Saturday, July 11, 2015

बिहार विधान परिषद चुनाव: जाति समीकरण और धन-बल का असर

बिहार विधान परिषद की 24 सीटों में से भाजपा गठबंधन ने 13 और जद-यू -राजद महा-गठबंधन ने 10 सीटों पर विजय हासिल की। एक सीट निर्दलीय के खाते में गई जो लालू प्रसाद के अतिशय करीबी हैं। कुल मिलाकर एक लाइन की स्टोरी ये है कि लालू-नीतीश-कांग्रेस के महा-गठबंधन के मनोबल को भारी झटका लगा है-हालांकि वे अभी मोर्चा हारे हैं। जंग बाकी है। 

विधान परिषद या इस तरह के चुनावों में सत्ताधारी दलों का एक निश्चित प्रभाव रहता है। उस हिसाब से राजद-जद-यू को अवधारणात्मक बढत हासिल थी और वे विराट समाजिक गठबंधन भी प्रोजेक्ट कर रहे थे। ऐसे में यह चुनाव जद-यू-राजद-कांग्रेस महाजोट के लिए अपशकुन है। 
इस चुनाव के संबंध में कुछ बातें समझनी जरूरी हैं। बिहार विधान परिषद में कुल 75 सीटें हैं जिन्हें अलग-अलग तरीकों से भरा जाता है। आज जिन 24 सीटों का परिणाम आया( 1 को छोड़कर) उन्हें स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों द्वारा चुना गया है जिसमें ग्राम-पंचायत सदस्यों और नगरपालिका/निगम/विकास प्राधिकार/नगर पंचायत आदि के सदस्य चुनते हैं। इस बार बिहार में ऐसे स्थानीय निकाय वाले वोटरों की कुल संख्या करीब 1 लाख 39 हजार थी जिनमें से 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व हैं। स्थानीय निकायों में नियमानुसार दलितों और पिछड़ी जातियों के लिए भी सीटें रिजर्व हैं।
बिहार में चूंकि शहरीकरण देश में संभवत: सबसे कम है (करीब 12 फीसदी) तो ऐसे में इन वोटरों में भी लगभग 15 फीसदी वोटर ही शहरी थे।
जिन 24 सीटों पर चुनाव हुए थे उनमें पहले 15 सीटें जेडी-यू के पास, 4 राजद के पास और 5 भाजपा के पास थीं। यानी अभी के हिसाब से नीतीश के महाजोट के पास 19 सीटें थीं जो घटकर 9 रह गई हैं। भाजपा के पास 5 थीं जो बढ़कर 13 हो गई हैं। यों, जेडी-यू ने जब 15 सीटें जीतीं थीं तो वो उस समय भाजपा की जोड़ीदार थीं।

कहना न होगा कि भाजपा ने अपने दम पर जबर्दस्त प्रदर्शन किया है। भाजपा 18 पर लड़ी थी उसमें उसे 13 पर जीत हुई। उस हिसाब से उसका स्ट्राइक रेट लोकसभा जैसा ही है। जबकि पिछले साल हुए विधानसभा उपचुनाव में वो 10 में से 4 सीटें ही जीत पाई थीं। भाजपा की सहयोगी लोजपा 4 पर और रालोसपा 2 पर लड़ी थी। लोजपा महज एक सीट जीत पाई जबकि रालोसपा शून्य पर अटक गई जिसके नेता उपेंद्र कुशवाहा भी गाहे-बगाहे बिहार की सरदारी का दावा ठोकते रहते हैं।
इस चुनाव में जनता सीधे मतदान तो नहीं करती, हां उसकी नजरों के सामने लगभग हमेशा रहनेवाले प्रतिनिधि जरूर मतदान करते हैं। थोड़ा-थोड़ा वृहत रूप में राज्यसभा जैसा मामला होता है-लेकिन इसे राज्यसभा से इस मामले में ज्यादा पारदर्शी और जनता का नजदीकी माना जा सकता है कि राज्यसभा में जो विधायक अपने सांसदों को चुनते हैं वे अपनी पार्टी के व्हिप से बंधे होते हैं। लेकिन यहां पर किसी ग्राम पंचायत के सदस्य पर ऐसा कोई ह्विप नहीं होता। 
हां, चूंकि निचले स्तर पर जनप्रतिनिधियों की चेतना, उनका स्तर, धनबल का प्रभाव, जातीय राजनीति आदि ज्यादा हावी होती है तो ऐसे में यहां पर धन और जाति का असर भी देखने को मिलता है, बल्कि जाति से ज्यादा धन और अन्य प्रभावों का असर देखा जाता है। उस हिसाब से राज्यसभा चुनाव से तुलना किया जाए तो विधान परिषद के इस चुनाव में धन का प्रभाव बराबर ही होगा। हां, राज्यसभा में स्तर ऊंचा होता है, विधान परिषद में स्तर माइक्रो होता है। 
इस चुनाव में कुछ अपराधी चुनाव हार गए, लेकिन एक तो जेल से जीत गया ! एडमिशन माफिया के रूप में कुख्यात लोजपा उम्मीदवार रंजीत डॉन और लोजपा के ही हुलास पांडे हार गए तो पटना से रीतलाल यादव जीत गए जो जेल में हैं। रीतलाल, लालू के काफी करीबी हैं और उन्होंने जद-यू उम्मीदवार को हरा दिया। अब जद-यू उम्मीदवार कह रहे हैं कि लालू ने अपने यादव वोटरों का वोट उन्हें ट्रांसफर नहीं करवाया। इस आरोप में कुछ सचाई है क्योंकि पिछली बार जब पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से लालू की बेटी चुनाव लड़ रही थीं तो रीतलाल बागी हो गए थे और लालू यादव ने उनके घर जाकर उनके पिता को कुछ आश्वासन दिया था।
रीतलाल यादव की जीत की निश्चय ही पूरे बिहार में अलग व्याख्या की जाएगी। वो जीत बिहार में राजद-जद-यू वोटरों के बीच गहरी दरार खींच सकती है जो वैसे भी पहले से धुंधला सा बना हुआ है। जद-यू उम्मीदवारों को हमेशा ये संशय रहेगा कि लालू अपना सारा वोट उन्हें ट्रांसफर नहीं करवाएंगे या करवा पाएंगे। बिहार में यादव वोटरों की जितनी संख्या है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अगर गठबंधन के प्रति उनकी निष्ठा दो-चार फीसदी भी डोली तो बीजेपी को इसका भारी फायदा हो जाएगा।
हां, ये कहना ठीक नहीं है कि लालू के वोटरों ने इस परिषद चुनाव में जद-यू को पूरा वोट नहीं दिया। बल्कि लालू के स्वजातीय वोटर न होते तो जद-यू भागलपुर, नालंदा या नवादा जैसी सीटें कभी नहीं जीत पाती। एक अन्य कारक भी है। दरअसल एक लंबे समय तक यादवों के राज, काउंटर पोलराइजेशन और अति-पिछड़ों के उभार ने बिहार के स्थानीय निकायों में यादव प्रतिनिधियों की संख्या कम कर दी है। आशिंक रूप से वो भी इस चुनाव में झलक रहा है। वरना यादवों के गढ़ मिथिलांचल में यादव प्रतिनिधि जरूर चुनाव जीत जाते। 
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वाम दलों ने 16 उम्मीदवार खड़े किए थे, सारे खेत रहे। मुस्लिम उम्मीदवार एक ही जीत पाया, स्त्रियां करीब 12-15 फीसदी जीतीं और बनिए करीब 22 फीसदी और उतने ही यादव। जबकि यादवों की संख्या बिहार में बनियों से ज्यादा है। अंदाज लगा लीजिए कि धन-बल का कितना महत्व है !

Monday, July 6, 2015

यह व्यापम घोटाला है या जेम्स बॉंन्ड की कोई जासूसी फिल्म है?

