच में शायद स्नानागार की आकृति। जगह-जगह पुरातत्व विभाग ने मरम्मत करवाई थी जिसके बारे में सुरक्षा कर्मचारी बता रहे थे। लगा कि जब ये इमारते अपनी सही स्वरूप में रही होगीं तो वाकई लाजवाब होंगी। हिंदुस्तान ने 2600 पहले वास्तुकला में कितनी तरक्की की थीहालांकि इसमें आश्चर्यजनक बात नहीं थी। आखिर सिंधुघाटी सभ्यता में मिले मकान और स्नानागार तो उससे भी पुराने हैं।

वैशाली का नाम, उसकी प्रसिद्दि और उसकी प्राचीनता देखकर लगता था कि यहां इतिहास प्रेमी पर्यटकों की कतार लगी होगी। लेकिन वहां तो बिल्कुल सन्नाटा पसरा हुआ था। विशालगढ के मैदान में बकरिया चर रही थी, साईकिल पर गांव की लड़कियां स्कूल जा रही थीं और चारदीबारी के अंदर वह सुरक्षाकर्मी तंद्रा में लेटा हुआ था। बिहार सरकार ने पटना- वैशाली मार्ग पर कुछ जगह पर्यटन विभाग की नाम-पट्टिका, वैशाली में एक गेस्ट हाउस और सूचना केंद्र बनवाकर अपने कर्तव्य का समापन कर लिया था। हमें उस गेस्ट हाउस और सूचना केंद्र को खंगालने का मौका नहीं मिल पाया कि हम जान पाते कि उनका स्वास्थ्य कैसा है।

हां, उस सुरक्षाकर्मचारी ने जरूर हमें काम भर की जानकारी दे दी और शायद इस आशा में दी की हमलोग जाते समय उसे कुछ पैसे दे देंगे। वह कर्मचारी स्थानीय ही था और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से उसे प्रतिमाह महज 2000 रुपये मिलते थे। यानी नरेगा की मजदूरी से भी कम। वहां कुल मिलाकर दो सुरक्षाकर्मचारी थे जिनकी बारी-बारी से दिन और रात की ड्यूटी लगती थी। उनसे बात करनेपर पता चला कि वे पिछले 10 सालों से यहां काम कर रहे हैं और अनुवंध पर हैं। पहले तो और भी कम वेतन था। उसका कहना था कि अधिकारी उसे स्थायी करने के लिए लाखों रुपये घूस मांगते हैं जो उसके बस की बात नहीं है। उसके पास किसी स्थानीय लेखक की लिखी हुई कई पुस्तिकाएं थीं जिसमें वैशाली के बारे में तफ्सील से लिखा हुआ था और जिसे वह अपनी नौकरी के साथ-साथ बेचने का भी काम करता था।

यानी दुनिया के सबसे प्राचीन गणतंत्र के अवशेषों की रखवाली 2000 रुपये प्रतिमाह पर हो रही थी !

Sunday, February 17, 2013

वैशाली यात्रा-1


वैशाली जाने की योजना अनायास ही बन गई। हम एक शादी में पटना गए थे और हमारे एजेंडे में नालंदा और बोधगया था। लेकिन जिस शाम शादी होनी थी, वो दिन पूरा हमारे पास था और पटना से वैशाली की दूरी कुछ खास भी नहीं। हमने सोचा था कि नालंदा-बोधगया जाने के लिए हम टैक्सी कर लेंगे, लेकिन पटना जाकर हमने बाईक से जाने का फैसला किया ताकि इलाके में हुए बदलाव को भी सूंघा जा सके।

पटना के महेंद्रू इलाके में हम(मैं और मेरा दोस्त राजीव) रुके थे, वहां से हमने अशोक राजपथ लिया और गांधी सेतु पहुंच गए। पटना में भीड़भाड़ बहुत बढ़ गयी है और अशोक राजपथ का इलाका तो वैसे भी संकरा है। पटना बिल्कुल बनारस जैसा दिखता है जहां सड़कों पर रिक्शा और ऑटो के बीच लंबी कारें अपना रास्ता बनाने की घनघोर कोशिश करती हैं। गांधी सेतु की मरम्मत हो रही थी और कई सालों से हो रही थी। उत्तर बिहार को पटना से जोड़नेवाला यह महत्वपूर्ण पुल राजनीतिक वजहों से अपने उद्धार की राह देख रहा है।

हाजीपुर पहुंचकर हमने वैशाली की दूरी पूछी। पता चला कि वहां से लालगंज 18 किलोमीटर है और फिर लालगंज से वैशाली 15 किलोमीटर। यानी हाजीपुर से वैशाली कुल जमा 33 किलोमीटर है और पटना के केंद्र से करीब 50 किलोमीटर।

सड़क ठीकठाक थी। यों पर्यटकों की बहुत आवाजाही नहीं दिख रही थी। बिहार सरकार थोड़ी सक्रिय तो हुई थी कि उसने सड़कों के किनारे पर्यटन सूचना संबंधी बोर्ड लगवा दिया था जो आज से दशक भर पहले नहीं दिखते थे।

रास्ते में जो खास बात दिखी वो थी झुंड़ की झुंड लड़किया साईकिल पर सवार होकर स्कूल जा रही थी। साथ ही निजी स्कूलों की बसें भी खूब देखने को मिली। यानी सरकार और निजी स्कूल बच्चों और अभिभावकों को अपनी तरफ आकर्षित करने की होड़ में लगे थे। ये बिहार का वो इलाका है जहां गंगा के उत्तरी तट पर केले की अच्छी खेती होती है। यहां का चिनिया केला बहुत ही मशहूर है।  

हमने लालगंज में चाय पी और उसके बाद सीधे वैशाली रुके। रास्ते में जमीन ऊंची थी यानी सड़क के बराबर। ये इलाका सब्जियों और व्यवसायिक फसलों के लिए अच्छा माना जाता है। किसानों के पास थोड़ा बहुत पैसा आ जाता है। कच्चे मकान न के बराबर दिखे। यानी बिहार के सुदूर उत्तरी या उत्तर-पूर्वी इलाकों से तुलना की जाए तो लोगों की स्थिति ठीकठाक है। 

वैशाली के बारे में बचपन से किताबों में पढ़ता आया था लेकिन जो बात मालूम नहीं थी वो ये कि वैशाली में सिर्फ अशोक स्तंभ या भगवान महावीर का जन्मस्थल ही नहीं है। वहां ढ़ेर सारी ऐसी जगहें हैं जो अपने में इतिहास का खजाना छुपाए हुए हैं। वैशाली की नगरबधू उपन्यास में आचार्य चतुरसेन ने अभिषेक पुष्करिणी का जिक्र किया है वो अभी भी वहां है। अभिषेक पुष्करिणी वो तालाब था जिसमें स्नान करवाकर आम्रपाली को उस समय की प्रथा के अनुसार जबरन नगरबधु घोषित कर दिया गया था जिसके खिलाफ आम्रपाली ने विद्रोह किया था। वैशाली के गणपति की नियुक्त भी उसी तालाब जल से अभिषेक कर होता था। बहरहाल वो कहानी आगे।


मैं जब पटना में पढाई करता था तो मेरे गांव से पटना आनेवाली बस जाम से बचने के लिए एक बार वैशाली से होकर आई थी। अशोक स्तंभ मुझे दूर से दिखा था लेकिन मैं कभी वैशाली जा नहीं पाया। आज वो घड़ी आन पहुंची थी और मैं दुनिया के पहले गणतंत्र के भग्नावशेष के पास पहुंच गया था।(जारी)