व्यापम की वेबसाइट देख रहा था कि इसमें मेडिकल या प्री-इंजीनियरिंग टेस्ट है या नहीं। क्योंकि डॉक्टर भी मारे गए हैं, पत्रकार भी और चपरासी भी। बड़ा घालमेल है। इसका गठन तो हुआ था मेडिकल इंट्रेस इक्जाम के लिए लेकिन बाद में किसी 'दिमाग' वाले CM ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा हटा दिया और उसके लिए अलग बोर्ड बना दिया। अब व्यापम चौकीदार से लेकर एग्रीकल्चर ऑफिसर तक की बहाली करता है। वह पुलिस कांस्टेबल भी बहाल करता है, इजीनियर भी और साथ ही कई विषयों का इंट्रेस्ट टेस्ट भी लेता है। MCA करना है तो व्यापम जाइये। वो सौ मर्ज की एक दवा है। यानी व्यापम नौकरी बांटने और एडमिशन देने की थोक एेजेंसी है जो साल में पूरे MP में 25-30 हजार नौकरियां और एडमिशन के लिए जिम्मेवार है। 

हम लोग बचपन से हिंदी पट्टी में मध्यप्रदेश और राजस्थान को अलग मानते थे। शरीफ बच्चा सा दिखनेवाला सूबा जो अपना सारा काम समय पर करता है। जो धीरे-धीरे 'बीमारू' प्रदेश की श्रेणी से बाहर निकल गया था। हमें क्या पता था कि विकास होते रहने के बावजूद भ्रष्टाचार का कैंसर वैसे ही पसर सकता है। बहुत सारी बातें साफ हो रही है। हमने हाल के सालों में अखबारों में देखा कि कैसे भोपाल के अफसरों के घरों से सैकड़ों करोड़ बरामद हुए। कायदे से इतने पैसे लखनऊ या पटना के हाकिमों के घर से मिलने चाहिए थे।
अब आप इस बेरोजगारों भरे भ्रष्ट देश में अदांज लगाइये कि एक नौकरी की कीमत क्या हो सकती है। बाजार में एक औसत किरानी की नौकरी घूस देकर 6 से 8 लाख में मिलती है और हम इसे औसत मान लेते हैं। और अगर एक कंजूसी भरा आकलन करके माना जाए कि व्यापम में ज्यादा से ज्यादा 50 % सीटें भी बिकती हो तो कम से कम साल में 10 हजार नौकरी और एडमिशन की बोली लगती होगी।
अब हम 10 हजार को 6 लाख से गुणा कर देते हैं जो 600 करोड़ रुपये का सालाना मुनाफे वाला धंधा है। कहते हैं कि इसका इतिहास सनातन है। मान लिया जाए कि इसने पिछले 10-12 सालों में जोर पकड़ा हो तो व्यापम ने कम से कम 6-7 हजार करोड़ का धंधा किया होगा। एक राज्य स्तरीय सस्था के लिए इतना बढ़िया धंधा 'स्तुत्य' और 'प्रेरक' माना जाएगा। व्यापम को नवरत्न की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
जिस हिसाब से हत्याएं हुई हैं और सभी वर्ग-जाति का ख्याल रखा गया है, ऐसा लगता है कि इस घोटाले के बहुत सारे दावेदार हैं। शिवराज सिंह चौहान अगर कहते हैं कि उन्हें कोई फंसा रहा है तो उन्हें इसी बात पर इस्तीफा दे देना चाहिए। क्योंकि किसी शासक को वैसे भी गद्दी पर रहने का कोई अधिकार नहीं है जो अपनी सुरक्षा न कर सके।
ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस भी व्यापम घोटाले को ज्यादा तूल नहीं देना चाहती। हमें याद है कि बिहार में जब चारा घोटाल हुआ था तो पटना हाईकोर्ट ने ठोक-बजा कर राज्य सरकार की हालत खराब कर दी थी और मामला CBI को दे दिया गया। लेकिन व्यापम घोटाले में इतनी जानें जाने के बाद भी माननीय जबलपुर/भोपाल हाईकोर्ट उतना सख्त क्यों नहीं है?

बिहार में चारा घोटाला या यूपी में हेल्थ घोटाला में भी हत्याएं हुईं थीं। लेकिन वहां पर 50 लोग नहीं मरे थे। व्यापम तो सबका बाप निकला।

व्यापम में हो रही हत्याएं किसी हॉलीवुड जासूसी फिल्म या सुरेंद्र मो. पाठक के उपन्यास जैसी लगती है कि घुप्प अंधेरे में कोई आता है और किसी का कत्ल कर देता है। 

इसका नाम जिसने व्यापम रखा होगा वो जरूर किसी ज्योतिषी की औलाद होगा। व्यापम सुनकर ही लगता है कि यह व्यापक घोटाला है। कल हमारे एक वरिष्ठ ने लिखा कि टीवी प्रोड्यूशर व्यापम पर कोई प्रोग्राम बनाते हुए डरने लगे हैं कि क्या पता एडीटिंग मशीन से कोई भूत निकलकर कत्ल न कर दे।

Wednesday, July 1, 2015

यमुना की गंदगी और हथनिकुंड बांध


करीब दो साल पहले यमुना बचाओ अभियान के लोगों से मिलना हुआ तो हथिनीकुंड बराज के बारे में जानकारी मिली। वे लोग मथुरा से दिल्ली तक पदयात्रा करते आ रहे थे और पलवल के पास सड़क के किनारे एक स्कूल के मैदान में टेंट में विश्राम कर कर रहे थे। पता चला कि यमुना की गंदगी की असली वजह तो ये है कि उसका पानी हरियाणा के यमुनानगर में हथिनीकुंड बराज में रोक लिया गया है। वहां से यूपी और हरियाणा के लिए दाएं-बाएं नहर निकाल ली गई और यमुना का पानी खेतों में बांट लिया गया। ऐसे में यमुना सदानीरा नहीं रह पाई और रही-सही कसर दिल्ली के कचड़े(घरेलू और औद्यौगिक दोनों) और उसके कु-प्रबंधन ने पूरा कर दिया। 
यानी हथिनीकुंड का बराज यमुना का सारा पानी पी गया और प्रदूषण के लिए सारी गाली दिल्ली के कचड़े(फैलानेवालों) को मिली! विकीपीडिया कहता है कि बराज 1996 से 1999 के बीच बना जबकि उससे नीचे भी अंग्रेजी राज का करीब सवा सौ साल तजेवाला बराज पहले से था। लेकिन उसकी जगह हथिनीकुंड बनाया गया ताकि यूपी और हरियाणा की नहरों को पानी मिल सके।


केंद्र में उस समय देवगौड़ा-गुजराल और वाजपेयी की सरकारें थी और हरियाणा- यूपी में बीजेपी के ही भाई-बंधु थे। पता नहीं किन महानुभावों ने हथिनीकुंड बराज बनवाकर यमुना का पूरा पानी पी लेने की सहमति दी थी-यह अपने आप में शोध का विषय है। उस समय के कथित NGO क्या कर रहे थे, कोई सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं गया या अखबारों ने क्या-क्या लिखा इस पर विस्तृत शोध होना चाहिए।

दिक्कत ये है कि मामला नहर-सिंचाई और किसानों से जुड़ा था तो सब ने चुप्पी साध ली। हमारे देश में कुछ मामले अत्यधिक पवित्र होते हैं, कोई उसे नहीं छूता। यमुना का पानी रूक गया, नदी जल-विहीन हो गई, ऐसे में उसमें गिरनेवाला थोड़ा भी कचड़ा उसे नरक बनाने के लिए काफी था। यहां तो उसे दिल्ली जैसे भीमकाय शहर का कचड़ा झेलना था, फरीदाबाद-बल्लभगढ, पलवल, मथुरा और आगरा को झेलना था। ऐसे में उसकी क्या गत हुई, इसे समझने के लिए किसी IIT में पढ़ने की जरूरत कहां है?
ऐसा नहीं है कि इन शहरों के कचड़ों के प्रबंधन के लिए धन खर्च नहीं किए गए, लेकिन अरबों रुपये कहां गए किसी को पता नहीं है। इधर मोदी सरकार ने नदियों को साफ करने को लेकर कुछ रुचि दिखाई है- लेकिन मुझे शक है कि किसानों की आड़ में हरियाणा और यूपी की सरकारें नहरों में पानी की कटौती होने देंगी। दीर्घकालीन हित तो कोई सोचता नहीं, ऐसे में यमुना भले ही बर्बाद हो जाए या उसके किनारे की दसियों करोड़ की आबादी भले ही विनाश के कगार पर पहुंच जाए-हमारी राजनीति को कोई फर्क नहीं पड़ता।

परिवहन मंत्री नितिन गडकरी तो और भी कमाल के हैं! उन्हें लगा कि चूंकि यमुना में सिल्टिंग है-इसलिए पानी नहीं है। मंत्री जी ने कहा कि नदी की ड्रेजिंग करवाएंगे-यानी भीमकाय मशीन लाकर मिट्टी निकाल दो और नदी को गहरा कर दो। बिना इस बात की चिंता किए हुए कि हजारों सालों में एक प्रक्रिया के तहत बनी नदी और उसके मिट्टी के लेयर को ऐसे ड्रेंजिंग करके नहीं हटाया जा सकता और बीमारी, नदी की गहराई में नहीं-हथिनीकुंड में पानी की रुकावट में है-मंत्रीजी उसी जोश में आ गए मानो नेशनल हाईवे बनावा रहे हों। उनके दिमाग में सबसे पहली बात ये आई कि ड्रेजिंग करवा कर नदी में प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए नौका-विहार का आयोजन करवाएंगे!
पर्यावरणविदों का कहना है कि यमुना में बालू और मिट्टी का जो चरित्र है वो अलग है। दिल्ली की यमुना, पहाड़ से ज्यादा दूरी पर नहीं है। ऐसे में नदी की गहरी खुदाई मिट्टी के उस लेयर को हटा देगा और .यमुना के दोनों तट कटाव के लिए असुरक्षित हो जाएंगे।ये अच्छी बात है कि National Green Tribunal (NGT) ने हरियाणा सरकार से कहा है कि वो 10 क्यूसेक पानी छोड़े ताकि दिल्ली के वजीराबाद तक यमुना की प्राकृतिक धारा एक हद तक कायम रहे।
यमुना के लिए आवाज उठाना इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर हमने आज यमुना को खो दिया, तो कल को गंगा भी नहीं बचेगी, फिर एक दिन नर्मदा, कोसी और चंबल की भी बारी आएगी।

Saturday, June 27, 2015

अच्छी नींद से याददाश्त भी बढ़ती है और सैलरी भी!

 रात से शुरू करते हैं। कोशिश करें कि रात का खाना जितनी जल्दी खा सकें, खा लें। सोने से कम से कम 3 घंटे पहले खाना खा लें। ज्यादातर लोग खाना खाकर तुरंत सोने चले जाते हैं। यह ठीक बात नहीं है। लगभग पूरा चीन सूर्यास्त से पहले खाना खा लेता है। लगभग 80 फीसदी अमेरिकी शाम में 8 बजे तक डिनर कर लेते हैं। हमारे यहां जैनी भी ऐसे करते थे और पुराने जमाने में पूरा समाज सवेरे खाना खाता था। गांव में आज भी रात में 8 बजे तक लोग खाना खा लेते हैं। शहरों में ही कुछ लोग रात में 11 बजे खाते हैं और 2 बजे सोते हैं फिर सुबह में 10 बजे उठकर दिन भर भकुआते हुए घूमते रहते हैं।

खाना खाकर तुरंत सोने का मतलब ये है कि जब आप सोने जाते हैं तो शरीर कुछ काम कर रहा होता है। वो पाचन क्रिया में जुटा होता है। ऐसे में गाढी नींद नहीं आएगी। हम सोने के नाम पर खाना-पूर्ति कर रहे होंगे। बेहतर है कि सोने से 3 घंटा पहले खा लें। बेहतर नींद के लिए भोजन पर ध्यान देना जरूरी है। महात्मा गांधी ने इसे लेकर कई प्रयोग किए थे। उन्होंने कम घंटों में पूरी नींद लेने की महारत हासिल कर ली थी। भोजन कम से कम दिन में तीन बार और हो सके तो 5 बार थोड़ा-थोड़ा करके लें। अपने यहां कॉरपोरेट में काम करनेवालों को समय ही नहीं मिलता कि सुकून से खा सकें। लेकिन इस पर ध्यान देना होगा।

दिन का पहला भोजन यानी सुबह का नाश्ता भरपेट होना चाहिए। यानी दिन में अगर आप तीन बार खाते हैं तो सबसे तगड़ा भोजन सुबह का लीजिए। मान लीजिए आप पूरे दिन में 600 ग्राम खाते हैं तो 300 ग्राम सुबह में खाएं, फिर 200 ग्राम दिन में खाएं और 100 ग्राम रात में। हमारे यहां होता उल्टा है। लोग रात का खाना ही भकोस कर खाएंगे कि रात तो अपनी है और खाकर सो जाना है! जबकि रात में चूंकि आप कोई काम नहीं करते, तो ऐसे में ज्यादा खाना फैट में बदल जाएगा और उसका पाचन, आपकी साउंड स्लीप में खलल डालेगा अलग।

शाकाहार का अपना महत्व है। शाकाहार को शरीर आसानी से पचा लेता है, शरीर को ज्यादा मेहनत नहीं करनी होती पचाने में(हालांकि मैं खुद पूरी तरह से नहीं हो पाया हूं, लेकिन मुफ्त ज्ञान देने का अपना मजा है)। मन हल्का रहता है। भटकता नहीं है। किसी रिसर्च में आया है कि शाकाहार से आपकी याददाश्त भी बढ़ती है।  सोने से कम से कम एक घंटा पहले तमाम इलेक्ट्रानिक उपकरणों से अपनी आंख को दूर रखें। लैपटॉप, मोबाइल स्क्रीन नींद में बड़ी बाधा है। एक ब्रिटिश रिसर्च में ये बात सामने आई है कि जो लोग सोने से पहले मोबाइल स्क्रीन पर डटे रहते हैं, उनके नींद की गुणवत्ता घट जाती है।

 रात की नींद का कोई जोड़ नहीं। रात की 2 घंटे की नींद दिन के 5 घंटे से ज्यादा महत्वपूर्ण है। कोशिश करें कि जब आप सो रहे हों तो कहीं से भी प्रकाश की किरण या आभा आपके कमरे में प्रवेश न करें। मोबाइल को अपने से कम से कम 3 फीट की दूरी पर उलट कर रखें।

कई लोग गाढ़ी नींद लेने के लिए सोने से पहले वर्क आउट करते हैं। ताकि शरीर थोड़ा थक जाए। अमेरिका में खासकर इसका ज्यादा चलन है। आप चाहें तो सोने से पहले 15 मिनट तेज वॉक कर सकते हैं। इसे आजमा कर देखिए। 

कुल मिलाकर मामला ये है कि अच्छी नींद आएगी तो मेमोरी अच्छी रहेगी। चिड़चिड़ापन नहीं रहेगा। लोग आपको पसंद करेंगे! बॉस आपका 'पटा' रहेगा और बॉस की सेकरेटरी तुरंत आपको अप्वाइंटमेंट दिलवा देगी। 
हर-हर महादेव। रमजान आपको मुबारक हो।

Saturday, May 16, 2015

मोदी सरकार के एक साल, मेरी तरफ से 10 में 6 नंबर

मोदी सरकार के एक साल पर मैं उसे 10 में कम से कम 6 नंबर देता हूं। इस पर निम्नलिखित रूप से बिंदुवार चर्चा की गई है-
1. मेरी नजर में सबसे बड़ा काम था योजना आयोग को भंग करना और वित्त आयोग की सिफारिश मानकर राज्यों को ज्यादा पैसा देना। एक 67 साल के कथित रूप से बुजुर्ग हो चुके लोकतंत्र को अब अपने राज्यों पर भरोसा करना ही चाहिए। केंद्रीकृत व्यवस्था ने हमारे बचपन तक सिर्फ चार शहर पैदा किए थे। इसका असर आनेवाले सालों-दशकों में पता चलेगा जब एक बिहारी मुख्यमंत्री अपने हिसाब से पेयजल या गरीबों के लिए हाउसिंग स्कीम चला पाएगा। साथ ही सरकार अलग-अलग शहरों के विकास पर जोर दे रही है। हां, नाम रखने में कांग्रेसी ज्यादा माहिर थे-बीजेपी वाले अंग्रेजीदां नाम रखकर(जैसे स्मार्ट सिटी!) गरीबों को भयांक्रांत कर देते हैं।
2. विदेश नीति सही पटरी पर है-बहुत लोगों को इंदिरा गांधी की याद आ रही है। बहुत दिनों के बाद भारत अपने पड़ोसियों के साथ ठीक से पेश आ रहा है।


3. कम से कम आंकड़ों में अर्थव्यवस्था बेहतर लगती है। तेल मेहरवान रहा और प्रकृति बहुत बाद में नाराज हुई। सरकार ने कौशल विकास और विनिर्माण पर जोर दिया है। हालांकि जमीन पर उसे उतारने में समय लगेगा-लेकिन माहौल ऐसे ही बनाया जाता है।
4. भारत, आपदा के समय तारणहार बनकर उभरा है। कश्मीर, मालदीव, यमन और अब नेपाल के समय भारत ने इसका लोहा मनवाया है। हालांकि यह पिछले कई दशकों की मेहनत का नतीजा है लेकिन सेहरा तो दूल्हे के ही सिर बंधता है!
5. पिछले साल भर में घोटाले नहीं दिखे हैं।(!) आज के जमाने में यह कामयाबी वैसी ही है जैसे कोई बदमाश लड़का अपने कॉलेज में सबसे सुंदर कन्या को पटा ले!
6. जैसे कि उम्मीद थी, मोदी सरकार ने उस स्तर पर शिक्षा का भगवाकरण नहीं किया है-जैसा किसी संघी सरकार को करना चाहिए था। अभी भी बहुत सारे वामपंथी शिक्षा जगत में जमे हुए हैं या कई कमेटियों में फिर से बनाए गए हैं। उस हिसाब से यह इस सरकार का संतुलित कृत्य माना जाएगा।


7. देश में आंतरिक कानून व्यवस्था बहुत खराब नहीं है। आतंकियों द्वारा किए गए बम धमाके या नक्सली हमले काबू में हैं। लगता है उनके पैसों पर भी लगाम लगा है।
8. सरकार हार्ड बुनियादी ढ़ांचे पर आक्रामक दिखती है। सड़क और रेलवे सही हाथों में है। हालांकि हवाईजहाज वैसे ही बीमार है। लेकिन सॉफ्ट बुनियादी ढ़ाचे(शिक्षा, स्वास्थ्य आदि) पर सवाल बने हुए हैं। इसीलिए मैंने सरकार के चार नंबर काट लिए हैं।
9. सरकार की विधायी गतिविधियां भी तेज है। संसद में इतने कानून शायद ही कभी पारित हुए हों। उस हिसाब से राज्यसभा में अल्पमत में भी रहकर सरकार का फ्लोर मनेजमेंट बेहतर माना जाएगा।
10. सबसे बड़ी बात ये कि सरकार लोकलुभावनकारी कामों से बच रही है जो कांग्रेसियों की सबसे बड़ी आदत थी।

Thursday, April 16, 2015

भयांक्रांत नेताओं का जमावड़ा यानी जनता परिवार

जनता परिवार के विलय में वहीं भावना छुपी है, जो आखिरी घड़ी में दिल्ली बीजेपी में किरण बेदी की ताजपोशी में छुपी थी। यानी त्राहिमाम...त्राहिमाम। यह संदेश जनता तक कायदे से पहुंचा है। लैंड बिल, बेमौसम बारिश और उग्र-बयानवाजी से तनिक कमजोर सी दिख रही बीजेपी को लगता है जनता परिवार ने अपनी तरफ से अजेय घोषित कर दिया है !कभी शरद यादव के फाईल संभालनेवाले एक निजी सहायक यादवजी की कहानी सुनाता हूं। यादव जी एक बार ताजा-ताजा चुनाव हारकर बिहार से दिल्ली आए तो नॉर्थ एवेंन्यू के पांडे पान भंडार पर उन्होंने कहा, “पहले एक ही यादव बिहार में लोगों को आतंकित करने के लिए काफी था, अब तो पोस्टर पर तीन-तीन यादव इकट्ठे दिखाई देंगे। अंदाज लगाइये पब्लिक का क्या हाल होगा’! हलके-फुलके ढंग से कही गई इस बात को वो लोग समझेंगे जो कायदे से बिहार पर नजर रखते हैं। 


पिछले पच्चीस सालों से बिहार की राजनीति लालू यादव के इर्द-गिर्द घूमती रही है-या तो समर्थन में या विरोध में। ऐसा सम्पूर्ण रूप से पहली बार होने जा रहा है कि बिहार की राजनीति बीजेपी के इर्द-गिर्द घूमने जा रही है। ट्विटर पर अशोक उपाध्याय ने लिखा है- ‘नकारात्मक वजहों से पहले भी तीन बार ऐसे प्रयोग हो चुके हैं। सन् 77 में इंदिरा गांधी को रोकने के लिए, सन् 89 में राजीव गांधी को रोकने के लिए और सन् 1996 में वाजपेयी को रोकने के लिए। तीनों का नतीजा एक जैसा रहा। ऐसी कोई वजह नहीं कि अब चौथी बार नतीजा समान न हो। लोगों को ये नहीं पता कि यह पार्टी नया क्या देने जा रही है जो उसने पिछले 25 साल में नहीं दी है?


बिहार की बात करें तो नीतीश का लालू से मिलना वैसा ही है जैसे पाकिस्तान का सेक्यूलर हो जाना या भारत में विलय कर घर-वापसी कर लेना! मेरे पापा का जीवन राजनीति में गुजरा है। उन्होंने एक कहानी सुनाई थी। सन् 77 के आसपास मुंगेर के किसी गांव में भूमि विवाद में यादवों और कोइरियों में झगड़ा हुआ, पंचायत हुई, दोनों जातियों के दो बुजुर्ग विधायक पंच बने। लेकिन मामला नहीं सुलझा। पापा ने पूछा कि क्या हुआ? तो एक विधायक बोला, ‘दरअसल पंचों का चुनाव ही गलत हो गया। एक बोने वाली जाति है और एक चरानेवाली। ऐसे में पंच किसी तीसरे को होना चाहिए था!’ बोने-चरानेवाली बात हास्य में कही गई थी, लेकिन बिहार की जातीय हकीकतों को बेपर्दा करती है। 
पहली नजर में यह गठबंधन मजबूत पिछड़ी जातियों का आर्थिक-पारिवारिक फोरम लगता है। वंशवाद विरोधी लोहिया के ये अधिकांश चेले दिलोजान से वंशवादी हैं। शरद ने देर से शादी की थी, उनके वंशवाद की परीक्षा होनी बाकी है। इन दलों का सबसे बेस्ट प्रोडक्ट बाजार में पच्चीस साल पहले आ चुका है, उसके बाद की योजना जो होनी चाहिए थी उसे सिर्फ थोड़ा-थोड़ा नीतीश कुमार समझ पाए थे। 
इन दलों के नेता अपने अंतर्मन से उतने ही दलित-विरोधी हैं जितना कोई सवर्ण हो सकता है। मामला सिर्फ अवसर का है। आप मुलायम प्रायोजित गेस्ट हाउस कांड याद करें या नौकरियों में दलित प्रोन्नति का विरोध, आप मांझी प्रकरण याद करें या उससे भी महीन तरीके से लालू द्वारा हर तिकड़म करके सन् 90 में रामसुंदर दास को रोकना...या आप जाट सम्राट चौटाला के दौर में दलितों पर हुए हमलों को देखें आपको पता चल जाएगा कि दबंग पिछड़े नेताओं के लिए भी दलित सिर्फ साथ में फोटो खिंचवाने का औजार है। यह वैसा ही मामला है जैसा सवर्ण नेताओं के दौर में था। ऐसे दलित नेताओं को व्यंग्य से कांशीराम ‘सरकारी दलित’ कहते थे ! जबकि दलित राजनीति उससे एक कदम आगे बढ चुकी है। उसे अब ‘पेटी कांट्रेक्ट’ नहीं चाहिए, उसे ‘सॉलिड टेंडर’ चाहिए।
सबसे बड़ी बात ये कि क्या उत्तर भारत के इन पिछड़े सरदारों ने दक्षिण के अपने समकक्षों से कोई सबक सीखा है? कामराज, अन्नादुरई, चंद्रबाबू या यहां तक कि बंशीलाल ने जो काम हरियाणा में किया था, क्या उसका कोई भी संकेत लालू-मुलायम के पास है? इनकी समाजिक न्याय सन् 90 में बिल्कुल सटीक थी, लेकिन उसके बाद जो पीढी पैदा हुई है उसने हिंदी फिल्मों में भी राइफल वाले घुड़सवार ठाकुर नहीं देखे हैं। दिक्कत यहां है। पिछड़े नौजवानों को भी अपने सूबे में नौकरी चाहिए, उसे तोंदवाले समधी यादव नहीं चाहिए। उसे खैनी खानेवाला भदेस भी नहीं चाहिए। बल्कि उसे तो सूट-बूट और अंग्रेजी वाले बाबा साहब ज्यादा डैशिंग लगते हैं। जनता परिवार इस हकीकत से जबर्दस्ती मुंह चुरा रहा है।
जहां तक मुसलमानों की बात है तो वो मजबूरी में इनके साथ है। जिस दिन यूपी-बिहार में इनका विकल्प मुसलमानों को मिल गया, जनता परिवार का हाल वहीं होगा जो दिल्ली में कांग्रेस का हुआ। दरअसल उत्तर भारत राजनीतिक परिवर्तन के लिए छटपटा रहा है जिसकी चाबी न तो जनता परिवार के पास है और न ही कांग्रेस के पास। बीजेपी की शक्ल में दक्षिणपंथ का एक खूंटा मजबूत है, लेकिन तंबू का दूसरा खूंटा दिख नहीं रहा। फिर भी राजनीति कभी शून्य नहीं रहने देती। हां, ऐसे प्रयोगों से नई संभावनाएं जरूर बनती हैं। ये प्रयोग नए खिलाड़ियों को उभरने का मौका भी देते हैं। चलिए कुछ पॉजिटिव सोचा जाए।

Tuesday, February 24, 2015

अव्यवहारिक मांग और अन्ना की कमजोर 'जमीन'

 लैंड बिल पर सरकार डिफेंसिव दिख रही है लेकिन मेरे हिसाब से एकाध संसोधनों के साथ यहीं बिल व्यवहारिक है। दरअसल जब लोग किसान की बात करते हैं तो कई बार नॉस्टेल्जिक हो जाते हैं। देश में किसानों की बदहाली भूमि अधिग्रहण की वजह से नहीं है-बल्कि उपज का सही मूल्य न मिलने, जोत का आकार छोटा होने,उन्नत तकनीक न मिलने, सिंचाई और बिजली न मिलने की वजह से है। फैक्ट्री की वजह से कोई किसान गरीब नहीं होता, वो इस वजह से गरीब होता है कि पिछले 60 साल में उसकी तीन पीढियों को ठीक से पढाया नहीं गया और परिवार बढकर 44 लोगों का हो गया और जोत का आकार घट गया। वह इस वजह से गरीब होता है कि सरकार ने आसपास अस्पताल नहीं खोले और उसे दरभंगा या बनारस के डॉक्टरों ने घेरकर लूट लिया !


बात इस बिल की करें तो इस बिल में जिन पांच बिंदुओं में किसानों की सहमति न लेने की बात कही गई है उसमें सिर्फ एक पर या ज्यादा से ज्यादा डेढ पर मेरी आपत्ति है-वो भी स्पष्टता के संदर्भ में। इंडस्ट्रियल कॉरीडोर पर खासतौर पर। मान लिया जाए कि पटना से दरभंगा इंडस्ट्रियल कॉरीडोर विकसित करने को मंजूरी दी जाती है( माफ करें संदर्भ हमेशा मैं अपने ही इलाके का सोच पाता हूं, रुस या पोलैंड जेहन में नहीं आता!) तो उस कॉरीडोर में अधिग्रहित जमीन सिर्फ सरकार उपयोग करेगी या कोई और? बाद में वह औने-पौने दाम पर औद्योगिक घरानों को तो नहीं दे देगी? तो यह एक नया SEZ टाइप मामला भी हो सकता है। सरकार को इस पर स्पष्टीकरण देने की जरूरत है।

बाकी, सुरक्षा, ग्रामीण विकास, सस्ते आवास और पीपीपी प्रोजेक्ट में आप चाहें तो पीपीपी पर आपत्ति कर लें और स्पष्टीकरण मांग ले। लेकिन पीपीपी प्रोजेक्ट भी अंतत: सरकार और समाज के लिए ही होते हैं-चाहे वो दिल्ली मेट्रो हो या कोई मेगा सड़क परियोजना। अगर अन्ना हजारे की बात मान ली जाए तो देश में नई सड़क और विद्यालय तो दूर की बात है, सरकार एक कुंआ तक नहीं खोद पाएगी और 'स्टेटस को' बना रह जाएगा। 


अन्ना हजारे जो बात कर रहे हैं वो वैसी बात है कि जमीन पर किसानों का 'शाश्वत' या 'अध्यात्मिक' हक है। यह किसी पंचतंत्र की कहानी के वक्त सा लगता है, जबकि आधुनिक राष्ट्र-राज्य में जमीन पर वास्तवकि हक 'स्टेट' का है जिसका नेतृत्व, एक संप्रभु संसद का हिस्सा होता है। गांधी और बिनोवा ने भी कहा था कि 'सभै भूमि गोपाल की'..यहां गोपाल का मतलब गाय चरानेवाला नहीं, गांधी का ईश्वर(या सामूहिक विवेक?) था और लोकतंत्र में 'सार्वभौम सत्ता' है। लेकिन अन्ना कह रहे हैं कि जमीन पर असली हक किसान का है और वो हक वो किसी कीमत पर उससे छीना नहीं जा सकता। कई बार यह बात तो परले दर्जे की पूंजीवादी सोच लगती है जिसमें जो मेरा है वो मेरा है-कोई छीन नहीं सकता। हालांकि मैं किसानों की तुलना पूंजीवादियों से यहां नहीं कर रहा।

अन्ना की बात अगर मान ली जाए तो कल को किसी चीनी हमले की सूरत में दरभंगा एयरपोर्ट में एक ईंच की बढोत्तरी नहीं की जा सकती क्योंकि वहां 70 फीसदी किसानों की सहमति चाहिए होगी ! उनकी बात अगर मान ली जाए तो मेरे गांव में सरकारी अस्पताल नहीं बन पाएगा जिसको नीतीश सरकार मंजूर कर चुकी है लेकिन उतने किसान जमीन देने को राजी नहीं है। मेरे गांव में तीन पगडंडियों को खडंजा सड़क बनाने की योजना नीतीश सरकार पास कर चुकी है लेकिन उसके लिए 1-1 किलोमीटर तक पगडंडी के दोनो तरफ 4-4 फीट जमीन लेनी होगी। अन्ना हजारे की चली तो मेरे गांव में कभी वो पगडंडी सड़क नहीं बन पाएगी-जिस वजह से बरसात के दिनों कई किसानों की पत्नियां प्रसव काल में दम तोड़ देती हैं।

दरअसल, किसानों को असली समस्या भूमि अधिग्रहण से नहीं-मुआवजा और पुनर्वास में भ्रष्टाचार में है। एक आकलन के अनुसार सन् 1947 से लेकर 1990 तक देश में करीब 3.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे जिनके पुनर्वास और मुआवजे में भारी गड़बड़ी हुई। बाद में भी गड़बड़ी हुई होगी, ये संदर्भ मुझे राम गुहा की किताब इंडिया आफ्टर गांधी में कहीं मिले जिसका मैंने अनुवाद किया था। कुल मिलाकर कहें कि जनता का भरोसा सरकार पर कई कारणों से नहीं है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम 21वीं सदी में वक्त का पहिया रोक दें और वैदिक युग में प्रस्थान कर जाएं।

हालांकि इस बहस के अपने फायदे भी हैं। बहस इस पर होगी कि फिर उद्योगों के लिए जमीन कहां से आएगी? बहस का एक सिरा जनसंख्या विस्फोट की तरफ भी मुड़े कि शिक्षा बजट को बढाया जाए, लड़कियों के लिए ज्यादा मौके मुहैया करवाएं जाएं और जनसंख्या पर काबू पाया जाए।

एक प्रश्न है कि किसान एकमुश्त इतना पैसा लेकर करेंगे क्या? उन्हें शेयर बाजार में लगाना या फ्लैट खरीदना आता नहीं-उनका हाल वहीं होगा जो नोएडा वालों का हुआ। 10-12 साल में दारू पीकर फूंक देंगे। इसका उपाय ये है कि सरकार सिर्फ पैसा न दे, बल्कि परिवार में लोगों को सरकारी नौकरी भी दे। वह ज्यादा ठोस उपाय है।

सुना है कि सरकार के पास कोई बंजर जमीन को ठीक करने वाली योजना थी-पुराने जमाने से। लेकिन उसका मकसद सिर्फ खेती के लिए था। अब वक्त आ गया है कि देश के बंजर इलाकों में उद्योग के लिए माहौल बनाया जाए-हालांकि ये इतना आसान नहीं है। उसके लिए वहां बिजली और सबसे जरूरी पानी का इंतजाम करना होगा-जो कठिन तो है लेकिन असंभव नहीं।
10. दरअसल हर बनिया, फरीदाबाद या नासिक के पास ही जमीन चाहता है। कोई भी भिंड मुरैना या जैसलमेर नहीं जाना चाहेगा। 21वीं सदी के हिंदुस्तान को इस पर भी सोचना होगा कि गंगा के मैदान में जहां आबादी ठुसी पड़ी है और बंगाल में कम्यूनिस्टों की खूंखार सरकार जमीन के प्रश्न पर धराशायी हो गई-वहां आखिर रास्ते क्या हैं?

लेकिन शिकारी उद्योगपतियों से इतर भी जमीन तो सरकार को चाहिए ही जन-कल्याण के लिए। ऐसे में सरकार का हाथ बिल्कुल रोक देना उचित नहीं है। बेहतर है कि सरकार इंडस्ट्रियल कॉरीडोर पर बात साफ कर दे, तो फिर भी यह बिल व्यावहारिकता के निकट है।

Monday, February 9, 2015

ठिठकी हुई दलित राजनीति के लिए ऐेसा झटका जरूरी है !

मांझी नेता नहीं हैं, प्रतीक भर हैं। लेकिन राजनीति में प्रतीक बड़े काम का होता है। कई बार प्रतीक ऐसा काम कर देता है जैसा बड़े-बड़े हाकिम नहीं कर पाते हैं। जैसे यूपी में जब पहली दफा मायावती आईँ थीं तो ET ने लिखा कि दलितों में बीए-एमए करने की होड़ लग गई। एक दशक में दलितों की साक्षरता दर पूरे देश के मुकाबले दोगुनी हो गई। मुझे याद है जब लालू यादव बिहार के CM बने तो मेरे कई यादव दोस्तों ने कहा कि वह सिर्फ इसलिए पढता है कि शायद उसकी शादी मीसा भारती से हो सकती है। शादी तो नहीं हुई, लेकिन ढेर सारे यादव ग्रेजुएट जरूर हो गए!
मांझी ने विद्रोह कर अच्छा किया। हार-जीत अलग बात है लेकिन उनका यह विद्रोह उनके समुदाय को अतिरिक्त ऊर्जा देगा। मैं सलमान खान होता तो कहता कि इस विद्रोह में एक 'किक' है! यह विद्रोह दलितों को भविष्य में बेहतर लडाई के लिए प्रेरित करेगा। 

बाबा साहेब ने जाति-विहीन राजनीति की बात की थी, दलित राजनेता दूसरों की तरह ही जाति से चिपकने लगे। हालांकि दलित राजनीति, मंडल राजनीति की तुलना में ज्यादा गतिशील है और प्रगतिशील भी। वह शून्य से शुरू होकर डिक्की तक पहुंची है। पहले उसमें सरकारी मध्यमवर्ग का जन्म हुआ, फिर उसने राजनीति पर दावा ठोका। इसके उलट पिछड़ों ने पहले राजनीति पर दावा ठोका,उसके बाद वहां मध्यमवर्ग पैदा होना शुरू हुआ। उस हिसाब से पिछड़ा राजनीति कूपमंडूक है और सिर्फ संख्याबल पर ही इतराती है। वह हमेशा क्षत्रिय बनने का ख्वाब देखती रहती है जैसे कोई हिंदी का लेखक अंग्रेजी में छपने का ख्वाब देखता रहता है। इस मामले में वह प्रयोगधर्मी नहीं है। दलित ज्यादा साहसी हैं, कम संख्या-बल पर भी उन्होंने अपने हिसाब से मोल-भाव किया है और जगह बनाई है।

भारत का दलित, पिछड़ों की आक्रामकता और सवर्णों की राजनीतिक कुशलता की वजह से बीजेपी की गोद में जा बैठा है। देखा जाए तो उस हिसाब से पिछड़ा वर्ग ज्यादा सनातन-वादी है। बाबा साहब ने कहीं लिखा है कि ये मंझोली जातियां ब्राह्मणों की समाजिक पुलिस है, जब सवर्ण गांव छोड़कर शहर में बस जाएंगे तो ये जातियां सवर्णों से भी ज्यादा आक्रामकता से दलितों पर हमला करेंगी। लगता है कि लिटरली तो नहीं लेकिन क्लासिकल रूप से ऐसा ही हो रहा है।

बाबा साहब ग्राम्य-व्यवस्था के भी एक हद तक आलोचक थे। उनके हिसाब से गांव दलितों का कब्रगाह है। आज की तारीख में वहां पर सवर्णों की जायदाद भी सुरक्षित नहीं है। यानी शहर दलितों के लिए गतिशीलता देता है और सवर्णों को तो मानो पंख ही दे देता है। तो गांव किसके लिए सुरक्षित है? पिछड़ो के लिए? शायद ये भी पूरा सच नहीं है। वे गांव में सुरक्षित रहकर भी क्या कर पाएंगे जहां विकास की धारा ही सूख गई है। गांधी ने अलग अर्थों में ग्राम-स्वराज्य की बात की थी। वह विकेंद्रीकरण का मॉडेल था। हूबहू गांव न सही तो छोटे-छोटे 100-500 कस्बे-शहर जिसकी बात मोदी भी कर रहे हैं। तो ऐसे में बापू का विकेंद्रीकरण और अम्बेदकर के नगरीय व्यवस्था की तरफ झुकाव को मिला दिया जाए तो दलितों का कुछ हो सकता है। 

लेकिन सावधान। कहीं ऐसा न हो कि गांव से उठकर शहरी दलित, मजदूर का मजदूर बना रह जाए। इसके लिए कौन उपाय करेगा? सरकार? वह सिर्फ हिंदी पढाएगी, कुछेक नौकरियां दे देगी। समाज? समाज तो दलितों के लिए उपेक्षा का भाव रखता है और नीतीश कुमार की तरह इस्तेमाल भी करता है। दलितों का समाज सक्षम नहीं है-जो सक्षम हैं वे नव-ब्राह्मण बन गए हैं ! ये ऐसे कुछ सवाल हैं जिनसे दलितों को और पूरे समाज को टकराना होगा और मांझी जैसे प्रकरण उन्हें बार-बार अपनी हकीकत की याद दिलाते रहेंगे।

Saturday, February 7, 2015

दिल्ली चुनाव: जीत सकती है बीजेपी!

पिछले साल विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 33 फीसदी वोट मिले थे और आप को 29.5 फीसदी। लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट 13 फीसदी बढ गया, उसे 46 फीसदी मिला और आपको 33 फीसदी। यानी थोड़ा आप का भी बढा। कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुक्सान हुआ। उसे विधानसभा में 24.5 फीसदी वोट मिला था जो लोकसभा के वक्त गिरकर करीब 15 फीसदी रह गया। 
लोकसभा चुनाव में मोदी को जिताने और मनमोहन को हराने के लिए वोट हुआ था। यानी 46 फीसदी वोट बीजेपी को इन्ही दो महान कार्यों के लिए मिले थे। लेकिन इस चुनाव में न तो मनमोहन जैसा अलोकप्रिय विरोधी सामने था और न ही मोदी जैसा करिश्माई सामने था। यानी बीजेपी को उन बहुत सारे लोगों का वोट नहीं मिला होगा जिन्होंने "मोदी बनाओ-कांग्रेस हटाओ" प्रोजेक्ट के तहत उसे वोट दिया होगा। मान लिया जाए कि उस बढे हुए 13 फीसदी में से आधे ने यानी करीब 6.5 फीसदी ने भी उदासीनता दिखाई हो तो बीजेपी घटकर 39.5 फीसदी पर आ जाएगी। लेकिन वो 6.5 फीसदी जाएगा कहां? कांग्रेस में कदापि नहीं। यानी वो "आप" को मिलेगा। यानी "आप" का वोट बढकर 33+6.5= 39.5 फीसदी हो जाएगा।

लेकिन अभी ठहरिये। आप को और फायदा होना है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 15 फीसदी वोट मिले थे जिसमें बहुत सारे अल्पसंख्यकों के थे और मध्यमवर्ग व कुछ दलितों के भी रहे होंगे। इस बार कांग्रेस की जो हालत है उसका वोट सत्यनारायण पूजा के प्रसाद की तरह बंट गया होगा। मान लें कि उस 15 फीसदी में करीब 7 फीसदी वोट खांटी अल्पसंख्यकों के थे, तो तय मानिए कि उसमें से 5 फीसदी तो इस बार आप में चले गए होंगे। यानी "आप" हो जाती है बढकर 39.5+5=44.5 फीसदी। 

लेकिन ठहरिए, यहां आप में से अब कुछ वोट माइनस कीजिए। आप ने जिस तरह से गरीबों और अल्पसंख्यकों का जमावड़ा किया है-वो कुछ मध्यमवर्गीय वोटरों को बैचेन कर रहा है जिसने पिछली बार उसे विधानसभा व लोकसभा में वोट कर दिया था। यहां पर ऐसे वोटर करीब 3-4 फीसदी होंगे। ज्यादा हुए तो आप को भारी झटका लगेगा। शाही इमाम ने भी कम से कम 1 फीसदी वोटरों को हिलाया-डुलाया होगा। यानी आप के इस 44 फीसदी में से 4 फीसदी घटा दीजिए। कुल मिलाकर आप की फाइनल टैली 40 फीसदी वोट के आसपास है।
लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस से कुछ मध्यमवर्गीय हिंदू और दिल्ली का दलित वोट बीजेपी में भी गया होगा(दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम दंगा दरअसल दलित-मुस्मिल दंगा था)। कांग्रेस के पतन की मलाई सिर्फ आप नहीं खाएगी। यानी अगर हम मान लें कि इस बार कांग्रेस को 15 की जगह महज 8-10 फीसदी वोट मिले तो 2-3 फीसदी मध्यमवर्गीय हिंदू वोट बीजेपी में जाएगा। यानी बीजेपी हो जाएगी 43 फीसदी। यहां पर थोड़ा सा और दलित वोट बैंक बीजेपी को भारी कर देता है जैसा कि अनुमान है। 
5.इस अनुमान से बीजेपी करीब 44-45 वोट पर बैठी है और आप 40 फीसदी पर। दोनों के बीच 5 फीसदी की भारी खाई है। ऐसे में बीजेपी चुनाव जीत जाएगी।
लेकिन प्वाइंट नंबर-2 में वर्णित भाजपा के 13 फीसदी वोट में से अगर "आप" 10 फीसदी खींच लेती है तो "आप" 43 फीसदी और बीजेपी 40 फीसदी पर चली आएगी।
लेकिन देखा गया है कि 10 फीसदी की निगेटिव वोटिंग अमूमन नहीं होती है-अगर होती है तो किसी पार्टी के खिलाफ जबर्दस्त गुस्से में होती है। यहां बीजेपी से ऐसा गुस्सा था नहीं। ऐसे में 8 फीसदी की निगेटिव वोटिंग दोनो के वोट को "टाई" कर देंगे।
8. यानी स्थिति जो दिख रही है उसमें या तो बीजेपी जीत जाएगी या दोनों दल की स्थिति बराबर हो जाएगी। "आप" के जीतने की स्थिति मुश्किल लग रही है।

Tuesday, May 7, 2013

वैशाली यात्रा-10


अब हमारे एजेंडे में था भगवान महावीर की जन्मस्थली को देखना जो वैशाली की शायद सबसे महत्वपूर्ण जगह है लेकिन लोगबाग अशोक स्तंभ की प्रसिद्धि के सामने अक्सर इसे भूल जाते हैं। वैशाली में जहां अशोक स्तंभ है, उससे करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर मुख्य सड़क से दाईं तरफ एक पक्की सड़क निकलती है जो वासोकुंड गांव चली जाती है। इसे प्राचीन ग्रंथों में विदेहकुंड, कुंडलग्राम या कुंडग्राम भी कहा गया है। आज से करीब 2600 साल पहले जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म यहीं हुआ था।


वासोकुंड सांस्कृतिक-भौगोलिक रूप से वैशाली का ही हिस्सा है लेकिन प्रशासनिक रूप से जिला वैशाली की सीमा यहां खत्म हो जाती है और अब यह मुजफ्फरपुर का हिस्सा है। कह सकते हैं कि यह वैशाली-मुजफ्फरपुर के बिल्कुल बीच में है। वासोकुंड की तरफ जाते हुए आपको लीचियों के बागान दिखने लगते हैं और आप समझने लगते हैं कि कुछ-कुछ अलग सा है।

मैं जब वासोकुंड जा रहा था तो मेरे मन में एक गजब सा उल्लास था। मैं दुनिया में एक प्रमुख धर्म के तीर्थंकर के जन्मस्थल की तरफ जा रहा था जहां मेरी कल्पना में हजारो श्रद्धालुओं की जमघट होगी। लेकिन रास्ते में वीरानगी छाई हुई थी। इक्का दुक्का साईकिल सवार और यदा कदा गाय-भैंसों के अलावा कुछ नहीं मिला। गांव शुरू होने से पहले सड़क की दाईं तरफ एक जैन शोध संस्थान दिखा, तो लगा कि हम वासोकुंड के नजदीक हैं।

आगे चौक पर किसी से पूछने पर पता चला कि वासोकुंड यहीं है। महावीर का जन्मस्थल कहां है? ‘दाएं लीजिए, सामने बोर्ड लगा है।


वह पांचेक एकड़ में फैला हुआ एक परिसर था, जो निर्माणाधीन था। ईंट की चारदीवारी से घिरी हुई जमीन थी जहां सड़क की तरफ से एक लोह का फाटक लगा हुआ था। अंदर लीची के पेड़ और ईंट और पत्थरों के ढ़ेर। दूर-दूर तक कोई नहीं। हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ की हमारी कल्पना को गहरा धक्का लगा। वहां तो सन्नाटा पसरा हुआ था। फाटक से अंदर जाने पर एक गार्डनुमा व्यक्ति बैठा मिला जिसने बताया कि मंदिर पिछले कई सालों से निर्माणाधीन है और विस्तृत जानकारी मंदिर के मुख्य प्रबंधक जमुना प्रसाद देंगे जो मध्यप्रदेश के सागर के रहनेवाले थे।

बहरहाल, हम ईंट-पत्थरों के ढ़ेर से होकर आगे बढ़े तो एक विशालकाय निर्माणाधीन मंदिर था जिसमें जगह-जगह ऊपर से लेकर नीचे तक बांस के बल्ले लगे हुए थे। उस मंदिर में महावीर स्वामी की एक मूर्ति स्थापित थी और चबूतरे पर मंदिर का एक भव्य डिजायन था। बगल में दीवार पर एक पोस्टर टंगा था जिसमें मंदिर कमेटी के सदस्यों और उसके संरक्षक आचार्य विद्यानंदजी की तस्वीर थी। विद्यानंदजी का मंदिर निर्माण में बहुत बड़ा योगदान बताया जा रहा था और वे दिल्ली में रहते थे।


मंदिर के पहले माले से बाईं तरफ एक गेस्ट हाउस का निर्माण किया जा रहा था और दाईं तरफ एक जैन कमेटी का भोजनालय था जिसमें सस्ते दर पर भोजन की व्यवस्था थी। अलबत्ता दिन के चार बज चुके थे, तो भोजनालय बंद था।

कुर्सी पर मंदिर के प्रबंधक जमुना प्रसाद बैठे थे और सामने एक गेस्ट रजिस्टर और दानपेटी थी। उनसे बात करने पर टुकड़े-टुकड़े में जो जानकारी मिली उसके मुताबिक यह जगह 1957 तक भारत सरकार के अधीन थी और बाद में बिहार सरकार की देखरेख में आ गई। जैन कमेटी ने मुकदमा दायर किया तो सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई के बाद सन् 2007 में इसे जैन कमेटी को सुपुर्द कर दिया गया जिसने आसपास की पांचेक एकड़ जमीन खरीदकर इस पर एक भव्य मंदिर बनवाने का काम शुरू किया। मंदिर सन् 2013 में बनकर तैयार हो जाने की उम्मीद थी।हालांकि वहां काम के रफ्तार को देखकर कतई नहीं लग पा रहा था कि सन् 2013 में मंदिर बन पाएगा।

जमुना प्रसाद ज्यादा कुरेदने पर बातों को कुछ छुपाते नजर आए और बार-बार वे मंदिर के मुख्य इंजिनीयर से बात करने की सलाह देते नजर आए जो थोड़ी दूर खड़े किसी से मोबाईल पर लंबी वार्ता में तल्लीन थे।

तो जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर के जन्मस्थली का ये हाल था। बिहार या भारत की सरकार ने उसे जैन कमेटी के हवाले कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी और जैन कमेटी वाले भी बहुत उत्साहित नहीं लग रहे थे। मुझे पिछले साल अपनी जयपुर यात्रा का स्मरण हो आया जहां शहर से बाहर पदमपुर जैन मंदिर में हजारों पर्यटकों और श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ था और उस इलाके का वह एक लैंडमार्क था। लेकिन महावीर स्वामी की जन्मस्थली की यह अवहेलना क्यों थी, मेरी समझ से बाहर थी।

Monday, May 6, 2013

वैशाली यात्रा-9


हमारे पास समय कम था और अब हम अशोक स्तंभ देखने के लिए चले जो वहां से करीब 2 किलोमीटर उत्तर की दिशा में था। उस जगह को कोल्हुआ गांव कहते हैं। अशोक स्तंभ को बचपन से हम किताबों मे देखते आ रहे थे।

हमने परिसर में जाने का टिकट लिया और बाहर ही बाईक खड़ी की। बाहर कुछ दुकानें थी जो अमूमन इस तरह के जगहों पर होती हैं। बोतलबंद पानी, कोल्डड्रिंक, बुद्ध की काष्ठ और प्रस्तर मूर्तियों के साथ गणेश और बहुत सारी आकृतियां बिक रही थीं। लेकिन वहां भी बहुत भीड़-भाड़ नहीं थी। बाहर सन्नाटा सा था और फरवरी का सूरज प्यारा लग रहा था।


अंदर जाते ही स्तूप का भग्नावशेष और स्तंभ दिखा। परिसर में प्रवेश करते ही खुदाई में मिली इंटों से निर्मित गोलाकार स्तूप और अशोक स्तम्भ दिखायी दे जाता है। एकाश्म स्‍तंभ का निर्माण लाल बलुआ पत्‍थर से हुआ है। इस स्‍तंभ के ऊपर घंटी के आकार की बनावट है (लगभग १८.३ मीटर ऊंची ) जो इसको और आकर्षक बनाता है। अशोक स्तंभ को स्थानीय लोग भीमसेन की लाठी कहकर पुकारते हैं। यहीं पर एक छोटा सा कुंड है, जिसको रामकुंड के नाम से जाना जाता है। पुरातत्व विभाग ने इस कुण्ड की पहचान मर्कक-हद के रूप में की है। कुण्ड के एक ओर बुद्ध का मुख्य स्तूप है और दूसरी ओर कुटाग्रशाला है जिसका जिक्र बुद्ध साहित्य में व्यापक तौर पर आता है।

 परिसर में बड़े करीने से रंग-बिरंगे गुलाब लगाए गए थे और घासों की छंटाई की गई थी। सामने स्तंभ के पास एक दक्षिण कोरियाई दल(जिसमें करीब 30 लोग थे) बैठकर कुछ मंत्रोच्चार कर रहा था जिसमें कॉरपोरेट किस्म के लोग थे और कुछ बौद्ध भिक्षु उन्हें मंत्र पढ़वा रहे थे।

उस मंत्र सभा में हम भी बैठ गए। हमें मंत्र तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था-पता नहीं वो पालि भाषा में था या कोरियन में। लेकिन उसकी धुन गजब की थी। मन के गहरे तल तक एक शांति पसर आई। हमने राजीव की तरफ देखा, वो मुस्कुरा रहा था। शायद वह सोच रहा था कि इस दल में जरूर सैमसंग या हुंडई मोटर्स का चेयरमैन बैठा होगा जिससे वह दोस्ती गांठ लेगा !


कोरियन दल के अलावा वहां कुछ हिंदुस्तानी जोड़े भी थे जो शायद बुद्ध से अपने लिए आशीर्वाद मांगने आए थे। मोबाईल और डिजिटल कैमरों के इस दौर में फोटोग्राफरों का धंधा दम तोड़ रहा था।

वैशाली में जिस जगह पर अशोक का स्तंभ है वह एक बौद्ध विहार था जिसका नाम कुटाग्रशाला विहार था और जहां महात्मा बुद्ध अक्सर ठहरा करते थे। वहां पर जिस स्तूप का भग्नावशेष है उसे आनंद स्तूप कहते हैं और इस स्तंभ का निर्माण सम्राट अशोक ने करीब 2300 साल पहले करवाया था। एक अन्य कथा के अनुसार यह बौद्धविहार और इससे लगा वन आम्रपाली ने बुद्ध को भेंट स्वरूप दी थी।

हमने स्तंभ को छुआ, स्तूप और वहां के ईंटों को छुआ मानो हम इतिहास को टटोलने की कोशिश कर रहे हों। हमने सोचा कि इन ईंटो को सम्राट अशोक ने भी जरूर छुआ होगा।

Friday, May 3, 2013

वैशाली यात्रा-8


अस्थि स्तूप या रेलिक स्तूप के सामने की सड़क पर कुछ बालक भिक्षु नजर आए। हमने उनसे बात की और पूछा कि वे कब भिक्षु बने? बातचीत से पता चला कि वे बोधगया के रहनेवाले हैं और वहीं उन्हें दीक्षा दी गई। हमने उनसे उनका नाम पूछा, तो जैसा कि भिक्षुओं का नाम होता है, उसी तरह का उनका नाम था जिसके शुरु में भंते लगा हुआ था। वे भगवा और पीले वस्त्रों में थे और उनके सिर मुंडे हुए थे।


शुरू में हमारे सवालों का जवाब देते हुए वे हिचक रहे थे। हमने उनसे पूछा कि क्या वे पढ़ते लिखते भी हैं, तो पता चला बगल के बौद्ध मठ में एक स्कूल है जहां उनके पढ़ने और रहने-खाने की व्यवस्था है। उनमें से अधिकांश या सबके सब दलित और पिछड़ी जातियों के गरीब बच्चे थे जिनमें से किसी का पिता मध्य बिहार में खेतिहर मजदूर था तो कोई गया में रिक्शा चलाता था। आसपास मूर्तियां और कैलेंडर बेचनेवाले बच्चे उन्हें छेड़ रहे थे और वे शरमाकर कर भाग रहे थे। मुझे ऐसा लगा मानो किसी नाटक में उन्हें जबरन अभिनय करने भेज दिया गया हो ! बौद्ध भिक्षु बनने-बनाने की यह भी एक कहानी थी।  

आगे चलकर सड़क बाईं और दाईं तरफ मुड़ गई है। अभिषेक पुष्करिणी के किनारे आगे से बाईं ओर मुड़ने पर खूबसूरत और विशाल सा शांति स्तूप दिखता है जो मन मोह लेता है। दूसरी तरफ कुछ होटलनुमा इमारतें दिखीं, जो शायद सरकारी थी।


वैशाली के शांति स्तूप का निर्माण जापान के निप्पोनजन मायहोजी पंथ ने राजगीर के बुद्ध विहार सोसाईसटी के साथ संयुक्त रूप से किया है। द्वीतीय विश्वयुद्ध के बाद जापान के हिरोशिमा और नागाशाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद से जापान के निचिदात्सु फूजिई गुरूजी ने पूरी दुनिया में शांति स्तूपों के निर्माण की शुरुआत की थी और वैशाली का शांति स्तूप भी उसी सिलसिले में एक कड़ी है। गोल घुमावदार गुम्बद, अलंकृत सीढियां और उनके दोनों ओर स्वर्ण रंग के बड़े सिंह जैसे पहरेदार शांति स्तूप की रखवाली कर रहे प्रतीत होते हैं। सीढियों के सामने ही ध्यानमग्न बुद्ध की चमकती हुई प्रतिमा दिखायी देती है। शांति स्तूप के चारों ओर बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में अत्यन्त सुन्दर मूर्तियां ओजस्विता की चमक से भरी दिखाई देती हैं।


शांति स्तूप के सामने अभिषेक पुष्करिणी है और उसके उस पार बुद्ध का रेलिक या अस्थि स्तूप। दूसरी तरफ गेहूं के हरे-भरे खेत और सरसो के फूल। बड़ा मनमोहक दृश्य बन पड़ता है। मन करता है घंटों वहीं बैठे रहे। ढ़ेर सारे स्कूली बच्चे और स्थानीय लोग वहां फोटो खिंचवा रहे थे जिसमें से तो बहुत सारे नव-विवाहित जोड़े थे जो आसपास के गांवों से आए हुए थे।